भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 385
* अध्याय ११२ *३७५

| महेश्वरो वटो भूत्वा तिष्ठते परमेश्वरः।<br>ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।<br>रक्षन्ति मण्डलं नित्यं पापकर्मनिवारणात्॥ १०<br>यस्मिञ्जुह्वन् स्वकं पापं नरकं च न पश्यति।<br>एवं ब्रह्मा च विष्णुश्च प्रयागे समहेश्वरः॥ ११<br>सप्तद्वीपाः समुद्राश्च पर्वताश्च महीतले।<br>रक्षमाणाश्च तिष्ठन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १२<br>ये चान्ये बहवः सर्वे तिष्ठन्ति च युधिष्ठिर।<br>पृथिवीं तत्समाश्रित्य निर्मिता दैवतैस्त्रिभिः॥ १३<br>प्रजापतेरिदं क्षेत्रं प्रयागमिति विश्रुतम्।<br>एतत् पुण्यं पवित्रं वै प्रयागं च युधिष्ठिर।<br>स्वराज्यं कुरु राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितोऽनघ॥ १४ | तथा परमेश्वर शिव अक्षयवटके रूपमें स्थित हैं। इनके अतिरिक्त गन्धर्वोंसहित देवगण, सिद्धसमूह तथा यूथ-के-यूथ परमर्षि पाप-कर्मसे निवारण करनेके निमित्त नित्य प्रयागमण्डलकी रक्षा करते हैं, जिस मण्डलमें अपने पापोंका हवन करके प्राणी नरकका दर्शन नहीं करता, इस प्रकार प्रयागमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, सातों द्वीप, सातों समुद्र और भूतलपर स्थित सभी पर्वत उसकी रक्षा करते हुए प्रलयपर्यन्त स्थित रहते हैं। युधिष्ठिर! इनके अतिरिक्त अन्य जो बहुत-से देवता पृथ्वीका आश्रय लेकर निवास करते हैं, उनके निवासस्थानका निर्माण इन्हीं तीनों देवताओंद्वारा हुआ है। यह प्रयाग प्रजापति ब्रह्माका क्षेत्र है—ऐसी प्रसिद्धि है। युधिष्ठिर! यह प्रयाग पुण्यप्रद एवं परम पवित्र है। निष्पाप राजेन्द्र! तुम अपने भाइयोंके साथ अपना राज्य-कार्य सँभालो॥ ७–१४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये एकादशाधिकशततमोऽध्यायः॥ १११॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्यमें एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १११॥


एक सौ बारहवाँ अध्याय

भगवान् वासुदेवद्वारा प्रयागके माहात्म्यका वर्णन

| नन्दिकेश्वर उवाच<br><br>भ्रातृभिः सहितः सर्वैर्द्रौपद्या सह भार्यया।<br>ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य गुरून् देवानतर्पयत्॥ १<br>वासुदेवोऽपि तत्रैव क्षणेनाभ्यागतस्तदा।<br>पाण्डवैः सहितैः सर्वैः पूज्यमानस्तु माधवः॥ २<br>कृष्णेन सहितैः सर्वैः पुनरेव महात्मभिः।<br>अभिषिक्तः स्वराज्ये च धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः॥ ३<br>एतस्मिन्नन्तरे चैव मार्कण्डेयो महामुनिः।<br>ततः स्वस्तीति चोक्त्वा तु क्षणादाश्रममागमत्॥ ४<br>युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितोऽवसत्।<br>महादानं ततो दत्त्वा धर्मपुत्रो महामनाः॥ ५<br>यस्त्विदं कल्य उत्थाय माहात्म्यं पठते नरः।<br>प्रयागं स्मरते नित्यं स याति परमं पदम्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति॥ ६ | **नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! तदनन्तर धर्मराज युधिष्ठिरने अपने सभी भाइयों तथा पत्नी द्रौपदीके साथ ब्राह्मणोंको नमस्कार कर देवताओं एवं अपने गुरुजनोंको तर्पणद्वारा तृप्त किया। भगवान् वासुदेव भी अकस्मात् उसी क्षण वहीं आ पहुँचे। तब सभी पाण्डवोंने मिलकर भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की। तत्पश्चात् सभी महात्माओंके साथ-साथ भगवान् श्रीकृष्णने धर्मपुत्र युधिष्ठिरको पुनः उनके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। इसी बीच महामुनि मार्कण्डेय ‘स्वस्ति—तुम्हारा कल्याण हो’—यों कहकर क्षणमात्रमें अपने आश्रमको लौट गये। तदनन्तर महामना एवं धर्मात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिर भी बड़ा-बड़ा दान देकर भाइयोंके साथ वहाँ निवास करने लगे। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इस माहात्म्यका पाठ करता है तथा नित्य प्रयागका स्मरण करता है, वह परमपदको प्राप्त कर लेता है तथा समस्त पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकको चला जाता है॥ १–६॥ |

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