भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 275
* अध्याय ६८ *२६५
वस्त्रकाञ्चनरत्नौघैर्भक्ष्यैः सघृतपायसैः ।<br>पूजयेद् ब्राह्मणॉस्तद्वद् वित्तशाठ्यविवर्जितः ॥ ३१<br>भुक्त्वा च गुरुणा चेयमुच्चार्या मन्त्रसन्ततिः ।<br>दीर्घायुरस्तु बालोऽयं यावद्वर्षशतं सुखी ॥ ३२<br>यत्किञ्चिदस्य दुरितं तत् क्षिप्तं वडवानले ।<br>ब्रह्मा रुद्रो वसुः स्कन्दो विष्णुः शक्रो हुताशनः ॥ ३३<br>रक्षन्तु सर्वे दुष्टेभ्यो वरदाः सन्तु सर्वदा ।<br>एवमादीनि वाक्यानि वदन्तं पूजयेद् गुरुम् ॥ ३४<br>शक्तितः कपिलां दद्यात् प्रणम्य च विसर्जयेत् ।<br>चरुं च पुत्रसहिता प्रणम्य रविशङ्करौ ॥ ३५<br>हुतशेषं तदाश्नीयादादित्याय नमोऽस्त्विति ।<br>इदमेवाद्भुतोद्वेगदुःस्वप्नेषु प्रशस्यते ॥ ३६उसी प्रकार कृपणता छोड़कर अन्य ब्राह्मणोंका भी वस्त्र, सुवर्ण, रत्नसमूह आदिसे पूजन करके उन्हें घी और खीरसहित भक्ष्य पदार्थोंका भोजन कराये। भोजनोपरान्त गुरुदेवको इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये—'यह बालक दीर्घायु हो और सौ वर्षोंतक सुखका उपभोग करे। इसका जो कुछ पाप था उसे बडवानलमें डाल दिया गया। ब्रह्मा, रुद्र, वसुगण, स्कन्द, विष्णु, इन्द्र और अग्नि—ये सभी दुष्ट ग्रहोंसे इसकी रक्षा करें और सदा इसके लिये वरदायक हों।' इस प्रकारके वाक्योंका उच्चारण करनेवाले गुरुदेवका यजमान पूजन करे। अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें एक कपिला गौ प्रदान करे और फिर प्रणाम करके विदा कर दे। तत्पश्चात् मृतवत्सा स्त्री पुत्रको गोदमें लेकर सूर्यदेव और भगवान् शंकरको नमस्कार करे और हवनसे बचे हुए हव्यान्नको 'सूर्यदेवको नमस्कार है'—यह कहकर खा जाय। यही व्रत आश्चर्यजनक उद्विग्नता और दुःस्वप्न आदिमें भी प्रशस्त माना गया है॥ २४—३६॥
कर्तुर्जन्मदिनर्क्षं च त्यक्त्वा सम्पूजयेत् सदा ।<br>शान्त्यर्थं शुक्लसप्तम्यामेतत् कुर्वन् न सीदति ॥ ३७<br>सदानेन विधानेन दीर्घायुरभवन्नरः ।<br>संवत्सराणामयुतं शशास पृथिवीमिमाम् ॥ ३८<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं सप्तमीस्नपनं रविः ।<br>कथयित्वा द्विजश्रेष्ठ तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३९<br>एतत् सर्वं समाख्यातं सप्तमीस्नानमुत्तमम् ।<br>सर्वदुष्टोपशमनं बालानां परमं हितम् ॥ ४०<br>आरोग्यं भास्करादिच्छेद् धनमिच्छेद्धुताशनात् ।<br>ईश्वराज्ज्ञानमन्विच्छेन्मोक्षमिच्छेज्जनार्दनात् ॥ ४१<br>एतन्महापातकनाशनं स्यात्<br>परं हितं बालविवर्धनं च ।<br>शृणोति यश्चैन्नमनन्यचेता-<br>स्तस्यापि सिद्धिं मुनयो वदन्ति ॥ ४२इस प्रकार कर्ताके जन्मदिनके नक्षत्रको छोड़कर शान्ति-प्राप्तिके हेतु शुक्ल-पक्षकी सप्तमी तिथिमें सदा (सूर्य और शंकरका) पूजन करना चाहिये; क्योंकि इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाला कभी कष्टमें नहीं पड़ता। जो मनुष्य सदा इस विधानके अनुसार इस व्रतका अनुष्ठान करता है वह दीर्घायु होता है। (इसी व्रतके प्रभावसे) कृतवीर्यने दस हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीपर शासन किया था। द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार सूर्यदेव इस पुण्यप्रद, परम पावन और आयुवर्धक सप्तमीस्नपन-व्रतका विधान बतलाकर वहीं अन्तर्हित हो गये। इस प्रकार मैंने इस सप्तमीस्नपन-व्रतका, जो सर्वश्रेष्ठ, समस्त दोषोंको शान्त करनेवाला और बालकोंके लिये परम हितकारक है, समग्ररूपसे वर्णन कर दिया। मनुष्यको सूर्यसे नीरोगता, अग्निसे धन, ईश्वर (शिवजी)-से ज्ञान और भगवान् जनार्दनसे मोक्षकी अभिलाषा करनी चाहिये। यह व्रत बड़े-से-बड़े पापोंका विनाशक, बाल-वृद्धिकारक तथा परम हितकारी है। जो मनुष्य अनन्यचित्त होकर इस व्रत-विधानको श्रवण करता है, उसे भी सिद्धि प्राप्त होती है, ऐसा मुनियोंका कथन है॥ ३७—४२॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सप्तमीस्नपनव्रतं नामाष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सप्तमीस्नपन-व्रत नामक अड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६८॥