मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ११३ * ३८१
| तस्य पीत्वा फलरसं संजीवन्ति समायुतम्।<br>तस्य माल्यवतः पार्श्वे पूर्वे पूर्वा तु गण्डिका।<br>द्वात्रिंशच्च सहस्राणि तत्रापि शतमुच्यते॥ ५१<br><br>भद्राश्वस्तत्र विज्ञेयो नित्यं मुदितमानसः।<br>भद्रमालवनं तत्र कालाभ्रश्च महाद्रुमः॥ ५२<br><br>तत्र ते पुरुषाः श्वेता महासत्त्वा महाबलाः।<br>स्त्रियः कुमुदवर्णाभाः सुन्दर्यः प्रियदर्शनाः॥ ५३<br><br>चन्द्रप्रभाश्चन्द्रवर्णाः पूर्णचन्द्रनिभाननाः।<br>चन्द्रशीतलगात्राश्च स्त्रियो ह्युत्पलगन्धिकाः॥ ५४<br><br>दशवर्षसहस्राणि आयुस्तेषामनामयम्।<br>कालाभ्रस्य रसं पीत्वा ते सर्वे स्थिरयौवनाः॥ ५५ | उसके फलोंका रस पीकर वहाँके निवासी दस हजार वर्षोंतक जीवित रहते हैं। माल्यवान्के पूर्वी भागमें पूर्वगण्डिका नामक पर्वत है, जो बत्तीस हजार योजन लम्बा और सौ योजन चौड़ा कहा जाता है। उसकी तलहटीमें भद्राश्व नामक देश है, जहाँके निवासी सदा प्रसन्न-मन रहते हैं। वहाँ भद्रमाल नामक वन है, जिसमें कालाभ्र नामक एक महान् वृक्ष है। वहाँके निवासी पुरुष गोरे, महान् सत्त्वसम्पन्न एवं महाबली होते हैं तथा कुछ स्त्रियाँ कुमुदिनीकी-सी कान्तिवाली, परम सुन्दरी एवं देखनेमें प्रिय लगनेवाली होती हैं। इसी प्रकार कुछ स्त्रियाँ गौर वर्णवाली होती हैं, उनकी कान्ति चन्द्रमा-सरीखी उज्ज्वल होती है और उनका मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान चमकदार होता है। उनका शरीर भी चन्द्रमाके समान शीतल होता है और उससे कमलकी-सी गन्ध निकलती है। कालाभ्र वृक्षोंके फलोंका रस पान कर वहाँके सभी निवासियोंकी युवावस्था स्थिर बनी रहती है और वे नीरोग रहकर दस हजार वर्षोंतक जीवित रहते हैं॥ ४८–५५॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्तवानृषीन् ब्रह्मा वर्षाणि च निसर्गतः।<br>पूर्वं ममानुग्रहकृद् भूयः किं वर्णयामि वः॥ ५६<br>एतच्छ्रुत्वा वचस्ते तु ऋषयः संशितव्रताः।<br>जातकौतूहलाः सर्वे प्रत्यूचुस्ते मुदान्विताः॥ ५७ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें ब्रह्माने स्वभावतः मुझपर कृपा कर जिन वर्षोंका वर्णन किया था, उनका विवरण मैं आपलोगोंको बतला चुका। अब पुनः आपलोगोंसे किसका वर्णन करूँ? सूतजीकी यह बात सुनकर वे सभी व्रतनिष्ठ ऋषि विस्मयविमुग्ध हो गये। तत्पश्चात् वे प्रसन्नतापूर्वक बोले॥ ५६–५७॥ | | ऋषय ऊचुः<br>पूर्वापरौ समाख्यातौ यौ देशौ तौ त्वया मुने।<br>उत्तराणां च वर्षाणां पर्वतानां च सर्वशः॥ ५८<br>आख्याहि नो यथातथ्यं ये च पर्वतवासिनः।<br>एवमुक्तस्तु ऋषिभिस्तेभ्यस्त्वाख्यातवान् पुनः॥ ५९ | **ऋषियोंने पूछा—**मुने! पूर्व और पश्चिम दिशामें स्थित जो देश हैं; उनके विषयमें तो आप हमलोगोंको बतला चुके। अब उत्तर दिशामें स्थित वर्षों और पर्वतोंका वर्णन कीजिये। साथ ही उन पर्वतोंपर निवास करनेवाले लोगोंका चरित्र भी यथार्थरूपसे बतलाइये। ऋषियोंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर सूतजीने पुनः उनसे वर्णन करना आरम्भ किया॥ ५८–५९॥ | | सूत उवाच<br>शृणुध्वं यानि वर्षाणि पूर्वोक्तानि च वै मया।<br>दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु॥ ६०<br>वर्षं रमणकं नाम जायन्ते यत्र वै प्रजाः। | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पहले मैं आपलोगोंसे जिन वर्षोंके विषयमें वर्णन कर चुका हूँ, (उनके अतिरिक्त अन्य वर्षोंका वर्णन) सुनिये। नीलपर्वतसे दक्षिण और निषध पर्वतसे उत्तर दिशामें रमणक नामक वर्ष है, जहाँकी |