भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 305
* अध्याय ८१ *२९५
एवं नियमकृत् सुप्त्वा प्रातरुत्थाय मानवः।<br>स्नानं सर्वौषधैः कुर्यात् पञ्चगव्यजलेन तु॥<br>शुक्लमाल्याम्बरधरः पूजयेच्छ्रीशमुत्पलैः॥ ५<br>विशोकाय नमः पादौ जङ्घे च वरदाय वै।<br>श्रीशाय जानुनी तद्वदूरू च जलशायिने॥ ६<br>कन्दर्पाय नमो गुह्यं माधवाय नमः कटिम्।<br>दामोदरायेत्युदरं पार्श्वे च विपुलाय वै॥ ७<br>नाभिं च पद्मनाभाय हृदयं मन्मथाय वै।<br>श्रीधराय विभोर्वक्षः करौ मधुजिते नमः॥ ८<br>चक्रिणे वामबाहुं च दक्षिणं गदिने नमः।<br>वैकुण्ठाय नमः कण्ठमास्यं यज्ञमुखाय वै॥ ९<br>नासामशोकनिधये वासुदेवाय चक्षुषी।<br>ललाटं वामनायेति हरयेति पुनर्ध्रुवौ॥ १०<br>अलकान् माधवायेति किरीटं विश्वरूपिणे।<br>नमः सर्वात्मने तद्वच्छिर इत्यभिपूजयेत्॥ ११<br>एवं सम्पूज्य गोविन्दं फलमाल्यानुलेपनैः।<br>ततस्तु मण्डलं कृत्वा स्थण्डिलं कारयेन्मुदा॥ १२<br>चतुरस्रं समन्ताच्च रत्निमात्रमुदक्प्लवम्।<br>श्लक्ष्णं हृद्यं च परितो वप्रत्रयसमावृतम्॥ १३<br>त्र्यङ्गुलेनोच्छ्रिता वप्रास्तद्विस्तारस्तु द्व्यङ्गुलः।<br>स्थण्डिलस्योपरिष्टाच्च भित्तिरष्टाङ्गुला भवेत्॥ १४<br>नदीवालुकया शूर्पे लक्ष्म्याः प्रतिकृतिं न्यसेत्।<br>स्थण्डिले शूर्पमारोप्य लक्ष्मीमित्यर्चयेद् बुधः॥ १५<br>नमो देव्यै नमः शान्त्यै नमो लक्ष्म्यै नमः श्रियै।<br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै वृष्ट्यै हृष्ट्यै नमो नमः॥ १६<br>विशोका दुःखनाशाय विशोका वरदास्तु मे।<br>विशोका चास्तु सम्पत्त्यै विशोका सर्वसिद्धये॥ १७<br>ततः शुक्लाम्बरैः शूर्पं वेष्ट्य सम्पूजयेत् फलैः।<br>वस्त्रैर्नानाविधैस्तद्वत् सुवर्णकमलेन च॥ १८<br>रजनीषु च सर्वासु पिबेद् दर्भोदकं बुधः।<br>ततस्तु गीतनृत्यादि कारयेत् सकलां निशाम्॥ १९भोजन करूँगा'—ऐसा नियम लेकर रात्रिमें शयन करे। प्रातःकाल उठकर सर्वौषधि और पञ्चगव्य मिले हुए जलसे स्नान करे तथा श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करके भगवान् विष्णुकी कमल-पुष्पोंद्वारा पूजा करे। (पूजनकी विधि इस प्रकार है—) 'विशोकाय नमः' से दोनों चरणोंका, 'वरदाय नमः' से दोनों जङ्घाओंका, 'श्रीशाय नमः' से दोनों जानुओंका, 'जलशायिने नमः' से दोनों ऊरुओंका, 'कन्दर्पाय नमः' से गुह्यप्रदेशका, 'माधवाय नमः' से कटिप्रदेशका, 'दामोदराय नमः' से उदरका, 'विपुलाय नमः' से दोनों पार्श्वभागोंका, 'पद्मनाभाय नमः' से नाभिका, 'मन्मथाय नमः' से हृदयका, 'श्रीधराय नमः' से विष्णुके वक्षःस्थलका, 'मधुजिते नमः' से दोनों हाथोंका, 'चक्रिणे नमः' से बाँयीं भुजाका, 'गदिने नमः' से दाहिनी भुजाका, 'वैकुण्ठाय नमः' से कण्ठका, 'यज्ञमुखाय नमः' से मुखका, 'अशोकनिधये नमः' से नासिकाका, 'वासुदेवाय नमः' से दोनों नेत्रोंका, 'वामनाय नमः' से ललाटका, 'हरये नमः' से दोनों भौंहोंका, 'माधवाय नमः' से बालोंका, 'विश्वरूपिणे नमः' से किरीटका और 'सर्वात्मने नमः' से सिरका पूजन करना चाहिये॥ २—११॥<br><br>इस प्रकार हर्षपूर्वक फल, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे भगवान् गोविन्दका पूजन करनेके पश्चात् मण्डल बनाकर वेदीका निर्माण कराये। वह वेदी बीस अंगुल लम्बी-चौड़ी, चारों ओरसे चौकोर, उत्तरकी ओर ढालू, चिकनी, सुन्दर और तीन ओर वप्र (परिधि)-से युक्त हो। वे वप्र तीन अङ्गुल ऊँचे और दो अङ्गुल चौड़े होने चाहिये। वेदीके ऊपर आठ अङ्गुलकी दीवाल बनायी जाय। तत्पश्चात् बुद्धिमान् व्रती सूपमें नदीकी बालुकासे लक्ष्मीकी मूर्ति अङ्कित करे और उस सूपको वेदीपर रखकर 'देव्यै नमः', 'शान्त्यै नमः', 'लक्ष्म्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'पुष्ट्यै नमः', 'तुष्ट्यै नमः', 'वृष्ट्यै नमः', 'हृष्ट्यै नमः' के उच्चारणपूर्वक लक्ष्मीकी अर्चना करे और यों प्रार्थना करे—'विशोका (लक्ष्मीदेवी) मेरे दुःखोंका नाश करें, विशोका मेरे लिये वरदायिनी हों, विशोका मुझे धन-सम्पत्ति दें और विशोका मुझे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करें।' तदनन्तर श्वेत वस्त्रोंसे सूपको परिवेष्टित कर नाना प्रकारके फलों, वस्त्रों और स्वर्णमय कमलसे लक्ष्मीकी पूजा करे। चतुर व्रती सभी रात्रियोंमें कुशोदक पान करे और सारी रात नाच-गान आदिका आयोजन