भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ११४ *३८७

| अथापरे जनपदा दक्षिणापथवासिनः।<br>पाण्ड्याश्च केरलाश्चैव चोलाः कुल्यास्तथैव च ॥ ४७<br>सेतुका मूषिकाश्चैव कुपथा वाजिवासिकाः।<br>महाराष्ट्रा माहिषकाः कलिङ्गाश्चैव सर्वशः ॥ ४८<br>आभीराश्च सहैषीका आटव्याः शबरास्तथा।<br>पुलिन्दा विन्ध्यमुलिका वैदर्भा दण्डकैः सह ॥ ४९<br>कुलीयाश्च सिरालाश्च अश्मका भोगवर्धनाः।<br>तथा तैत्तिरिकाश्चैव दक्षिणापथवासिनः ॥ ५०<br>नासिक्याश्चैव ये चान्ये ये चैवान्तरनर्मदाः।<br>भारुकच्छाः समाहेयाः सह सारस्वतैस्तथा ॥ ५१<br>काच्छीकाश्चैव सौराष्ट्रा आनर्ता अर्बुदैः सह।<br>इत्येते अपरान्तास्तु शृणु ये विन्ध्यवासिनः ॥ ५२<br>मालवाश्च करूषाश्च मेकलाश्चोत्कलैः सह।<br>औण्ड्रा माषा दशार्णाश्च भोजाः किष्किन्धकैः सह ॥ ५३<br>तोशलाः कोसलाश्चैव त्रैपुरा वैदिशास्तथा।<br>तुमुरास्तुम्बराश्चैव पद्‌मा नैषधैः सह ॥ ५४<br>अरूपाः शौण्डिकेराश्च वीतिहोत्रा अवन्तयः।<br>एते जनपदाः ख्याता विन्ध्यपृष्ठनिवासिनः ॥ ५५<br>अतो देशान् प्रवक्ष्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये।<br>निराहाराः सर्वगाश्च कुपथा अपथास्तथा ॥ ५६<br>कुथप्रावरणाश्चैव ऊर्णादर्वाः समुद्रकाः।<br>त्रिगर्ता मण्डलाश्चैव किराताश्चामरैः सह ॥ ५७<br>चत्वारि भारते वर्षे युगानि मुनयोऽब्रुवन्।<br>कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम्।<br>तेषां निसर्गं वक्ष्यामि उपरिष्टाच्च कृत्स्नशः ॥ ५८ | इनके बाद अब दक्षिणापथके देश बतलाये जा रहे हैं। पाण्ड्य, केरल, चोल, कुल्य, सेतुक, मूषिक, कुपथ, वाजिवासिक, महाराष्ट्र, माहिषक, कलिंग (उड़ीसाका दक्षिणी भाग), आभीर, सहैषीक, आटव्य, शबर, पुलिन्द, विन्ध्यमुलिक, वैदर्भ (विदर्भ), दण्डक, कुलीय, सिराल, अश्मक (महाराष्ट्रका दक्षिण भाग), भोगवर्धन (उड़ीसाका दक्षिणभाग), तैत्तिरिक, नासिक्य तथा नर्मदाके अन्तःप्रान्तमें स्थित अन्य प्रदेश—ये दक्षिणापथके अन्तर्गतके देश हैं। भारुकच्छ, माहेय, सारस्वत, काच्छीक, सौराष्ट्र, आनर्त और अर्बुद—ये सभी अपरान्त प्रदेश हैं। अब जो विन्ध्यवासियोंके प्रदेश हैं, उन्हें सुनिये। मालव, करुष, मेकल, उत्कल, औण्ड्र (उड़ीसा), माष, दशार्ण, भोज, किष्किन्धक, तोशल, कोसल (दक्षिणकोसल), त्रैपुर, वैदिश (भेलसाराज्य), तुमुर, तुम्बर, पद्म, नैषध, अरूप, शौण्डिकेर, वीतिहोत्र तथा अवन्ति—ये सभी प्रदेश विन्ध्यपर्वतकी घाटियोंमें स्थित बतलाये जाते हैं। इसके बाद अब मैं उन देशोंका वर्णन कर रहा हूँ जो पर्वतपर स्थित हैं। उनके नाम हैं—निराहार, सर्वग, कुपथ, अपथ, कुथप्रावरण, ऊर्णादर्भ, समुद्रक, त्रिगर्त, मण्डल, किरात और चामर। मुनियोंका कथन है कि इस भारतवर्षमें सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चार युगोंकी व्यवस्था है। अब मैं उनके वृत्तान्तका पूर्णतया वर्णन कर रहा हूँ॥ ४७–५८॥ | | मत्स्य उवाच<br>एतच्छ्रुत्वा तु ऋषय उत्तरं पुनरेव ते।<br>शुश्रूषवस्तमूचुस्ते प्रकामं लोमहर्षणिम् ॥ ५९ | मत्स्यभगवान्‌ने कहा— राजर्षे! सूतजीद्वारा कहे हुए इस प्रकरणको सुनकर मुनियोंको और भी आगे सुननेकी उत्कट इच्छा उत्पन्न हो गयी, तब वे पुनः लोमहर्षण-पुत्र सूतजीसे बोले॥ ५९॥ | | ऋषय ऊचुः<br>यच्च किम्पुरुषं वर्षं हरिवर्षं तथैव च।<br>आचक्ष्व नो यथातत्त्वं कीर्तितं भारतं त्वया ॥ ६०<br>जम्बूखण्डस्य विस्तारं तथान्येषां विदांवर।<br>द्वीपानां वासिनां तेषां वृक्षाणां प्रब्रवीहि नः ॥ ६१ | ऋषियोंने पूछा— वेत्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी! आपने भारतवर्षका तो वर्णन कर दिया। अब हमें किम्पुरुषवर्ष तथा हरिवर्षके विषयमें बतलाइये। साथ ही जम्बूखण्डके विस्तारका तथा अन्य द्वीपोंके निवासियोंका एवं वहाँ उद्गत होनेवाले वृक्षोंका भी वर्णन हमें सुनाइये। |