भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२९० * मत्स्यपुराण *


| सुवर्णाश्वः प्रदातव्यः पूर्ववन्मन्त्रवादनम्।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत कुर्वन् दोषं समश्नुते॥ १२<br><br>अमृतं पिबतो वक्त्रात् सूर्यस्यामृतबिन्दवः।<br>निष्येतुर्ये धरण्यां ते शालिमुद्गेक्षवः स्मृताः॥ १३<br><br>शर्करा तु परा तस्मादिक्षुसारोऽमृतात्मवान्।<br>इष्टा रवेरतः पुण्या शर्करा हव्यकव्ययोः॥ १४<br><br>शर्करासप्तमी चेयं वाजिमेधफलप्रदा।<br>सर्वदुष्टप्रशमनी पुत्रपौत्रप्रवर्धिनी॥ १५<br><br>यः कुर्यात् परया भक्त्या स वै सद्गतिमाप्नुयात्।<br>कल्पमेकं वसेत् स्वर्गे ततो याति परं पदम्॥ १६<br><br>इदमनघं शृणोति यः स्मरेद् वा<br>परिपठतीह दिवाकरस्य लोके।<br>मतिमपि च ददाति सोऽपि देवै-<br>रमरवधूजनमालयाभिपूज्यः॥ १७ | सोनेका एक घोड़ा बनवाकर पहलेकी ही भाँति मन्त्रोच्चारणपूर्वक दान करना चाहिये। इसमें कृपणता न करे, यदि करता है तो दोषभागी होना पड़ता है॥ १—१२॥<br><br>अमृत-पान करते समय सूर्यके मुखसे जो अमृतबिन्दु भूतलपर गिर पड़े थे, वे ही शालि (अगहनी धान), मूँग और ईंख नामसे कहे जाते हैं। इनमें ईंखका सारभूत शक्कर अमृततुल्य सुस्वादु है, इसलिये यह तीनोंमें श्रेष्ठ है। इसी कारण यह पुण्यवती शर्करा सूर्यके हव्य एवं कव्य—दोनों हवनीय पदार्थोंमें उन्हें अत्यन्त प्रिय है। यह शर्करासप्तमी अश्वमेध-यज्ञके समान फलदायिनी, समस्त दुष्ट ग्रहोंको शान्त करनेवाली और पुत्र-पौत्रोंकी प्रवर्धिनी है। जो मानव उत्कृष्ट श्रद्धाके साथ इसका अनुष्ठान करता है, उसे सद्गतिकी प्राप्ति होती है। वह एक कल्पतक स्वर्गमें निवास कर अन्तमें परमपदको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य इस निष्पाप व्रतका श्रवण, स्मरण अथवा पाठ करता है, वह सूर्यलोकमें जाता है। साथ ही जो इसका अनुष्ठान करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी देवगणों एवं देवाङ्गनाओंके समूहसे पूजित होता है॥१३—१७॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे शर्कराव्रतं नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शर्करासप्तमीव्रत नामक सतहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७७॥


अठहत्तरवाँ अध्याय

कमलसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

| ईश्वर उवाच<br><br>अतः परं प्रवक्ष्यामि तद्वत् कमलसप्तमीम्।<br>यस्याः संकीर्तनादेव तुष्यतीह दिवाकरः॥ १<br><br>वसन्तामलसप्तम्यां स्नातः सन् गौरसर्षपैः।<br>तिलपात्रे च सौवर्णं निधाय कमलं शुभम्॥ २<br><br>वस्त्रयुग्मावृतं कृत्वा गन्धपुष्पैः समर्चयेत्।<br>नमस्ते पद्महस्ताय नमस्ते विश्वधारिणे॥ ३<br><br>दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते।<br>ततो विकालवेलायामुदकुम्भसमन्वितम्॥ ४<br><br>विप्राय दद्यात् सम्पूज्य वस्त्रमाल्यविभूषणैः।<br>शक्त्या च कपिलां दद्यादलङ्कृत्य विधानतः॥ ५ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! इसके बाद अब मैं कमलसप्तमीव्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका नाम लेनेमात्रसे भी भगवान् सूर्यदेव प्रसन्न हो जाते हैं। व्रती मनुष्य वसन्त-ऋतुमें शुक्लपक्षकी सप्तमीको पीली सरसोंयुक्त जलसे स्नान करके शुद्ध हो जाय और किसी तिलसे पूर्ण पात्रमें एक सुन्दर स्वर्णमय कमल स्थापित कर दे। फिर उसे दो वस्त्रोंसे आच्छादित कर गन्ध, पुष्प आदिद्वारा उसकी अर्चना करे। पूजनके समय 'पद्महस्ताय ते नमः', 'विश्वधारिणे ते नमः', 'दिवाकर तुभ्यं नमः', 'प्रभाकर ते नमोऽस्तु'—इन मन्त्रोंका उच्चारण (कर सूर्यको प्रणाम) करे। तदनन्तर सायंकाल वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषण आदिसे ब्राह्मणका पूजन कर उन्हें जलपूर्ण कलशसहित कमल दान कर दे। साथ ही एक कपिला गौको |