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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

७८ * मत्स्यपुराण *


बीसवाँ अध्याय

महर्षि कौशिकके पुत्रोंका वृत्तान्त तथा पिपीलिकाकी कथा

ऋषय ऊचुःऋषियोंने पूछा—
कथं कौशिकदायादाः प्राप्तास्ते योगमुत्तमम्।<br>पञ्चभिर्जन्मसम्बन्धैः कथं कर्मक्षयो भवेत्॥ १सूतजी! महर्षि कौशिकके* वे पुत्र किस प्रकार उत्तम योगको प्राप्त हुए तथा पाँच ही बार जन्म ग्रहण करनेसे उनके अशुभ कर्मोंका विनाश कैसे हुआ?॥ १॥
सूत उवाच**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! कुरुक्षेत्रमें कौशिक नामक एक धर्मात्मा महर्षि थे। उनके सात पुत्र थे। (उन पुत्रोंके वृत्तान्त) नाम एवं कर्मानुसार बतला रहा हूँ, सुनिये।
कौशिको नाम धर्मात्मा कुरुक्षेत्रे महानृषिः।<br>नामतः कर्मतस्तस्य सुतान् सप्त निबोधत॥ २उनके स्वसृप, क्रोधन, हिंस्र, पिशुन, कवि, वाग्दुष्ट और पितृवर्ती—ये नाम थे। पिताकी मृत्युके पश्चात् वे सभी महर्षि गर्गके शिष्य हुए।
स्वसृपः क्रोधनो हिंस्रः पिशुनः कविरेव च।<br>वाग्दुष्टः पितृवर्ती च गर्गशिष्यास्तदाभवन्॥ ३उस समय समस्त लोकोंको भयभीत करनेवाली महती अनावृष्टि हुई, जिसके कारण भीषण अकाल पड़ गया।
पितर्युपरते तेषामभूद् दुर्भिक्षमुल्बणम्।<br>अनावृष्टिश्च महती सर्वलोकभयंकारी॥ ४इसी बीच वे सभी तपस्वी अपने गुरु गर्गाचार्यकी आज्ञासे उनकी सेवामें लग गये। वहाँ वनमें वे सभी भूखसे अत्यन्त पीड़ित हो गये।
गर्गादेशाद् वने दोग्ध्रीं रक्षन्तस्ते तपोधनाः।<br>खादामः कपिलामेतां वयं क्षुत्पीडिता भृशम्॥ ५जब क्षुधा-शान्तिका कोई अन्य उपाय न सूझा, तब छोटे भाई पितृवर्तीने श्राद्ध-कर्म करनेकी सम्मति दी।
इति चिन्तयतां पापं लघुः प्राह तदानुजः।<br>यद्यवश्यमियं वध्या श्राद्धरूपेण योज्यताम्॥ ६बड़े भाइयोंने ‘अच्छा, ऐसा ही करो’—ऐसी आज्ञा पाकर
श्राद्धे नियोज्यमानेयं पापात् त्रास्यति नो ध्रुवम्।<br>एवं कुर्वित्यनुज्ञातः पितृवर्ती तदाग्रजैः॥ ७पितृवर्तीने समाहित-चित्त होकर श्राद्धका उपक्रम आरम्भ किया। उस समय उसने छोटे-बड़ेके क्रमसे दो भाइयोंको देव-कार्यमें, तीनको पितृकार्यमें और एकको अतिथिरूपमें नियुक्त किया तथा स्वयं श्राद्धकर्ता बन गया।
चक्रे समाहितः श्राद्धमुपयुज्य च तां पुनः।<br>द्वौ दैवे भ्रातरौ कृत्वा पित्रे त्रीनप्यनुक्रमात्॥ ८इस प्रकार पितृपरायण पितृवर्तीने पितरोंका स्मरण करते हुए मन्त्रोच्चारणपूर्वक श्राद्धकार्य सम्पन्न किया।
तथैकमतिथिं कृत्वा श्राद्धदः स्वयमेव तु।<br>चकार मन्त्रवच्छ्राद्धं स्मरन् पितृपरायणः॥ ९कालक्रमानुसार मृत्युके उपरान्त श्राद्धवैगुण्यरूप कर्मदोषसे वे सभी दाशपुर (मन्दसौर) नामक नगरमें बहेलिया होकर उत्पन्न हुए, किंतु पितृ-स्नेह (श्राद्धकृत्य)-से भावित होनेके कारण उन्हें पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंका स्मरण बना रहा।
विना गवां वत्सकोऽपि गुरवे विनिवेदितः।<br>व्याघ्रेण निहता धेनुर्वत्सोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥ १०पूर्वजन्मके कर्मोंके परिणाम-स्वरूप वे क्रूरकर्मी बहेलियोंके घरमें पैदा तो हुए,
एवं सा भक्षिता धेनुः सप्तभिस्तैस्तपोधनैः।<br>वैदिकं बलमाश्रित्य क्रूरे कर्मणि निर्भयाः॥ ११
ततः कालावकृष्टास्ते व्याधा दाशपुरेऽभवन्।<br>जातिस्मरत्वं प्राप्तास्ते पितृभावेन भाविताः॥ १२
यत् कृतं क्रूरकर्माणिश्राद्धरूपेण तैस्तदा।<br>तेन ते भवने जाता व्याधानां क्रूरकर्मणाम्॥ १३

* कौशिक नामके प्राचीन समयमें १०—१२ व्यक्ति हुए हैं, जिनमें विश्वामित्र सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। पर ये उनसे भिन्न हैं। विश्वामित्रका सम्बन्ध बिहारसे लेकर कन्नौजतक रहा है, पर ये कुरुक्षेत्रवासी हैं। यह कथा पद्मपुराण १।१०, हरिवंश १।२१—२७ आदिमें भी है। और इसका संकेत गरुडपु० १।२१०।२०-२१ आदि बीसों स्थलोंपर है।

* अध्याय २० * ७९

| पितॄणां चैव माहात्म्याज्जाता जातिस्मरास्तु ते।<br>ते तु वैराग्ययोगेन आस्थायानशनं पुनः॥ १४<br>जातिस्मराः सप्त जाता मृगाः कालञ्जरे गिरौ।<br>नीलकण्ठस्य पुरतः पितृभावानुभाविताः ॥ १५<br>तत्रापि ज्ञानवैराग्यात् प्राणानुत्सृज्य धर्मतः।<br>लोकैरवेक्ष्यमाणास्ते तीर्थान्तेऽनशनेन तु॥ १६<br>मानसे चक्रवाकास्ते सञ्जाताः सप्त योगिनः।<br>नामतः कर्मतः सर्वाञ्छृणुध्वं द्विजसत्तमाः ॥ १७<br>सुमनाः कुमुदः शुद्धश्छिद्रदर्शी सुनेत्रकः।<br>सुनेत्रांशुमांश्चैव सप्तैते योगपारगाः ॥ १८<br>योगभ्रष्टास्त्रयस्तेषां बभ्रमुश्चाल्पचेतनाः।<br>दृष्ट्वा विभ्राजमानं तमुद्याने स्त्रीभिरन्वितम्॥ १९<br>क्रीडन्तं विविधैर्भावैर्महाबलपराक्रमम्।<br>पाञ्चालान्वयसम्भूतं प्रभूतबलवाहनम्॥ २०<br>राज्यकामोऽभवच्चैकस्तेषां मध्ये जलौकसाम्।<br>पितृवर्ती च यो विप्रः श्राद्धकृत् पितृवत्सलः॥ २१<br>अपरौ मन्त्रिणौ दृष्ट्वा प्रभूतबलवाहनौ।<br>मन्त्रित्वे चक्रतुश्चेच्छामस्मिन् मर्त्ये द्विजोत्तमाः॥ २२<br>तन्मध्ये ये तु निष्कामास्ते बभूवुर्द्विजोत्तमाः।<br>विभ्राजपुत्रस्त्वेकोऽभूद् ब्रह्मदत्त इति स्मृतः॥ २३<br>मन्त्रिपुत्रौ तथा चोभौ कण्डरीकसुबालकौ।<br>ब्रह्मदत्तोऽभिषिक्तः सन् पुरोहितविपश्चिता॥ २४<br>पाञ्चालराजो विक्रान्तः सर्वशास्त्रविशारदः।<br>योगिवत् सर्वजन्तूनां रुतवेत्ताभवत् तदा॥ २५<br>तस्य राज्ञोऽभवद् भार्या देवलस्यात्मजा शुभा।<br>संनतिर्नाम विख्याता कपिला याभवत् पुरा॥ २६<br>पितृकार्ये नियुक्तत्वादभवद् ब्रह्मवादिनी।<br>तया चकार सहितः स राज्यं राजनन्दनः॥ २७<br>कदाचिदुद्यानगतस्तया सह स पार्थिवः।<br>ददर्श कीटमिथुनमनङ्गकलहाकुलम्॥ २८<br>पिपीलिकामनुनयन् परितः कीटकामुकः।<br>पञ्चबाणाभितप्ताङ्गः सगद्गदमुवाच ह॥ २९ | परंतु पितरोंके ही माहात्म्यसे वे सभी जातिस्मर (पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंके ज्ञाता) बने ही रहे। पुनः श्राद्ध-कर्मके फलसे वैराग्य उत्पन्न हो जानेके कारण उन सभीने अनशन करके अपने-अपने उस शरीरका त्याग कर दिया। तदनन्तर वे सातों कालञ्जर पर्वतपर भगवान् नीलकण्ठके समक्ष मृग-योनिमें उत्पन्न हुए। वहाँ भी पितरोंके स्नेहसे अनुभावित होनेके कारण वे जातिस्मर बने ही रहे। उस योनिमें भी ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न हो जानेके कारण उन लोगोंने तीर्थ-स्थानमें अनशन करके लोगोंके देखते-देखते धर्मपूर्वक प्राणोंका उत्सर्ग कर दिया। तत्पश्चात् उन सातों योगाभ्यासी जनोंने मानसरोवरमें चक्रवाककी योनिमें जन्म धारण किया। द्विजवरो! अब आपलोग नाम एवं कर्मानुसार उन सभीका वृत्तान्त श्रवण कीजिये। इस योनिमें उनके नाम हैं—सुमना, कुमुद, शुद्ध, छिद्रदर्शी, सुनेत्रक, सुनेत्र और अंशुमान्। ये सातों योगके पारदर्शी थे। इनमेंसे अल्पबुद्धिवाले तीन तो योगसे भ्रष्ट हो गये और इधर-उधर भ्रमण करने लगे। उसी समय एक पाञ्चालवंशी नरेश, जो महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न था तथा जिसके पास अधिक-से-अधिक सेना और वाहन थे, अपने क्रीडोद्यानमें स्त्रियोंके साथ अनेकविध हाव-भावोंसे क्रीडा कर रहा था। उस शोभाशाली राजाको देखकर उन जलपक्षियोंमेंसे एकको, जो पितृभक्त श्राद्धकर्ता पितृवर्ती नामक ब्राह्मण था, राज्य-प्राप्तिकी आकाङ्क्षा उत्पन्न हो गयी। इसी प्रकार दूसरे दोनोंने राजाके दो मन्त्रियोंको प्रचुर सेना और वाहनोंसे युक्त देखकर इस मृत्युलोकमें मन्त्रि-पद प्राप्त करनेकी इच्छा व्यक्त की। द्विजवरो! उनमें जो चार निष्काम थे, वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणकुलमें पैदा हुए। उन तीनोंमेंसे पहला राजा विभ्राजके* पुत्ररूपमें ब्रह्मदत्त नामसे विख्यात हुआ तथा अन्य दो कण्डरीक और सुबालक नामसे मन्त्रीके पुत्र हुए। (राजा विभ्राजकी मृत्युके उपरान्त) विद्वान् पुरोहितने ब्रह्मदत्तको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वह पाञ्चाल-नरेश ब्रह्मदत्त प्रबल पराक्रमी, सभी शास्त्रोंमें प्रवीण, योगज्ञ और सभी जन्तुओंकी बोलीका ज्ञाता था। देवलकी सुन्दरी कन्या, जो संनति नामसे विख्यात थी, राजा ब्रह्मदत्तकी पत्नी हुई। वह ब्रह्मवादिनी थी। उस पत्नीके साथ रहकर राजकुमार ब्रह्मदत्त राज्य-भार सँभालने लगा ॥ २—२७॥<br><br>एक बार राजा ब्रह्मदत्त अपनी पत्नी संनतिके साथ भ्रमण करनेके लिये उद्यानमें गया। वहाँ उसने काम-कलहसे व्याकुल एक कीट-दम्पति (चींटा-चींटी)-को देखा। वह कीट, जिसका शरीर कामदेवके बाणोंसे संतप्त हो उठा था, चारों ओरसे चींटीसे अनुनय-विनय करता हुआ गद्गद वाणीमें बोला— |


* इसका कहीं अणुह तथा कहीं नीप नाम भी आया है।

८० * मत्स्यपुराण *

| न त्वया सदृशी लोके कामिनी विद्यते क्वचित्।<br>मध्यक्षामातिजघना बृहद्वक्षोऽभिगामिनी ॥ ३०<br><br>सुवर्णवर्णा सुश्रोणी मञ्जूक्ता चारुहासिनी।<br>सुलक्ष्यनेत्ररसना गुडशर्करवत्सला ॥ ३१<br><br>भोक्ष्यसे मयि भुङ्क्ते त्वं स्नासि स्नाते तथा मयि।<br>प्रोषिते सति दीना त्वं क्रुद्धेऽपि भयचञ्चला ॥ ३२<br><br>किमर्थं वद कल्याणि सरोषवदना स्थिता।<br>सा तमाह सकोपा तु किमालपसि मां शठ ॥ ३३<br><br>त्वया मोदकचूर्णं तु मां विहाय विनेष्यता।<br>प्रदत्तं समतिक्रान्ते दिनेऽन्यस्याः समन्मथ ॥ ३४<br><br>पिपीलिक उवाच<br>त्वत्सादृश्यान्मया दत्तमन्यस्यै वरवर्णिनि।<br>तदेकमपराधं मे क्षन्तुमर्हसि भामिनि ॥ ३५<br><br>नैतदेवं करिष्यामि पुनः क्वापीह सुव्रते।<br>स्पृशामि पादौ सत्येन प्रसीद प्रणतस्य मे ॥ ३६<br><br>सूत उवाच<br>इति तद्वचनं श्रुत्वा सा प्रसन्नाभवत् ततः।<br>आत्मानमर्पयामास मोहनाय पिपीलिका ॥ ३७<br><br>ब्रह्मदत्तोऽप्यशेषं तं ज्ञात्वा विस्मयमागमत्।<br>सर्वसत्त्वरुतज्ञत्वात् प्रसादाच्चक्रपाणिनः ॥ ३८ | 'प्रिये! इस जगत्में तुम्हारे समान सुन्दरी स्त्री कहीं कोई भी नहीं है। तुम्हारा कटिप्रदेश पतला और जंघे मोटे हैं, तुम स्तनोंके भारी भारसे विनम्र होकर चलनेवाली, स्वर्णके समान गौरवर्णा, सुन्दर कमरवाली, मृदुभाषिणी, मनोहर हास्यसे युक्त, भलीभाँति लक्ष्यको भेदन करनेवाले नेत्रों और जीभसे समन्वित तथा गुड़ और शक्करकी प्रेमी हो। तुम मेरे भोजन कर लेनेके पश्चात् भोजन करती हो तथा मेरे स्नान कर लेनेपर स्नान करती हो। इसी प्रकार मेरे परदेश चले जानेपर तुम दीन हो जाती हो और क्रुद्ध होनेपर भयभीत हो उठती हो। कल्याणि! बतलाओ तो सही, तुम किस कारण क्रोधसे मुँह फुलाये बैठी हो।' तब क्रोधसे भरी हुई चींटी उस कीटसे बोली—'शठ! तुम क्या मुझसे व्यर्थ बकवाद कर रहे हो? अरे धूर्त! अभी कल ही तुमने मेरा परित्याग करके लड्डूका चूर्ण ले जाकर दूसरी चींटीको नहीं दिया है?'॥ २८—३४॥<br><br>चींटा बोला—वरवर्णिनि! तुम्हारे सदृश रूप-रंगवाली होनेके कारण मैंने भूलसे दूसरी चींटीको लड्डू दे दिया है, अतः भामिनि! तुम मेरे इस एक अपराधको क्षमा कर दो। सुव्रते! मैं पुनः कभी भी इस प्रकारका कार्य नहीं करूँगा। मैं सत्यकी दुहाई देकर तुम्हारे चरण छूता हूँ, तुम मुझ विनीतपर प्रसन्न हो जाओ॥ ३५-३६॥<br><br>सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इस प्रकार उस चींटेका कथन सुनकर वह चींटी प्रसन्न हो गयी। इधर, चक्रपाणि भगवान् विष्णुकी कृपासे समस्त प्राणियोंकी बोलीका ज्ञाता होनेके कारण ब्रह्मदत्त भी उस सारे वृत्तान्तको जानकर विस्मयविमुग्ध हो गये॥ ३७-३८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे श्राद्धमाहात्म्ये पिपीलिकावहासो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पके श्राद्धमाहात्म्यमें पिपीलिकावहास नामक बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०॥


