भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६६ * मत्स्यपुराण *


उनहत्तरवाँ अध्याय

भीमद्वादशी-व्रतका विधान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मत्स्य उवाच<br>पुरा रथन्तरे कल्पे परिपृष्टो महात्मना।<br>मन्दरस्थो महादेवः पिनाकी ब्रह्मणा स्वयम्॥ १मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! प्राचीन रथन्तरकल्पकी बात है, पिनाकधारी भगवान् शंकर मन्दराचलपर विराजमान थे। उस समय महात्मा ब्रह्माजीने स्वयं ही उनके पास जाकर प्रश्न किया॥ १॥
ब्रह्मोवाच<br>कथमारोग्यमैश्वर्यमनन्तममरेश्वर ।<br>स्वल्पेन तपसा देव भवेन्मोक्षोऽथवा नृणाम्॥ २<br><br>किंमज्ञातं महादेव त्वत्प्रसादादधोक्षज।<br>स्वल्पकेनाथ तपसा महत्फलमिहोच्यताम्॥ ३ब्रह्माजीने पूछा— देवेश्वर! थोड़ी-सी तपस्यासे मनुष्योंको नीरोगता, अनन्त ऐश्वर्य और मोक्षकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? महादेव! आपके लिये कुछ अज्ञात तो है नहीं, अर्थात् आप सर्वज्ञ हैं, इसलिये अधोक्षज! आपकी कृपासे थोड़ी-सी तपस्याद्वारा इस लोकमें महान् फलकी प्राप्तिका क्या उपाय है? यह बतलाइये॥ २-३॥
मत्स्य उवाच<br>एवं पृष्टः स विश्वात्मा ब्रह्मणा लोकभावनः।<br>उमापतिरुवाचेदं मनसः प्रीतिकारकम्॥ ४मत्स्यभगवान्ने कहा— ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रश्न करनेपर जगत्की उत्पत्ति एवं वृद्धि करनेवाले विश्वात्मा उमानाथ शिव मनको प्रिय लगनेवाले वचन बोले॥ ४॥
ईश्वर उवाच<br>अस्माद् रथन्तरात् कल्पात् त्रयोविंशात् पुनर्यदा।<br>वाराहो भविता कल्पस्तस्य मन्वन्तरे शुभे॥ ५<br><br>वैवस्वताख्ये संजाते सप्तमे सप्तलोककृत्।<br>द्वापराख्यं युगं तद्वदष्टाविंशतिमं जगुः॥ ६<br><br>तस्यान्ते स महादेवो वासुदेवो जनार्दनः।<br>भारावतरणार्थाय त्रिधा विष्णुर्भविष्यति॥ ७<br><br>द्वैपायनऋषिस्तद्वद् रौहिणेयोऽथ केशवः।<br>कंसादिदर्पमथनः केशवः क्लेशनाशनः॥ ८<br><br>पुरीं द्वारवतीं नाम साम्प्रतं या कुशस्थली।<br>दिव्यानुभावसंयुक्तामधिवासाय शार्ङ्गिणः।<br>त्वष्टा ममाज्ञया तद्वत् करिष्यति जगत्पतेः॥ ९<br><br>तस्यां कदाचिदासीनः सभायाममितद्युतिः।<br>भार्याभिर्वृष्णिभिश्चैव भूभृद्भिर्भूरिदक्षिणैः॥ १०<br><br>कुरुभिर्देवगन्धर्वैरभितः कैटभार्दनः।<br>प्रवृत्तासु पुराणीषु धर्मसंवर्धिनीषु च॥ ११ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! इस तेईसवें रथन्तरकल्पके पश्चात् जब पुनः वाराहकल्प आयेगा, तब उसके सातवें वैवस्वत नामक मङ्गलमय मन्वन्तरके प्राप्त होनेपर अट्ठाईसवें द्वापर नामक युगके अन्तमें सातों लोकोंके रचयिता देवाधिदेव जनार्दन भगवान् विष्णु वासुदेवरूपसे पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये अपनेको महर्षि द्वैपायन, रोहिणीनन्दन बलराम और केशवरूपसे तीन भागोंमें विभक्त करके अवतीर्ण होंगे। वे कष्टहारी केशव कंस आदि राक्षसोंके मदको चूर्ण करेंगे। शार्ङ्गधनुषधारी उन जगत्पतिके निवासके लिये मेरी आज्ञासे विश्वकर्मा द्वारवती (द्वारका) नामकी पुरीका निर्माण करेंगे, जो समस्त दिव्य भावोंसे युक्त होगी। वह इस समय कुशस्थली नामसे विख्यात है। वहीं कभी जब द्वारकाकी सभामें दानवराज कैटभके संहारक अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्ण अपनी पत्नियों, वृष्णिवंशी पुरुषों, प्रचुर दक्षिणा देनेवाले राजाओं, कौरवों और देव-गन्धर्वोंसे घिरे हुए बैठे रहेंगे और धर्मकी वृद्धि करनेवाली पौराणिक कथाएँ होती रहेंगी,