मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ११४ * | ३८५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अभिजातास्ततश्चान्ये विपुलाश्चित्रसानवः।<br>अन्ये तेभ्यः परिज्ञाता ह्रस्वा ह्रस्वोपजीविनः ॥ १९<br>तैर्विमिश्रा जानपदा आर्या म्लेच्छाश्च सर्वतः।<br>पीयन्ते यैरिमा नद्यो गङ्गा सिन्धुः सरस्वती*॥ २०<br>शतद्रुश्चन्द्रभागा च यमुना सरयूस्तथा।<br>इरावती वितस्ता च विपाशा देविका कुहूः ॥ २१<br>गोमती धूतपापा च बाहुदा च दृषद्वती।<br>कौशिकी च तृतीया च निश्चीरा गण्डकी तथा।<br>चक्षुर्लोहित इत्येता हिमवत्पादनिःसृताः ॥ २२<br>वेदस्मृतिर्वेत्रवती वृत्रघ्नी सिन्धुरेव च।<br>पर्णाशा चन्दना चैव सदानीरा मही तथा ॥ २३<br>पारा चर्मण्वती यूपा विदिशा वेणुमत्यपि।<br>शिप्रा ह्यवन्ती कुन्ती च पारियात्राश्रिताः स्मृताः ॥ २४<br>शोणो महानदी चैव नर्मदा सुरसा क्रिया।<br>मन्दाकिनी दशार्णा च चित्रकूटा तथैव च।<br>तमसा पिप्पली श्येनी करतोया पिशाचिका ॥ २५<br>विमला चञ्चला चैव वञ्जुला वालुवाहिनी।<br>शुक्तिमन्ती शुनी लज्जा मुकुटा हृदिकापि च।<br>ऋक्षवन्तप्रसूतास्ता नद्योऽमलजलाः शुभाः ॥ २६<br>तापी पयोष्णी निर्विन्ध्या क्षिप्रा च निषधा नदी।<br>वेण्वा वैतरणी चैव विश्वमाला कुमुद्वती ॥ २७<br>तोया चैव महागौरी दुर्गा चान्तःशिला तथा।<br>विन्ध्यपादप्रसूतास्ता नद्यः पुण्यजलाः शुभाः ॥ २८<br>गोदावरी भीमरथी कृष्णवेणी च वञ्जुला।<br>तुङ्गभद्रा सुप्रयोगा वाह्या कावेर्यथापि च।<br>दक्षिणापथनद्यस्ताः सह्यपादाद् विनिःसृताः ॥ २९<br>कृतमाला ताम्रपर्णी पुष्पजा चोत्पलावती।<br>मलयान्निःसृता नद्यः सर्वाः शीतजलाः शुभाः ॥ ३०<br>त्रिषामा ऋषिकुल्या च इक्षुला त्रिदिवाचला।<br>लाङ्गूलिनी वंशधरा महेन्द्रतनयाः स्मृताः ॥ ३१<br>ऋषीका सुकुमारी च मन्दगा मन्दवाहिनी।<br>कृपा पलाशिनी चैव शुक्तिमत्प्रभवाः स्मृताः ॥ ३२ | इनके अतिरिक्त अन्य भी विशाल एवं चित्र-विचित्र शिखरोंवाले पर्वत हैं तथा दूसरे कुछ उनसे भी छोटे हैं जो निम्न (पर्वतीय) जातियोंके आश्रयभूत हैं। इन्हीं पर्वतोंसे संयुक्त जो प्रदेश हैं उनमें चारों ओर आर्य एवं म्लेच्छ जातियाँ निवास करती हैं, जो इन आगे कही जानेवाली नदियोंका जल पान करती हैं। जैसे गङ्गा, सिन्धु, सरस्वती, शतद्रु (सतलज), चन्द्रभागा (चिनाव), यमुना, सरयू, इरावती (रावी), वितस्ता (झेलम), विपाशा (व्यास), देविका, कुहू, गोमती, धूतपापा (धोपाप), बाहुदा, दृषद्वती, कौशिकी (कोसी), तृतीया, निश्चीरा, गण्डकी, चक्षु, लौहित—ये सभी नदियाँ हिमालयकी उपत्यका (तलहटी)—से निकली हुई हैं। वेदस्मृति, वेत्रवती (बेतवा), वृत्रघ्नी, सिन्धु, पर्णाशा, चन्दना, सदानीरा, मही, पारा, चर्मण्वती, यूपा, विदिशा, वेणुमती, शिप्रा, अवन्ती तथा कुन्ती—इन नदियोंका उद्गमस्थान पारियात्र पर्वत है॥ १५–२४॥<br><br>शोण, महानदी, नर्मदा, सुरसा, क्रिया, मन्दाकिनी, दशार्णा, चित्रकूटा, तमसा, पिप्पली, श्येनी, करतोया, पिशाचिका, विमला, चञ्चला, वञ्जुला, वालुवाहिनी, शुक्तिमन्ती, शुनी, लज्जा, मुकुटा और हृदिका—ये स्वच्छसलिला कल्याणमयी नदियाँ ऋक्षवन्त (ऋक्षवान्) पर्वतसे उद्भूत हुई हैं। तापी, पयोष्णी (पूर्णानदी या पैनगङ्गा), निर्विन्ध्या, क्षिप्रा, निषधा, वेण्वा, वैतरणी, विश्वमाला, कुमुद्वती, तोया, महागौरी, दुर्गा तथा अन्तःशिला—ये सभी पुण्यतोया मङ्गलमयी नदियाँ विन्ध्याचलकी उपत्यकाओंसे निकली हुई हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, वञ्जुला (मंजीरा), कर्णाटककी तुङ्गभद्रा, सुप्रयोगा, वाह्या (वर्धनदी) और कावेरी—ये सभी दक्षिणापथमें प्रवाहित होनेवाली नदियाँ हैं, जो सह्यपर्वतकी शाखाओंसे प्रकट हुई हैं। कृतमाला (वैगैन नदी), ताम्रपर्णी, पुष्पजा (कुसुमाङ्गा, पेम्बै या पेन्नार नदी) और उत्पलावती—ये कल्याणमयी नदियाँ मलयाचलसे निकली हुई हैं। इनका जल बहुत शीतल होता है। त्रिषामा, ऋषिकुल्या, इक्षुला, त्रिदिवा, अचला, लाङ्गूलिनी और वंशधरा—ये सभी नदियाँ महेन्द्रपर्वतसे निकली हुई मानी जाती हैं। ऋषीका, सुकुमारी, मन्दगा, मन्दवाहिनी, कृपा और पलाशिनी—इन नदियोंका उद्गम शुक्तिमान् पर्वतसे हुआ है। |
* यह नदी-वर्णन ठीक इसी प्रकार ब्रह्मपु० १९। १०–२४, ब्रह्माण्ड० १। १६। २४–३९ तथा वायु० ४५। ६३–७८ में भी है।