इक्कीसवाँ अध्याय

ब्रह्मदत्तका वृत्तान्त तथा चार चक्रवाकोंकी गतिका वर्णन

| ऋषय ऊचुः<br>कथं सत्त्वरुतज्ञोऽभूद् ब्रह्मदत्तो धरातले।<br>तच्चाभवत् कस्य कुले चक्रवाकचतुष्टयम् ॥ १<br><br>सूत उवाच<br>तस्मिन्नेव पुरे जातास्ते च चक्राह्वयास्तदा।<br>वृद्धद्विजस्य दायादा विप्रा जातिस्मराः पुरा ॥ २ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी! ब्रह्मदत्त इस भूतलपर जन्म लेकर समस्त प्राणियोंकी बोलीके ज्ञाता कैसे हो गये? तथा वे चारों चक्रवाक किसके कुलमें उत्पन्न हुए?॥ १॥<br><br>सूतजी कहते हैं—ऋषियो! वे चारों चक्रवाक उसी ब्रह्मदत्तके नगरमें एक वृद्ध ब्राह्मणके पुत्ररूपसे उत्पन्न हुए थे। उस जन्ममें भी वे ब्राह्मण पूर्ववत् जातिस्मर बने रहे। |

* अध्याय २१ * ८१


| धृतिमांस्तत्त्वदर्शी च विद्याचण्डस्तपोत्सुकः।<br>नामतः कर्मतश्चैते सुदरिद्रस्य ते सुताः॥ ३<br>तपसे बुद्धिरभवत् तदा तेषां द्विजन्मनाम्।<br>यास्यामः परमां सिद्धिमित्यूचुस्ते द्विजोत्तमाः॥ ४<br>ततस्तद्वचनं श्रुत्वा सुदरिद्रो महातपाः।<br>उवाच दीनया वाचा किमेतदिति पुत्रकाः॥ ५<br>अधर्म एष इति वः पिता तानभ्यवारयत्।<br>वृद्धं पितरमुत्सृज्य दरिद्रं वनवासिनः॥ ६<br>को नु धर्मोऽत्र भविता मत्त्यागाद् गतिरेव वा।<br>ऊचुस्ते कल्पिता वृत्तिस्तव तात वदस्व तत्॥ ७<br>वित्तमेतत् पुरो राज्ञः स ते दास्यति पुष्कलम्।<br>धनं ग्रामसहस्राणि प्रभाते पठतस्तव॥ ८<br>ये विप्रमुख्याः कुरुजाङ्गलेषु<br>दाशास्तथा दाशपुरे मृगाश्च।<br>कालंजरे सप्त च चक्रवाका<br>ये मानसे तेऽत्र वसन्ति सिद्धाः॥ ९<br>इत्युक्त्वा पितरं जग्मुस्ते वनं तपसे पुनः।<br>वृद्धोऽपि राजभवनं जगामात्मार्थसिद्धये॥ १० | (उस समय उनके) धृतिमान्, तत्त्वदर्शी, विद्याचण्ड और तपोत्सुक—ये चार नाम थे। वे कर्मानुसार एक अत्यन्त सुदरिद्र (उस ब्राह्मणका नाम भी सुदरिद्र था) ब्राह्मणके पुत्र थे। बचपनमें ही इन ब्राह्मणोंकी बुद्धि तपस्याकी ओर प्रवृत्त हो गयी। तब ये द्विजश्रेष्ठ पितासे प्रार्थना करते हुए बोले—'पिताजी! हमलोग तपस्या करके परम सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं।' उनके इस कथनको सुनकर महातपस्वी सुदरिद्र दीन वाणीमें बोले—'पुत्रो! यह कैसी बात कह रहे हो? मुझ दरिद्र बूढ़े पिताको छोड़कर तुमलोग वनवासी होना चाहते हो, भला मेरा परित्याग कर देनेसे तुमलोगोंको कौन-सा धर्म प्राप्त होगा तथा तुम्हारी क्या गति होगी? यह तो महान् अधर्म है।' ऐसा कहकर पिताने उन्हें मना कर दिया। यह सुनकर उन पुत्रोंने कहा—'तात! हमलोगोंने आपके जीविकोपार्जनका प्रबन्ध कर लिया है। इसके अतिरिक्त आपको और क्या चाहिये, सो बतलाइये। यदि आप प्रातःकाल राजा ब्रह्मदत्तके समक्ष जाकर (आगे बताये जानेवाले श्लोकका) पाठ कीजियेगा तो वे आपको प्रचुर धन-सम्पत्ति एवं सहस्रों ग्राम प्रदान करेंगे। (उस श्लोकका अर्थ यों है—)'जो कुरुक्षेत्रमें श्रेष्ठ ब्राह्मण, दाशपुर (मंदसौर)-में व्याध, कालञ्जर पर्वतपर मृग और मानसरोवरमें सात चक्रवाक थे, वे सिद्ध (होकर) यहाँ निवास करते हैं।' पितासे ऐसा कहकर वे सभी तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये। इधर वृद्ध सुदरिद्र भी अपनी स्वार्थ-सिद्धिके लिये राजभवनकी ओर चल पड़े॥ २—१०॥ | | अणुहो नाम वैभ्राजः पाञ्चालाधिपतिः पुरा।<br>पुत्रार्थी देवदेवेशं हरिं नारायणं प्रभुम्॥ ११<br>आराधयामास विभुं तीव्रव्रतपरायणः।<br>ततः कालेन महता तुष्टस्तस्य जनार्दनः॥ १२<br>वरं वृणीष्व भद्रं ते हृदयेनेप्सितं नृप।<br>एवमुक्तस्तु देवेन वव्रे स वरमुत्तमम्॥ १३<br>पुत्रं मे देहि देवेश महाबलपराक्रमम्।<br>पारगं सर्वशास्त्राणां धार्मिकं योगिनां परम्॥ १४<br>सर्वसत्त्वरुतज्ञं मे देहि योगिनमात्मजम्।<br>एवमस्त्विति विश्वात्मा तमाह परमेश्वरः॥ १५<br>पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत।<br>ततः स तस्य पुत्रोऽभूद् ब्रह्मदत्तः प्रतापवान्॥ १६ | (अब ब्रह्मदत्तकी उत्पत्ति-कथा बतलाते हैं—) पूर्वकालमें पञ्चाल देशके एक अणुह नामक नरेश हो गये हैं, जो विभ्राट्के पुत्र थे। वे पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे कठोर व्रतमें तत्पर होकर सामर्थ्यशाली एवं सर्वव्यापक देवदेवेश्वर नारायण श्रीहरिकी आराधना करने लगे। तत्पश्चात् अधिक काल व्यतीत होनेपर भगवान् जनार्दन उनकी आराधनासे प्रसन्न हुए (और उनके समक्ष प्रकट होकर बोले—) 'राजन्! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम अपना मनोऽभिलषित वरदान माँग लो।' भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर राजाने उत्तम वरकी याचना करते हुए कहा—'देवेश! मुझे ऐसा पुत्र प्रदान कीजिये, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न, सम्पूर्ण शास्त्रोंका पारगामी विद्वान्, धार्मिक, श्रेष्ठ योगी, सम्पूर्ण प्राणियोंकी बोलीका ज्ञाता और योगाभ्यासी हो। भगवन्! मुझे ऐसा ही औरस पुत्र दीजिये।' यह सुनकर विश्वात्मा परमेश्वर राजासे 'ऐसा ही हो'—यों कहकर समस्त देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्हित हो गये। तदनन्तर समयानुसार वही प्रतापी ब्रह्मदत्त उस राजा अणुहका पुत्र हुआ, जो आगे |

२३- चन्द्रमाकी उत्पत्ति, उनका दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंके साथ विवाह, चन्द्रमाद्वारा राजसूययज्ञका अनुष्ठान, उनकी तारापर आसक्ति, उनका भगवान् शङ्करके साथ युद्ध तथा ब्रह्माजीका बीच-बचाव करके युद्ध शान्त करना

८२ * मत्स्यपुराण *


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वसत्त्वानुकम्पी च सर्वसत्त्वबलाधिकः ।<br>सर्वसत्त्वरुतज्ञश्च सर्वसत्त्वेश्वरेश्वरः ॥ १७चलकर सम्पूर्ण जीवोंपर दयालु, समस्त प्राणियोंमें अमित बलसम्पन्न, सम्पूर्ण प्राणियोंकी भाषाका ज्ञाता और समस्त प्राणियोंके राजाधिराज-सम्राट् हुआ ॥ ११—१७ ॥
अहसत् तेन योगात्मा स पिपीलिकरागतः ।<br>यत्र तत्कीटमिथुनं रममाणमवस्थितम् ॥ १८<br><br>ततः सा संनतिर्दृष्ट्वा तं हसन्तं सुविस्मिता ।<br>किमप्याशङ्क्य मनसा तमपृच्छन्नरेश्वरम् ॥ १९तत्पश्चात् जहाँ वे कीट-दम्पति (चींटे-चींटी) बातें करते हुए स्थित थे, वहाँ पहुँचनेपर चींटेकी कामचेष्टाको देखकर योगात्मा ब्रह्मदत्तको हँसी आ गयी। राजाको हँसते देखकर महारानी संनति आश्चर्यचकित हो उठी और मनमें किसी भावी अनर्थकी आशङ्का करके नरेश्वर ब्रह्मदत्तसे प्रश्न कर बैठी ॥ १८-१९ ॥
संनतिरुवाच<br>अकस्मादतिहासस्ते किमर्थमभवन्नृप ।<br>हास्यहेतुं न जानामि यदकाले कृतं त्वया ॥ २०संनतिने पूछा— राजन्! अकस्मात् आपका यह अट्टहास किसलिये हुआ है? असमयमें आपको जो यह हँसी आयी है, इस हास्यका कारण मैं नहीं समझ पा रही हूँ ॥ २० ॥
सूत उवाच<br>अवदद् राजपुत्रोऽपि स पिपीलिकभाषितम् ।<br>रागवाग्भिः समुत्पन्नमेतद्धास्यं वरानने ॥ २१<br><br>न चान्यत्कारणं किंचिद्धास्यहेतौ शुचिस्मिते ।<br>न सामन्यत् तदा देवी प्राहालीकमिदं वचः ॥ २२<br><br>अहमेवाद्य हसिता न जीविष्ये त्वयाधुना ।<br>कथं पिपीलिकालापं मर्त्यो वेत्ति विना सुरान् ॥ २३<br><br>तस्मात् त्वयाहमेवेह हसिता किमतः परम् ।<br>ततो निरुत्तरो राजा जिज्ञासुस्तत्पुरो हरेः ॥ २४<br><br>आस्थाय नियमं तस्थौ समरात्रमकल्मषः ।<br>स्वप्ने प्राह हृषीकेशः प्रभाते पर्यटन् पुरम् ॥ २५<br><br>वृद्धद्विजो यस्तद्वाक्यात् सर्वं ज्ञास्यस्यशेषतः ।<br>इत्युक्त्वान्तर्दधे विष्णुः प्रभातेऽथ नृपः पुरात् ॥ २६<br><br>निर्गच्छन्मन्त्रिसहितः सभार्यो वृद्धमग्रतः ।<br>गदन्तं विप्रमायान्तं तं वृद्धं संददर्श ह ॥ २७सूतजी कहते हैं— ऋषियो! तब राजकुमार ब्रह्मदत्तने (महारानी संनतिसे) चींटे-चींटीके उस सारे वार्तालापको सुनाते हुए कहा—'वरानने! इनके प्रेमालापपूर्ण वचनोंको सुननेसे मुझे ऐसी हँसी आ गयी है। शुचिस्मिते! मेरी हँसीके विषयमें कोई अन्य कारण नहीं है।' परंतु रानी संनतिने (राजाके उस कथनपर) विश्वास नहीं किया और कहा—'राजन्! आपका यह कथन सरासर असत्य है। अभी-अभी आपने मेरे ही किसी विषयको लेकर हास्य किया है, अतः अब मैं जीवन धारण नहीं करूँगी। भला, देवताओंके अतिरिक्त मृत्युलोकनिवासी प्राणी चींटे-चींटीके वार्तालापको कैसे जान सकता है! इसलिये यहाँ आपने मेरी ही हँसी उड़ायी है। इसके अतिरिक्त और क्या हो सकता है?' रानीकी बात सुनकर निष्पाप राजा ब्रह्मदत्त कुछ उत्तर न दे सके। फिर इस रहस्यको जाननेकी इच्छासे वे श्रीहरिके समक्ष नियमपूर्वक आराधना करते हुए सात राततक बैठे रहे। अन्तमें भगवान् हृषीकेशने स्वप्नमें राजासे कहा—'राजन्! प्रातःकाल तुम्हारे नगरमें घूमता हुआ एक वृद्ध ब्राह्मण जो कुछ कहेगा, उसके उन वचनोंसे तुम्हें सारा रहस्य ज्ञात हो जायगा।' यों कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर प्रातःकाल जब राजा ब्रह्मदत्त अपनी पत्नी और दोनों मन्त्रियोंके साथ नगरसे निकल रहे थे, उसी समय उन्होंने अपने समक्ष आते हुए उस वृद्ध ब्राह्मणको देखा, जो इस प्रकार कह रहा था ॥ २१—२७ ॥
ब्राह्मण उवाच<br>ये विप्रमुख्याः कुरुजाङ्गलेषु<br>दाशास्तथा दाशपुरे मृगाश्च ।ब्राह्मण कह रहा था— 'जो (पहले) कुरुक्षेत्रमें श्रेष्ठ ब्राह्मणके रूपमें, दाशपुर (मंदसौर)-में व्याधके रूपमें,
* अध्याय २१ *८३

