मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| सर्वाः पुण्यजलाः पुण्याः सर्वाश्चैव समुद्रगाः।<br>विश्वस्य मातरः सर्वाः सर्वपापहराः शुभाः ॥ ३३ | ये सभी पुण्यतोया नदियाँ पुण्यप्रद, सर्वत्र बहनेवाली तथा साक्षात् या परम्परासे समुद्रगामिनी हैं। ये सब-की-सब विश्वके लिये माता-सदृश हैं तथा इन सबको कल्याणकारिणी एवं पापहारिणी माना गया है$^१$ ॥ २५—३३॥ | | तासां नद्युपनद्यश्च शतशोऽथ सहस्रशः।<br>तास्विमे कुरुपाञ्चालाः शाल्वाश्चैव सजाङ्गलाः ॥ ३४<br>शूरसेना भद्रकारा बाह्याः सहपटच्चराः।<br>मत्स्याः किराताः कुन्त्याश्च कुन्तलाः काशिकोसलाः ॥ ३५<br>आवन्ताश्च कलिङ्गाश्च मूकाश्चैवान्धकैः सह।<br>मध्यदेशा जनपदाः प्रायशः परिकीर्तिताः ॥ ३६<br>सह्यास्यान्तरे चैते यत्र गोदावरी नदी।<br>पृथिव्यामपि कृत्स्नायां स प्रदेशो मनोरमः ॥ ३७<br>यत्र गोवर्धनो नाम मन्दरो गन्धमादनः।<br>रामप्रीत्यर्थं स्वर्गीया वृक्षा दिव्यास्तथौषधीः ॥ ३८<br>भरद्वाजेन मुनिना तत्प्रियार्थेऽवतारिताः।<br>ततः पुष्पवरो देशस्तेन जज्ञे मनोरमः ॥ ३९<br>बाह्लीका वाटधानाश्च आभीराः कालतोयकाः।<br>पुरंधाश्चैव शूद्राश्च पल्लवाश्चात्तखण्डिकाः ॥ ४०<br>गान्धारा यवनाश्चैव सिन्धुसौवीरभद्रकाः।<br>शका द्रुह्याः पुलिन्दाश्च पारदाहारमूर्तिकाः ॥ ४१<br>रामठाः कण्टकाराश्च कैकेय्या दशनामकाः।<br>क्षत्रियोपनिवेशाश्च वैश्याः शूद्रकुलानि च ॥ ४२<br>काम्बोजा दरदाश्चैव वर्वरा पह्लवा तथा।<br>अत्रेयाश्च भरद्वाजाः प्रस्थलाश्च कसेरकाः ॥ ४३<br>लम्पकास्तलगानाश्च सैनिकाः सह जाङ्गलैः।<br>एते देशा उदीच्यास्तु प्राच्यान् देशान् निबोधत ॥ ४४<br>अङ्गा वङ्गा मद्गुरका अन्तर्गिरिबहिर्गिरी।<br>ततः प्लवङ्गमातङ्गा यमका मालवर्णकाः।<br>सुह्योत्तराः प्रविजया मार्गवागेयमालवाः ॥ ४५<br>प्राग्ज्योतिषाश्च पुण्ड्राश्च विदेहास्ताम्रलिप्तकाः।<br>शाल्वमागधगोनर्दाः प्राच्या जनपदाः स्मृताः ॥ ४६ | अथवा इनकी सैकड़ों-हजारों छोटी-बड़ी सहायक नदियाँ भी हैं जिनके कछारोंमें कुरु, पाञ्चाल, शाल्व, सजाङ्गल, शूरसेन, भद्रकार, बाह्य, सहपटच्चर, मत्स्य$^२$, किरात, कुन्ती, कुन्तल, काशी, कोसल, आवन्त, कलिङ्ग, मूक और अन्धक—ये देश अवस्थित हैं, जो प्रायः मध्यदेशके जनपद कहलाते हैं। ये सह्यपर्वतके निकट बसे हुए हैं, यहाँ गोदावरी नदी प्रवाहित होती है। अखिल भूमण्डलमें यह प्रदेश अत्यन्त मनोरम है। तत्पश्चात् गोवर्धन, मन्दराचल और श्रीरामचन्द्रजीका प्रियकारक गन्धमादन पर्वत है, जिसपर मुनिवर भरद्वाजजीने श्रीरामके मनोरंजनके लिये स्वर्गीय वृक्षों और दिव्य ओषधियोंको अवतरित किया था। उन्हीं मुनिवरके प्रभावसे वह प्रदेश पुष्पोंसे परिपूर्ण होनेके कारण मनोमुग्धकारी हो गया था। बाह्लीक (बलख), वाटधान, आभीर, कालतोयक, पुरन्ध्र, शूद्र, पल्लव, आत्तखण्डिक, गान्धार, यवन, सिन्धु (सिंध), सौवीर (सिन्धका उत्तरी भाग), मद्रक (पंजाबका उत्तरी भाग), शक, द्रुह्य (ययाति-पुत्र द्रुह्युका उत्तरी भाग—पश्चिमी पंजाब), पुलिन्द, पारद, आहारमूर्तिक, रामठ, कण्टकार, कैकेय और दशनामक—ये क्षत्रियोंके उपनिवेश हैं तथा इनमें वैश्य और शूद्र-कुलके लोग भी निवास करते हैं। इनके अतिरिक्त कम्बोज (अफगानिस्तान), दरद, बर्बर, पह्लव (ईरान), अत्रि, भरद्वाज, प्रस्थल, कसेरक, लम्पक, तलगान और जाङ्गलसहित सैनिक प्रदेश—ये सभी उत्तरापथके देश हैं। अब पूर्व दिशाके देशोंको सुनिये। अङ्ग (भागलपुर), वङ्ग (बंगाल), मद्गुरक, अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि, प्लवङ्ग, मातङ्ग, यमक, मालवर्णक, सुह्म (उत्तरी असम), प्रविजय, मार्ग, वागेय, मालव, प्राग्ज्योतिष (आसामका पूर्वीभाग), पुण्ड्र (बंगलादेश), विदेह (मिथिला), ताम्रलिप्तक (उड़ीसाका उत्तरी भाग), शाल्व, मागध और गोनर्द—ये पूर्व दिशाके जनपद हैं ॥ ३४—४६ ॥ |
१. इन नदियोंका पूरा परिचय कल्याण, वराहपुराणाङ्कमें द्रष्टव्य है।
२. यहाँ पाणिनि अष्टाध्यायीके काशिका (४। १। १६०) कौमुदि (४। १। १७०) सम्प्रदायोंमें दो सूत्रोंका अन्तर होकर प्रतिलिपिकी भूलसे 'सूरमत्स्य' की जगह 'सूरमस' पाठ हो गया है। 'गणरत्नमहोदधि' में वर्द्धमानका पाठ ठीक है।