भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६८* मत्स्यपुराण *

| याचितारश्च नः सन्तु मा च याचिष्म कञ्चन।<br>एतदस्त्विति तत्प्रोक्तमन्वाहार्यं तु पार्वणम्॥ ५१<br>यथेन्दुसंक्षये तद्वदन्यत्रापि निगद्यते।<br>पिण्डांस्तु गोऽजविप्रेभ्यो दद्यादग्नौ जलेऽपि वा॥ ५२<br>विप्राग्रतो वा विकिरेद् वयोभिरभिवाशयेत्।<br>पत्नी तु मध्यमं पिण्डं प्राशयेद् विनयान्विता॥ ५३<br>आधत्त पितरो गर्भमत्र संतानवर्धनम्।<br>तावदुच्छेषणं तिष्ठेद् यावद् विप्रा विसर्जिताः॥ ५४<br>वैश्वदेवं ततः कुर्यान्निवृत्ते पितृकर्मणि।<br>इष्टैः सह ततः शान्तो भुञ्जीत पितृसेवितम्॥ ५५ | हमसे माँगनेवाले बहुत हों, परंतु हम किसीसे याचना न करें।' उस समय ब्राह्मणलोग कहें—'ऐसा ही हो।' इस प्रकार अन्वाहार्यक नामक पार्वण श्राद्ध जिस प्रकार अमावास्या तिथिको बतलाया गया है, उसी प्रकार अन्य तिथियोंमें भी किया जा सकता है। श्राद्ध-समाप्तिके पश्चात् उन पिण्डोंको गौ, बकरी या ब्राह्मणको दे दे अथवा अग्नि या जलमें भी डाल दे अथवा ब्राह्मणके सामने ही पक्षियोंके लिये छींट दे। उनमें मझले पिण्डको (श्राद्धकर्ताकी) पत्नी 'पितृगण मेरे उदरमें संतानकी वृद्धि करनेवाले गर्भकी स्थापना करायें' यों याचना करती हुई विनयपूर्वक स्वयं खा जाय। यह पिण्ड तबतक उच्छिष्ट बना रहता है, जबतक ब्राह्मण विदा नहीं कर दिये जाते। इस प्रकार पितृकर्मके समाप्त हो जानेपर वैश्वदेवका पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात् अपने इष्ट-मित्रोंसहित शान्तिपूर्वक उस पितृसेवित अन्नका स्वयं भोजन करना चाहिये॥ ४३—५५॥ | | पुनर्भोजनमध्वानं यानमायासमैथुनम्।<br>श्राद्धकृच्छ्राद्धभुक्चैव सर्वमेतद् विवर्जयेत्॥ ५६<br>स्वाध्यायं कलहं चैव दिवास्वप्नं च सर्वदा।<br>अनेन विधिना श्राद्धं निरुद्गारस्येह निर्वपेत्॥ ५७<br>कन्याकुम्भवृषस्थेऽर्के कृष्णपक्षेषु सर्वदा।<br>यत्र यत्र प्रदातव्यं सपिण्डीकरणात् परम्।<br>तत्रानेन विधानेन देयमग्निम्रता सदा॥ ५८ | श्राद्धकर्ता और श्राद्धभोक्ता—दोनोंको श्राद्धमें भोजन करनेके पश्चात् पुनः भोजन करना, मार्गगमन, सवारीपर चढ़ना, परिश्रमका काम करना, मैथुन, स्वाध्याय, कलह और दिनमें शयन—इन सबका उस दिन परित्याग कर देना चाहिये। इस प्रकार उपर्युक्त विधिसे जमुहाई आदि न लेकर श्राद्ध-कर्म सम्पन्न करना चाहिये। सपिण्डीकरणके पश्चात् कन्या, कुम्भ और वृष राशिपर सूर्यके स्थित रहनेपर कृष्णपक्षमें जहाँ-जहाँ पिण्डदान करे, वहाँ-वहाँ अग्निहोत्री श्राद्धकर्ताको सदा इसी विधिसे पिण्डदान करना चाहिये॥ ५६—५८॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽग्रिमच्छ्राद्धे श्राद्धकल्पो नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अग्रिमच्छ्राद्धविषयक श्राद्धकल्प नामक सोलहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६॥


सत्रहवाँ अध्याय

साधारण एवं आभ्युदयिक श्राद्धकी विधिका विवरण

| सूत उवाच<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि विष्णुना यदुदीरितम्।<br>श्राद्धं साधारणं नाम भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ १<br>अयने विषुवे युग्मे सामान्ये चार्कसंक्रमे।<br>अमावास्याष्टकाकृष्णपक्षे पञ्चदशीषु च॥ २<br>आर्द्रा मघारोहिणीषु द्रव्यब्राह्मणसङ्गमे।<br>गजच्छायाव्यतीपाते विष्टिवैधृतिवासरे॥ ३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इसके पश्चात् अब मैं उस साधारण श्राद्धके विषयमें बतला रहा हूँ, जो भोग एवं मोक्षरूपी फल प्रदान करनेवाला है तथा जिसका स्वयं भगवान् विष्णुने वर्णन किया है। सूर्यके उत्तरायण एवं दक्षिणायनके समय, विषुवयोग (सूर्यके तुला और मेष राशिपर संक्रमण करते समय), कृष्णपक्षकी अष्टका (मार्गशीर्ष, पौष, फाल्गुन कृष्णपक्षकी सप्तमी, अष्टमी, नवमी—इन तीन तिथियोंका समुदाय), अमावास्या और पूर्णिमा तिथियोंमें, आर्द्रा मघा और रोहिणी नक्षत्रोंमें, द्रव्य और ब्राह्मणके मिलनेपर, गजच्छाया, व्यतिपात और वैधृति योगोंमें तथा विष्टि (भद्रा) करणमें पूर्वोक्त साधारण श्राद्ध किया जाता है। |