| कालञ्जरे सप्त च चक्रवाका<br>ये मानसे तेऽत्र वसन्ति सिद्धाः॥ २८ | कालञ्जर-पर्वतपर मृग-योनिमें और मानसरोवरमें सात चक्रवाकके रूपमें उत्पन्न हुए थे, वे ही (व्यक्ति अब) सिद्ध (होकर) यहाँ निवास कर रहे हैं'॥ २८॥ | | सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्ताभ्यां स पपात शुचा ततः।<br>जातिस्मरत्वमगमत् तौ च मन्त्रिवरावुभौ॥ २९<br>कामशास्त्रप्रणेता च बाभ्रव्यस्तु सुबालकः।<br>पाञ्चाल इति लोकेषु विश्रुतः सर्वशास्त्रवित्॥ ३०<br>कण्डरीकोऽपि धर्मात्मा वेदशास्त्रप्रवर्तकः।<br>भूत्वा जातिस्मरौ शोकात् पतितावग्रतस्तदा॥ ३१<br>हा वयं योगविभ्रष्टाः कामतः कर्मबन्धनाः।<br>एवं विलप्य बहुशस्त्रयस्ते योगपारगाः॥ ३२<br>विस्मयाच्छाद्धमाहात्म्यमभिनन्द्य पुनः पुनः।<br>ततस्तस्मै धनं दत्त्वा प्रभूतग्रामसंयुतम्॥ ३३<br>विसृज्य ब्राह्मणं तं च वृद्धं धनमुदान्वितम्।<br>आत्मीयं नृपतिः पुत्रं नृपलक्षणसंयुतम्॥ ३४<br>विष्वक्सेनाभिधानं तु राजा राज्येऽभ्यषेचयत्।<br>मानसे मिलिताः सर्वे ततस्ते योगिनो वराः॥ ३५<br>ब्रह्मदत्तादयस्तस्मिन् पितृसक्ता विमत्सराः।<br>संनतिश्चाभवद् भ्रष्टा मयैतत् किल दर्शितम्॥ ३६<br>राज्यत्यागफलं सर्वं यदेतदभिलक्ष्यते।<br>तथेति प्राह राजा तु पुनस्तामभिनन्दयन्॥ ३७<br>त्वत्प्रसादादिदं सर्वं मयैतत् प्राप्यते फलम्।<br>ततस्ते योगमास्थाय सर्व एव वनौकसः॥ ३८<br>ब्रह्मरन्ध्रेण परमं पदमापुस्तपोबलात्।<br>एवमायुर्धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च॥ ३९<br>प्रयच्छन्ति सुतान् राज्यं नृणां प्रीताः पितामहाः।<br>य इदं पितृमाहात्म्यं ब्रह्मदत्तस्य च द्विजाः॥ ४०<br>द्विजेभ्यः श्रावयेद् यो वा शृणोत्यथ पठेत्तु वा।<br>कल्पकोटिशतं साग्रं ब्रह्मलोके महीयते॥ ४१ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! ब्राह्मणकी ऐसी बात सुनकर राजा शोकाकुल हो अपने दोनों मन्त्रियोंके साथ भूतलपर गिर पड़े। उस समय उन्हें जातिस्मरत्व (पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंके ज्ञातृत्व)-की प्राप्ति हो गयी। उन दोनों श्रेष्ठ मन्त्रियोंमें एक बाभ्रव्य सुबालक कामशास्त्रका प्रणेता और सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता था। वह संसारमें पाञ्चाल नामसे विख्यात था। दूसरा कण्डरीक भी धर्मात्मा और वेद-शास्त्रका प्रवर्तक था। वे दोनों भी उस समय राजाके अग्रभागमें शोकाविष्ट हो धराशायी हो गये और उन्हें भी जातिस्मरत्वकी प्राप्ति हुई। (उस समय वे विलाप करते हुए कहने लगे—)'हाय! हमलोग लोलुप हो कर्मबन्धनमें फँसकर योगसे पूर्णतया भ्रष्ट हो गये।' इस तरह अनेकविध विलाप करके वे तीनों योगके पारदर्शी विद्वान् विस्मयाविष्ट हो बारंबार श्राद्धके माहात्म्यका अभिनन्दन करने लगे। तत्पश्चात् राजाने उस ब्राह्मणको अनेक गाँवोंसहित प्रचुर धन-सम्पत्ति प्रदान की। इस प्रकार धनकी प्राप्तिसे हर्षित हुए उस वृद्ध ब्राह्मणको विदाकर राजा ब्रह्मदत्तने राजलक्षणोंसे युक्त अपने विष्वक्सेन नामक औरस पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया (और स्वयं जंगलकी राह ली)। तदनन्तर ब्रह्मदत्त आदि वे सभी श्रेष्ठ योगी मत्सररहित एवं पितृभक्त होकर उस मानसरोवरमें परस्पर आ मिले। संनतिका अमर्ष गल गया और वह राजासे कहने लगी—'राजन्! आप जो यह अभिलाषा कर रहे हैं, वह सब राज्य-त्यागका ही परिणाम है और निश्चय ही मेरे द्वारा घटित हुआ है।' राजाने 'तथेति'—ऐसा ही है कहकर उसकी बातको स्वीकार किया और पुनः उसका अभिनन्दन करते हुए कहा—'यह तुम्हारी ही कृपा है, जो मुझे यह सारा फल प्राप्त हो रहा है।' तदनन्तर वे सभी वनवासी योगका आश्रय लेकर अपने तपोबलके प्रभावसे ब्रह्मरन्ध्रद्वारा प्राणत्याग करके परमपदको प्राप्त हो गये। इस प्रकार प्रसन्न हुए पितामह—पितरलोग मनुष्योंको, आयु, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख, पुत्र और राज्य प्रदान करते हैं। द्विजवरो! जो मनुष्य ब्रह्मदत्तके इस पितृमाहात्म्यको ब्राह्मणोंको सुनाता है या स्वयं श्रवण करता है अथवा पढ़ता है, वह सौ करोड़ कल्पोंतक ब्रह्मलोकमें प्रशंसित होता है॥ २९—४१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे पितृमाहात्म्यं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पमें पितृमाहात्म्य नामक इक्कीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१॥

८४ * मत्स्यपुराण *

बाईसवाँ अध्याय

श्राद्धके योग्य समय, स्थान (तीर्थ) तथा कुछ विशेष नियमोंका वर्णन

ऋषय ऊचुः<br>कस्मिन् काले च तच्छ्राद्धमनन्तफलं भवेत्।<br>कस्मिन् वासरभोगे तु श्राद्धकृच्छ्राद्धमाचरेत्।<br>तीर्थेषु केषु च कृतं श्राद्धं बहुफलं भवेत्॥ १**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! श्राद्धकर्ताको दिनके किस भागमें श्राद्ध करना चाहिये? किस कालमें किया गया वह श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है? तथा किन-किन तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध अधिक-से-अधिक फल प्रदान करता है?॥ १॥
सूत उवाच<br>अपराह्ने तु सम्प्राप्ते अभिजिद्रौहिणोदये।<br>यत्किञ्चिद् दीयते तत्र तदक्षयमुदाहृतम्॥ २<br>तीर्थानि यानि सर्वाणि पितॄणां वल्लभानि च।<br>नामतस्तानि वक्ष्यामि संक्षेपेण द्विजोत्तमाः॥ ३<br>पितृतीर्थं गयानाम सर्वतीर्थवरं शुभम्।<br>यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव पितामहः॥ ४<br>तत्रैषा पितृभिर्गीता गाथा भागमभीप्सुभिः॥ ५<br>एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्।<br>यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत्॥ ६<br>तथा वाराणसी पुण्या पितॄणां वल्लभा सदा।<br>यत्राविमुक्तसांनिध्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ ७<br>पितॄणां वल्लभं तद्वत् पुण्यं च विमलेश्वरम्।<br>पितृतीर्थं प्रयागं तु सर्वकामफलप्रदम्॥ ८<br>वटेश्वरस्तु भगवान् माधवेन समन्वितः।<br>योगनिद्राशयस्तद्वत् सदा वसति केशवः॥ ९**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अपराह्न-काल (दिनके तीसरे पहरमें प्राप्त होनेवाले) अभिजित् मुहूर्तमें तथा रोहिणीके उदयकालमें (पितरोंके निमित्त) जो कुछ दिया जाता है, वह अक्षय बतलाया गया है। द्विजवरो! अब जो-जो तीर्थ पितरोंको परम प्रिय हैं, उन सबका नाम-निर्देशपूर्वक संक्षेपसे वर्णन कर रहा हूँ। गया नामक पितृतीर्थ सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ एवं मङ्गलदायक है, वहाँ देवदेवेश्वर भगवान् पितामह स्वयं ही विराजमान हैं। वहाँ श्राद्धमें भाग पानेकी कामनावाले पितरोंद्वारा यह गाथा गायी गयी है—'मनुष्योंको अनेक पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये; क्योंकि उनमेंसे यदि एक भी पुत्र गयाकी यात्रा करेगा अथवा अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान कर देगा या नील वृष (साँड़)-का उत्सर्ग कर देगा (तो हमारा उद्धार हो जायगा)।' उसी प्रकार पुण्यप्रदा वाराणसी नगरी सदा पितरोंको प्रिय है, जहाँ अविमुक्तके निकट किया गया श्राद्ध भुक्ति (भोग) एवं मुक्ति (मोक्ष)-रूप फल प्रदान करता है। उसी प्रकार पुण्यप्रद विमलेश्वर तीर्थ भी पितरोंके लिये परम प्रिय है। पितृतीर्थ प्रयाग सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंका प्रदाता है। वहाँ माधवसमेत भगवान् वटेश्वर तथा उसी प्रकार योगनिद्रामें शयन करते हुए भगवान् केशव सदा निवास करते हैं॥ २—९॥
दशाश्वमेधिकं पुण्यं गङ्गाद्वारं तथैव च।<br>नन्दाथ ललिता तद्वत्तीर्थं मायापुरी शुभा॥ १०<br>तथा मित्रपदं नाम ततः केदारमुत्तमम्।<br>गङ्गासागरमित्याहुः सर्वतीर्थमयं शुभम्॥ ११<br>तीर्थं ब्रह्मसरस्तद्वच्छतद्रुसलिले ह्रदे।<br>तीर्थं तु नैमिषं नाम सर्वतीर्थफलप्रदम्॥ १२पुण्यमय दशाश्वमेधिक तीर्थ, गङ्गाद्वार (हरिद्वार), नन्दा, ललिता तथा मङ्गलमयी मायापुरी (ऋषिकेश)—ये सभी तीर्थ भी उसी प्रकार पितरोंको प्रिय हैं। मित्रपद (तीर्थ) भी श्रेष्ठ हैं। उत्तम केदारतीर्थ और सर्वतीर्थमय एवं मङ्गलप्रद गङ्गासागरतीर्थको भी पितृप्रिय कहा गया है। उसी तरह शतद्रु (सतलज) नदीके जलके अन्तर्गत कुण्डमें स्थित ब्रह्मसर तीर्थ भी श्रेष्ठ हैं। नैमिषारण्य सम्पूर्ण तीर्थोंका एकत्र फल प्रदान करनेवाला है। यह

