भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८३८* मत्स्यपुराण *

| तिलपूर्णं ततः कृत्वा वामपादे निवेशयेत्।<br>यानि कानि च पापानि कर्मोत्थानि कृतानि च॥ १३<br>कांस्यपात्रप्रदानेन तानि नश्यन्तु मे सदा।<br>मधुपूर्णं तु तत् कृत्वा पादे वै दक्षिणे न्यसेत्॥ १४<br>परापवादपैशुन्याद् वृथा मांसस्य भक्षणात्।<br>तत्रोत्थितं च मे पापं ताम्रपात्रात् प्रणश्यतु॥ १५<br>कन्यामृताद् गवां चैव परदाराभिमर्षणात्।<br>रौप्यपात्रप्रदानाद्धि क्षिप्रं नाशं प्रयातु मे॥ १६<br>ऊर्ध्वपादे त्विमे कार्यं ताम्रस्य रजतस्य च।<br>जन्मान्तरसहस्रेषु कृतं पापं कुबुद्धिना॥ १७<br>सुवर्णपात्रदानात् तु नाशयाशु जनार्दन।<br>हेममुक्ता विद्रुमं च दाडिमं बीजपूरकम्॥ १८<br>प्रशस्तपात्रे श्रवणे खुरे शृङ्गाटकानि च।<br>एवं कृत्वा यथोक्तेन सर्वशाकफलानि च॥ १९<br>तत्प्रतिग्रहविद् विद्वानाहिताग्निर्द्विजोत्तमः।<br>स्नातो वस्त्रयुगच्छन्नः स्वशक्त्या चाप्यलङ्कृतः॥ २०<br>प्रतिग्रहश्च तस्योक्तः पुच्छदेशे महीपते।<br>तत एवं समीपे तु मन्त्रमेनमुदीरयेत्॥ २१<br>कृष्णाजिनेति कृष्णान् हिरण्यं मधुसर्पिषी।<br>ददाति यस्तु विप्राय सर्वं तरति दुष्कृतम्॥ २२<br>यस्तु कृष्णाजिनं दद्यात् सखुरं शृङ्गसंयुतम्।<br>तिलैः प्रच्छाद्य वासोभिः सर्ववस्त्रैरलंकृतम्॥ २३<br>वैशाख्यां पौर्णमास्यां तु विशाखायां विशेषतः।<br>ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना॥ २४<br>सप्तद्वीपान्विता दत्ता पृथिवी नात्र संशयः।<br>कृष्णकृष्णाङ्कलो देवः कृष्णाजिन नमोऽस्तु ते॥ २५<br>सुवर्णदानात् त्वद्दानाद् धूतपापस्य प्रीयताम्।<br>त्रयस्त्रिंशत्सुराणां त्वमाधारत्वे व्यवस्थितः॥ २६<br>कृष्णोऽसि मूर्तिमान् साक्षात् कृष्णाजिन नमोऽस्तु ते।<br>सुवर्णनाभिकं दद्यात् प्रीयतां वृषभध्वजः॥ २७ | फिर काँसेके पात्रको तिलोंसे भरकर बायें पैरके पास रखे और कहे कि 'मैंने प्रसङ्गवश जिन-जिन पापोंका आचरण किया है, मेरे वे सभी पाप इस कांस्य-पात्रके दानसे सदाके लिये नष्ट हो जायँ।' फिर ताम्र-पात्रमें मधु भरकर दाहिने पैरके पास रखे और कहे कि 'दूसरेकी निन्दा या चुगुली करने अथवा किसी अवैध मांसका भक्षण करनेसे उत्पन्न हुआ मेरा पाप इस ताम्र-पात्रका दान करनेसे नष्ट हो जाय।' 'कन्या और गौके लिये मिथ्या कहनेसे तथा परकीय स्त्रीका स्पर्श करनेसे जो पाप उत्पन्न हुआ हो, मेरा वह पाप चाँदीके पात्रदानसे शीघ्र ही नष्ट हो जाय।' चाँदी तथा ताँबेके बने हुए पात्रोंको पैरके ऊपरी भागमें रखना चाहिये। 'जनार्दन! मैंने अपनी दुष्ट बुद्धिके द्वारा हजारों जन्मोंमें जो पाप किया है उसे आप सुवर्णपात्रके दानसे शीघ्र ही नष्ट कर दें।' यह मन्त्र सुवर्णपात्र दान करते समय कहे। उस समय सुवर्ण, मोती, मूँगा, अनार और बिजौरा नींबूको अच्छे पात्रमें रखकर उस मृगचर्मके कान, खुर और सींगपर स्थापित कर दे। यथोक्त विधिके अनुसार ऐसा करके सभी प्रकारके शाक-फलोंको भी रख दे। महीपते! तत्पश्चात् जो ब्राह्मणश्रेष्ठ प्रतिग्रहकी विधिका ज्ञाता, विद्वान् और अग्न्याधान करनेवाला हो तथा स्नानके पश्चात् दो सुन्दर वस्त्रको धारणकर अपनी शक्तिके अनुसार अलंकृत भी हो, ऐसे ब्राह्मणको उस मृगचर्मके पुच्छदेशमें दान देनेका विधान है। उस समय उसके समीप इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। जो 'कृष्णाजिनेति०'—इस मन्त्रका उच्चारण कर कृष्णमृगचर्म, सुवर्ण, मधु और घृत ब्राह्मणको दान करता है, वह सभी दुष्कर्मोंसे छूट जाता है॥ ११—२२॥<br>जो मनुष्य खुर तथा सींगसहित कृष्णमृगचर्मको तिलोंसे ढककर एवं सभी प्रकारके वस्त्रोंसे अलङ्कृत कर विशेषतया विशाखा नक्षत्रसे युक्त वैशाखमासकी पूर्णिमा तिथिको दान करता है, उसने निःसंदेह समुद्रों, गुफाओं, पर्वतों एवं जंगलोंसमेत सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका दान कर दिया। कृष्णाजिन! तुम कृष्णस्वरूपधारी देवता हो, तुम्हें नमस्कार है। सुवर्णदान तथा तुम्हारे दानसे जिसके समस्त पाप नष्ट हो गये हैं, ऐसे मुझपर तुम प्रसन्न हो जाओ। कृष्णाजिन! तुम तैंतीस देवताओंके आधार-स्वरूप निश्चित किये गये हो और साक्षात् मूर्तिमान् श्रीकृष्ण हो, तुम्हें प्रणाम है। पुनः वृषभध्वज शंकर मुझपर प्रसन्न हो जायँ—इस भावनासे सुवर्णयुक्त नाभिवाले मृगचर्मका दान |