मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| न खल्वन्यत्र मर्त्यानां भूमौ कर्मविधिः स्मृतः।<br>भारतस्यास्य वर्षस्य नव भेदान् निबोधत ॥ ७<br>इन्द्रद्वीपः कशेरुश्च ताम्रपर्णी गभस्तिमान्।<br>नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः ॥ ८<br>अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः।<br>योजनानां सहस्रं तु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरः ॥ ९<br>आयतस्तु कुमारीतो गङ्गायाः प्रवाहवधिः।<br>तिर्यगूर्ध्वं तु विस्तीर्णः सहस्राणि दशैव तु ॥ १०<br>द्वीपो ह्युपनिविष्टोऽयं म्लेच्छैरन्तेषु सर्वशः।<br>यवनाश्च किराताश्च तस्यान्ते पूर्वपश्चिमे ॥ ११<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च भागशः।<br>इज्ज्यायुधवणिज्याभिर्वर्तयन्तो व्यवस्थिताः ॥ १२<br>तेषां संव्यवहारोऽयं वर्तते तु परस्परम्।<br>धर्मार्थकामसंयुक्तो वर्णानां तु स्वकर्मसु ॥ १३<br>सकल्पपञ्चमानां तु आश्रमाणां यथाविधि।<br>इह स्वर्गापवर्गार्थं प्रवृत्तिरिह मानुषे ॥ १४ | इस भूतलपर भारतवर्षके अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी प्राणियोंके लिये कर्मका विधान नहीं सुना जाता। इस भारतवर्षके नौ भेद हैं, उनके नाम सुनिये—इन्द्रद्वीप, कशेरुमान्, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्यद्वीप, गान्धर्वद्वीप और वारुणद्वीप—ये आठ तथा उनमें नवाँ यह समुद्रसे घिरा हुआ भारतद्वीप^१ (या खण्ड) है। यह द्वीप दक्षिणसे उत्तरतक एक हजार योजनमें फैला हुआ है। इसका विस्तार गङ्गाके उद्गमस्थानसे लेकर कन्याकुमारी अथवा कुमारी अन्तरीपतक है। यह तिरछेरूपमें ऊपर-ही-ऊपर दस हजार योजन विस्तृत है। इस द्वीपके चारों ओर सीमावर्ती प्रदेशोंमें म्लेच्छ जातियोंकी बस्तियाँ हैं। इसकी पूर्व एवं पश्चिम दिशामें क्रमशः किरात और यवन निवास करते हैं। इसके मध्यभागमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र विभागपूर्वक यज्ञ, शस्त्र-ग्रहण और व्यवसाय आदिके द्वारा जीवन-यापन करते हुए निवास करते हैं। उन चारों वर्णोंका पारस्परिक व्यवहार धर्म, अर्थ और कामसे संयुक्त होता है और वे अपने-अपने कर्मोंमें ही लगे रहते हैं। यहाँ कल्पसहित पाँचों वर्णों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, योगी और संन्यासी) तथा आश्रमोंका विधिपूर्वक पालन होता है। इस द्वीपके मनुष्योंकी कर्म-प्रवृत्ति स्वर्ग और मोक्षके लिये होती है॥ ५—१४॥ | | यस्त्वयं मानवो द्वीपस्तिर्यग्यामः प्रकीर्तितः।<br>य एनं जयते कृत्स्नं स सम्राडिति कीर्तितः ॥ १५ | इस मानव द्वीपको जो त्रिकोणाकार फैला हुआ है, जो सम्पूर्ण रूपमें जीत लेता है वह सम्राट् कहलाता है। | | अयं लोकस्तु वै सम्राडन्तरिक्षजितां स्मृतः।<br>स्वराडसौ स्मृतो लोकः पुनर्वक्ष्यामि विस्तरात् ॥ १६ | अन्तरिक्षपर विजय पानेवालोंके लिये यह लोक सम्राट् कहा गया है और यही लोक स्वराट्के नामसे भी प्रसिद्ध है। अब मैं इसका पुनः विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ। | | सप्त चास्मिन् महावर्षे विश्रुताः कुलपर्वताः।<br>महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षवानपि ॥ १७<br>विन्ध्यश्च पारियात्रश्च इत्येते कुलपर्वताः।<br>तेषां सहस्रशश्चान्ये पर्वतास्तु समीपतः ॥ १८ | इस महान् भारतवर्षमें सात विश्वविख्यात कुलपर्वत हैं। महेन्द्र^२, मलय, सह्य, शुक्तिमान्^३, ऋक्षवान्^४, विन्ध्य और पारियात्र^५—ये कुलपर्वत हैं। इनके समीप अन्य हजारों पर्वत हैं। |
१. इस प्रकार आजका दीखनेवाला सारा भूमण्डल बृहत्तर भारतके ही अन्तर्गत सिद्ध होता है। इसीलिये हेमाद्रि संकल्पमें 'भारतवर्षे भरतखण्डे' पढ़ा जाता है।
२. उड़ीसाके दक्षिणपूर्वी भागका पर्वत।
३. यह शक्ति पर्वत है, जो रायगढ़से लेकर मानभूम जिलेकी डालमा पहाड़ीतक फैला है।
४. यह विन्ध्य-पर्वतमालाका पूर्वी भाग है।
५. यह विन्ध्यपर्वतमालाका पश्चिमी भाग है।