* अध्याय २२ * । ८५


| गङ्गोद्भेदस्तु गोमत्यां यत्रोद्भूतः सनातनः।<br>तथा यज्ञवराहस्तु देवदेवश्च शूलभृत् ॥ १३<br>यत्र तत्काञ्चनं द्वारमष्टादशभुजो हरः।<br>नेमिस्तु हरिचक्रस्य शीर्णा यत्राभवत् पुरा ॥ १४<br>तदेतन्नैमिषारण्यं सर्वतीर्थनिषेवितम्।<br>देवदेवस्य तत्रापि वाराहस्य तु दर्शनम् ॥ १५<br>यः प्रयाति स पूतात्मा नारायणपदं व्रजेत्।<br>कृतशौचं महापुण्यं सर्वपापनिषूदनम् ॥ १६<br>यत्रास्ते नारसिंहस्तु स्वयमेव जनार्दनः।<br>तीर्थमिक्षुमती नाम पितॄणां वल्लभं सदा ॥ १७<br>सङ्गमे यत्र तिष्ठन्ति गङ्गायाः पितरः सदा।<br>कुरुक्षेत्रं महापुण्यं सर्वतीर्थसमन्वितम् ॥ १८<br>तथा च सरयूः पुण्या सर्वदेवनमस्कृता।<br>इरावती नदी तद्वत् पितृतीर्थाधिवासिनी ॥ १९<br>यमुना देविका काली चन्द्रभागा दृषद्वती।<br>नदी वेणुमती पुण्या परा वेत्रवती तथा ॥ २०<br>पितॄणां वल्लभा होताः श्राद्धे कोटिगुणा मताः।<br>जम्बूमार्गं महापुण्यं यत्र मार्गो हि लक्ष्यते ॥ २१<br>अद्यापि पितृतीर्थं तत् सर्वकामफलप्रदम्।<br>नीलकुण्डमिति ख्यातं पितृतीर्थं द्विजोत्तमाः ॥ २२<br>तथा रुद्रसरः पुण्यं सरो मानसमेव च।<br>मन्दाकिनी तथाच्छोदा विपाशाथ सरस्वती ॥ २३<br>पूर्वमित्रपदं तद्वद् वैद्यनाथं महाफलम्।<br>क्षिप्रा नदी महाकालस्तथा कालञ्जरं शुभम् ॥ २४<br>वंशोद्भेदं हरोद्भेदं गङ्गोद्भेदं महाफलम्।<br>भद्रेश्वरं विष्णुपदं नर्मदाद्वारमेव च ॥ २५<br>गयापिण्डप्रदानेन समान्याहुर्महर्षयः।<br>एतानि पितृतीर्थानि सर्वपापहराणि च ॥ २६<br>स्मरणादपि लोकानां किमु श्राद्धकृतां नृणाम्।<br>ओंकारं पितृतीर्थं च कावेरी कपिलोदकम् ॥ २७ | पितरोंको (बहुत) प्रिय है। यहीं गोमती नदीमें गङ्गाका सनातन स्रोत प्रकट हुआ है। यहाँ त्रिशूलधारी महादेव और सनातन यज्ञवराह विराजते हैं। यहाँ अष्टादश भुजाधारी शंकरकी प्रतिमा है। यहाँका काञ्चनद्वार प्रसिद्ध है। यहाँ पूर्वकालमें भगवान् विष्णुद्वारा दिये गये धर्मचक्रकी नेमि शीर्ण होकर गिरी थी। यह सम्पूर्ण तीर्थोंद्वारा निषेवित नैमिषारण्य नामक तीर्थ है। यहाँ देवाधिदेव भगवान् वाराहका भी दर्शन होता है। जो वहाँकी यात्रा करता है, वह पवित्रात्मा होकर नारायणपदको प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार सम्पूर्ण पापोंका विनाशक एवं महान् पुण्यशाली कृतशौच नामक तीर्थ है, जहाँ भगवान् जनार्दन नृसिंहरूपसे विराजमान रहते हैं। तीर्थभूता इक्षुमती (काली नदी) पितरोंको सदा प्रिय है। (कन्नौजके पास इस इक्षुमतीके साथ) गङ्गाजीके संगमपर पितरलोग सदा निवास करते हैं। सम्पूर्ण तीर्थोंसे युक्त कुरुक्षेत्र नामक महान् पुण्यप्रद तीर्थ है। इसी प्रकार समस्त देवताओंद्वारा नमस्कृत पुण्यसलिला सरयू, पितृ-तीर्थोंकी अधिवासिनीरूपा इरावती नदी, यमुना, देविका (देग), काली (कालीसिंध), चन्द्रभागा (चनाब), दृषद्वती (घग्गर), पुण्यतोया वेणुमती (वेण्वा) नदी तथा सर्वश्रेष्ठ वेत्रवती (बेतवा)—ये नदियाँ पितरोंको परम प्रिय हैं। इसलिये श्राद्धके विषयमें करोड़ों गुना फलदायिनी मानी गयी हैं। द्विजवरो! जम्बूमार्ग (भड़ौंच) नामक तीर्थ महान् पुण्यदायक एवं सम्पूर्ण मनोऽभिलषित फलोंका प्रदाता है, यह पितरोंका प्रिय तीर्थ है। वहाँसे पितृलोक जानेका मार्ग अभी भी दिखायी पड़ता है। नीलकुण्ड तीर्थ भी पितृतीर्थरूपसे विख्यात है॥ १०—२२॥<br><br>इसी प्रकार पुण्यप्रद रुद्रसर, मानससर, मन्दाकिनी, अच्छोदा (अच्छावत), विपाशा (व्यास नदी), सरस्वती, पूर्वमित्रपद, महान् फलदायक वैद्यनाथ, क्षिप्रा नदी, महाकाल, मङ्गलमय कालञ्जर, वंशोद्भेद, हरोद्भेद, महान् फलप्रद गङ्गोद्भेद, भद्रेश्वर, विष्णुपद और नर्मदाद्वार—ये सभी पितृप्रिय तीर्थ हैं। इन तीर्थोंमें श्राद्ध करनेसे गया तीर्थमें पिण्ड-प्रदानके तुल्य ही फल प्राप्त होता है—ऐसा महर्षियोंने कहा है। ये सभी पितृतीर्थ जब स्मरणमात्र कर लेनेसे लोगोंके सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करते हैं, तब (वहाँ जाकर) श्राद्ध करनेवाले मनुष्योंके पापनाशकी तो बात ही क्या है। इसी तरह ओंकार पितृतीर्थ है। कावेरी, कपिलोदका, |

२४- ताराके गर्भसे बुधकी उत्पत्ति, पुरूरवाका जन्म, पुरूरवा और उर्वशीकी कथा, नहुष-पुत्रोंके वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिका वृत्तान्त

८६ * मत्स्यपुराण *

| सम्भेदश्चण्डवेगायास्तथैवामरकण्टकम् ।<br>कुरुक्षेत्राच्छतगुणं तस्मिन् स्नानादिकं भवेत् ॥ २८<br>शुक्रतीर्थं च विख्यातं तीर्थं सोमेश्वरं परम् ।<br>सर्वव्याधिहरं पुण्यं शतकोटिफलाधिकम् ॥ २९<br>श्राद्धे दाने तथा होमे स्वाध्याये जलसंनिधौ ।<br>कायावरोहणं नाम तथा चर्मण्वती नदी ॥ ३०<br>गोमती वरुणा तद्वत्तीर्थमौशनसं परम् ।<br>भैरवं भृगुतुङ्गं च गौरीतीर्थमनुत्तमम् ॥ ३१<br>तीर्थं वैनायकं नाम भद्रेश्वरमतः परम् ।<br>तथा पापहरं नाम पुण्याथ तपती नदी ॥ ३२<br>मूलतापी पयोष्णी च पयोष्णीसङ्गमस्तथा ।<br>महाबोधिः पाटला च नागतीर्थमवन्तिका ॥ ३३<br>तथा वेणा नदी पुण्या महाशालं तथैव च ।<br>महारुद्रं महालिङ्गं दशार्णा च नदी शुभा ॥ ३४<br>शतरुद्रा शताह्वा च तथा विष्णुपदं परम् ।<br>अङ्गारवाहिका तद्वन्नदौ तौ शोणघर्घरौ ॥ ३५<br>कालिका च नदी पुण्या वितस्ता च नदी तथा ।<br>एतानि पितृतीर्थानि शस्यन्ते स्नानदानयोः ॥ ३६<br>श्राद्धमेतेषु यद् दत्तं तदनन्तफलं स्मृतम् ।<br>द्रोणी वाटनदी धारासरित् क्षीरनदी तथा ॥ ३७<br>गोकर्णं गजकर्णं च तथा च पुरुषोत्तमः ।<br>द्वारका कृष्णतीर्थं च तथार्बुदसरस्वती ॥ ३८<br>नदी मणिमती नाम तथा च गिरिकर्णिका ।<br>धूतपापं तथा तीर्थं समुद्रो दक्षिणस्तथा ॥ ३९<br>एतेषु पितृतीर्थेषु श्राद्धमानन्त्यमश्नुते ।<br>तीर्थं मेघंकरं नाम स्वयमेव जनार्दनः ॥ ४०<br>यत्र शार्ङ्गधरो विष्णुर्मेखलायामवस्थितः ।<br>तथा मन्दोदरीतीर्थं तीर्थं चम्पा नदी शुभा ॥ ४१<br>तथा सामलनाथश्च महाशालनदी तथा ।<br>चक्रवाकं चर्मकोटं तथा जन्मेश्वरं महत् ॥ ४२<br>अर्जुनं त्रिपुरं चैव सिद्धेश्वरमतः परम् ।<br>श्रीशैलं शांकरं तीर्थं नारसिंहमतः परम् ॥ ४३<br>महेन्द्रं च तथा पुण्यमथ श्रीरङ्गसंज्ञितम् ।<br>एतेष्वपि सदा श्राद्धमनन्तफलदं स्मृतम् ॥ ४४<br>दर्शनादपि चैतानि सद्यः पापहराणि वै ।<br>तुङ्गभद्रा नदी पुण्या तथा भीमरथी सरित् ॥ ४५ | चण्डवेगा और नर्मदाका संगम तथा अमरकण्टक—इन पितृतीर्थोंमें स्नान आदि करनेसे कुरुक्षेत्रसे सौगुने अधिक फलकी प्राप्ति होती है। शुक्रतीर्थ भी पितृतीर्थरूपसे विख्यात है तथा सर्वोत्तम सोमेश्वरतीर्थ स्नान, श्राद्ध, दान, हवन तथा स्वाध्याय करनेपर समस्त व्याधियोंका विनाशक, पुण्यप्रदाता और सौ करोड़ गुना फलसे भी अधिक फलदायी है। कायावरोहण (गुजरातका कारावन) नामक तीर्थ, चर्मण्वती (चम्बल) नदी, गोमती, वरुणा (वरणा), उसी प्रकार औशनस नामक उत्तम तीर्थ, भैरव, (केदारनाथके पास) भृगुतुङ्ग, सर्वश्रेष्ठ गौरीतीर्थ, वैनायक नामक तीर्थ, उसके बाद भद्रेश्वरतीर्थ तथा पापहर नामक तीर्थ, पुण्यसलिला तपती नदी, मूलतापी, पयोष्णी तथा पयोष्णी-संगम, महाबोधि, पाटला, नागतीर्थ, अवन्तिका (उज्जैनी) तथा पुण्यतोया वेणानदी, महाशाल, महारुद्र, महालिङ्ग और मङ्गलमयी दशार्णा (धसान) नदी तो अत्यन्त ही शुभ हैं॥ २३—३४॥<br><br>शतरुद्रा, शताह्वा तथा श्रेष्ठ विष्णुपद, अङ्गारवाहिका, उसी प्रकार शोण और घर्घर (घाघरा) नामक दो नद, पुण्यजला कालिका नदी तथा वितस्ता (झेलम) नदी—ये पितृतीर्थ स्नान और दानके लिये प्रशस्त माने गये हैं। इनमें जो श्राद्ध आदि कर्म किया जाता है, वह अनन्त फलदायक कहा गया है। द्रोणी, वाटनदी, धारानदी, क्षीरनदी, गोकर्ण, गजकर्ण, पुरुषोत्तम-क्षेत्र, द्वारका, कृष्णतीर्थ तथा अर्बुदगिरि (आबू), सरस्वती, मणिमती नदी गिरिकर्णिका, धूतपापतीर्थ तथा दक्षिण समुद्र—इन पितृतीर्थोंमें किया गया श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है। इसके पश्चात् मेघंकर नामक तीर्थ (गुजरातमें) है, जिसकी मेखलामें शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले स्वयं जनार्दन भगवान् विष्णु स्थित हैं। इसी प्रकार मन्दोदरीतीर्थ तथा मङ्गलमयी चम्पा नदी, सामलनाथ, महाशाल नदी, चक्रवाक, चर्मकोट, महान् तीर्थ जन्मेश्वर, अर्जुन, त्रिपुर इसके बाद सिद्धेश्वर, श्रीशैल (मल्लिकार्जुन), शाङ्करतीर्थ, इसके पश्चात् नारसिंहतीर्थ, महेन्द्र तथा पुण्यप्रद श्रीरङ्ग नामक तीर्थ हैं। इनमें भी किया गया श्राद्ध सदा अनन्त फलदाता माना गया है तथा ये दर्शनमात्रसे ही तुरंत पापोंको हर लेते हैं। पुण्यसलिला तुङ्गभद्रा नदी तथा भीमरथी नदी, |

* अध्याय २२ *८७

| भीमेश्वरं कृष्णवेणा कावेरी कुड्मला नदी।<br>नदी गोदावरी नाम त्रिसंध्या तीर्थमुत्तमम्॥ ४६<br>तीर्थं त्रैयम्बकं नाम सर्वतीर्थनमस्कृतम्।<br>यत्रास्ते भगवानीशः स्वयमेव त्रिलोचनः॥ ४७<br>श्राद्धमेतेषु सर्वेषु कोटिकोटिगुणं भवेत्।<br>स्मरणादपि पापानि नश्यन्ति शतधा द्विजाः॥ ४८<br>श्रीपर्णी ताम्रपर्णी च जयातीर्थमनुत्तमम्।<br>तथा मत्स्यनदी पुण्या शिवधारं तथैव च॥ ४९<br>भद्रतीर्थं च विख्यातं पम्पातीर्थं च शाश्वतम्।<br>पुण्यं रामेश्वरं तद्वदेलापुरमलंपुरम्॥ ५०<br>अङ्गारक च विख्यातमामर्दकमलम्बुषम्।<br>आम्रातकेश्वरं तद्वदेकाम्रकमतः परम्॥ ५१<br>गोवर्धनं हरिश्चन्द्रं कृपुचन्द्रं पृथूदकम्।<br>सहस्राक्षं हिरण्याक्षं तथा च कदली नदी॥ ५२<br>रामाधिवासस्तत्रापि तथा सौमित्रिसङ्गमः।<br>इन्द्रकीलं महानादं तथा च प्रियमेलकम्॥ ५३<br>एतान्यपि सदा श्राद्धे प्रशस्तान्यधिकानि तु।<br>एतेषु सर्वदेवानां सांनिध्यं दृश्यते यतः॥ ५४<br>दानमेतेषु सर्वेषु दत्तं कोटिशताधिकम्।<br>बाहुदा च नदी पुण्या तथा सिद्धवनं शुभम्॥ ५५<br>तीर्थं पाशुपतं नाम नदी पार्वतिका शुभा।<br>श्राद्धमेतेषु सर्वेषु दत्तं कोटिशतोत्तरम्॥ ५६<br>तथैव पितृतीर्थं तु यत्र गोदावरी नदी।<br>युता लिङ्गसहस्रेण सर्वान्तरजलावहा॥ ५७<br>जामदग्न्यस्य तत् तीर्थं क्रमादायातमुत्तमम्।<br>प्रतीकस्य भयाद् भिन्नं यत्र गोदावरी नदी॥ ५८<br>तत् तीर्थं हव्यकव्यानामप्सरोयुगसंज्ञितम्।<br>श्राद्धाग्निकार्यदानेषु तथा कोटिशताधिकम्॥ ५९<br>तथा सहस्रलिङ्गं च राघवेश्वरमुत्तमम्।<br>सेन्द्रफेना नदी पुण्या यत्रेन्द्रः पतितः पुरा॥ ६०<br>निहत्य नमुचिं शक्रस्तपसा स्वर्गमाप्तवान्।<br>तत्र दत्तं नरैः श्राद्धमनन्तफलं भवेत्॥ ६१<br>तीर्थं तु पुष्करं नाम शालग्रामं तथैव च।<br>सोमपानं च विख्यातं यत्र वैश्वानरालयम्॥ ६२ | भीमेश्वर, कृष्णवेणा, कावेरी, कुड्मला नदी, गोदावरी नदी, त्रिसंध्या नामक उत्तम तीर्थ तथा समस्त तीर्थोंद्वारा नमस्कृत त्रैयम्बक नामक तीर्थ, जहाँ त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर स्वयं ही निवास करते हैं—इन सभी तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध करोड़ों-करोड़ों गुना फलदायक होता है। ब्राह्मणो ! इन तीर्थोंका स्मरणमात्र करनेसे पापसमूह सैकड़ों टुकड़ोंमें चूर-चूर होकर नष्ट हो जाते हैं ॥४६—४८॥<br><br>इसी प्रकार श्रीपर्णी, ताम्रपर्णी, सर्वश्रेष्ठ जयातीर्थ, पुण्यतोया मत्स्य नदी, शिवधार, सुप्रसिद्ध भद्रतीर्थ, सनातन पम्पातीर्थ, पुण्यमय रामेश्वर, एलापुर, अलमपुर, अङ्गारक, प्रख्यात आमर्दक, अलम्बुष, (अलम्बुषा देवीका स्थान) आम्रातकेश्वर एवं एकाग्रक (भुवनेश्वर) हैं। इसके बाद गोवर्धन, हरिश्चन्द्र, कृपुचन्द्र, पृथूदक, सहस्राक्ष, हिरण्याक्ष, कदली नदी, रामाधिवास, उसमें भी सौमित्रिसंगम, इन्द्रकील, महानाद तथा प्रियमेलक—ये सभी श्राद्धमें सदा सर्वाधिक प्रशस्त माने गये हैं। चूँकि इन तीर्थोंमें सम्पूर्ण देवताओंका सांनिध्य देखा जाता है, इसलिये इन सभीमें दिया गया दान सैकड़ों कोटि गुनासे भी अधिक फलदायी होता है। पुण्यजला बाहुदा (धवला) नदी, मङ्गलमय सिद्धवन, पाशुपत नामक तीर्थ तथा शुभदायिनी पार्वतिका नदी—इन सभी तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध सौ करोड़ गुनासे भी अधिक फलदाता होता है। उसी प्रकार यह भी एक पितृतीर्थ है, जहाँ सहस्रों शिवलिङ्गोंसे युक्त एवं अन्तरमें सभी नदियोंका जल प्रवाहित करनेवाली गोदावरी नदी बहती है। वहींपर जामदग्न्यका वह उत्तम तीर्थ क्रमशः आकर सम्मिलित हुआ है, जो प्रतीकके भयसे पृथक् हो गया था। गोदावरी नदीमें स्थित हव्य-कव्य-भोजी पितरोंका वह परम प्रियतीर्थ अप्सरोयुग नामसे प्रसिद्ध है। यह भी श्राद्ध, हवन और दान आदि कार्योंमें सैकड़ों कोटि गुनेसे अधिक फल देनेवाला है तथा सहस्रलिङ्ग, उत्तम राघवेश्वर और पुण्यतोया इन्द्रफेना नदी नामक तीर्थ है, जहाँ पूर्वकालमें इन्द्रका पतन हो गया था तथा पुनः उन्होंने अपने तपोबलसे नमुचिका वध करके स्वर्गलोकको प्राप्त किया था। वहाँ मनुष्योंद्वारा किया गया श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है। पुष्कर नामक तीर्थ, शालग्राम और जहाँ वैश्वानरका निवासस्थान है, वह सुप्रसिद्ध सोमपानतीर्थ, |

