मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२६८ * मत्स्यपुराण *
| दामोदरायेत्युदरं मेढ्रं पञ्चशराय वै।<br>ऊरू सौभाग्यनाथाय जानुनी भूतधारिणे॥ २४<br><br>नमो नीलाय वै जङ्घे पादौ विश्वसृजे नमः।<br>नमो देव्यै नमः शान्त्यै नमो लक्ष्म्यै नमः श्रियै॥ २५<br><br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै धृष्ट्यै हृष्ट्यै नमो नमः।<br>नमो विहङ्गनाथाय वायुवेगाय पक्षिणे।<br>विषप्रमाथिने नित्यं गरुडं चाभिपूजयेत्॥ २६<br><br>एवं सम्पूज्य गोविन्दमुमापतिविनायकौ।<br>गन्धैर्माल्यैस्तथा धूपैर्भक्ष्यैर्नानाविधैरपि॥ २७<br><br>गव्येन पयसा सिद्धां कृसरामथ वाग्यतः।<br>सर्पिषा सह भुक्त्वा च गत्वा शतपदं बुधः॥ २८<br><br>न्यग्रोधं दन्तकाष्ठमथवा खादिरं बुधः।<br>गृहीत्वा धावयेद् दन्तानाचान्तः प्रागुदङ्मुखः॥ २९<br><br>ब्रूयात् सायंतनीं कृत्वा संध्यामस्तमिते रवौ।<br>नमो नारायणायेति त्वामहं शरणं गतः॥ ३० | 'इसके बाद 'दामोदराय नमः' कहकर उदरका, 'पञ्चशराय नमः' इस मन्त्रसे जननेन्द्रियका, 'सौभाग्यनाथाय नमः' इससे दोनों जंघोंका, 'भूतधारिणे नमः' से दोनों घुटनोंका, 'नीलाय नमः' इस मन्त्रसे पिंडलियों (घुटनेसे नीचेके भाग)-का और 'विश्वसृजे नमः' इससे पुनः दोनों चरणोंका पूजन करे। तत्पश्चात् 'देव्यै नमः', 'शान्त्यै नमः', 'लक्ष्म्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'पुष्ट्यै नमः', 'तुष्ट्यै नमः', 'धृष्ट्यै नमः', 'हृष्ट्यै नमः'—इन मन्त्रोंसे भगवती लक्ष्मीकी पूजा करे। इसके बाद 'विहङ्गनाथाय नमः', 'वायुवेगाय नमः', 'पक्षिणे नमः', 'विषप्रमाथिने नमः'—इन मन्त्रोंके द्वारा सदा गरुडकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार गन्ध, पुष्प, धूप तथा नाना प्रकारके पकवानोंद्वारा श्रीकृष्णकी, महादेवजीकी तथा गणेशजीकी भी पूजा करे। फिर गौके दूधकी बनी हुई खीर लेकर घीके साथ मौनपूर्वक भोजन करे। भोजनके अनन्तर विद्वान् पुरुष सौ पग चलकर बरगद अथवा खैरकी दाँतुन ले उसके द्वारा दाँतोंको साफ करे, फिर मुँह धोकर आचमन करे। सूर्यास्त होनेके बाद पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख बैठकर सायंकालीन संध्या करे। उसके अन्तमें यह कहे—'भगवान् श्रीनारायणको नमस्कार है। भगवन्! मैं आपकी शरणमें आया हूँ।' (इस प्रकार प्रार्थना करके रात्रिमें शयन करे।)॥ २४—३०॥ |
| एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य च केशवम्।<br>रात्रिं च सकलां स्थित्वा स्नानं च पयसा तथा॥ ३१<br><br>सर्पिषा चापि दहनं हुत्वा ब्राह्मणपुङ्गवैः।<br>सहैव पुण्डरीकाक्ष द्वादश्यां क्षीरभोजनम्॥ ३२<br><br>करिष्यामि यतात्माहं निर्विघ्नेनास्तु तच्च मे।<br>एवमुक्त्वा स्वपेद् भूमावितिहासकथां पुनः॥ ३३<br><br>श्रुत्वा प्रभाते संजाते नदीं गत्वा विशाम्पते।<br>स्नानं कृत्वा मुदा तद्वत् पाषण्डानभिवर्जयेत्॥ ३४<br><br>उपास्य संध्यां विधिवत् कृत्वा च पितृतर्पणम्।<br>प्रणम्य च हृषीकेशं समलोकैकमीश्वरम्॥ ३५<br><br>गृहस्य पुरतो भक्त्या मण्डपं कारयेद् बुधः।<br>दशहस्तमथाष्टौ वा करान् कुर्याद् विशांपते॥ ३६ | दूसरे दिन एकादशीको निराहार रहकर भगवान् केशवकी पूजा करे और रातभर बैठा रहकर प्रातःकाल दूध या जलसे स्नान करे। फिर अग्निमें घीकी आहुति देकर प्रार्थना करे—'पुण्डरीकाक्ष! मैं जितेन्द्रिय होकर द्वादशीको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ ही खीरका भोजन करूँगा। मेरा यह व्रत निर्विघ्नतापूर्वक पूर्ण हो।' यह कहकर इतिहास-पुराणकी कथा सुननेके पश्चात् भूमिपर शयन करे। राजन्! सबेरा होनेपर जाकर नदीमें प्रसन्नतापूर्वक स्नान करे। पाखण्डियोंके संसर्गसे दूर रहे। विधिपूर्वक संध्योपासन करके पितरोंका तर्पण करे। फिर सातों लोकोंके एकमात्र अधीश्वर भगवान् हृषीकेशको प्रणाम करके बुद्धिमान् व्रती घरके सामने भक्तिपूर्वक एक मण्डपका निर्माण कराये। राजन्! वह मण्डप दस अथवा आठ हाथ लम्बा-चौड़ा होना चाहिये। |