मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३०० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्माद् विधानं वक्ष्यामि पर्वतानामनुक्रमात्।<br>प्रथमो धान्यशैलः स्याद् द्वितीयो लवणाचलः॥ ४<br>गुडाचलस्तृतीयस्तु चतुर्थो हेमपर्वतः।<br>पञ्चमस्तिलशैलः स्यात् षष्ठः कार्पासपर्वतः॥ ५<br>सप्तमो घृतशैलश्च रत्नशैलस्तथाष्टमः।<br>राजतो नवमस्तद्वद् दशमः शर्कराचलः॥ ६<br>वक्ष्ये विधानमेतेषां यथावदनुपूर्वशः।<br>अयने विषुवे पुण्ये व्यतीपाते दिनक्षये॥ ७<br>शुक्लपक्षे तृतीयायामुपरागे शशिक्षये।<br>विवाहोत्सवयज्ञेषु द्वादश्यामथ वा पुनः॥ ८<br>शुक्लायां पञ्चदश्यां वा पुण्यर्क्षे वा विधानतः।<br>धान्यशैलादयो देया यथाशास्त्रं विजानता॥ ९<br>तीर्थेष्वायतने वापि गोष्ठे वा भवनाङ्गणे।<br>मण्डपं कारयेद् भक्त्या चतुरस्रमुदङ्मुखम्।<br>प्रागुदक्प्रवणं तद्वत् प्राङ्मुखं च विधानतः॥ १०<br>गोमयेनानुुलिप्तायां भूमावास्तीर्य वै कुशान्।<br>तन्मध्ये पर्वतं कुर्याद् विष्कम्भपर्वतान्वितम्॥ ११<br>धान्यद्रोणसहस्रेण भवेद् गिरिरिहोत्तमः।<br>मध्यमः पञ्चशतकः कनिष्ठः स्यात् त्रिभिः शतैः॥ १२ | निर्माणसे भी नहीं प्राप्त होता। इसलिये अब मैं पर्वतोंके क्रमसे उनके विधानका वर्णन कर रहा हूँ। (उनके नाम हैं—) पहला धान्यशैल, दूसरा लवणाचल, तीसरा गुडाचल, चौथा हेमपर्वत, पाँचवाँ तिलशैल, छठा कार्पासपर्वत, सातवाँ घृतशैल, आठवाँ रत्नशैल, नवाँ रजतशैल और दसवाँ शर्कराचल। इनका विधान यथार्थरूपसे क्रमशः बतला रहा हूँ। सूर्यके उत्तरायण और दक्षिणायनके समय, पुण्यमय विषुवयोगमें, व्यतीपातयोगमें, ग्रहणके समय सूर्य अथवा चन्द्रमाके अदृश्य हो जानेपर, शुक्लपक्षकी तृतीया, द्वादशी अथवा पूर्णिमा तिथिके दिन, विवाह, उत्सव और यज्ञके अवसरोंपर तथा पुण्यप्रद शुभ नक्षत्रके योगमें विद्वान् दाताको शास्त्रादेशानुसार विधिपूर्वक धान्यशैल आदि पर्वतदानोंको करना चाहिये। इसके लिये तीर्थोंमें, देवमन्दिरमें, गोशालामें अथवा अपने घरके आँगनमें ही भक्तिपूर्वक विधि-विधानके साथ एक चौकोर मण्डपका निर्माण करावे; उसमें उत्तर और पूर्व दिशामें दो दरवाजे हों और उसकी भूमि पूर्वोत्तर दिशामें ढालू हो। उस मण्डपकी गोबरसे लिपी-पुती भूमिपर कुश बिछाकर उसके बीचमें विष्कम्भपर्वतसहित¹ देय पदार्थकी पर्वताकार राशि लगा दे। इस विषयमें एक हजार द्रोण² अन्नका पर्वत उत्तम, पाँच सौ द्रोणका मध्यम और तीन सौ द्रोणका कनिष्ठ माना जाता है॥ २—१२॥ |
| मेरुर्महाव्रीहिमयस्तु मध्ये<br>सुवर्णवृक्षत्रयसंयुतः स्यात्।<br>पूर्वेण मुक्ताफलवज्रयुक्तो<br>याम्येन गोमेदकपुष्परागैः॥ १३<br>पश्चाच्च गारुत्मतनीलरत्नैः<br>सौम्येन वैदूर्यसरोजरागैः।<br>श्रीखण्डखण्डैरभितः प्रवालै-<br>र्लतान्वितः शुक्तिशिलातलः स्यात्॥ १४<br>ब्रह्माथ विष्णुर्भगवान् पुरारि-<br>र्दिवाकरोऽप्यत्र हिरण्मयः स्यात्।<br>मूर्धन्यवस्थानममत्सरेण<br>कार्यं त्वनेकैश्च पुनर्द्विजौघैः॥ १५ | महान् धान्यराशिसे बने हुए मेरु पर्वतको मध्यमें तीन स्वर्णमय वृक्षोंसे युक्त कर, पूर्व दिशामें मोती और हीरेसे, दक्षिण दिशामें गोमेद और पुष्पराग (पुखराज)-से, पश्चिम दिशामें गारुत्मत (पन्ना) और नीलम मणिसे, उत्तर दिशामें वैदूर्य और पद्मराग मणिसे तथा चारों ओर चन्दनके टुकड़ों और मूँगेसे सुशोभित कर दे। उसे लताओंसे परिवेष्टित तथा सीपीके शिलाखण्डोंसे सुसज्जित कर दिया जाय। पुनः यजमान गर्वरहित होकर अनेकों द्विजसमूहोंके साथ उस पर्वतके मूर्धा-स्थानपर ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, शङ्कर और सूर्यकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित करे। |
१. सुमेरुगिरिके चारों ओर स्थित मन्दर, गन्धमादन, विपुल और सुपार्श्व नामक पर्वतोंको 'विष्कम्भपर्वत' कहा जाता है।
२. बत्तीस सेरका एक प्राचीन मान।