मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ७ * | ३३ |
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सातवाँ अध्याय
मरुतोंकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें दितिकी तपस्या, मदनद्वादशी-व्रतका वर्णन, कश्यपद्वारा दितिको वरदान, गर्भिणी स्त्रियोंके लिये नियम तथा मरुतोंकी उत्पत्ति
| संस्कृत | हिन्दी |
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| ऋषय ऊचुः<br>दितेः पुत्राः कथं जाता मरुतो देववल्लभाः।<br>देवैर्जग्मुश्च सापत्नैः कस्मात्ते सख्यमुत्तमम्॥ १ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! (दैत्योंकी जननी) दितिके पुत्र उनचास मरुत देवताओंके प्रिय कैसे बन गये? तथा अपने सौतेले भाई देवताओंके साथ उनकी प्रगाढ़ मैत्री कैसे हो गयी?॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>पुरा देवासुरे युद्धे हतेषु हरिणा सुरैः।<br>पुत्रपौत्रेषु शोकार्ता गत्वा भूर्लोकमप्युत्तमम्॥ २<br>स्यमन्तपञ्चके क्षेत्रे सरस्वत्यास्तटे शुभे।<br>भर्तुराराधनपरा तप उग्रं चचार ह॥ ३<br>तदा दितिर्दैत्यमाता ऋषिरूपेण सुव्रत।<br>फलाहारा तपस्तेपे कृच्छ्रं चान्द्रायणादिकम्॥ ४<br>यावद् वर्षशतं साग्रं जराशोकसमाकुला।<br>ततः सा तपसा तप्ता वसिष्ठादीनपृच्छत॥ ५<br>कथयन्तु भवन्तो मे पुत्रशोकविनाशनम्।<br>व्रतं सौभाग्यफलदमिह लोके परत्र च॥ ६<br>ऊचुर्वसिष्ठप्रमुखा मदनद्वादशीव्रतम्।<br>यस्याः प्रभावादभवत् सुतशोकविवर्जिता॥ ७ | **सूतजी कहते हैं—**सुव्रत मुनियो! प्राचीनकालकी बात है, देवासुर-संग्राममें भगवान् विष्णु तथा देवगणोंद्वारा अपने पुत्र-पौत्रोंका संहार हो जानेपर दैत्यमाता दिति शोकसे विह्वल हो गयी। वह उत्तम भूलोकमें जाकर स्यमन्तपञ्चकक्षेत्रमें सरस्वतीके मङ्गलमय तटपर अपने पतिदेव महर्षि कश्यपकी आराधनामें तत्पर रहती हुई घोर तपमें निरत हो गयी। उस समय उसने ऋषियोंके समान फलाहारपर निर्भर रहकर कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रतोंका पालन किया। इस प्रकार बुढ़ापा और शोकसे अत्यन्त आकुल हुई दिति सौ वर्षोंतक उस कठोर तपका अनुष्ठान करती रही। तदनन्तर उस तपस्यासे सन्तप्त हुई दितिन्ने वसिष्ठ आदि महर्षियोंसे पूछा— 'ऋषियो! आप लोग मुझे ऐसा व्रत बतलाइये, जो पुत्र-शोकका विनाशक तथा इहलोक एवं परलोकमें सौभाग्यरूपी फलका प्रदाता हो।' तब वसिष्ठ आदि ऋषियोंने उसे मदनद्वादशी-व्रतका विधान बतलाया, जिसके प्रभावसे वह पुत्रशोकसे उन्मुक्त हो गयी॥ २—७॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>श्रोतुमिच्छामहे सूत मदनद्वादशीव्रतम्।<br>सुतानेकोनपञ्चाशद् येन लेभे दितिः पुनः॥ ८ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! जिसका अनुष्ठान करनेसे दितिको पुनः उनचास पुत्रोंकी प्राप्ति हुई, उस मदन-द्वादशीव्रतके विषयमें हमलोग भी सुनना चाहते हैं॥ ८॥ |
| सूत उवाच<br>यद् वसिष्ठादिभिः पूर्वं दितेः कथितमुत्तमम्।<br>विस्तरेण तदेवेदं मत्सकाशात्रिबोधत॥ ९<br>चैत्रे मासि सिते पक्षे द्वादश्यां नियतव्रतः।<br>स्थापयेदव्रणं कुम्भं सिततण्डुलपूरितम्॥ १०<br>नानाफलयुतं तद्वदिक्षुदण्डसमन्वितम्।<br>सितवस्त्रयुगच्छन्नं सितचन्दनचर्चितम्॥ ११<br>नानाभक्ष्यसमोपेतं सहिरण्यं तु शक्तितः।<br>ताम्रपात्रं गुडोपेतं तस्योपरि निवेशयेत्॥ १२ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें वसिष्ठ आदि महर्षियोंने दितिके प्रति जिस उत्तम मदनद्वादशी-व्रतका वर्णन किया था, उसीको आपलोग मुझसे विस्तारपूर्वक सुनिये। व्रतधारीको चाहिये कि वह चैत्रमासमें शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको श्वेत चावलोंसे परिपूर्ण एवं छिद्ररहित एक घट स्थापित करे। उसपर श्वेत चन्दनका अनुलेप लगा हो तथा वह श्वेत वस्त्रके दो टुकड़ोंसे आच्छादित हो। उसके निकट विभिन्न प्रकारके ऋतुफल और गन्नेके टुकड़े रखे जायें। वह विविध प्रकारकी खाद्य-सामग्रीसे युक्त हो तथा उसमें यथाशक्ति सुवर्ण-खण्ड भी डाला जाय। तत्पश्चात् उसके ऊपर गुड़से भरा हुआ ताँबेका पात्र स्थापित करना चाहिये। |