मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १७ * | ६९ |
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| वैशाखस्य तृतीया या नवमी कार्त्तिकस्य च।<br>पञ्चदशी च माघस्य नभस्ये च त्रयोदशी॥ ४<br><br>युगादयः स्मृता ह्येता दत्तस्याक्षयकारिकाः।<br>तथा मन्वन्तरादौ च देयं श्राद्धं विजानता॥ ५ | वैशाखमासकी शुक्लतृतीया (अक्षयतृतीया), कार्तिकमासकी शुक्लनवमी (अक्षयनवमी), माघमासकी पूर्णिमा और भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी—ये युगादि तिथियोंके नामसे प्रसिद्ध हैं। इनमें किया गया श्राद्ध अक्षय फलदायक होता है। इसी प्रकार विद्वान् श्राद्धकर्ताको मन्वन्तरोंकी आदि तिथियोंमें भी श्राद्ध-कर्म करना चाहिये॥ १—५॥ |
| अश्वयुक्छुक्लनवमी द्वादशी कार्त्तिके तथा।<br>तृतीया चैत्रमासस्य तथा भाद्रपदस्य च॥ ६<br><br>फाल्गुनस्य ह्यमावास्या पौषस्यैकादशी तथा।<br>आषाढस्यापि दशमी माघमासस्य सप्तमी॥ ७<br><br>श्रावणस्याष्टमी कृष्णा तथाषाढी च पूर्णिमा।<br>कार्त्तिकी फाल्गुनी चैत्री ज्येष्ठपञ्चदशी सिता।<br>मन्वन्तरादयश्चैता दत्तस्याक्षयकारिकाः॥ ८ | आश्विनमासकी शुक्लनवमी, कार्तिकमासकी शुक्लद्वादशी, चैत्रमासकी शुक्लतृतीया, भाद्रपदमासकी शुक्लतृतीया, फाल्गुनमासकी अमावास्या, पौषमासकी शुक्ल-एकादशी, आषाढ़मासकी शुक्लदशमी, माघमासकी शुक्लसप्तमी, श्रावणमासकी कृष्णाष्टमी, आषाढ़मासकी पूर्णिमा तथा कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठकी पूर्णिमा—ये चौदह तिथियाँ चौदह मन्वन्तरोंकी आदि तिथियाँ हैं; इनमें किया गया श्राद्ध अक्षय फलकारक होता है। |
| यस्यां मन्वन्तरस्यादौ रथमास्ते दिवाकरः।<br>माघमासस्य सप्तम्यां सा तु स्याद् रथसप्तमी॥ ९<br><br>पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं<br>दद्यात् पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः।<br>श्राद्धं कृतं तेन समाः सहस्रं<br>रहस्यमेतत् पितरो वदन्ति॥ १० | जिस मन्वन्तरकी आदि तिथि माघमासकी शुक्लसप्तमीमें भगवान् सूर्य रथपर आरूढ़ होते हैं, वह सप्तमी रथसप्तमीके नामसे प्रसिद्ध है। इस तिथिमें यदि मनुष्य प्रयत्नपूर्वक अपने पितरोंको तिलमिश्रित जलमात्र प्रदान करता है अर्थात् तर्पण कर लेता है तो वह सहस्रों वर्षोंतक किये गये श्राद्धके समान फलदायक होता है। इसका रहस्य पितृगण स्वयं बतलाते हैं। |
| वैशाख्यामुपरागेषु तथोत्सवमहालये।<br>तीर्थायतनगोष्ठेषु दीपोद्यानगृहेषु च॥ ११<br><br>विविक्तेषूपलिप्तेषु श्राद्धं देयं विजानता।<br>विप्रान् पूर्वे परे चाह्नि विनीतात्मा निमन्त्रयेत्॥ १२<br><br>शीलवृत्तगुणोपेतान् वयोरूपसमन्वितान्।<br>द्वौ दैवे त्रींस्तथा पित्र्ये एकैकमुभयत्र वा॥ १३<br><br>भोजयेत् सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे।<br>विश्वान् देवान् यवैः पुष्पैरण्यर्च्य्यासनपूर्वकम्॥ १४<br><br>पूरयेत् पात्रयुग्मं तु स्थाप्य दर्भपवित्रकम्।<br>शंनो देवीत्यपः कुर्याद् यवोऽसीति यवानपि॥ १५ | विद्वान् श्राद्धकर्ताको चाहिये कि वह वैशाखी पूर्णिमामें, सूर्य एवं चन्द्रग्रहणमें, विशेष उत्सवके अवसरपर, पितृपक्षमें,* तीर्थस्थान, देव-मन्दिर एवं गोशालामें, दीपगृह और वाटिकामें एकान्तमें लिपी-पुती हुई भूमिपर श्राद्ध-कार्य सम्पन्न करे। वह श्राद्धके एक या दो दिन पूर्व ही विनम्रभावसे शीलवान्, सदाचारी, गुणी, रूपवान् एवं अधिक अवस्थावाले ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। देवकार्यमें दो और पितृ-कार्यमें तीन अथवा दोनोंमें एक-एक ही ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। अतिशय समृद्धिशाली होनेपर भी विस्तारमें नहीं लगना चाहिये। उस समय विश्वेदेवोंको आसन प्रदान करके यव और पुष्पोंद्वारा उनकी अर्चना करे। फिर दो मिट्टीके पात्र (कोसा) रखकर उनमें कुशनिर्मित पवित्रक डाल दे और ‘शं नो देवीरभीष्टये०’ (वाज० सं० ३६। १२) इस मन्त्रको पढ़कर उन्हें जलसे भर दे और ‘यवोऽसि०’ (नारायणोपनिषद्) यह मन्त्र उच्चारणकर उनमें यव डाल दे। |
* इस प्रकार श्राद्धके ९६ अवसर प्रसिद्ध हैं और ये ही वचन हेमाद्रि आदिके श्राद्धकाण्डों तथा श्राद्धतत्त्व, श्राद्धविवेक, श्राद्धप्रकाश, श्राद्धकल्पलता, पितृदयिता आदि सभी श्राद्ध-निबन्धोंमें प्राप्त होते हैं।