मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३२ * मत्स्यपुराण *
| शुकी शुकानुलूकांश्च जनयामास धर्मतः।<br>श्येनी श्येनांस्तथा भासी कुररानप्यजीजनत्॥ ३१<br>गृध्री गृध्रान् कपोतांश्च पारावतविहङ्गमान्।<br>हंससारसक्रौञ्चांश्च प्लवाञ्छुचिरजीजनत्॥ ३२<br>अजाश्वमेषोष्ट्रखरान् सुग्रीवी चाप्यजीजनत्।<br>एष ताम्रान्वयः प्रोक्तो विनतायां निबोधत॥ ३३ | इनमें शुकीने धर्मके संयोगसे शुक और उलूकोंको उत्पन्न किया। श्येनीसे श्येन (बाज) तथा भासीसे कुरर(चकवा)-की उत्पत्ति हुई। गृध्रीने गीधों, पँडुत्रियों और कबूतरोंको पैदा किया। शुचिके गर्भसे हंस, सारस, क्रौंच और प्लव (कारण्डव या विशेष जलपक्षी) प्रादुर्भूत हुए। सुग्रीवीने बकरा, घोड़ा, भेंडा, ऊँट और गधोंको जन्म दिया। इस प्रकार यह ताम्राके वंशका वर्णन किया, अब विनताकी वंश-परम्पराके विषयमें सुनिये॥ १६—३३॥ |
| गरुडः पततां नाथो अरुणश्च पतत्रिणाम्।<br>सौदामिनी तथा कन्या येयं नभसि विश्रुता॥ ३४<br>सम्पातिश्च जटायुश्च अरुणस्य सुतावुभौ।<br>सम्पातिपुत्रो बभ्रुश्च शीघ्रगश्चापि विश्रुतः॥ ३५<br>जटायुषः कर्णिकारः शतगामी च विश्रुतौ।<br>सारसो रज्जुबालश्च भेरुण्डश्चापि तत्सुताः॥ ३६<br>तेषामनन्तमभवत् पक्षिणां पुत्रपौत्रकम्।<br>सुरसायाः सहस्रं तु सर्पाणामभवत् पुरा॥ ३७<br>सहस्रशिरसां कद्रूः सहस्रं चापि सुव्रत।<br>प्रधानास्तेषु विख्याताः षड्विंशतिररिंदम॥ ३८<br>शेषवासुकिकर्कोटशङ्खैरावतकम्बलाः।<br>धनञ्जयमहानीलपद्माश्वतरतक्षकाः॥ ३९<br>एलापत्रमहापद्मधृतराष्ट्रबलाहकाः।<br>शङ्खपालमहाशङ्खपुष्पदंष्ट्रशुभाननाः॥ ४०<br>शङ्कुरोमा च बहुलो वामनः पाणिनस्तथा।<br>कपिलो दुर्मुखश्चापि पतञ्जलिरिति स्मृताः॥ ४१<br>एषामनन्तमभवत् सर्वेषां पुत्रपौत्रकम्।<br>प्रायशो यत् पुरा दग्धं जनमेजयमन्दिरे॥ ४२<br>रक्षोगणं क्रोधवशा स्वनामानमजीजनत्।<br>दंष्ट्रिणां नियुतं तेषां भीमसेनादगात् क्षयम्॥ ४३<br>रुद्राणां च गणं तद्वद् गोमहिष्यो वराङ्गनाः।<br>सुरभिर्जनयामास कश्यपात् संयतव्रता॥ ४४<br>मुनिर्मुनीनां च गणं गणमप्सरसां तथा।<br>तथा किन्नरगन्धर्वानरिष्टाजनयद् बहून्॥ ४५<br>तृणवृक्षलतागुल्ममिरा सर्वमजीजनत्।<br>विश्वा तु यक्षरक्षांसि जनयामास कोटिशः॥ ४६<br>तत एकोनपञ्चाशन्मरुतः कश्यपाद् दितिः।<br>जनयामास धर्मज्ञान् सर्वानमरवल्लभान्॥ ४७ | (विनताके दो पुत्र) गरुड़ और अरुण आकाशचारी छोटे-बड़े समस्त पक्षियोंके स्वामी हैं। (उसकी तीसरी संतान) सौदामिनी नामकी कन्या है, जो गगन-मण्डलमें विख्यात है। अरुणके सम्पाति और जटायु नामके दो पुत्र हुए। उनमें सम्पातिके पुत्र बभ्रु और शीघ्रग नामसे विख्यात हुए। जटायुके दो पुत्र कर्णिकार और शतगामी नामसे प्रसिद्ध हुए। इनके अतिरिक्त जटायुके सारस, रज्जुबाल और भेरुण्डनामक पुत्र भी थे। इन पक्षियोंके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या अनन्त है। सुव्रत! सुरसा तथा कद्रूके गर्भसे सहस्र फणोंवाले एक-एक हजार सर्पोंकी उत्पत्ति हुई। परन्तप! उनमें छब्बीस प्रधान हैं। उनके नाम ये हैं—शेष, वासुकि, कर्कोटक, शङ्ख, ऐरावत, कम्बल, धनञ्जय, महानील, पद्म, अश्वतर, तक्षक, एलापत्र, महापद्म, धृतराष्ट्र, बलाहक, शंखपाल, महाशंख, पुष्पदंष्ट्र, शुभानन, शंकुरोमा, बहुल, वामन, पाणिन, कपिल, दुर्मुख और पतञ्जलि। इन सभी सर्पोंके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या अगणित थी, परंतु प्राचीनकालमें जनमेजयके सर्पयज्ञमें (इनमेंसे) प्रायः अधिकांश जला दिये गये। क्रोधवशाने अपने ही नामवाले (क्रोधवश नामक) दंष्ट्रधारी एक लाख राक्षसोंको जन्म दिया, जो भीमसेनद्वारा नष्ट कर दिये गये। संयत व्रतवाली सुरभिने महर्षि कश्यपके संयोगसे रुद्रगणों तथा सुन्दर अङ्गोंवाली गायों और भैंसोंको उत्पन्न किया। मुनिने मुनि-समुदाय तथा अप्सरा-समूहको पैदा किया, उसी प्रकार अरिष्टाने बहुत-से किन्नर और गन्धर्वोंको जन्म दिया। इरासे समस्त तृण, वृक्ष, लता और झाड़ी आदिकी उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार विश्वाने करोड़ों यक्षों और राक्षसोंको पैदा किया तथा दितिने कश्यपके सम्पर्कसे उनचास मरुतोंको उत्पन्न किया, जो सभी धर्मज्ञ और देवप्रिय थे॥ ३४—४७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदिसर्गे कश्यपान्वयो नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें कश्यप-वंश-वर्णन नामक छठा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६॥