मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय १८ * ७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| काञ्चनं पुरुषं तद्वत् फलवस्त्रसमन्वितम्।<br>सम्पूज्य द्विजदाम्पत्यं नानाभरणभूषणैः॥ १३<br><br>वृषोत्सर्गं प्रकुर्वीत देया च कपिला शुभा।<br>उदकुम्भश्च दातव्यो भक्ष्यभोज्यसमन्वितः॥ १४<br><br>यावदब्दं नरश्रेष्ठ सतिलोदकपूर्वकम्।<br>ततः संवत्सरे पूर्णे सपिण्डीकरणं भवेत्॥ १५<br><br>सपिण्डीकरणादूर्ध्वं प्रेतः पार्वणभाग् भवेत्।<br>वृद्धिपूर्वेषु योग्यश्च गृहस्थश्च भवेत्ततः॥ १६ | काञ्चनपुरुष (सोनेकी प्रतिमा) और फल-वस्त्रसे समन्वित विलक्षण शय्याका दान करना चाहिये। उसी समय अनेकविध वस्त्राभूषणोंसे द्विज-दम्पतीका पूजन करे। तत्पश्चात् वृषोत्सर्ग (साँड़ छोड़ने)-का काम सम्पन्न करे। उस समय एक सुन्दर कपिला गौका दान करे। नरश्रेष्ठ! पुनः अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे युक्त एक जलपात्र, जो तिल और जलसे परिपूर्ण हो, दान करे। इस प्रकारके जलपात्रका दान वर्षपर्यन्त करना चाहिये। इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर सपिण्डीकरण श्राद्ध किया जाता है। सपिण्डीकरण श्राद्धके पश्चात् प्रेतात्मा पार्वणश्राद्धका भागी हो जाता है तथा पूर्वकथित आभ्युदयिक आदि वृद्धि श्राद्धोंमें भाग पानेके योग्य एवं गृहस्थ हो जाता है॥ २—१६॥ |
| सपिण्डीकरणे श्राद्धे देवपूर्वं नियोजयेत्।<br>पितॄनेवासयेत् तत्र पृथक् प्रेतं विनिर्दिशेत्॥ १७<br><br>गन्धोदकतिलैर्युक्तं कुर्यात् पात्रचतुष्टयम्।<br>अर्घार्थं पितृपात्रेषु प्रेतपात्रं प्रसेचयेत्॥ १८<br><br>तद्वत् संकल्प्य चतुरः पिण्डान् पिण्डप्रदस्तथा।<br>ये समाना इति द्वाभ्यामन्त्यं तु विभजेत् तथा॥ १९<br><br>चतुर्थस्य पुनः कार्यं न कदाचिदतो भवेत्।<br>ततः पितृत्वमापन्नः सर्वतस्तुष्टिमागतः॥ २०<br><br>अग्निष्वात्तादिमध्यत्वं प्राप्नोत्यमृतमुत्तमम्।<br>सपिण्डीकरणादूर्ध्वं तस्मै तस्मान्न दीयते॥ २१<br><br>पितृष्वेव तु दातव्यं तत्पिण्डो येषु संस्थितः।<br>ततः प्रभृति संक्रान्तावुपरागादिपर्वसु॥ २२<br><br>त्रिपिण्डमाचरेच्छ्राद्धमेकोद्दिष्टे मृतेऽहनि।<br>एकोद्दिष्टं परित्यज्य मृताहे यः समाचरेत्॥ २३<br><br>सदैव पितृहा स स्यान्मातृभ्रातृविनाशकः।<br>मृताहे पार्वणं कुर्वन्नधोऽधो याति मानवः॥ २४<br><br>सम्पृक्तेष्वाकुलीभावः प्रेतेषु तु यतो भवेत्।<br>प्रतिसंवत्सरं तस्मादेकोद्दिष्टं समाचरेत्॥ २५ | सपिण्डीकरण श्राद्धमें सर्वप्रथम विश्वेदेवोंको नियुक्त करे। तत्पश्चात् पितरोंको स्थान दे और प्रेतका स्थान उनसे अलग निश्चित करे। फिर अर्घ्य देनेके लिये चन्दन, जल और तिलसे युक्त चार पात्र तैयार करे और प्रेतपात्रके जलसे पितृपात्रोंको सिक्त कर दे। (अर्थात् प्रेतपात्रके जलको तीन भागमें विभक्त करके उन्हें पितृपात्रोंमें डाल दे।) इसी प्रकार पिण्डदाता चार पिण्डोंका निर्माण करके उन्हें संकल्पपूर्वक (पितरों और प्रेतके स्थानोंपर पृथक्-पृथक्) रख दे। फिर 'ये समानाः०' (वाजस० १९।४५-४६)—इन दो मन्त्रोंद्वारा अन्तके (चौथे प्रेतके) पिण्डको (स्वर्णशलाका या कुशसे) तीन भागोंमें विभक्त कर दे (और एक-एक भागको क्रमशः पितरोंके पिण्डोंमें मिला दे)। इसके पश्चात् उस चौथे पिण्डका कहीं भी कोई उपयोग नहीं रह जाता। इसके बाद वह प्रेतात्मा सब ओरसे संतुष्ट होकर पितृरूपमें परिवर्तित हो जाता है और 'अग्निष्वात्त' आदि देवपितरोंके मध्य उत्तम एवं अविनाशी पद प्राप्त कर लेता है। इसी कारण सपिण्डीकरणके पश्चात् उसे कुछ नहीं दिया जाता। वह प्रेतात्मा जिन पितरोंके बीच स्थित है, उसके पिण्डके तीनों भागोंको उन्हीं पितरोंके पिण्डोंमें मिला देना चाहिये। तत्पश्चात् संक्रान्ति अथवा ग्रहण आदि पर्वोंके समय त्रिपिण्ड श्राद्ध ही करना चाहिये। एकोद्दिष्ट श्राद्धको प्रेतात्माकी मृत्युके दिन करनेका विधान है। जो श्राद्धकर्ता पिताकी मृत्युतिथिपर एकोद्दिष्ट श्राद्धका परित्याग कर (केवल) अन्य श्राद्धोंको करता है, वह सदैव पितृघाती तथा माता और भाईका विनाशक हो जाता है। पिताकी क्षयातिथिपर पार्वण श्राद्ध करनेवाला मानव अधम-से-अधम गतिको प्राप्त होता है। चूँकि प्रेतोंसे सम्बन्धित हो जानेसे पितृगण व्याकुल हो जाते हैं, इसलिये प्रतिवर्ष एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये। |