मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय ११ * | ४५
ग्यारहवाँ अध्याय
सूर्यवंश और चन्द्रवंशका वर्णन तथा इलाका वृत्तान्त
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>आदित्यवंशमखिलं वद सूत यथाक्रमम्।<br>सोमवंशं च तत्त्वज्ञ यथावद् वक्तुमर्हसि॥ १ | **ऋषियोंने पूछा—**तत्त्वज्ञ सूतजी! अब आप हम लोगोंसे सम्पूर्ण सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका क्रमशः यथार्थ-रूपसे वर्णन कीजिये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>विवस्वान् कश्यपात् पूर्वमदित्यामभवत् सुतः।<br>तस्य पत्नीत्रयं तद्वत् संज्ञा राज्ञी प्रभा तथा॥ २ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें महर्षि कश्यपसे अदितिको विवस्वान् (सूर्य) पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए थे। उनकी संज्ञा, राज्ञी तथा प्रभा नामकी तीन पत्नियाँ थीं। |
| रेवतस्य सुता राज्ञी रैवतं सुषुवे सुतम्।<br>प्रभा प्रभातं सुषुवे त्वाष्ट्री संज्ञा तथा मनुम्॥ ३ | इनमें रेवतकी कन्या राज्ञीने रैवत नामक पुत्रको तथा प्रभाने प्रभात नामक पुत्रको उत्पन्न किया। संज्ञा त्वाष्ट्र (विश्वकर्मा)-की पुत्री थी। उसने वैवस्वत मनु और यम नामक दो पुत्र एवं यमुना नामकी एक कन्याको उत्पन्न किया। |
| यमश्च यमुना चैव यमलौ तु बभूवतुः।<br>ततस्तेजोमयं रूपमसहन्ती विवस्वतः॥ ४ | इनमें यम और यमुना जुड़वे पैदा हुए थे।* कुछ समयके पश्चात् जब सुन्दरी त्वाष्ट्री (संज्ञा) विवस्वान्के तेजोमय रूपको सहन न कर सकी, |
| नारीमुत्पादयामास स्वशरीरादनिन्दिताम्।<br>त्वाष्ट्री स्वरूपरूपेण नाम्ना छायेति भामिनी॥ ५ | तब उसने अपने शरीरसे अपने ही रूपके समान एक अनिन्द्यसुन्दरी नारीको उत्पन्न किया। वह 'छाया' नामसे प्रसिद्ध हुई। |
| पुरतः संस्थितां दृष्ट्वा संज्ञा तां प्रत्यभाषत।<br>छाये त्वं भज भर्तारमस्मदीयं वरानने॥ ६ | उस छायाको अपने सामने खड़ी देखकर संज्ञाने उससे कहा—'वरानने छाये! तुम हमारे पतिदेवकी सेवा करना, |
| अपत्यानि मदीयानि मातृस्नेहेन पालय।<br>तथेत्युक्त्वा च सा देवमगात् कामाय सुव्रता॥ ७ | साथ ही मेरी संतानोंका माताके समान स्नेहसे पालन-पोषण करना।' तब 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा'—कहकर वह सुव्रता पतिकी सेवाभावनासे विवस्वान्देवके निकट गयी। |
| कामयामास देवोऽपि संज्ञेयमिति चादरात्।<br>जनयामास तस्यां तु पुत्रं च मनुरूपिणम्॥ ८ | इधर विवस्वान्देव भी 'यह संज्ञा ही है'—ऐसा समझकर छायाके साथ आदरपूर्वक पूर्ववत् व्यवहार करते रहे। यथासमय उन्होंने उसके गर्भसे मनुके समान रूपवाले एक पुत्रको उत्पन्न किया। |
| सवर्णत्वाच्च सावर्णिर्मनोर्वैवस्वतस्य च।<br>ततः शनिं च तपतीं विष्टिं चैव क्रमेण तु॥ ९ | ये वैवस्वत मनुके सवर्ण (रूप-रंगवाला) होनेके कारण 'सावर्णि' नामसे प्रसिद्ध हुए। |
| छायायां जनयामास संज्ञेयमिति भास्करः।<br>छाया स्वपुत्रेऽभ्यधिकं स्नेहं चक्रे मनौ तथा॥ १० | तदुपरांत सूर्यने 'यह संज्ञा ही है'—ऐसा मानकर छायाके गर्भसे क्रमशः एक शनि नामका पुत्र और तपती एवं विष्टि नामकी दो कन्याओंको भी उत्पन्न किया। छाया अपने पुत्र मनुके प्रति अन्य संतानोंसे अधिक स्नेह रखती थी। |
| पूर्वो मनुस्तु चक्षाम न यमः क्रोधमूर्च्छितः।<br>संतर्जयामास तदा पादमुद्यम्य दक्षिणम्॥ ११ | उसके इस व्यवहारको संज्ञा-नन्दन मनु तो सहन कर लेते थे, परंतु यम (एक दिन सहन न होनेके कारण) क्रुद्ध हो उठे और अपने दाहिने पैरको उठाकर छायाको मारनेकी धमकी देने लगे। |
| शशाप च यमं छाया भक्षितः कृमिसंयुतः।<br>पादोऽयमेको भविता पूयशोणितविस्रवः॥ १२ | तब छायाने यमको शाप देते हुए कहा—'तुम्हारे इस एक पैरको कीड़े काट खायेंगे और इससे पीब एवं |
* इसका मूल ऋक् ० १०। १७। १-२ में 'त्वष्टा दुहित्रे...............यमस्य माता...............कृत्वी सवर्णा' आदिमें है।