भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ८३ *३०१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चत्वारि शृङ्गाणि च राजतानि<br>नितम्बभागेष्वपि राजतः स्यात्।<br>तथेषुवंशावृतकन्दरस्तु<br>घृतोदकप्रस्रवणैश्च दिक्षु॥ १६<br>शुक्लाम्बराण्युम्बुधरावली स्यात्<br>पूर्वेण पीतानि च दक्षिणेन।<br>वासांसि पश्चादथ कर्बुराणि<br>रक्तानि चैवोत्तरतो घनाली॥ १७<br>रौप्यान् महेन्द्रप्रमुखान्स्तथाष्टौ<br>संस्थाप्य लोकाधिपतीन् क्रमेण।<br>नानाफलाली च समन्ततः स्या-<br>न्मनोरमं माल्यविलेपनं च॥ १८<br>वितानकं चोपरि पञ्चवर्ण-<br>म्म्लानपुष्पाभरणं सितं च।<br>इत्थं निवेश्यामरशैलमग्र्यं<br>मेरोस्तु विष्कम्भगिरीन् क्रमेण॥ १९<br>तुरीयभागेन चतुर्दिशं च<br>संस्थापयेत् पुष्पविलेपनाढ्यान्।<br>पूर्वेण मन्दरमनेकफलावलीभि-<br>र्युक्तं यवैः कनकभद्रकदम्बचिह्नैः॥ २०<br>कामेन काञ्चनमयेन विराजमान-<br>माकारयेत् कुसुमवस्त्रविलेपनाढ्यम्।<br>क्षीरारुणोदसरसाथ वनेन चैवं<br>रौप्येण शक्तिघटितेन विराजमानम्॥ २१उसमें चाँदीके चार शिखर बनाये जायँ, जिनके नितम्बभाग भी चाँदीके ही बने हों। उसी प्रकार चारों दिशाओंमें गन्ना और बाँससे ढकी हुई कन्दराएँ तथा घी और जलके झरने भी बनाये जायँ। पुनः पूर्व दिशामें श्वेत वस्त्रोंसे, दक्षिण दिशामें पीले वस्त्रोंसे, पश्चिम दिशामें चितकबरे वस्त्रोंसे और उत्तर दिशामें लाल वस्त्रोंसे बादलोंकी पङ्क्तियाँ बनायी जायँ। फिर चाँदीके बने हुए महेन्द्र आदि आठों लोकपालोंको क्रमशः स्थापित करे और उस पर्वतके चारों ओर अनेकों प्रकारके फल, मनोरम पुष्पमालाएँ और चन्दन भी रख दे। उसके ऊपर पँचरंगा चाँदौवा लगा दे और उसे खिले हुए श्वेत पुष्पोंसे विभूषित कर दे। इस प्रकार श्रेष्ठ अमरशैल (सुमेरुगिरि)-की स्थापना कर उसके चतुर्थांशसे इसकी चारों दिशाओंमें क्रमशः विष्कम्भ (मर्यादा) पर्वतोंकी स्थापना करनी चाहिये। ये सभी पुष्प और चन्दनसे सुशोभित हों। पूर्व दिशामें यवसे मन्दराचलका आकार बनावे, उसके निकट अनेकों प्रकारके फलोंकी कतारें लगा दे, उसे कनकभद्र (देवदारु) और कदम्ब-वृक्षोंके चिह्नोंसे सुशोभित कर दे, उसपर कामदेवकी स्वर्णमयी प्रतिमा स्थापित कर दे। फिर उसे अपनी शक्तिके अनुसार चाँदीके बने हुए वन और दूधनिर्मित अरुणोद नामक सरोवरसे सुशोभित कर दे। तत्पश्चात् वस्त्र, पुष्प और चन्दन आदिसे उसे भरपूर सुसज्जित कर देना चाहिये॥ १३–२१॥
याम्येन गन्धमदनश्च विवेशनीयो<br>गोधूमसंचयमयः कलधौतयुक्तः।<br>हैमेन यज्ञपतिना घृतमानसेन<br>वस्त्रैश्च रजतवनेन च संयुतः स्यात्॥ २२<br>पश्चात् तिलाचलमनेकसुगन्धिपुष्प-<br>सौवर्णपिप्पलहिरण्मयहंसयुक्तम्।<br>आकारयेद् रजतपुष्पवनेन तद्वद्<br>वस्त्रान्वितं दधिसितोदरस्तथाग्रे॥ २३<br>संस्थाप्य तं विपुलशैलमथोत्तरेण<br>शैलं सुपार्श्वमपि माषमयं सुवस्त्रम्।<br>पुष्पैश्च हेमवटपादपशेखरं त-<br>माकारयेत् कनकधेनुविराजमानम्॥ २४दक्षिण दिशामें गेहूँकी राशिसे गन्धमादनकी रचना करनी चाहिये। उसे स्वर्णपत्रसे सुशोभित कर दे। उसपर यज्ञपतिकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित कर दे और उसे वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। फिर उसे घीके सरोवर और चाँदीके वनसे सुशोभित कर देना चाहिये। पश्चिम दिशामें अनेकों सुगन्धित पुष्पों, स्वर्णमय पीपल-वृक्ष और सुवर्णनिर्मित हंससे युक्त तिलाचलकी स्थापना करनी चाहिये। उसी प्रकार इसे भी वस्त्रसे परिवेष्टित तथा चाँदीके पुष्पवनसे सुशोभित कर दे। इसके अग्रभागमें दहीसे सितोद सरोवरकी भी रचना कर दे। इस प्रकार उस विपुल शैलकी स्थापना करके उत्तर दिशामें उड़दसे सुपार्श्व नामक पर्वतकी स्थापना करे। इसे भी सुन्दर वस्त्र और पुष्पोंसे सुसज्जित कर दे, इसके शिखरपर स्वर्णमय वटवृक्ष रख दे और सुवर्णनिर्मित गौसे सुशोभित कर दे।