भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८८* मत्स्यपुराण *

| तामप्युपोष्य विधिवदनेनैव क्रमेण तु।<br>तद्वद्धेमफलं दत्त्वा सुवर्णकमलान्वितम्॥ ५<br><br>शर्करापात्रसंयुक्तं वस्त्रमाल्यसमन्वितम्।<br>संवत्सरं च तेनैव विधिनाभयसप्तमीम्॥ ६<br><br>उपोष्‍य दत्त्वा क्रमशः सूर्यमन्त्रमुदीरयेत्।<br>भानुरर्को रविर्ब्रह्मा सूर्यः शक्रो हरिः शिवः।<br>श्रीमान् विभावसुस्त्वष्टा वरुणः प्रीयतामिति॥ ७<br><br>प्रतिमासं च सप्तम्यामेकैकं नाम कीर्तयेत्।<br>प्रतिपक्षं फलत्यागमेतत् कुर्वन् समाचरेत्॥ ८<br><br>व्रतान्ते विप्रमिथुनं पूजयेद् वस्त्रभूषणैः।<br>शर्कराकलशं दद्याद्धेमपद्मदलान्वितम्॥ ९<br><br>यथा न विफलाः कामास्त्वद्भक्तानां सदा रवे।<br>तथानन्तफलावाप्तिरस्तु मे सप्तजन्मसु॥ १०<br><br>इमामसन्तफलदां यः कुर्यात् फलसप्तमीम्।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सूर्यलोके महीयते॥ ११<br><br>सुरापानादिकं किञ्चिद् यदत्रामुत्र वा कृतम्।<br>तत् सर्वं नाशमायाति यः कुर्यात् फलसप्तमीम्॥ १२<br><br>कुर्वाणः सप्तमीं चेमां सततं रोगवर्जितः।<br>भूतान् भव्यांश्च पुरुषांस्तारयेदेकविंशतिम्।<br>यः शृणोति पठेद् वापि सोऽपि कल्याणभाग् भवेत्॥ १३ | कृष्णपक्षकी सप्तमी न आ जाय। उस दिन भी उसी क्रमसे विधिपूर्वक उपवास करके स्वर्णमय कमलके साथ स्वर्णनिर्मित फलका दान करना चाहिये। उसके साथ शक्करसे भरा हुआ पात्र, वस्त्र और पुष्पमाला भी होना आवश्यक है। इस प्रकार एक वर्षतक दोनों पक्षोंकी सप्तमीके दिन उपवास और दान कर क्रमशः सूर्य-मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। भानु, अर्क, रवि, ब्रह्मा, सूर्य, शक्र, हरि, शिव, श्रीमान्, विभावसु, त्वष्टा और वरुण—ये मुझपर प्रसन्न हों। मार्गशीर्षसे प्रारम्भ कर प्रत्येक मासकी सप्तमी तिथिको उपर्युक्त नामोंमें क्रमशः एक-एकका कीर्तन करना चाहिये। प्रत्येक पक्षमें फलदान करनेका भी विधान है। इस प्रकार सारा कार्य करते हुए व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये॥ १-८॥<br><br>व्रतकी समाप्तिपर वस्त्र और आभूषण आदिद्वारा सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करे और स्वर्णमय कमलसहित शक्करसे भरा हुआ कलश दान करे। उस समय ऐसा कहे—'सूर्यदेव! जिस प्रकार आपके भक्तोंकी कामनाएँ कभी विफल नहीं होतीं, उसी प्रकार मुझे भी सात जन्मोंतक अनन्त फलकी प्राप्ति होती रहे।' जो मनुष्य इस अनन्त फलदायिनी फलसप्तमीका व्रत करता है, उसका आत्मा समस्त पापोंसे विशुद्ध हो जाता है और वह सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। फलसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करनेवाले मनुष्यद्वारा इस लोकमें अथवा परलोकमें मद्यपान आदि जो कुछ भी दुष्कर्म किया गया है, वह सारा-का-सारा विनष्ट हो जाता है। इस फलसप्तमीव्रतका* निरन्तर अनुष्ठान करनेवाले मनुष्यके पास रोग नहीं फटकते और वह अपनी भूत एवं भविष्यकी इक्कीस पीढ़ियोंको तार देता है। जो इस व्रत-विधानको सुनता अथवा पढ़ता है, वह भी कल्याणभागी हो जाता है॥ ९-१३॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे फलसप्तमीव्रतं नाम षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें फलसप्तमीव्रत नामक छिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥


* 'व्रतकल्पद्रुम' में इसके अतिरिक्त दो और भिन्न फलसप्तमियाँ निर्दिष्ट हुई हैं।

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