मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय २०६ * <span style="float: right;">८३९</span>
| संस्कृत | हिन्दी |
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| कृष्णः कृष्णगलो देवः कृष्णाजिनधरस्तथा।<br>तद्दानाद्धतपापस्य प्रीयतां वृषभध्वजः॥ २८<br><br>अनेन विधिना दत्त्वा यथावत् कृष्णमार्गकम्।<br>न स्पृश्योऽसौ द्विजो राजञ्श्वितियूपसमो हि सः॥ २९<br><br>तं दाने श्राद्धकाले च दूरतः परिवर्जयेत्।<br>स्वगृहात् प्रेष्य तं विप्रं मङ्गलस्नानमाचरेत्॥ ३० | करना चाहिये। जो श्यामवर्ण, कृष्णकण्ठ तथा कृष्णचर्म धारण करनेवाले देवता हैं, आपके दानसे पापशून्य हुए मुझपर वे शंकर प्रसन्न हों। राजन्! उपर्युक्त विधिसे कृष्णमृगचर्मका दान देनेके पश्चात् उस प्रतिगृहीता ब्राह्मणका स्पर्श नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह (श्मशानस्था अस्पृश्या) चिताके खूँटेके समान हो जाता है। उसका श्राद्ध और दानके समय दूरसे ही परित्याग कर देना चाहिये। उस ब्राह्मणको अपने घरसे विदाकर फिर मङ्गलस्नान करनेका विधान है॥ २३-३०॥ |
| पूर्णकुम्भेन राजेन्द्र शाखया चम्पकस्य तु।<br>कृत्वाऽऽचार्यश्च कलशं मन्त्रेणानेन मूर्धनि॥ ३१<br><br>आप्यायस्व समुद्रज्येष्ठा ऋचा संस्नाप्य षोडश।<br>अहते वाससी वीत आचान्तः शुचितामियात्॥ ३२<br><br>तद्वासः कुम्भसहितं नीत्वा क्षेप्यं चतुष्पथे।<br>ततो मण्डलमाविशेत् कृत्वा देवान् प्रदक्षिणम्॥ ३३<br><br>पीते वृत्ते सपत्नीकं मार्जयेद् याज्यकं द्विजः।<br>मार्जयेन्मुक्तिकामं तु ब्राह्मणेन घटेन वै॥ ३४<br><br>श्रीकामं वैष्णवेनेह कलशेन तु पार्थिव।<br>राज्यकामं तथा मूर्ध्नि ऐन्द्रेण कलशेन तु॥ ३५<br><br>द्रव्यप्रतापकामं तु आग्नेयघटवारिणा।<br>मृत्युञ्जयविधानाय याम्येन कलशेन तु॥ ३६<br><br>ततस्तु तिलकं कार्यं ब्राह्मणेभ्यस्तु दक्षिणाम्।<br>दत्त्वा तत्कर्मसिद्धयर्थं ग्राह्याऽऽशीस्तु विशेषतः॥ ३७ | राजेन्द्र! तत्पश्चात् आचार्य चम्पककी शाखासे युक्त जलपूर्ण कलशके जलसे दाताके मस्तकपर ‘आप्यायस्व समुद्रज्येष्ठा०' आदि सोलह ऋचाओंसे अभिषेचन करे, तब वह दो बिना फटे वस्त्रोंको पहनकर आचमन करके पवित्र होता है। पुनः उस वस्त्रको कलशमें डालकर उसे चौराहेपर फेंक दे। इसके बाद देवताओंकी प्रदक्षिणा कर मण्डपमें प्रवेश करे। तदनन्तर ब्राह्मण उस पीत वस्त्रधारी सपत्नीक यजमानका मार्जन करे। यदि यजमान मुक्तिकी इच्छा रखता हो तो ब्राह्मणसम्बन्धी घटसे उसका मार्जन करे। राजन्! यदि यजमान लक्ष्मीका अभिलाषी हो तो विष्णुसम्बन्धी कलशके जलसे उसका मार्जन करे। यदि राज्यकी कामना हो तो इन्द्रसम्बन्धी कलशके जलसे यजमानके मस्तकपर अभिषेक करे। द्रव्य और प्रतापकी कामना करनेवाले यजमानका अग्निसम्बन्धी कलशके जलसे सिंचन करे। मृत्युपर विजय पानेके विधानके लिये यमसम्बन्धी कलशके जलसे अभिषेक करे। तत्पश्चात् यजमानको तिलक लगाये। दाता ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर कृष्णमृगचर्म-दानकी सिद्धिके लिये उनसे विशेष रूपसे आशीर्वाद ग्रहण करे॥ ३१-३७॥ |
| कृतेनानेन या तुष्टिर्न सा शक्या सुरैरपि।<br>वक्तुं हि नृपतिश्रेष्ठ तथाप्युद्देशतः शृणु॥ ३८<br><br>समग्रभूमिदानस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम्।<br>सर्वांल्लोकांश्च जयति कामचारी विहङ्गवत्॥३९<br><br>आभूतसम्प्लवं तावत् स्वर्गमाप्नोत्यसंशयम्।<br>न पिता पुत्रमरणं वियोगं भार्यया सह॥४० | नृपतिश्रेष्ठ! इसके करनेसे जो तुष्टि प्राप्त होती है, उसका वर्णन करनेकी शक्ति यद्यपि देवताओंमें भी नहीं है तथापि मैं संक्षेपमें बतला रहा हूँ, सुनिये। वह दाता निश्चय ही समग्र पृथ्वीके दानका फल प्राप्त करता है, सभी लोकोंको जीत लेता है, पक्षीके समान सर्वत्र स्वेच्छानुसार विचरण करता है, महाप्रलयकालपर्यन्त निःसंदेह स्वर्गलोकमें स्थित रहता है, पिता पुत्रकी मृत्यु और पत्नीके वियोगको नहीं देखता। |