मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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७४ * मत्स्यपुराण *
अठारहवाँ अध्याय
एकोद्दिष्ट और सपिण्डीकरण श्राद्धकी विधि
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इसके उपरान्त अब मैं उस 'एकोद्दिष्ट'¹ श्राद्धकी विधि बतला रहा हूँ, जिसका वर्णन स्वयं भगवान् चक्रपाणि विष्णुने किया है। पिताकी मृत्यु हो जानेपर पुत्रोंको शौचपर्यन्त जैसा कार्य करना चाहिये, उसे सुनिये॥ १॥ |
|---|---|
| एकोद्दिष्टमतो वक्ष्ये यदुक्तं चक्रपाणिना।<br>मृते पुत्रैर्यथा कार्यमाशौचं च पितर्यपि॥ १ | ब्राह्मणोंमें दस दिनके अशौचका विधान है। इसी प्रकार क्षत्रियोंमें बारह दिनका, वैश्योंमें पन्द्रह दिनका और शूद्रोंमें एक मासका अशौच लगता है। इस अशौचका विधान सगोत्रमें ही किया गया है। जिसका मुण्डन-संस्कार नहीं हुआ हो, ऐसे बच्चेका मरणाशौच एक राततक तथा इससे बड़ी अवस्थावालेका तीन राततक बतलाया गया है। इसी प्रकार जननाशौच भी सर्वदा सभी वर्णोंके लिये होता है। मरणाशौचमें अस्थिसञ्चयनके उपरान्त (परिवारवालोंका) अङ्गस्पर्श करनेका विधान है। प्रेतात्माके लिये बारह दिनोंतक पिण्डदान करना चाहिये; क्योंकि वे पिण्ड उस प्रेतके लिये पाथेय (मार्गका कलेवा) बतलाये गये हैं, अतः अतिशय सुखदायी होते हैं। इसी कारण वह प्रेतात्मा बारह दिनोंतक प्रेतपुर (यमपुरी)—को नहीं ले जाया जाता। वह बारह दिनोंतक अपने गृह, पुत्र और पत्नीको देखता रहता है। इसलिये उसके समस्त दाहोंकी शान्ति तथा मार्गकी थकावटका विनाश करनेके निमित्त दस राततक आकाशमें (पीपलके वृक्षमें बँधा हुआ) जलघट रखना चाहिये। तत्पश्चात् ग्यारहवें दिन ग्यारह ब्राह्मणोंको भोजन करावे। इसी प्रकार क्षत्रिय आदि अन्य वर्णवालोंको भी अपने-अपने सूतककी समाप्तिपर (विषम-संख्यक) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। पुनः दूसरे अर्थात् बारहवें दिन पूर्ववत् विधिपूर्वक एकोद्दिष्ट श्राद्धका समारम्भ करे। इसमें आवाहन, अग्निमें पिण्डदान तथा विश्वेदेवोंका पूजन निषिद्ध है। इस श्राद्धमें एक ही पवित्रक, एक ही अर्घ्य और एक ही पिण्डका विधान है। इसके पश्चात् 'उपतिष्ठताम्' इस शब्दका उच्चारण करके तिलसहित जल प्रदान करे और 'स्वदितम्०' इस सम्पूर्ण मन्त्रको बोलकर अन्नको पृथ्वीपर बिखेर दे तथा विसर्जनके समय 'अभिरम्यताम्' ऐसा कहे। इस प्रकार वेदज्ञ पुत्रको अपने पिताका शेष श्राद्ध-कार्य पूर्ववत् करना चाहिये। इसी विधिसे प्रतिमास (पिताकी मृत्यु-तिथिपर) सारा कार्य सम्पादित करना चाहिये। सूतक समाप्त होनेके पश्चात् दूसरे दिन |
| दशाहं शावमाशौचं ब्राह्मणेषु विधीयते।<br>क्षत्रियेषु दश द्वे च पक्षं वैश्येषु चैव हि॥ २ | |
| शूद्रेषु मासमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते।<br>नैशं वाकृतचूडस्य त्रिरात्रं परतः स्मृतम्॥ ३ | |
| जननेऽप्येवमेव स्यात् सर्ववर्णेषु सर्वदा।<br>तथास्थिसञ्चयनादूर्ध्वमङ्गस्पर्शो विधीयते॥ ४ | |
| प्रेताय पिण्डदानं तु द्वादशाहं समाचरेत्।<br>पाथेयं तस्य तत् प्रोक्तं यतः प्रीतिकरं महत्॥ ५ | |
| तस्मात् प्रेतपुरं प्रेतो द्वादशाहं¹ न नीयते।<br>गृहं पुत्रं कलत्रं च द्वादशाहं प्रपश्यति॥ ६ | |
| तस्मान्निधेयमाकाशे दशरात्रं पयस्तथा।<br>सर्वदाहोपशान्त्यर्थमध्वश्रमविनाशनम् ॥ ७ | |
| तत एकादशाहे तु द्विजानेकादशैव तु।<br>क्षत्रादिः सूतकान्ते तु भोजयेदयुतो द्विजान्॥ ८ | |
| द्वितीयेऽह्नि पुनस्तद्वदेकोद्दिष्टं समाचरेत्।<br>आवाहनाग्नौकरणं दैवहीनं विधानतः॥ ९ | |
| एकं पवित्रमेकोऽर्घ्य एकः पिण्डो विधीयते।<br>उपत्तिष्ठतामित्येतद् देयं पश्चात्तिलोदकम्॥ १० | |
| स्वदितं विकिरेद् ब्रूयाद् विसर्गे चाभिरम्यताम्।<br>शेषं पूर्ववदत्रापि कार्यं वेदविदा पितुः॥ ११ | |
| अनेन विधिना सर्वमनुमासं समाचरेत्।<br>सूतकान्ताद् द्वितीयेऽह्नि शय्यां दद्याद् विलक्षणाम्॥ १२ |
१. 'कहीं-कहीं द्वादशाहेन नीयते' पाठ भी है। वहाँ १२ दिनोंमें यमपुरी या पितृपुर ले जाया जाता है, ऐसा अर्थ समझना चाहिये।
२. पिता आदि केवल एक व्यक्तिके उद्देश्यसे किये जानेवाला श्राद्ध 'एकोद्दिष्ट' है।