भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 88

७८ * मत्स्यपुराण *


बीसवाँ अध्याय

महर्षि कौशिकके पुत्रोंका वृत्तान्त तथा पिपीलिकाकी कथा

ऋषय ऊचुःऋषियोंने पूछा—
कथं कौशिकदायादाः प्राप्तास्ते योगमुत्तमम्।<br>पञ्चभिर्जन्मसम्बन्धैः कथं कर्मक्षयो भवेत्॥ १सूतजी! महर्षि कौशिकके* वे पुत्र किस प्रकार उत्तम योगको प्राप्त हुए तथा पाँच ही बार जन्म ग्रहण करनेसे उनके अशुभ कर्मोंका विनाश कैसे हुआ?॥ १॥
सूत उवाच**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! कुरुक्षेत्रमें कौशिक नामक एक धर्मात्मा महर्षि थे। उनके सात पुत्र थे। (उन पुत्रोंके वृत्तान्त) नाम एवं कर्मानुसार बतला रहा हूँ, सुनिये।
कौशिको नाम धर्मात्मा कुरुक्षेत्रे महानृषिः।<br>नामतः कर्मतस्तस्य सुतान् सप्त निबोधत॥ २उनके स्वसृप, क्रोधन, हिंस्र, पिशुन, कवि, वाग्दुष्ट और पितृवर्ती—ये नाम थे। पिताकी मृत्युके पश्चात् वे सभी महर्षि गर्गके शिष्य हुए।
स्वसृपः क्रोधनो हिंस्रः पिशुनः कविरेव च।<br>वाग्दुष्टः पितृवर्ती च गर्गशिष्यास्तदाभवन्॥ ३उस समय समस्त लोकोंको भयभीत करनेवाली महती अनावृष्टि हुई, जिसके कारण भीषण अकाल पड़ गया।
पितर्युपरते तेषामभूद् दुर्भिक्षमुल्बणम्।<br>अनावृष्टिश्च महती सर्वलोकभयंकारी॥ ४इसी बीच वे सभी तपस्वी अपने गुरु गर्गाचार्यकी आज्ञासे उनकी सेवामें लग गये। वहाँ वनमें वे सभी भूखसे अत्यन्त पीड़ित हो गये।
गर्गादेशाद् वने दोग्ध्रीं रक्षन्तस्ते तपोधनाः।<br>खादामः कपिलामेतां वयं क्षुत्पीडिता भृशम्॥ ५जब क्षुधा-शान्तिका कोई अन्य उपाय न सूझा, तब छोटे भाई पितृवर्तीने श्राद्ध-कर्म करनेकी सम्मति दी।
इति चिन्तयतां पापं लघुः प्राह तदानुजः।<br>यद्यवश्यमियं वध्या श्राद्धरूपेण योज्यताम्॥ ६बड़े भाइयोंने ‘अच्छा, ऐसा ही करो’—ऐसी आज्ञा पाकर
श्राद्धे नियोज्यमानेयं पापात् त्रास्यति नो ध्रुवम्।<br>एवं कुर्वित्यनुज्ञातः पितृवर्ती तदाग्रजैः॥ ७पितृवर्तीने समाहित-चित्त होकर श्राद्धका उपक्रम आरम्भ किया। उस समय उसने छोटे-बड़ेके क्रमसे दो भाइयोंको देव-कार्यमें, तीनको पितृकार्यमें और एकको अतिथिरूपमें नियुक्त किया तथा स्वयं श्राद्धकर्ता बन गया।
चक्रे समाहितः श्राद्धमुपयुज्य च तां पुनः।<br>द्वौ दैवे भ्रातरौ कृत्वा पित्रे त्रीनप्यनुक्रमात्॥ ८इस प्रकार पितृपरायण पितृवर्तीने पितरोंका स्मरण करते हुए मन्त्रोच्चारणपूर्वक श्राद्धकार्य सम्पन्न किया।
तथैकमतिथिं कृत्वा श्राद्धदः स्वयमेव तु।<br>चकार मन्त्रवच्छ्राद्धं स्मरन् पितृपरायणः॥ ९कालक्रमानुसार मृत्युके उपरान्त श्राद्धवैगुण्यरूप कर्मदोषसे वे सभी दाशपुर (मन्दसौर) नामक नगरमें बहेलिया होकर उत्पन्न हुए, किंतु पितृ-स्नेह (श्राद्धकृत्य)-से भावित होनेके कारण उन्हें पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंका स्मरण बना रहा।
विना गवां वत्सकोऽपि गुरवे विनिवेदितः।<br>व्याघ्रेण निहता धेनुर्वत्सोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥ १०पूर्वजन्मके कर्मोंके परिणाम-स्वरूप वे क्रूरकर्मी बहेलियोंके घरमें पैदा तो हुए,
एवं सा भक्षिता धेनुः सप्तभिस्तैस्तपोधनैः।<br>वैदिकं बलमाश्रित्य क्रूरे कर्मणि निर्भयाः॥ ११
ततः कालावकृष्टास्ते व्याधा दाशपुरेऽभवन्।<br>जातिस्मरत्वं प्राप्तास्ते पितृभावेन भाविताः॥ १२
यत् कृतं क्रूरकर्माणिश्राद्धरूपेण तैस्तदा।<br>तेन ते भवने जाता व्याधानां क्रूरकर्मणाम्॥ १३

* कौशिक नामके प्राचीन समयमें १०—१२ व्यक्ति हुए हैं, जिनमें विश्वामित्र सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। पर ये उनसे भिन्न हैं। विश्वामित्रका सम्बन्ध बिहारसे लेकर कन्नौजतक रहा है, पर ये कुरुक्षेत्रवासी हैं। यह कथा पद्मपुराण १।१०, हरिवंश १।२१—२७ आदिमें भी है। और इसका संकेत गरुडपु० १।२१०।२०-२१ आदि बीसों स्थलोंपर है।