मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मादुपरि कामं तु कदलीदलसंस्थितम्।<br>कुर्याच्छर्करयोपेतां रतिं तस्य च वामतः ॥ १३<br>गन्धं धूपं ततो दद्याद् गीतं वाद्यं च कारयेत्।<br>तदभावे कथां कुर्यात् कामकेशवयोनरः ॥ १४<br>कामनाम्नो हरेरर्चां स्नापयेद् गन्धवारिणा।<br>शुक्लपुष्पाक्षततिलैरर्चयेन्मधुसूदनम् ॥ १५<br>कामाय पादौ सम्पूज्य जङ्घे सौभाग्यदाय च।<br>ऊरू स्मरायेति पुनर्मन्मथायेति वै कटिम्॥ १६<br>स्वच्छोदरायेत्युदरमनङ्गायेत्युरो हरेः।<br>मुखं पद्ममुखायेति बाहू पञ्चशराय वै॥ १७<br>नमः सर्वात्मने मौलिमर्चयेदिति केशवम्।<br>ततः प्रभाते तं कुम्भं ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ १८<br>ब्राह्मणान् भोजयेद् भक्त्या स्वयं च लवणादृते।<br>भुक्त्वा तु दक्षिणां दद्यादिमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ १९<br>प्रीयतामत्र भगवान् कामरूपी जनार्दनः।<br>हृदये सर्वभूतानां य आनन्दोऽभिधीयते॥ २० | उसके ऊपर केलेके पत्तेपर काम तथा उसके वाम भागमें शक्करसमन्वित रतिकी स्थापना करे। फिर गन्ध, धूप आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करे और गीत, वाद्य आदिका भी प्रबन्ध करे। (अर्थाभावके कारण) गीत-वाद्य आदिका प्रबन्ध न हो सकनेपर मनुष्यको कामदेव और भगवान् विष्णुकी कथाका आयोजन करना चाहिये। पुनः कामदेव नामक भगवान् विष्णुकी अर्चना करते समय उन्हें सुगन्धित जलसे स्नान कराना चाहिये। श्वेत पुष्प, अक्षत और तिलोंद्वारा उन मधुसूदनकी विधिवत् पूजा करे। उस समय उन 'विष्णुके पैरोंमें कामदेव, जङ्घाओंमें सौभाग्यदाता, ऊरुओंमें स्मर, कटिभागमें मन्मथ, उदरमें स्वच्छोदर, वक्षःस्थलमें अनङ्ग, मुखमें पद्ममुख, बाहुओंमें पञ्चशर और मस्तकमें सर्वात्माको नमस्कार है'—यों कहकर भगवान् केशवका साङ्गोपाङ्ग पूजन करे। तदनन्तर प्रातःकाल वह घट ब्राह्मणको दान कर दे। पुनः भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी नमकरहित भोजन करे और ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर इस मन्त्रका उच्चारण करे—'जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित रहकर आनन्द नामसे कहे जाते हैं, वे कामरूपी भगवान् जनार्दन मेरे इस अनुष्ठानसे प्रसन्न हों'॥ ९—२०॥ |
| अनेन विधिना सर्वं मासि मासि व्रतं चरेत्।<br>उपवासी त्रयोदश्यामर्चयेद् विष्णुमव्ययम्॥ २१<br>फलमेकं च सम्प्राश्य द्वादश्यां भूतले स्वपेत्।<br>ततस्त्रयोदशे मासि घृतधेनुसमन्विताम्॥ २२<br>शय्यां दद्यादनङ्गाय सर्वोपस्करसंयुताम्।<br>काञ्चनं कामदेवं च शुक्लां गां च पयस्विनीम्॥ २३<br>वासोभिर्द्विजदाम्पत्यं पूज्यं शक्त्या विभूषणैः।<br>शय्यागन्धादिकं दद्यात् प्रीयतामित्युदीरयेत्॥ २४<br>होमः शुक्लतिलैः कार्यः कामनामानि कीर्तयेत्।<br>गव्येन हविषा तद्वत् पायसेन च धर्मवित्॥ २५<br>विप्रेभ्यो भोजनं दद्याद् वित्तशाठ्यं विवर्जयेत्।<br>इक्षुदण्डानथो दद्यात् पुष्पमालाश्च शक्तितः ॥ २६ | इसी विधिसे प्रत्येक मासमें मदनद्वादशीव्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि वह द्वादशीके दिन एक फल खाकर भूतलपर शयन करे और त्रयोदशीके दिन अविनाशी भगवान् विष्णुका पूजन करे। तेरहवाँ महीना आनेपर घृतधेनुसहित एवं समस्त सामग्रियोंसे सम्पन्न शय्या, कामदेवकी स्वर्ण-निर्मित प्रतिमा और श्वेत रंगकी दुधारू गौ अनङ्ग (कामदेव)-को समर्पित करे (अर्थात् अनङ्गके उद्देश्यसे ब्राह्मणको दान दे)। उस समय शक्तिके अनुसार वस्त्र एवं आभूषण आदिद्वारा सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करके उन्हें शय्या और सुगन्ध आदि प्रदान करते हुए ऐसा कहना चाहिये कि 'आप प्रसन्न हों।' तत्पश्चात् उस धर्मज्ञ व्रतीको गोदुग्धसे बनी हुई हवि, खीर और श्वेत तिलोंसे कामदेवके नामोंका कीर्तन करते हुए हवन करना चाहिये। पुनः कृपणता छोड़कर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये और उन्हें यथाशक्ति गन्ना और पुष्पमाला प्रदानकर संतुष्ट करना चाहिये। |