मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ६१ * | २६७ |
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| कथान्ते भीमसेनेन परिपृष्टः प्रतापवान्।<br>त्वया पृष्टस्य धर्मस्य रहस्यस्यास्य भेदकृत्॥ १२<br><br>भविता स तदा ब्रह्मन् कर्ता चैव वृकोदरः।<br>प्रवर्तकोऽस्य धर्मस्य पाण्डुपुत्रो महाबलः॥ १३<br><br>यस्य तीक्ष्णो वृको नाम जठरे हव्यवाहनः।<br>मया दत्तः स धर्मात्मा तेन चासौ वृकोदरः॥ १४<br><br>मतिमान् दानशीलश्च नागायुतबलो महान्।<br>भविष्यत्यजरः श्रीमान् कंदर्प इव रूपवान्॥ १५<br><br>धार्मिकस्याप्यशक्तस्य तीव्राग्नित्वादुपोषणे।<br>इदं व्रतमशेषाणां व्रतानामधिकं यतः॥ १६<br><br>कथयिष्यति विश्वात्मा वासुदेवो जगद्गुरुः।<br>अशेषयज्ञफलदमशेषाघविनाशनम् ॥ १७<br><br>अशेषदुष्टशमनमशेषसुरपूजितम् ।<br>पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम्।<br>भविष्यं च भविष्याणां पुराणानां पुरातनम्॥ १८<br><br><center>वासुदेव उवाच</center><br>यद्यष्टमीचतुर्दश्योर्द्वादशीष्वथ भारत।<br>अन्येष्वपि दिनर्क्षेषु न शक्तस्त्वमुपोषितुम्॥ १९<br><br>ततः पुण्यां तिथिमिमां सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>उपोष्य विधिनानेन गच्छ विष्णोः परं पदम्॥ २०<br><br>माघमासस्य दशमी यदा शुक्ला भवेत् तदा।<br>घृतेनाभ्यञ्जनं कृत्वा तिलैः स्नानं समाचरेत्॥ २१<br><br>तथैव विष्णुमभ्यर्च्य नमो नारायणाय च।<br>कृष्णाय पादौ सम्पूज्य शिरः सर्वात्मने नमः॥ २२<br><br>वैकुण्ठायेति वै कण्ठमुरः श्रीवत्सधारिणे।<br>शङ्खिने चक्रिणे तद्वद् गदिने वरदाय वै।<br>सर्वं नारायणस्यैवं सम्पूज्या बाहवः क्रमात्॥ २३ | तब कथाकी समाप्तिपर भीमसेन प्रतापी श्रीकृष्णसे वैसा ही प्रश्न करेंगे, जो तुम्हारे द्वारा पूछा गया है और इस धर्मके रहस्यके भेदको प्रकट करनेवाला है। ब्रह्मन्! उस समय पाण्डुपुत्र महाबली भीमसेन इस धर्मके कर्ता एवं प्रवर्तक होंगे। उनके उदरमें मेरे द्वारा दिये गये वृक नामक तीक्ष्ण अग्निका निवास होगा, इसी कारण वे धर्मात्मा 'वृकोदर' नामसे विख्यात होंगे। वे श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न, दानशील, दस हजार हाथियोंके सदृश बलशाली, महत्त्वयुक्त, जरारहित, लक्ष्मीवान् और कामदेव-सदृश सौन्दर्यशाली होंगे। भीमसेनके धर्मात्मा होनेपर भी उदरमें तीव्र अग्निके स्थित रहनेके कारण उपवासमें असमर्थ जानकर विश्वात्मा जगद्गुरु भगवान् वासुदेव उन्हें यह व्रत बतलायेंगे; क्योंकि यह सम्पूर्ण व्रतोंमें श्रेष्ठ है। यह समस्त यज्ञोंका फलदाता, सम्पूर्ण पापोंका विनाशक, अखिल दोषोंका शामक, समस्त देवताओंद्वारा सम्मानित, सम्पूर्ण पवित्र पदार्थोंमें परम पवित्र, निखिल मङ्गलोंमें श्रेष्ठ मङ्गलरूप, भविष्यमें सर्वाधिक भव्य और पुरातनोंमें विशेष पुरातन है॥ ५—१८॥<br><br>भगवान् वासुदेव कहेंगे— भारत! यदि तुम अष्टमी, चतुर्दशी, द्वादशी तिथियोंमें तथा अन्यान्य दिनों और नक्षत्रोंमें उपवास करनेमें असमर्थ हो तो मैं तुम्हें एक पापविनाशिनी तिथिका परिचय देता हूँ। उस दिन निम्नाङ्कित विधिसे उपवास कर तुम श्रीविष्णुके परम धामको प्राप्त करो। जिस दिन माघमासके शुक्लपक्षकी दशमी* तिथि आये, उस दिन (व्रतीको चाहिये कि) समस्त शरीरमें घी लगाकर तिलमिश्रित जलसे स्नान करे तथा 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रसे भगवान् श्रीविष्णुका पूजन करे। 'श्रीकृष्णाय नमः' कहकर दोनों चरणोंकी और 'सर्वात्मने नमः' कहकर मस्तककी पूजा करे। 'वैकुण्ठाय नमः' इस मन्त्रसे कण्ठकी और 'श्रीवत्सधारिणे नमः' इससे वक्षःस्थलकी अर्चा करे। फिर 'शङ्खिने नमः', 'चक्रिणे नमः', 'गदिने नमः', वरदाय नमः तथा 'सर्वं नारायणस्य' (सब कुछ नारायणका ही है)—ऐसा कहकर आवाहन आदिके क्रमसे भगवान्की बाहुओंकी पूजा करे॥ १९—२३॥ |
* अन्य पुराणोंमें तथा एकादशीमाहात्म्य आदिमें ज्येष्ठ शुक्ल ११को निर्जला या भीमसेनी एकादशी अथवा द्वादशी कहा गया है।