भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 308

२९८ * मत्स्यपुराण *

नानाफलसमायुक्तौ घ्राणगन्धकरण्डकौ।<br>इत्येवं रचयित्वा तौ धूपदीपैरथार्चयेत्॥ १०<br>या लक्ष्मीः सर्वभूतानां या च देवेष्ववस्थिता।<br>धेनुरूपेण सा देवी मम शान्तिं प्रयच्छतु॥ ११<br>देहस्था या च रुद्राणी शंकरस्य सदा प्रिया।<br>धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु॥ १२<br>विष्णोर्वक्षसि या लक्ष्मीः स्वाहा या च विभावसोः।<br>चन्द्रार्कशक्रशक्तिर्या धेनुरूपास्तु सा श्रिये॥ १३<br>चतुर्मुखस्य या लक्ष्मीर्या लक्ष्मीर्धनदस्य च।<br>लक्ष्मीर्या लोकपालानां सा धेनुर्वरदास्तु मे॥ १४<br>स्वधा या पितृमुख्यानां स्वाहा यज्ञभुजां च या।<br>सर्वपापहरा धेनुस्तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे॥ १५<br>एवमामन्त्र्य तां धेनुं ब्राह्मणाय निवेदयेत्।<br>विधानमेतद् धेनूनां सर्वासामभिषद्यते॥ १६<br>यास्ताः पापविनाशिन्यः पठ्यन्ते दश धेनवः।<br>तासां स्वरूपं वक्ष्यामि नामानि च नराधिप॥ १७<br>प्रथमा गुडधेनुः स्याद् घृतधेनुस्तथापरा।<br>तिलधेनुस्तृतीया तु चतुर्थी जलसंज्ञिता॥ १८<br>क्षीरधेनुश्च विख्याता मधुधेनुस्तथापरा।<br>सप्तमी शर्कराधेनुर्दधिधेनुस्तथाष्टमी।<br>रसधेनुश्च नवमी दशमी स्यात् स्वरूपतः॥ १९<br>कुम्भाः स्युर्द्रवधेनूनामितरासां तु राशयः।<br>सुवर्णधेनुमप्यत्र केचिदिच्छन्ति मानवाः॥ २०<br>नवनीतेन रत्नैश्च तथान्ये तु महर्षयः।<br>एतदेवं विधानं स्यात्त एवोपस्कराः स्मृताः॥ २१<br>मन्त्रावाहनसंयुक्ताः सदा पर्वणि पर्वणि।<br>यथाश्रद्धं प्रदातव्या भुक्तिमुक्तिफलप्रदाः॥ २२<br>गुडधेनुप्रसङ्गेन सर्वास्तावन्मयोदिताः।<br>अशेषयज्ञफलदाः सर्वाः पापहराः शुभाः॥ २३<br>व्रतानामुत्तमं यस्माद् विशोकद्वादशीव्रतम्।<br>तदङ्गत्वेन चैवात्र गुडधेनुः प्रशस्यते॥ २४आभूषणोंकी, चाँदीसे खुरोंकी और नाना प्रकारके फलोंसे नासापुटोंकी रचना कर धूप, दीप आदिद्वारा उनकी अर्चना करनेके पश्चात् यों प्रार्थना करे॥२-१०॥<br>'जो समस्त प्राणियों तथा देवताओंमें निवास करनेवाली लक्ष्मी हैं, धेनुरूपसे वही देवी मुझे शान्ति प्रदान करें। जो सदा शङ्करजीके वामाङ्गमें विराजमान रहती हैं तथा उनकी प्रिय पत्नी हैं, वे रुद्राणीदेवी धेनुरूपसे मेरे पापोंका विनाश करें। जो लक्ष्मी विष्णुके वक्षःस्थलपर विराजमान हैं, जो स्वाहारूपसे अग्निकी पत्नी हैं तथा जो चन्द्र, सूर्य और इन्द्रकी शक्तिरूपा हैं, वे ही धेनुरूपसे मेरे लिये सम्पत्तिदायिनी हों। जो ब्रह्माकी लक्ष्मी हैं, जो कुबेरकी लक्ष्मी हैं तथा जो लोकपालोंकी लक्ष्मी हैं, वे धेनुरूपसे मेरे लिये वरदायिनी हों। जो लक्ष्मी प्रधान पितरोंके लिये स्वधारूपा हैं, जो यज्ञभोजी अग्रियोंके लिये स्वाहारूपा हैं, समस्त पापोंको हरनेवाली वे ही धेनुरूपा हैं, अतः मुझे शान्ति प्रदान करें।' इस प्रकार उस गुड-धेनुको आमन्त्रित कर उसे ब्राह्मणको निवेदित कर दे। यही विधान घृत-तिल आदि सम्पूर्ण धेनुओंके दानके लिये कहा जाता है। नरेश्वर! अब जो दस पापविनाशिनी गौएँ बतलायी जाती हैं, उनका नाम और स्वरूप बतला रहा हूँ। पहली गुड-धेनु, दूसरी घृत-धेनु, तीसरी तिल-धेनु, चौथी जल-धेनु, पाँचवीं सुप्रसिद्ध क्षीर-धेनु, छठी मधु-धेनु, सातवीं शर्करा-धेनु, आठवीं दधि-धेनु, नवीं रस-धेनु और दसवीं स्वरूपतः प्रत्यक्ष धेनु है। द्रव (बहनेवाले) पदार्थोंसे बननेवाली गौओंका स्वरूप घट है और अद्रव पदार्थोंसे बननेवाली गौओंका उन-उन पदार्थोंकी राशि है। इस लोकमें कुछ मानव सुवर्ण-धेनुकी तथा अन्य महर्षिगण नवनीत (मक्खन) और रत्नोंसे भी गौकी रचनाकी इच्छा करते हैं। परंतु सभीके लिये यही विधान है और ये ही सामग्रियाँ भी हैं। सदा पर्व-पर्वपर अपनी श्रद्धाके अनुसार मन्त्रोच्चारणपूर्वक आवाहनसहित इन गौओंका दान करना चाहिये; क्योंकि ये सभी भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाली हैं॥११-२२॥<br>इस प्रकार गुड-धेनुके वर्णन-प्रसङ्गसे मैंने सभी धेनुओंका वर्णन कर दिया। ये सभी सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्रदान करनेवाली, कल्याणकारिणी और पापहारिणी हैं। चूँकि इस लोकमें विशोकद्वादशी-व्रत सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ माना गया है, इसलिये उसका अङ्ग होनेके कारण गुड-धेनु भी प्रशस्त मानी गयी है।
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