मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय ८२ * २९७
बयासीवाँ अध्याय
गुड-धेनुके$^१$ दानकी विधि और उसकी महिमा
| मनुरुवाच | मनुने पूछा—जगत्पते! अब आप मुझे (अभी विशोकद्वादशीके प्रसङ्गमें निर्दिष्ट) गुड-धेनुका विधान बतलाइये। साथ ही उस गुड-धेनुका कैसा रूप होता है और उसे किस मन्त्रका पाठ करके दान करना चाहिये—यह भी बतलानेकी कृपा कीजिये॥ १॥ |
|---|---|
| गुडधेनुविधानं मे समाचक्ष्व जगत्पते।<br>किं रूपं केन मन्त्रेण दातव्यं तदिहोच्यताम्॥ १ | |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा—राजर्षे! इस लोकमें गुड-धेनुके विधानका जो रूप है और उसका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसका मैं अब वर्णन कर रहा हूँ। वह समस्त पापोंका विनाशक है। गोबरसे लिपी-पुती भूमिपर सब ओरसे कुश बिछाकर उसपर चार हाथ लम्बा काला मृगचर्म स्थापित कर दे, जिसका अग्रभाग पूर्व दिशाकी ओर हो। उसी प्रकार एक छोटे मृगचर्ममें बछड़ेकी कल्पना करके उसीके निकट रख दे। फिर उसमें पूर्व मुख और उत्तर पैरवाली सवत्सा गौकी कल्पना करनी चाहिये। चार भार$^२$ गुड़से बनी हुई गुड-धेनु सदा उत्तम मानी गयी है। उसका बछड़ा एक भार गुड़का बनाना चाहिये। दो भार गुड़की बनी हुई धेनु मध्यम कही गयी है। उसका बछड़ा आधा भार गुड़का होना चाहिये। एक भार गुड़की बनी धेनु कनिष्ठा होती है, उसका बछड़ा चौथाई भार गुड़का बनता है। तात्पर्य यह है कि अपने गृहकी सम्पत्तिके अनुसार इस (गौ)-का निर्माण कराना चाहिये। इस प्रकार गौ और बछड़ेकी कल्पना करके उन्हें श्वेत एवं महीन वस्त्रसे आच्छादित कर दे। फिर घीसे उनके मुखकी, सीपसे कानोंकी, गन्नेसे पैरोंकी, श्वेत मोतीसे नेत्रोंकी, श्वेत सूतसे नाड़ियोंकी, श्वेत कम्बलसे गलकम्बलकी, लाल रंगके चिह्नसे पीठकी, श्वेत रंगके मृगपुच्छके बालोंसे रोएँकी, मूँगेसे दोनों भौंहोंकी, मक्खनसे दोनोंके स्तनोंकी, रेशमके धागेसे पूँछकी, काँसासे दोहनीकी, इन्द्रनीलमणिसे आँखोंकी तारिकाओंकी, सुवर्णसे सींगके |
| गुडधेनुविधानस्य यद् रूपमिह यत् फलम्।<br>तदिदानीं प्रवक्ष्यामि सर्वपापविनाशनम्॥ २ | |
| कृष्णाजिनं चतुर्हस्तं प्राग्ग्रीवं विन्यसेद् भुवि।<br>गोमयेनानुलिप्तायां दर्भानास्तीर्य सर्वतः॥ ३ | |
| लघ्वेणकाजिनं तद्वद् वत्सं च परिकल्पयेत्।<br>प्राङ्मुखीं कल्पयेद् धेनुमुदक्पादां सवत्सकाम्॥ ४ | |
| उत्तमा गुड़धेनुः स्यात् सदा भारचतुष्टयम्।<br>वत्सं भारेण कुर्वीत द्वाभ्यां वै मध्यमा स्मृता॥ ५ | |
| अर्धभारेण वत्सः स्यात् कनिष्ठा भारकेण तु।<br>चतुर्थांशेन वत्सः स्याद् गृहवित्तानुसारतः॥ ६ | |
| धेनुवत्सौ घृतास्यौ तौ सितसूक्ष्माम्बरावृतौ।<br>शुक्तिकर्णाविक्षुपादौ शुचिमुक्ताफलेक्षणौ॥ ७ | |
| सितसूत्रशिरालौ तौ सितकम्बलकम्बलौ।<br>ताम्रगण्डकपृष्ठौ तौ सितचामररोमकौ॥ ८ | |
| विद्रुमभ्रूयुगोपेतौ नवनीतस्तनावुभौ।<br>क्षौमपुच्छौ कांस्यदोहाविन्द्रनीलकतारकौ॥ ९ | |
| सुवर्णशृङ्गाभरणौ रजतैः खुरसंयुतौ। |
१. यह अध्याय पद्मपु० १। २१, वराहपुराण १०२, कृत्यकल्पतरु ५, दानकाण्ड तथा दानमयूख, दानसागरादिमें विशेष शुद्धरूपसे उद्धृत है। तदनुसार इसे भी शुद्ध किया गया है।
२. दो हजार पल अर्थात् तीन मनके वजनको 'भार' कहते हैं।