८८ * मत्स्यपुराण *

तीर्थं सारस्वतं नाम स्वामितीर्थं तथैव च।<br>मलन्दरा नदी पुण्या कौशिकी चन्द्रिका तथा॥ ६३<br>वैदर्भी चाथ वेणा च पयोष्णी प्राङ्मुखा परा।<br>कावेरी चोत्तरा पुण्या तथा जालंधरो गिरिः॥ ६४<br>एतेषु श्राद्धतीर्थेषु श्राद्धमानन्त्यमश्नुते।<br>लोहदण्डं तथा तीर्थं चित्रकूटस्तथैव च॥ ६५सारस्वततीर्थ, स्वामितीर्थ, मलन्दरा नदी, कौशिकी और चन्द्रिका—ये पुण्यजला नदियाँ हैं। वैदर्भा, वैणा, पूर्वमुख बहनेवाली श्रेष्ठा पयोष्णी, उत्तरमुख बहनेवाली पुण्यसलिला कावेरी तथा जालंधर गिरि—इन श्राद्धसम्बन्धी तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है॥ ४९–६४ १/२ ॥
विन्ध्ययोगश्च गङ्गायास्तथा नदीतटं शुभम्।<br>कुब्जाम्रं तु तथा तीर्थमुर्वशीपुलिनं तथा॥ ६६<br>संसारमोचनं तीर्थं तथैव ऋणमोचनम्।<br>एतेषु पितृतीर्थेषु श्राद्धमानन्त्यमश्नुते॥ ६७<br>अट्टहासं तथा तीर्थं गौत्मेश्वरमेव च।<br>तथा वसिष्ठं तीर्थं तु हारीतं तु ततः परम्॥ ६८<br>ब्रह्मावर्तं कुशावर्तं हयतीर्थं तथैव च।<br>पिण्डारकं च विख्यातं शङ्खोद्धारं तथैव च॥ ६९<br>घण्टेश्वरं बिल्वकं च नीलपर्वतमेव च।<br>तथा च धरणीतीर्थं रामतीर्थं तथैव च॥ ७०<br>अश्वतीर्थं च विख्यातममन्तं श्राद्धदानयोः।उसी प्रकार लोहदण्डतीर्थ, चित्रकूट, विन्ध्ययोग, गङ्गा नदीका मङ्गलमय तट, कुब्जाम्र (ऋषिकेश) तीर्थ, उर्वशीपुलिन, संसारमोचनतीर्थ तथा ऋणमोचन—इन पितृतीर्थोंमें श्राद्धका फल अनन्त हो जाता है। अट्टहासतीर्थ, गौतमेश्वर, वसिष्ठतीर्थ, उसके बाद हारीततीर्थ, ब्रह्मावर्त, कुशावर्त, हयतीर्थ, (द्वारकाके पास) प्रख्यात पिण्डारक, शङ्खोद्धार, घण्टेश्वर, बिल्वक, नीलपर्वत, धरणीतीर्थ, रामतीर्थ तथा अश्वतीर्थ (कन्नौज)—ये सब भी श्राद्ध एवं दानके लिये अनन्त फलदायक-रूपसे विख्यात हैं॥ ६५–७० १/२ ॥
तीर्थं वेदशिरो नाम तथैवौघवती नदी॥ ७१<br>तीर्थं वसुप्रदं नामच्छागलाण्डं तथैव च।<br>एतेषु श्राद्धदातारः प्रयान्ति परमं पदम्॥ ७२<br>तथा च बदरीतीर्थं गणतीर्थं तथैव च।<br>जयन्तं विजयं चैव शक्रतीर्थं तथैव च॥ ७३<br>श्रीपतेश्च तथा तीर्थं तीर्थं रैवतकं तथा।<br>तथैव शारदातीर्थं भद्रकालेश्वरं तथा॥ ७४<br>वैकुण्ठतीर्थं च परं भीमेश्वरमथापि वा।<br>एतेषु श्राद्धदातारः प्रयान्ति परमां गतिम्॥ ७५<br>तीर्थं मातृगृहं नाम करवीरपुरं तथा।<br>कुशेशयं च विख्यातं गौरीशिखरमेव च॥ ७६<br>नकुलेशस्य तीर्थं च कर्दमालं तथैव च।<br>दिण्डिपुण्यकरं तद्वत् पुण्डरीकपुरं तथा॥ ७७<br>समगोदावरी तीर्थं सर्वतीर्थेश्वरेश्वरम्।<br>तत्र श्राद्धं प्रदातव्यमनन्तफलमीप्सुभिः॥ ७८वेदशिर नामक तीर्थ, उसी तरह ओघवती नदी, वसुप्रद नामक तीर्थ एवं छागलाण्डतीर्थ—इन तीर्थोंमें श्राद्ध प्रदान करनेवाले लोग परमपदको प्राप्त हो जाते हैं। बदरीतीर्थ, गणतीर्थ, जयन्त, विजय, शक्रतीर्थ, श्रीपतितीर्थ, रैवतकतीर्थ, शारदातीर्थ, भद्रकालेश्वर, वैकुण्ठतीर्थ, श्रेष्ठ भीमेश्वरतीर्थ—इन तीर्थोंमें श्राद्ध करनेवाले लोग परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। मातृगृह नामक तीर्थ, करवीरपुर, कुशेशय, सुप्रसिद्ध गौरी-शिखर, नकुलेशतीर्थ, कर्दमाल, दिण्डिपुण्यकर, उसी तरह पुण्डरीकपुर तथा समस्त तीर्थेश्वरोंका भी अधीश्वर समगोदावरीतीर्थ—इन तीर्थोंमें अनन्त फलप्राप्तिके इच्छुकोंको श्राद्ध प्रदान करना चाहिये॥ ७१–७८॥
एष तूद्देशतः प्रोक्तस्तीर्थानां संग्रहो मया।<br>वागीशोऽपि न शक्नोति विस्तरात् किमु मानुषः॥ ७९इस प्रकार मैंने तीर्थोंके इस संग्रहका संक्षेपमें वर्णन किया; वैसे इनका विस्तृत वर्णन करनेमें तो बृहस्पति भी समर्थ नहीं हैं, फिर मनुष्यकी तो गणना ही क्या है?
सत्यं तीर्थं दया तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः।<br>वर्णाश्रमाणां गेहेऽपि तीर्थं तु समुदाहृतम्॥ ८०सत्यतीर्थ, दयातीर्थ तथा इन्द्रियनिग्रहतीर्थ—ये सभी वर्णाश्रम-धर्म माननेवालोंके घरमें भी तीर्थरूपसे बतलाये गये हैं।

* अध्याय २२ *

८९

एतत्तीर्थेषु यच्छ्राद्धं तत् कोटिगुणमिष्यते ।<br>यस्मात्तस्मात् प्रयत्नेन तीर्थे श्राद्धं समाचरेत् ॥ ७९<br>प्रातःकालो मुहूर्तास्त्रीन् सङ्गवस्तावदेव तु ।<br>मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तः स्यादपराह्नस्ततः परम् ॥ ८२<br>सायाह्नस्त्रिमुहूर्तः स्याच्छ्राद्धं तत्र न कारयेत् ।<br>राक्षसी नाम सा वेला गर्हिता सर्वकर्मसु ॥ ८३<br>अह्नो मुहूर्ता विख्याता दश पञ्च च सर्वदा ।<br>तत्राष्टमो मुहूर्त्तो यः स कालः कुतपः स्मृतः ॥ ८४<br>मध्याह्ने सर्वदा यस्मान्मन्दो भवति भास्करः ।<br>तस्मादनन्तफलदस्तदारम्भो भविष्यति ॥ ८५<br>मध्याह्नखड्गपात्रं च तथा नेपालकम्बलः ।<br>रूप्यं दर्भांस्तिला गावो दौहित्रश्चाष्टमः स्मृतः ॥ ८६<br>पापं कुत्सितमित्याहुस्तस्य संतापकारिणः ।<br>अष्टावेते यतस्तस्मात् कुतपा इति विश्रुताः ॥ ८७<br>ऊर्ध्वं मुहूर्त्तात् कुतपाद्यान्मुहूर्त्तचतुष्टयम् ।<br>मुहूर्त्तपञ्चकं चैतत् स्वधाभवनमिष्यते ॥ ८८<br>विष्णोर्देहसमुद्भूताः कुशाः कृष्णास्तिलास्तथा ।<br>श्राद्धस्य रक्षणार्थालमेतत्प्राहूर्दिवौकसः ॥ ८९<br>तिलोदकाञ्जलिर्देयो जलस्थैस्तीर्थवासिभिः ।<br>सदर्भहस्तेनैकेन श्राद्धमेवं विशिष्यते ॥ ९०<br>श्राद्धसाधनकाले तु पाणिनाैकेन दीयते ।<br>तर्पणं तूभयेनैव विधिरेष सदा स्मृतः ॥ ९१चूँकि इन तीर्थोंमें जो श्राद्ध किया जाता है, वह कोटिगुना फलदायक होता है, अतः प्रयत्नपूर्वक तीर्थोंमें श्राद्ध-कार्य सम्पन्न करना चाहिये। प्रातःकाल तीन मुहूर्ततकका काल संगव कहलाता है। उसके बाद तीन मुहूर्ततकका काल मध्याह्न और उसके बाद उतने ही समयतक अपराह्न है। फिर तीन मुहूर्ततक सायंकाल होता है, उसमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये। सायंकालका समय राक्षसी वेला नामसे प्रसिद्ध है। यह सभी कार्योंमें निन्दित है। एक दिनमें पन्द्रह मुहूर्त होते हैं, यह तो सदासे विख्यात है। उनमें जो आठवाँ मुहूर्त है, वह कुतप नामसे प्रसिद्ध है। चूँकि मध्याह्नके समय सूर्य सदा मन्द हो जाते हैं, इसलिये उस समय अनन्त फलदायक उस (कुतप)-का आरम्भ होता है। मध्याह्नकाल, खड्गपात्र, नेपालकम्बल, चाँदी, कुश, तिल, गौ और आठवाँ दौहित्र (कन्याका पुत्र)—ये आठों चूँकि पापको, जिसे कुत्सित कहा जाता है, संतप्त करनेवाले हैं, इसलिये 'कुतप' नामसे विख्यात हैं। इस कुतप मुहूर्तके उपरान्त चार मुहूर्त अर्थात् कुल पाँच मुहूर्त स्वधावाचनके लिये उत्तम काल हैं। कुश तथा काला तिल—ये दोनों भगवान् विष्णुके शरीरसे प्रादुर्भूत हुए हैं, अतः ये श्राद्धकी रक्षा करनेमें सर्वसमर्थ हैं—ऐसा देवगण कहते हैं। तीर्थवासियोंको जलमें प्रवेश करके एक हाथमें कुश लेकर तिलसहित जलाञ्जलि देनी चाहिये। ऐसा करनेसे श्राद्धकी विशेषता बढ़ जाती है। श्राद्ध करते समय (पिण्ड आदि तो) एक ही हाथसे दिया जाता है, परंतु तर्पण दोनों हाथोंसे किया जाता है—यह विधि सदासे प्रचलित है॥ ७९-९१॥
सूत उवाच<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं सर्वपापविनाशनम् ।<br>पुरा मत्स्येन कथितं तीर्थश्राद्धानुकीर्तनम् ।<br>शृणोति यः पठेद् वापि श्रीमान् संजायते नरः ॥ ९२<br>श्राद्धकाले च वक्तव्यं तथा तीर्थनिवासिभिः ।<br>सर्वपापोपशान्त्यर्थमलक्ष्मीनाशनं परम् ॥ ९३<br>इदं पवित्रं यशसो निधान-<br>मिदं महापापहरं च पुंसाम् ।<br>ब्रह्मार्कुरुद्रैरपि पूजितं च<br>श्राद्धस्य माहात्म्यमुशन्ति तज्ज्ञाः ॥ ९४**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें मत्स्यभगवान्ने इस तीर्थ-श्राद्धका वर्णन किया था। यह पुण्यप्रद, परम पवित्र, आयुवर्धक तथा सम्पूर्ण पापोंका विनाशक है। जो मनुष्य इसे सुनता है अथवा स्वयं इसका पाठ करता है, वह श्रीसम्पन्न हो जाता है। तीर्थनिवासियाेंद्वारा समस्त पापोंकी शान्तिके निमित्त श्राद्धके समय इस परम श्रेष्ठ दरिद्रताविनाशक (श्राद्ध-माहात्म्यरूप) प्रसङ्गका पाठ करना चाहिये। यह श्राद्ध-माहात्म्य परम पवित्र, यशका आश्रयस्थान, पुरुषोंके महान्-से-महान् पापोंका विनाशक तथा ब्रह्मा, सूर्य और रुद्रद्वारा भी पूजित (सम्मानित) है॥ ९२-९४॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पमें बाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२॥

