भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 297
* अध्याय ७६ *२८७

| अतैललवणं भुक्त्वा सप्तम्यां मौनसंयुतः।<br>ततः पुराणश्रवणं कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥ ७<br>अनेन विधिना सर्वमुभयोरपि पक्षयोः।<br>कृत्वा यावत् पुनर्माघशुक्लपक्षस्य सप्तमी ॥ ८<br>व्रतान्ते कलशं दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्।<br>शय्यां सोपस्करां दद्यात् कपिलां च पयस्विनीम् ॥ ९<br>अनेन विधिना यस्तु वित्तशाठ्यविवर्जितः।<br>विशोकसप्तमीं कुर्यात् स याति परमां गतिम् ॥ १०<br>यावज्जन्मसहस्राणां साग्रं कोटिशतं भवेत्।<br>तावन्न शोकमभ्येति रोगदौर्गत्यवर्जितः ॥ ११<br>यं यं प्रार्थयते कामं तं तमाप्नोति पुष्कलम्।<br>निष्कामः कुरुते यस्तु स परं ब्रह्म गच्छति ॥ १२<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि विशोकाख्यां च सप्तमीम्।<br>सोऽपीन्द्रलोकमाप्नोति न दुःखी जायते क्वचित् ॥ १३ | स्वयं सप्तमीको तेल और नमकसहित अन्नका भोजन करके मौन धारण कर ले। वैभवकी इच्छा रखनेवाले व्रतीको उस दिन पुराणोंकी कथाएँ सुननी चाहिये। इस विधिसे दोनों पक्षोंमें सारा कार्य तबतक करते रहना चाहिये जबतक पुनः माघमासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी न आ जाय॥१—८॥<br>व्रतके अन्तमें स्वर्णनिर्मित कमलसमेत कलश, समस्त उपकरणोंसहित शय्या और दुधारू कपिला गौका दान करना चाहिये। इस प्रकार जो मनुष्य कृपणता छोड़कर उपर्युक्त विधिके अनुसार विशोकसप्तमी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है तथा करोड़ों जन्मतक उसे शोककी प्राप्ति नहीं होती। वह रोग और दुर्गतिसे रहित हो जाता है तथा जिस-जिस मनोरथकी प्रार्थना करता है, उसे-उसे वह प्रचुरमात्रामें प्राप्त करता है। जो व्रती निष्कामभावसे अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस विशोकसप्तमीव्रतकी कथा या विधानको पढ़ता अथवा श्रवण करता है, वह भी इस लोकमें कभी दुःखी नहीं होता और अन्तमें इन्द्रलोकको प्राप्त होता है॥९—१३॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विशोकसप्तमीव्रतं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विशोकसप्तमीव्रत नामक पचहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७५ ॥


छियत्तरवाँ अध्याय

फलसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

| ईश्वर उवाच<br>अन्यामपि प्रवक्ष्यामि नाम्ना तु फलसप्तमीम्।<br>यामुपोष्य नरः पापाद् विमुक्तः स्वर्गभाग् भवेत् ॥ १<br>मार्गशीर्षे शुभे मासि सप्तम्यां नियतव्रतः।<br>तामुपोष्याथ कमलं कारयित्वा तु काञ्चनम् ॥ २<br>शर्करासंयुक्तं दद्याद् ब्राह्मणाय कुटुम्बिने।<br>रविं काञ्चनकं कृत्वा पलस्यैकस्य धर्मवित्।<br>दद्याद् द्विकालवेलायां भानुर्मे प्रीयतामिति ॥ ३<br>भक्त्या तु विप्रान् सम्पूज्य चाष्टम्यां क्षीरभोजनम्।<br>दत्त्वा कुर्यात् फलयुतं यावत् स्यात् कृष्णसप्तमी ॥ ४ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! अब मैं फलसप्तमी नामक एक अन्य व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य पापोंसे विमुक्त हो स्वर्गभागी हो जाता है। व्रतनिष्ठ मनुष्यको चाहिये कि वह मार्गशीर्ष नामक शुभ मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको सोनेका एक कमल बनवाये और उस दिन उपवास कर उसे शक्करसमेत कुटुम्बी ब्राह्मणको दान कर दे। इसी प्रकार धर्मवेत्ता व्रती एक पल सोनेकी सूर्यकी मूर्ति बनवाकर उसे सायंकालके समय 'भगवान् सूर्य मुझपर प्रसन्न हों'—यों कहकर ब्राह्मणको दान करे। फिर अष्टमीके दिन ब्राह्मणोंको फलसहित दूधसे बने हुए अन्नका भोजन कराकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करे। ऐसा तबतक करते रहना चाहिये जबतक पुनः |