मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ८३ * | २९९ |
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| अयने विषुवे पुण्ये व्यतीपातेऽथवा पुनः।<br>गुडधेन्वादयो देयास्तूपरागादिपर्वसु॥ २५<br>विशोकद्वादशी चैषा पुण्या पापहरा शुभा।<br>यामुपोष्य नरो याति तद् विष्णोः परमं पदम्॥ २६<br>इह लोके च सौभाग्यमायुरारोग्यमेव च।<br>वैष्णवं पुरमाप्नोति मरणे च स्मरन् हरिम्॥ २७<br>नवार्बुदसहस्त्राणि दश चाष्टौ च धर्मवित्।<br>न शोकदुःखदौर्गत्यं तस्य संजायते नृप॥ २८<br>नारी वा कुरुते या तु विशोकद्वादशीव्रतम्।<br>नृत्यगीतपरा नित्यं सापि तत्फलमाप्नुयात्॥ २९<br>तस्मादग्रे हरेर्नित्यमनन्तं गीतवादनम्।<br>कर्तव्यं भूतिकामेन भक्त्या तु परया नृप॥ ३०<br>इति पठति य इत्थं यः शृणोतीह सम्यङ्—<br>मधुमुरनरकारेर्चनं यश्च पश्येत्।<br>मतिमपि च जनानां यो ददातीन्द्रलोके<br>वसति स बिबुधौघैः पूज्यते कल्पमेकम्॥ ३१ | उत्तरायण और दक्षिणायनके दिन, पुण्यप्रद विषुवयोग, व्यतीपातयोग अथवा सूर्य-चन्द्रके ग्रहण आदि पर्वोंपर इन गुड-धेनु आदि गौओंका दान करना चाहिये। यह विशोकद्वादशी पुण्यदायिनी, पापहारिणी और मङ्गलकारिणी है। इसका व्रत करके मनुष्य विष्णुके परमपदको प्राप्त हो जाता है तथा इस लोकमें सौभाग्य, नीरोगता और दीर्घायुका उपभोग करके मरनेपर श्रीहरिका स्मरण करता हुआ विष्णुलोकको चला जाता है। धर्मज्ञ नरेश! उसे नौ अरब अठारह हजार वर्षोंतक शोक, दुःख और दुर्गंतिकी प्राप्ति नहीं होती। अथवा जो स्त्री नित्य नाच-गानमें तत्पर रहकर इस विशोकद्वादशीव्रतका अनुष्ठान करती है, उसे भी वही पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है। राजन्! इसलिये वैभवकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषको उत्कृष्ट भक्तिके साथ श्रीहरिके समक्ष नित्य-निरन्तर गायन-वादनका आयोजन करना चाहिये। इस प्रकार जो मनुष्य इस व्रत-विधानको पढ़ता अथवा श्रवण करता है एवं मधु, मुर और नरक नामक राक्षसोंके शत्रु श्रीहरिके पूजनको भलीभाँति देखता है तथा वैसा करनेके लिये लोगोंको सम्मति देता है, वह इन्द्रलोकमें वास करता है और एक कल्पतक देवगणोंद्वारा पूजित होता है॥ २३–३१॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विशोकद्वादशीव्रतं नाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः॥ ८२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विशोकद्वादशीव्रत नामक बयासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८२॥
तिरासीवाँ अध्याय
पर्वतदानके दस भेद, धान्यशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| नारद उवाच<br>भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि दानमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>यदक्षयं परे लोके देवर्षिगणपूजितम्॥ १ | नारदजीने पूछा— भगवन्! अब मैं विविध दानोंके उत्तम माहात्म्यको श्रवण करना चाहता हूँ, जो देवगणों एवं ऋषिसमूहोंद्वारा पूजित और परलोकमें अक्षय फल देनेवाला है॥ १॥ |
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| उमापतिरुवाच<br>मेरोः प्रदानं वक्ष्यामि दशधा मुनिपुङ्गव।<br>यत्प्रदानान्नरो लोकानाप्नोति सुरपूजितान्॥ २<br>पुराणेषु च वेदेषु यज्ञेष्व्वायतनेषु च।<br>न तत्फलमधीतेषु कृतेष्विह यदश्नुते॥ ३ | उमापतिने कहा— मुनिपुङ्गव! मैं मेरु-(पर्वत) दानके दस भेदोंको बतला रहा हूँ। जिनका दान करनेसे मनुष्य देवपूजित लोकोंको प्राप्त करता है। उसे इस लोकमें जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह वेदों और पुराणोंके अध्ययनसे, यज्ञानुष्ठानसे और देव-मन्दिर आदिके |