९०

* मत्स्यपुराण *


तेईसवाँ अध्याय

चन्द्रमाकी उत्पत्ति, उनका दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंके साथ विवाह, चन्द्रमाद्वारा राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान, उनकी तारापर आसक्ति, उनका भगवान् शङ्करके साथ युद्ध तथा ब्रह्माजीका बीच-बचाव करके युद्ध शान्त करना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br><br>सोमः पितॄणामधिपः कथं शास्त्रविशारद।<br>तद्वंश्या ये च राजानो बभूवुः कीर्तिवर्धनाः॥ १**ऋषियोंने पूछा—**शास्त्रविशारद सूतजी! पितरोंके अधिपति चन्द्रमाकी उत्पत्ति कैसे हुई? आप यह सब हमें बताइये तथा चन्द्रवंशमें जो कीर्तिवर्धक राजा हो गये हैं, उनके विषयमें भी हमलोग सुनना चाहते हैं, कृपया वह सब भी विस्तारसे बतलायें॥ १॥
सूत उवाच<br><br>आदिष्टो ब्रह्मणा पूर्वमत्रिः सर्गविधौ पुरा।<br>अनुत्तरं नाम तपः सृष्ट्यर्थं तप्तवान् प्रभुः॥ २<br>यदानन्दकरं ब्रह्म जगत्क्लेशविनाशनम्।<br>ब्रह्मविष्ण्वर्करुद्राणामभ्यन्तरमतीन्द्रियम् ॥ ३<br>शान्तिकृच्छान्तमनसस्तदन्तर्नयने स्थितम्।<br>माहात्म्यात्तपसा विप्राः परमानन्दकारकम्॥ ४<br>यस्मादुमापतिः सार्धमुमया तमधिष्ठितः।<br>तं दृष्ट्वा चाष्टमांशेन तस्मात् सोमोऽभवच्छिशुः॥ ५<br>अधः सुस्राव नेत्राभ्यां धाम तच्चाम्बुसम्भवम्।<br>दीपयद् विश्वमखिलं ज्योत्स्नया सचराचरम्॥ ६<br>तद्दिशो जगृहुर्धाम स्त्रीरूपेण सुतेच्छया।<br>गर्भोऽभूत् तदुदरे तासामास्थितोऽब्दशतत्रयम्॥ ७<br>आशास्तं मुमुचुर्गर्भमशक्ता धारणे ततः।<br>समादायाथ तं गर्भमेकीकृत्य चतुर्मुखः॥ ८<br>युवानमकरोद् ब्रह्मा सर्वायुधधरं नरम्।<br>स्यन्दनेऽथ सहस्त्राश्वे वेदशक्तिमये प्रभुः॥ ९<br>आरोप्य लोकमनयदात्मीयं स पितामहः।<br>तत्र ब्रह्मर्षिभिः प्रोक्तमस्मत् स्वामी भवत्वयम्॥ १०**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें ब्रह्माने अपने मानसपुत्र अत्रिको सृष्टि-रचनाके लिये आज्ञा दी। उन सामर्थ्यशाली महर्षिने सृष्टि-रचनाके निमित्त अनुत्तर<sup></sup> नामक (भीषण) तप किया। उस तपके प्रभावसे जगत्के कष्टोंका विनाशक, शान्तिकर्ता, इन्द्रियोंसे परे जो परमानन्द है तथा जो ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और रुद्रके अन्तःप्रदेशमें निवास करनेवाला है, वही ब्रह्म उन प्रशान्त मनवाले<sup></sup> महर्षिके (मन एवं) नेत्रोंके भीतर स्थित हो गया। चूँकि उस समय उमासहित उमापति शंकरने भी अत्रिके मन-नेत्रोंको अधियम बनाया था, अतः उन्हें देखकर शिवके या उनके अष्टमांशसे शिशु (ललाटस्थ चन्द्रके) रूपमें चन्द्रमा प्रकट हो गये। उस समय महर्षि अत्रिके नेत्रोंसे जलसम्भूत धाम (तेज) नीचेकी ओर बह चला। उसने अपने प्रकाशसे अखिल चराचर विश्वको उद्दीप्त कर दिया। दिशाओंने उस तेजको स्त्री-रूपसे धारणकर पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे ग्रहण कर लिया। वह उनके उदरमें गर्भरूप होकर तीन सौ वर्षोंतक स्थित रहा। जब दिशाएँ उस गर्भको धारण करनेमें असमर्थ हो गयीं, तब उन्होंने उसका परित्याग कर दिया। तत्पश्चात् चतुर्मुख ब्रह्माने उस गर्भको उठाकर उसे एकत्र कर सर्वायुधधारी तरुण पुरुषके रूपमें परिणत कर दिया तथा वे शक्तिशाली पितामह सहस्र घोड़ोंसे जुते हुए वेदशक्तिमय रथपर उसे बैठाकर अपने लोकको ले गये। वहाँ (उस पुरुषको देखकर) ब्रह्मर्षियोंने कहा—'ये हम लोगोंके स्वामी हों।'

१. यह अध्याय पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड, १२ में भी यों ही है।
२. जिसके बाद किसीने वैसा या उससे कोई दूसरा बड़ा तप न किया हो, वह तपस्या ही 'अनुत्तर' तप है।
३. इसमें 'चन्द्रमा मनसो जातः' (पुरुषसूक्त १३०)-का उपबृंहण है।

२५- कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी-विद्या प्राप्त करना

* अध्याय २३ *९१
पितृभिर्देवगन्धर्वैरोषधीभिस्तथैव च।<br>तुष्टुवुः सोमदेवत्यैर्ब्रह्माद्यैर्मन्त्रसंग्रहैः॥ ११<br>स्तूयमानस्य तस्याभूदधिको धामसम्भवः।<br>तेजोवितानादभवद् भुवि दिव्यौषधीगणः॥ १२<br>तद्धीमिरधिका तस्माद् रात्रौ भवति सर्वदा।<br>तेनौषधीशः सोमोऽभूद् द्विजेशश्चापि गद्यते॥ १३<br>वेदधामरसं चापि यदिदं चन्द्रमण्डलम्।<br>क्षीयते वर्धते चैव शुक्ले कृष्णे च सर्वदा॥ १४<br>विंशतिं च तथा सप्त दक्षः प्राचेतसो ददौ।<br>रूपलावण्यसंयुक्तास्तस्मै कन्याः सुवर्चसः॥ १५<br>ततः समाससहस्राणां सहस्राणि दशैव तु।<br>तपश्चचार शीतांशुर्विष्णुध्यानैकतत्परः॥ १६<br>ततस्तुष्टस्तु भगवान्स्तस्मै नारायणो हरिः।<br>वरं वृणीष्व प्रोवाच परमात्मा जनार्दनः॥ १७<br>ततो वव्रे वरान् सोमः शक्रलोकं जयाम्यहम्।<br>प्रत्यक्षमेव भोक्तारो भवन्तु मम मन्दिरे॥ १८<br>राजसूये सुरगणा ब्रह्माद्याः सन्तु मे द्विजाः।<br>रक्षःपालः शिवोऽस्माकमास्तां शूलधरो हरः॥ १९<br>तथेत्युक्तः स आजहे राजसूयं तु विष्णुना।<br>होतात्रिर्भृगुरध्वर्युुरुद्गाताभूच्चतुर्मुखः ॥ २०<br>ब्रह्मत्वमगमत् तस्य उपद्रष्टा हरिः स्वयम्।<br>सदस्याः सनकाद्यास्तु राजसूयविधौ स्मृताः॥ २१<br>चमसाध्वर्यवस्तत्र विश्वेदेवा दशैव तु।<br>त्रैलोक्यं दक्षिणा तेन ऋत्विग्भ्यः प्रतिपादितम्॥ २२<br>ततः समाप्तेऽवभृथे तद्रूपालोकनेच्छवः।<br>कामबाणाभितप्ताङ्ग्यो नव देव्यः सिषेविरे॥ २३<br>लक्ष्मीनारायणं त्यक्त्वा सिनीवाली च कर्दमम्।<br>द्युतिर्विभावसुं तद्वत् तुष्टिर्धातारमव्ययम्॥ २४<br>प्रभा प्रभाकरं त्यक्त्वा हविष्मन्तं कुहूः स्वयम्।<br>कीर्तिर्जयन्तं भर्तारं वसुर्मरीचकश्यपम्॥ २५उसी समय पितर, ब्रह्मादि देवता, गन्धर्व और ओषधियोंने ‘सोमदैवत्य’* नामक वैदिक मन्त्रसमूहोंसे उनकी स्तुति की। इस प्रकार स्तुति किये जानेपर चन्द्रमाका तेज और अधिक बढ़ गया। तब उस तेजसमूहसे भूतलपर दिव्य ओषधियोंका प्रादुर्भाव हुआ। इसी कारण रात्रिमें उन ओषधियोंकी कान्ति सर्वदा अधिक हो जाती है। इसी हेतु चन्द्रमा ओषधीश कहलाये तथा उन्हें द्विजेश भी कहा जाता है। वेदोंके तेजरूप रससे उत्पन्न हुआ जो यह चन्द्रमण्डल है, वह सर्वदा शुक्लपक्षमें बढ़ता है और कृष्णपक्षमें क्षीण होता रहता है॥ २-१४॥<br><br>तदनन्तर प्रचेता-नन्दन दक्षने चन्द्रमाको अपनी सत्ताईस कन्याएँ—जो रूप-लावण्यसे सम्पन्न तथा परम तेजस्विनी थीं, पत्नीरूपमें प्रदान कीं। तब शीत किरणोंवाले चन्द्रमाने एकमात्र भगवान् विष्णुके ध्यानमें तत्पर होकर १० लाख वर्षोतक तपस्या की। उससे प्रभावित होकर भगवान् (ऐश्वर्यशाली) जनार्दन (दुष्टविनाशक), परमात्मा (परम आत्मबलसे सम्पन्न), नारायण (जलशायी) हैं, वे श्रीहरि चन्द्रमापर प्रसन्न हो गये और (उनके समक्ष प्रकट होकर) बोले—‘वर माँगो!’ इस प्रकार कहे जानेपर चन्द्रमाने वर माँगते हुए कहा—‘भगवन्! मैं इन्द्रलोकको जीत लेना चाहता हूँ, जिससे देवतालोग प्रत्यक्षरूपसे मेरे भवनमें आकर अपना-अपना भाग ग्रहण करें। मेरे राजसूय-यज्ञमें ब्रह्मा आदि देवगण ब्राह्मण हों तथा त्रिशूलधारी मङ्गलमय भगवान् शंकर हम सभीके दिव्य रक्षःपाल (राक्षसोंसे रक्षा करनेवाले या सभी प्रकारके रक्षक) रूपमें उपस्थित रहें।’ भगवान् विष्णुके ‘तथेति’—‘ऐसा ही हो’—यों कहकर स्वीकार कर लेनेपर चन्द्रमाने राजसूय-यज्ञका आयोजन किया। उस यज्ञमें महर्षि अत्रि होता (ऋग्वेदके पाठक), भृगु अध्वर्यु (यजुर्वेदके पाठक) और चतुर्मुख ब्रह्मा उद्गाता (सामवेदके गायक) थे। स्वयं श्रीहरिने उस यज्ञका उपद्रष्टा होकर ब्रह्मा (अथर्ववेदका पाठक)-का पद ग्रहण किया। उस राजसूय-यज्ञमें सनक आदि सदस्य और दसों विश्वेदेव चमसाध्वर्यु (यज्ञमें सोमरस पीनेवाले) बने—ऐसा सुना जाता है। उस समय चन्द्रमाने ऋत्विजोंको तीनों लोक दक्षिणारूपमें प्रदान कर दिये थे। तत्पश्चात् अवभृथस्नान (यज्ञान्तमें होनेवाला स्नान)-की समाप्तिपर (चन्द्रमाके रूपपर मुग्ध होकर) उसके सौन्दर्यका अवलोकन करनेकी इच्छासे युक्त सिनीवाली आदि नौ देवियाँ उनकी सेवामें उपस्थित हुई। लक्ष्मी नारायणको, सिनीवाली कर्दमको, द्युति विभावसुको, तुष्टि अविनाशी ब्रह्माको, प्रभा प्रभाकरको, कुहू स्वयं हविष्मान्‌को, कीर्ति जयन्तको, वसु मरीचिनन्दन कश्यपको

* ऋग्वेदके १। ९१ (मुख्यतम), ९। १-११४, १०। ८५ (जिसे विवाहसूक्त भी कहते हैं) आदि सूक्त सोमदैवत्य हैं।

९२ | मत्स्यपुराण |


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
धृतिस्त्यक्त्वा पतिं नन्दिं सोममेवाभजंस्तदा।<br>स्वकीया इव सोमोऽपि कामयामास तास्तदा॥ २६<br>एवं कृतापचारस्य तासां भर्तृगणस्तदा।<br>न शशाकापचाराय शापैः शस्त्रादिभिः पुनः॥ २७<br>तथाप्यराजत विधुर्दशधा भावयन् दिशः।<br>सोमः प्राप्याथ दुष्प्राप्यमैश्वर्यं सृष्टिसंस्कृतम्।<br>सप्तलोकैकनाथत्वमवाप तपसा तदा॥ २८और धृति अपने पति नन्दिको छोड़कर उस समय चन्द्रमाकी सेवामें नियुक्त हुई। चन्द्रमा उस समय दसों दिशाओंको उद्भासित करते हुए सुशोभित हो रहे थे तथा उन्होंने समस्त सृष्टिमें संस्कृत एवं दुर्लभ ऐश्वर्यको प्राप्तकर सातों लोकोंका एकच्छत्र आधिपत्य प्राप्त किया'॥ १५–२८॥
कदाचिदुद्यानगतामपश्य-<br>दनेकपुष्पाभरणैश्च शोभिताम्।<br>बृहन्नितम्बस्तनभारखेदात्-<br>पुष्पस्य भङ्गेऽप्यतिदुर्बलाङ्गीम्॥ २९<br>भार्यां च तां देवगुरोरनङ्ग-<br>बाणाभिरामायतचारुनेत्राम् ।<br>तारां स ताराधिपतिः स्मरार्तः<br>केशेषु जग्राह विविक्तभूमौ॥ ३०<br>सापि स्मरार्ता सह तेन रेमे<br>तद्रूपकान्त्या हृतमानसेन।<br>चिरं विहृत्याथ जगाम तारां<br>विधुर्गृहीत्वा स्वगृहं ततोऽपि॥ ३१इसके कुछ दिन बाद चन्द्रमा एक बार कभी ताराको साथ लेकर अपने घर चले गये। बृहस्पतिके कहनेपर भी उन्होंने ताराको उन्हें समर्पित नहीं किया।
न तृप्तिरासीच्च गृहेऽपि तस्य<br>तारानुरक्तस्य सुखागमेषु।<br>बृहस्पतिस्तद्विरहाग्निदग्ध-<br>स्तद्ध्याननिष्ठैकमना बभूव॥ ३२<br>शशाक शापं न च दातुमस्मै<br>न मन्त्रशस्त्राग्निविशेषरौषैः।<br>तस्यापकर्तुं विविधैरुपायै-<br>र्नैवाभिचारैरपि वागधीशः॥ ३३तत्पश्चात् महेश्वर, ब्रह्मा, साध्यगण तथा लोकपालोंसहित मरुद्गणके समझानेपर भी जब चन्द्रमाने ताराको किसी प्रकार नहीं लौटाया, तब भगवान् शिव, जो भूतलपर
स याचयामास ततस्तु दैन्यात्<br>सोमं स्वभार्यार्थमनङ्गतप्तः।<br>स याच्यमानोऽपि ददौ न तारां<br>बृहस्पतेस्तत्सुखपाशबद्धः॥ ३४<br>महेश्वरेणाथ चतुर्मुखेण<br>साध्यैर्मरुद्भिः सह लोकपालैः।<br>ददौ यदा तां न कथंचिदिन्दु-<br>स्तदा शिवः क्रोधपरो बभूव॥ ३५वामदेव नामसे विख्यात हैं तथा अनेकों रुद्र जिनके चरणकमलोंकी अर्चना किया करते हैं, क्रुद्ध हो उठे।
यो वामदेवः प्रथितः पृथिव्या-<br>मनेकरुद्रार्चितपादपद्मः ।<br>ततः सशिष्यो गिरिशः पिनाकी<br>बृहस्पतिस्नेहवशानुबद्धः॥ ३६तदनन्तर त्रिपुरासुरके शत्रु एवं पिनाक धारण करनेवाले भगवान् शंकर बृहस्पतिके प्रति स्नेहके वशीभूत हो शिष्योंके
* अध्याय २३ *९३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
धनुर्गृहीत्वाजगवं पुरारि-<br>र्जगाम भूतेश्वरसिद्धजुष्टः।<br>युद्धाय सोमेन विशेषदीप्त-<br>स्तृतीयनेत्रानलभीमवक्त्रः॥ ३७॥साथ 'आजगव' नामक धनुष लेकर चन्द्रमाके साथ युद्ध करनेके लिये प्रस्थित हुए। उस समय उनका मुख विशेषरूपसे उद्दीप्त हुए तृतीय नेत्रकी अग्निसे बड़ा भयानक दीख रहा था॥ २९-३७॥
सहैव जगमुश्च गणेशकाद्या<br>विंशच्चतुःषष्टिगणास्त्रयुक्ताः।<br>यक्षेश्वरः कोटिशतैरनेकै-<br>र्युतोऽन्वगात् स्पन्दनसंस्थितानाम्॥ ३८॥उनके साथ भूतेश्वरों और सिद्धोंका समुदाय भी था तथा शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित गणेश आदि चौरासी गण भी साथ ही रवाना हुए। उसी प्रकार यक्षराज कुबेरने भी अनेकों शतकोटि सेनाओंके साथ-साथ रथारूढ़ एक
वेतालरक्षोरगकिंनराणां<br>पद्मेन चैकेन तथार्बुदेन।<br>लक्षैस्त्रिभिर्द्वादशभी रथानां<br>सोमोऽप्यगात् तत्र विवृद्धमन्युः॥ ३९॥पद्म वेताल, एक अरब यक्ष, तीन लाख नाग और बारह लाख किन्नरोंको साथ लेकर शिवजीका अनुसरण किया। उधर चन्द्रमा भी क्रोधाविष्ट हो नक्षत्रों, दैत्यों
नक्षत्रदैत्यासुरसैन्ययुक्तः<br>शनैश्चराङ्गारकवृद्धतेजाः।<br>जग्मुर्भयं सप्त तथैव लोका-<br>श्चचाल भूद्वीपसमुद्रगर्भा॥ ४०॥और असुरोंकी सेनाओंके साथ शनैश्चर और मंगलके सहयोगके कारण उद्दीप्त तेजसे सम्पन्न हो रणभूमिमें आ डटे। उस समाहारको देखकर सातों लोक भयभीत हो उठे तथा द्वीपों एवं समुद्रोंसहित पृथ्वी काँपने लगी।
स सोममेवाभ्यगमत् पिनाकी<br>गृहीतदीप्तास्त्रविशालवह्निः।<br>अथाभवद् भीषणभीमसेन-<br>सैन्यद्वयस्यापि महाहवोऽसौ॥ ४१॥शिवजीने प्रकाशमान एवं विशाल आग्नेयास्त्रको लेकर चन्द्रमापर आक्रमण किया। फिर तो दोनों सेनाओंमें अत्यन्त भीषण युद्ध छिड़ गया। धीरे-धीरे उस युद्धने
अशेषसत्त्वक्षयकृत्प्रवृद्ध-<br>स्तीक्ष्णायुधास्त्रज्वलनेकरूपः।<br>शस्त्रैरथान्योन्यमशेषसैन्यं<br>द्वयोर्जगाम क्षयमुग्रतीक्ष्णैः॥ ४२॥उग्ररूप धारण कर लिया। उसमें सम्पूर्ण जीवोंका संहार हो रहा था तथा अग्निके समान प्रज्वलित हथियार चमक रहे थे। इस प्रकार एक-दूसरेके प्रति अत्यन्त तीखे शस्त्रोंके प्रहारसे दोनों सेनाएँ समग्ररूपसे नष्ट होने लगीं।
पतन्ति शस्त्राणि तथोज्ज्वलानि<br>स्वर्भूमिपातालमथो दहन्ति।<br>रुद्रः कोपाद् ब्रह्मशीर्षं मुमोच<br>सोमोऽपि सोमास्त्रममोघवीर्यम्॥ ४३॥उस समय ऐसे जाज्वल्यमान शस्त्रोंकी वर्षा हो रही थी, जो स्वर्गलोक, भूतल और पातालको भस्म कर डालते थे। यह देख रुद्रने क्रुद्ध होकर ब्रह्मशीर्ष नामक अस्त्र चलाया, तब चन्द्रमाने भी अपने अचूक लक्ष्यवाले सोमास्त्रका प्रयोग किया।
तयोर्निपातेन समुद्रभूम्यो-<br>रथान्तरिक्षस्य च भीतिरासीत्।<br>तदस्त्रयुग्मं जगतां क्षयाय<br>प्रवृद्धमालोक्य पितामहोऽपि॥ ४४॥उन दोनों अस्त्रोंके टकरानेसे समुद्र, भूमि और अन्तरिक्ष आदि सभी भयसे काँप उठे। इस प्रकार उन दोनों अस्त्रोंको जगत्का विनाश करनेके लिये बढ़ता हुआ देखकर
अन्तःप्रविश्याथ कथं कथंचि-<br>न्निवारयामास सुरैः सहैव।<br>अकारणं किं क्षयकृज्जनानां<br>सोम त्वयापीत्थमकारि कार्यम्॥ ४५॥देवताओंके साथ ब्रह्माने उनके भीतर प्रवेश करके किसी-किसी प्रकारसे उनका निवारण किया (और कहा-) 'सोम! तुमने अकारण ही ऐसा कार्य क्यों किया, यह तो लोगोंका विनाशक है। सोम! चूँकि तुमने

९४ * मत्स्यपुराण *


| यस्मात् परस्त्रीहरणाय सोम<br>त्वया कृतं युद्धमतीव भीमम्।<br>पापग्रहस्त्वं भविता जनेषु<br>शान्तोऽप्यलं नूनमथो सितान्ते॥<br>भार्यामिमामर्पय वाक्पतेस्त्वं<br>न चावमानोऽस्ति परस्वहारे॥ ४६ | दूसरेकी स्त्रीका अपहरण करनेके लिये इतना भयंकर युद्ध किया है, इसलिये शान्तस्वरूप होनेपर भी तुम शुक्लपक्षके अन्तमें अर्थात् कृष्णपक्षमें निश्चय ही जनतामें पापग्रहके रूपसे प्रसिद्ध होओगे। तुम बृहस्पतिकी इस भार्याको उन्हें समर्पित कर दो। दूसरेका धन लेकर उसे लौटा देनेमें अपमान नहीं होता'॥ ३८—४६॥ | | सूत उवाच<br>तथेति चोवाच हिमांशुमाली<br>युद्धादपाक्रामदतः प्रशान्तः।<br>बृहस्पतिः स्वामपगृह्य तारां<br>हृष्टो जगाम स्वगृहं सरुद्रः॥ ४७ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तब चन्द्रमाने 'तथेति—ऐसा ही हो' यों कहकर ब्रह्माकी आज्ञा स्वीकार कर ली और वे शान्त होकर युद्धसे हट गये। इधर बृहस्पति भी अपनी पत्नी ताराको ग्रहण करके शिवजीके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको चले गये॥ ४७॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशाख्याने सोमापचारो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः॥ २३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंशाख्यानमें सोमापचार नामक तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३॥


चौबीसवाँ अध्याय

ताराके गर्भसे बुधकी उत्पत्ति, पुरूरवाका जन्म, पुरूरवा और उर्वशीकी कथा, नहुष-पुत्रोंके वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिका वृत्तान्त

| सूत उवाच<br>ततः संवत्सरस्यान्ते द्वादशादित्यसंनिभः।<br>दिव्यपीताम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः॥ १<br>तारोदराद् विनिष्क्रान्तः कुमारश्चन्द्रसंनिभः।<br>सर्वार्थशास्त्रविद् धीमान् हस्तिशास्त्रप्रवर्तकः॥ २<br>नाम यद्राजपुत्रीयं विश्रुतं गजवैद्यकम्।<br>राज्ञः सोमस्य पुत्रत्वाद् राजपुत्रो बुधः स्मृतः॥ ३<br>जातमात्रः स तेजांसि सर्वाण्येवाजयद् बली।<br>ब्रह्माद्यास्तत्र चाजग्मुर्देवा देवर्षिभिः सह॥ ४<br>बृहस्पतिगृहे सर्वे जातकर्मोत्सवे तदा।<br>अपृच्छंस्ते सुरास्तारां केन जातः कुमारकः॥ ५ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर एक वर्ष व्यतीत होनेपर ताराके उदरसे एक कुमार प्रकट हुआ। वह बारहों सूर्योंके समान तेजस्वी, दिव्य पीताम्बरधारी, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित तथा चन्द्रमाके सदृश कान्तिमान् था। वह सम्पूर्ण अर्थशास्त्रका ज्ञाता, उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्न तथा हस्तिशास्त्र (हाथीके गुण-दोष तथा चिकित्सा आदि विवेचनापूर्ण शास्त्र)-का प्रवर्तक था। वही शास्त्र 'राजपुत्रीय' (या 'पालकाप्य'<sup></sup>)-नामसे विख्यात है, इसमें गज-चिकित्साका विशद वर्णन है।<sup></sup> सोम राजाका पुत्र होनेके कारण वह राजकुमार राजपुत्र तथा बुधके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस बलवान् राजकुमारने जन्म लेते ही सभी तेजस्वी पदार्थोंको अभिभूत कर दिया। उसके जातकर्म-संस्कारके उत्सवमें ब्रह्मा आदि सभी देवता देवर्षियोंके साथ बृहस्पतिके घर पधारे। चन्द्रमाने उस पुत्रको ग्रहण |


१. यह ग्रन्थ बहुत बड़ा है। अग्निपुराण २८७-९१, बृहत्संहिता ६६, ९३, आकाशभैरवकल्प, शिवतत्त्वरत्नाकर, मानसोल्लास १।१०००-१४०० आदिमें इसका वर्णन है। वाल्मी० रामा० १।६।२४-३० की तथा रघुवंश ५।५० की टीकाओंमें भी इसके कुछ अंश निर्दिष्ट हैं।
२. इन्हींसे 'राजपूत' शब्द भी प्रचलित हुआ।

* अध्याय २४ *९५
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
ततः सा लज्जिता तेषां न किंचिदवदत् तदा।<br>पुनः पुनस्तदा पृष्टा लज्जयन्ती वराङ्गना॥ ६<br>सोमस्येति चिरादाह ततोऽगृह्लाद् विधुः सुतम्।<br>बुध इत्यकरोन्नाम्ना प्रादाद् राज्यं च भूतले॥ ७<br>अभिषेकं ततः कृत्वा प्रधानमकरोद् विभुः।<br>ग्रहसाम्यं प्रदायाथ ब्रह्मा ब्रह्मर्षिसंयुतः॥ ८<br>पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत।<br>इलोदरे च धर्मिष्ठं बुधः पुत्रमजीजनत्॥ ९<br>अश्वमेधशतं साग्रमकरोद् यः स्वतेजसा।<br>पुरूरवा इति ख्यातः सर्वलोकनमस्कृतः॥ १०<br>हिमवच्छिखरे रम्ये समाराध्य जनार्दनम्।<br>लोकैश्वर्यमगाद् राजा सप्तद्वीपपतिस्तदा॥ ११<br>केशिप्रभृतयो दैत्याः कोटिशो येन दारिताः।<br>उर्वशी यस्य पत्नीत्वमगमद् रूपमोहिता॥ १२<br>सप्तद्वीपा वसुमती सशैलवनकानना।<br>धर्मेण पालिता तेन सर्वलोकहितैषिणा॥ १३<br>चामरग्राहिणी कीर्तिः सदा चैवाङ्गवाहिका।<br>विष्णोः प्रसादाद् देवेन्द्रो ददार्धासनं तदा॥ १४कर लिया और उसका नाम 'बुध' रखा। तत्पश्चात् सर्वव्यापी ब्रह्मा ने ब्रह्मर्षियोंके साथ उसे भूतलके राज्यपर अभिषिक्त कर सर्वप्रधान बना दिया और ग्रहोंकी समता प्रदान की। फिर सभी देवताओंके देखते-देखते ब्रह्मा वहीं अन्तर्हित हो गये। बुधने इलाके गर्भसे एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न किया। वह पुरूरवा नामसे विख्यात हुआ। वह सम्पूर्ण लोगोंद्वारा वन्दित हुआ। उन्होंने अपने प्रभावसे एक सौसे भी अधिक अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया। उस राजा पुरूरवाने हिमवान् पर्वतके रमणीय शिखरपर भगवान् विष्णुकी आराधना करके लोकोंका ऐश्वर्य प्राप्त किया तथा वे सातों द्वीपोंके अधिपति हुए। उन्होंने केशि आदि करोड़ों दैत्योंको विदीर्ण कर दिया। उनके रूपपर मुग्ध होकर उर्वशी उनकी पत्नी बन गयी। सम्पूर्ण लोकोंकी हित-कामनासे युक्त पुरूरवाने पर्वत, वन और काननोंसहित सातों द्वीपोंकी पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया। कीर्ति तो (मानो) सदा उनकी चँवर धारण करनेवाली सेविका थी। भगवान् विष्णुकी कृपासे देवराज इन्द्रने उन्हें अपना अर्धासन प्रदान किया था॥ १-१४॥
धर्मार्थकामान् धर्मेण सममेवाभ्यपालयत्।<br>धर्मार्थकामाः संद्रष्टुमाजग्मुः कौतुकात् पुरा॥ १५<br>जिज्ञासवस्तच्चरितं कथं पश्यति नः समम्।<br>भक्त्या चक्रे ततस्तेषामर्घ्यपाद्यादिकं नृपः॥ १६<br>आसनत्रयमानीय दिव्यं कनकभूषितम्।<br>निवेश्याथाकरोत् पूजामीषद् धर्मेऽधिकां पुनः॥ १७<br>जग्मतुस्तेन कामार्थावतिक्षोपं नृपं प्रति।<br>अर्थः शापमदात् तस्मै लोभात् त्वं नाशमेष्यसि॥ १८<br>कामोऽप्याह तवोन्मादो भविता गन्धमादने।<br>कुमारवनमाश्रित्य वियोगादुर्वशीभवात्॥ १९<br>धर्मोऽप्याह चिरायुस्त्वं धार्मिकश्च भविष्यसि।<br>सन्ततिस्तव राजेन्द्र यावच्चन्द्रार्कतारकम्॥ २०<br>शतशो वृद्धिमायातु न नाशं भुवि यास्यति।<br>इत्युक्त्वान्तर्दधुः सर्वे राजा राज्यं तदन्वभूत्॥ २१पुरूरवा धर्म, अर्थ और कामका समानरूपसे ही पालन करते थे। पूर्वकालमें एक बार धर्म, अर्थ और काम कुतूहलवश यह देखनेके लिये राजाके निकट आये कि यह हमलोगोंको समानरूपसे कैसे देखता है। उनके मनमें राजाके चरित्रको जाननेकी अभिलाषा थी। राजाने उन्हें भक्तिपूर्वक अर्घ्य-पाद्य आदि प्रदान किया। तत्पश्चात् स्वर्णजटित तीन दिव्य आसन लाकर उनपर उन्हें बैठाया और उनकी पूजा की। इसके बाद उन्होंने पुनः धर्मकी थोड़ी अधिक पूजा कर दी। इस कारण अर्थ और काम राजापर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे। अर्थने राजाको शाप देते हुए कहा—'तुम लोभके कारण नष्ट हो जाओगे।' कामने भी कहा—'राजेन्द्र! गन्धमादन पर्वतपर स्थित कुमारवनमें तुम्हें उर्वशीजन्य वियोगसे उन्माद हो जायगा।' धर्मने कहा—'राजेन्द्र! तुम दीर्घायु और धार्मिक होगे। तुम्हारी संतति करोड़ों प्रकारसे वृद्धिको प्राप्त होती रहेगी और जबतक सूर्य, चन्द्रमा तथा तारागणकी सत्ता विद्यमान है, तबतक उनका भूतलपर विनाश नहीं होगा।' यों कहकर वे सभी अन्तर्हित हो गये और राजा राज्यका उपभोग करने लगे ॥ १५-२१ ॥
९६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अहन्यहनि देवेन्द्रं द्रष्टुं याति स राजराट्।<br>कदाचिदारुह्य रथं दक्षिणाम्बरचारिणम्॥ २२<br>सार्धमर्केण सोऽपश्यन्नीयमानामथाम्बरे।<br>केशिना दानवेन्द्रेण चित्रलेखामथोर्वशीम्॥ २३<br>तं विनिर्जित्य समरे विविधायुधपाणिना।<br>बुधपुत्रेण वायव्यमस्त्रं मुक्त्वा यशोऽर्थिना॥ २४<br>तथा शक्रोऽपि समरे येन चैवं विनिर्जितः।<br>मित्रत्वमगमद् देवैर्दाविन्द्राय चोर्वशीम्॥ २५<br>ततः प्रभृति मित्रत्वमगमत् पाकशासनः।<br>सर्वलोकातिशायित्वं बलमूर्जो यशः श्रियम्॥ २६<br>प्रादाद् वज्रीति संतुष्टो गेयतां भरतेन च।<br>सा पुरूरवसः प्रीत्या गायन्ती चरितं महत्॥ २७<br>लक्ष्मीस्वयंवरं नाम भरतेन प्रवर्तितम्।<br>मेनकामुर्वशीं रम्भां नृत्यतेति तदादिशत्॥ २८<br>ननर्त सलयं तत्र लक्ष्मीरूपेण चोर्वशी।<br>सा पुरूरवसं दृष्ट्वा नृत्यन्ती कामपीडिता॥ २९<br>विस्मृताभिनयं सर्वं यत् पुरा भरतोदितम्।<br>शशाप भरतः क्रोधाद् वियोगादस्य भूतले॥ ३०<br>पञ्चपञ्चाशदब्दानि लता सूक्ष्मा भविष्यसि।<br>पुरूरवाः पिशाचत्वं तत्रैवानुभविष्यति॥ ३१राजराजेश्वर पुरूरवा प्रतिदिन देवराज इन्द्रको देखनेके लिये (अमरावतीपुरी) जाया करते थे। एक बार वे सूर्यके साथ रथपर चढ़कर गगनतलके दक्षिण भागमें विचरण कर रहे थे, उसी समय उन्होंने दानवराज केशिद्वारा चित्रलेखा और उर्वशी नाम्नी अप्सराओंको आकाशमार्गसे ले जायी जाती हुई देखा।* तब विविधास्त्रधारी यशोऽभिलाषी बुध-नन्दन पुरूरवाने समरभूमिमें वायव्यास्त्रका प्रयोग करके उस दानवराज केशीको पराजित कर दिया, जिसने संग्राममें इन्द्रको भी परास्त कर दिया था। तत्पश्चात् राजाने उर्वशीको ले जाकर इन्द्रको समर्पित कर दिया, जिससे उनकी देवोंके साथ प्रगाढ़ मैत्री हो गयी। तभीसे इन्द्र भी राजाके मित्र हो गये। फिर इन्द्रने प्रसन्न होकर राजाको समस्त लोकोंमें श्रेष्ठता, अत्यधिक बल, पराक्रम, यश और सम्पत्ति प्रदान की। साथ ही भरत मुनिद्वारा उनके यशका गान भी कराया गया। उर्वशी पुरूरवाके प्रेमसे उनके महान् चरित्रका गान करती रहती थी। एक बार भरत मुनिद्वारा प्रवर्तित 'लक्ष्मीस्वयंवर' नाटकका अभिनय हुआ। उसमें इन्द्रने मेनका, उर्वशी और रम्भा—तीनोंको नाचनेका आदेश दिया। उनमें उर्वशी लक्ष्मीका रूप धारण करके लयपूर्वक नृत्य कर रही थी। (पर) नृत्यकालमें पुरूरवाको देखकर अनुरागसे सुधबुध खो जानेके कारण भरत मुनिने उसे पहले जो कुछ अभिनयका नियम बतलाया था, वह सारा-का-सारा उसे विस्मृत हो गया। तब भरत मुनिने क्रोधके वशीभूत हो उसे शाप देते हुए कहा—'तुम इसके वियोगसे भूतलपर पचपन वर्षतक सूक्ष्मलताके रूपमें उत्पन्न होकर रहोगी और पुरूरवा वहीं पिशाच-योनिका अनुभव करेगा॥ २२—३१॥
ततस्तमुर्वशी गत्वा भर्तारमकरोच्चिरम्।<br>शापान्ते भरतस्याथ उर्वशी बुधसूनुतः॥ ३२<br>अजीजनत् सुतानष्टौ नामतस्तान् निबोधत।<br>आयुर्दृढायुरश्वायुर्धनायुर्धृतिमान् वसुः॥ ३३<br>शुचिविद्यः शतायुश्च सर्वे दिव्यबलौजसः।<br>आयुषो नहुषः पुत्रो वृद्धशर्मा तथैव च॥ ३४<br>रजिर्दम्भो विपाप्मा च वीराः पञ्च महारथाः।<br>रजेः पुत्रशतं जज्ञे राजेयमिति विश्रुतम्॥ ३५<br>रजिराराधयामास नारायणमकल्मषम्।<br>तपसा तोषितो विष्णुर्वरान् प्रादान्महीपतेः॥ ३६तत्पश्चात् उर्वशीने पुरूरवाके पास जाकर चिरकालके लिये उनका पतिरूपमें वरण कर लिया। भरत मुनिद्वारा दिये गये शापकी निवृत्तिके पश्चात् उर्वशीने बुधपुत्र पुरूरवाके संयोगसे आठ पुत्रोंको जन्म दिया। उनके नाम थे—आयु, दृढ़ायु, अश्वायु, धनायु, धृतिमान्, वसु, शुचिविद्य और शतायु। ये सभी दिव्य बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। इनमें आयुके नहुष, वृद्धशर्मा, रजि, दम्भ और विपाप्मा नामक पाँच महारथी वीर पुत्र उत्पन्न हुए। रजिके सौ पुत्र पैदा हुए, जो राजेय नामसे विख्यात हुए। रजिने पापरहित भगवान् नारायणकी आराधना की। उनकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान् विष्णुने राजाको अनेकों वर

* कालिदासके विक्रमोर्वशीय नाटकका यही कथानक आधार है। यह पद्मपुराणमें भी है। वैसे पुरूरवावृत्त वेदोंसे लेकर प्रायः सभी पुराणोंमें चर्चित है, पर वह थोड़ा भिन्नरूपमें है।

२६- देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना

* अध्याय २४ * ९७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देवासुरमनुष्याणामभूत् स विजयी तदा।<br>अथ देवासुरं युद्धमभूद् वर्षशतत्रयम्॥ ३७<br>प्रह्लादशक्रयोर्भीमं न कश्चिद् विजयी तयोः।<br>ततो देवासुरैः पृष्टः प्राह देवश्चतुर्मुखः॥ ३८<br>अनयोर्विजयी कः स्याद् रजियंत्रैति सोऽब्रवीत्।<br>जयाय प्रार्थितो राजा सहायस्त्वं भवस्व नः॥ ३९<br>दैत्यैः प्राह यदि स्वामी वो भवामि ततस्त्वलम्।<br>नासूरैः प्रतिपन्नं तत् प्रतिपन्नं सुरैस्तथा॥ ४०<br>स्वामी भव त्वमस्माकं संग्रामे नाशय द्विषः।<br>ततो विनाशिताः सर्वे येऽवध्या वज्रपाणिना॥ ४१<br>पुत्रत्वमगमत् तुष्टस्तस्येन्द्रः कर्मणा विभुः।<br>दत्त्वेन्द्राय तदा राज्यं जगाम तपसे रजिः॥ ४२प्रदान किये, जिससे वे उस समय देवों, असुरों और मनुष्योंके विजेता हो गये। तदनन्तर प्रह्लाद और इन्द्रका भयंकर देवासुर-संग्राम छिड़ गया, जो तीन सौ वर्षोंतक चलता रहा; परंतु उन दोनोंमें कोई किसीपर विजय नहीं पा रहा था। तब देवताओं और असुरोंने मिलकर देवाधिदेव ब्रह्मासे पूछा—'ब्रह्मन्! इन दोनोंमें कौन (पक्ष) विजयी होगा?' यह सुनकर ब्रह्माने उत्तर दिया—'जिस पक्षमें राजा रजि रहेंगे (वही विजयी होगा)।' तब दैत्योंने राजाके पास जाकर अपनी विजयके लिये उनसे प्रार्थना की कि 'आप हमारे सहायक हो जायें।' उनकी प्रार्थना सुनकर रजिने कहा—'यदि मैं आप लोगोंका स्वामी हो जाऊँ तभी उपयुक्त सहायता हो सकेगी।' परंतु असुरोंने उस प्रस्तावको स्वीकार नहीं किया, किंतु देवताओंने उसे स्वीकार करते हुए कहा—'राजन् ! आप हमलोगोंके स्वामी हो जायें और संग्राममें शत्रुओंका संहार करें।' तदनन्तर राजा रजिने उन सभी असुरोंको मौतके घाट उतार दिया, जो इन्द्रद्वारा अवध्य थे। इस कर्मसे प्रसन्न होकर देवराज इन्द्र राजाके पुत्र बन गये। तब राजा रजि इन्द्रको राज्य समर्पित कर स्वयं तपस्या करनेके लिये चले गये॥ ३२—४२ ॥
रजिपुत्रैस्तदाच्छिन्नं बलादिन्द्रस्य वैभवम्।<br>यज्ञभागं च राज्यं च तपोबलगुणान्वितैः॥ ४३<br>राज्याद् भ्रष्टस्तदा शक्रो रजिपुत्रैर्निपीडितः।<br>प्राह वाचस्पतिं दीनः पीडितोऽस्मि रजेः सुतैः॥ ४४<br>न यज्ञभागो राज्यं मे निर्जितश्च बृहस्पते।<br>राज्यलाभाय मे यत्नं विधत्स्व धिषणाधिप॥ ४५<br>ततो बृहस्पतिः शक्रमकरोद् बलदर्पितम्।<br>ग्रहशान्तिविधानेन पौष्टिकेन च कर्मणा॥ ४६<br>गत्वाथ मोहयामास रजिपुत्रान् बृहस्पतिः।<br>जिनधर्मे समास्थाय वेदबाह्यं स वेदवित्॥ ४७<br>वेदत्रयीपरिभ्रष्टांश्चकार धिषणाधिपः।<br>वेदबाह्यान् परिज्ञाय हेतुवादसमन्वितान्॥ ४८<br>जघान शक्रो वज्रेण सर्वान् धर्मबहिष्कृतान्।<br>नहुषस्य प्रवक्ष्यामि पुत्रान् सप्तैव धार्मिकान्॥ ४९<br>यतिर्ययातिः संयातिरुद्भवः पचिरेव च।<br>शर्यातिर्मेघजातिश्च सप्तैते वंशवर्धनाः॥ ५०तत्पश्चात् तपस्या, बल और गुणोंसे सम्पन्न रजिपुत्रोंने इन्द्रके वैभव, यज्ञभाग और राज्यको बलपूर्वक छीन लिया। इस प्रकार रजि-पुत्रोंद्वारा सताये गये एवं राज्यसे भ्रष्ट हुए दीन-दुःखी इन्द्र बृहस्पतिके पास जाकर बोले—'गुरुदेव ! मैं रजिके पुत्रोंद्वारा सताया जा रहा हूँ, मुझे अब यज्ञमें भाग नहीं मिलता तथा मेरा राज्य जीत लिया गया, अतः धिषणाधिप! (बृहस्पते) पुनः मेरी राज्य-प्राप्तिके लिये किसी उपायका विधान कीजिये।' तब बृहस्पतिने ग्रह-शान्तिके विधानसे तथा पौष्टिक कर्मद्वारा इन्द्रको बलसम्पन्न बना दिया और रजि-पुत्रोंके पास जाकर उन्हें मोहमें डाल दिया। उन वेदज्ञ बृहस्पतिने वेदोंद्वारा बहिष्कृत जिनधर्मका आश्रय लेकर उन्हें वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद)-से परिभ्रष्ट कर दिया। तदुपरान्त इन्द्रने उन्हें हेतुवाद (तर्कवाद-नास्तिक्य)-से समन्वित और वेदबाह्य जानकर अपने वज्रसे उन सभी धर्मबहिष्कृत रजि-पुत्रोंका संहार कर डाला। अब मैं नहुषके सात धार्मिक पुत्रोंका वर्णन कर रहा हूँ। उनके नाम हैं—यति, ययाति, संयाति, उद्भव, पाचि, शर्याति और मेघजाति। ये सातों वंश-विस्तारक थे॥ ४३—५०॥