भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३१२* मत्स्यपुराण *

| तपस्विशरणोपेतां महाब्राह्मणसेविताम्।<br>ददर्श तपनीयाभां महाराजः पुरूरवाः॥ ३<br>सितहंसावलिच्छन्नां काशचामरराजिताम्।<br>साभिषिक्तामिव सतां पश्यन् प्रीतिं परां ययौ॥ ४<br>पुण्यां सुशीतलां हृद्यां मनसः प्रीतिवर्धिनीम्।<br>क्षयवृद्धियुतां रम्यां सोममूर्तिमिवापराम्॥ ५<br>सुशीतशीघ्रपानीयां द्विजसंघनिषेविताम्।<br>सुतां हिमवतः श्रेष्ठां चञ्चद्वीचिविराजिताम्॥ ६<br>अमृतस्वादुसलिलां तापसैरुपशोभिताम्।<br>स्वर्गारोहणनिःश्रेणीं सर्वकल्मषनाशिनीम्॥ ७<br>अग्र्यां समुद्रमहिषीं महर्षिगणसेविताम्।<br>सर्वलोकस्य चौत्सुक्यकारिणीं सुमनोहराम्॥ ८<br>हितां सर्वस्य लोकस्य नाकमार्गप्रदायिकाम्।<br>गोकुलाकुलतीरान्तां रम्यां शैवालवर्जिताम्॥ ९<br>हंससारससंघुष्टां जलजैरुपशोभिताम्।<br>आवर्तनाभिगम्भीरां द्वीपोरुजघनस्थलीम्॥ १०<br>नीलनीरजनेत्राभामुत्फुल्लकमलाननाम् ।<br>हिमाभफेनवसनां चक्रवाकाधरां शुभाम्।<br>बलाकापङ्क्तिदशनां चलन्मत्स्यावलिभ्रुवम्॥ ११<br>स्वजलोद्भूतमत्ताङ्गरम्यकुम्भपयोधराम् ।<br>हंसनूपुरसंघुष्टां मृणालवलयावलीम्॥ १२ | इन्द्र-धनुषके समान चमक रही थी। उसके तटपर तपस्वियोंके आश्रम बने हुए थे। वह श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा सुसेवित तथा तपाये हुए सुवर्णके समान चमक रही थी। ऐसी नदीको उस दिन महाराज पुरूरवाने देखा। वह श्वेत वर्णवाले हंसोंकी पङ्क्तियोंसे आच्छन्न, काश-पुष्परूपी चँवरसे सुशोभित और सत्पुरुषोंद्वारा नहलायी गयी-सी दीख रही थी। उसे देखकर राजाको परम प्रसन्नता प्राप्त हुई। वह पुण्यमयी नदी शीतल जलसे परिपूर्ण, मनोहारिणी, मनकी प्रसन्नता बढ़ानेवाली, ह्रास और वृद्धिसे संयुक्त, रमणीय, दूसरी चन्द्र-मूर्तिके समान उज्ज्वल, अत्यन्त शीतल और वेगसे बहनेवाले जलसे संयुक्त, ब्राह्मणों तथा पक्षिसमूहोंद्वारा सुसेवित, हिमालयकी श्रेष्ठ पुत्रीभूत, लोल लहरोंसे सुशोभित, अमृतके समान सुस्वादु जलसे परिपूर्ण, तपस्वियोंद्वारा सुशोभित, स्वर्गपर चढ़नेके लिये सोपान-सदृश, समस्त पापोंकी विनाशिनी, सर्वश्रेष्ठ, समुद्रकी पटरानी, महर्षिगणोंद्वारा सेवित, सभी लोगोंके मनमें उत्सुकता प्रकट करनेवाली, परम मनोहर, सभी लोगोंकी हितकारिणी, स्वर्गका मार्ग प्रदान करनेवाली, गोसमूहोंसे व्याप्त तट-प्रान्तवाली, परम सुन्दर, सेवाररहित, हंस तथा सारस पक्षियोंके शब्दसे गूँजित, कमलोंसे सुशोभित, भँवररूपी गहरी नाभिसे युक्त, द्वीपरूपी ऊरु एवं जघन-भागवाली, नीले कमलरूपी नेत्रकी शोभासे युक्त, खिले हुए कमल-पुष्परूपी मुखवाली, हिम (बर्फ)-तुल्य उज्ज्वल फेनरूपी वस्त्रसे युक्त, चक्रवाकरूपी होंठोंवाली, कल्याणमयी, बगुलोंकी पङ्क्तिरूपी दाँतोंसे युक्त, चञ्चल मछलियोंकी कतारकी-सी भौंहोंवाली, अपने जलके घुमावसे बने हुए हाथीके रमणीय गण्डस्थलरूपी स्तनोंसे युक्त, हंसरूपी नूपुरके झंकारसे संयुक्त तथा कमलनालरूपी कंकणोंसे सुशोभित थी॥ १-१२॥ | | तस्यां रूपमदोन्मत्ता गन्धर्वानुगताः सदा।<br>मध्याह्नसमये राजन् क्रीडन्त्यप्सरसां गणाः॥ १३<br>तामप्सरोविनिर्मुक्तं वहन्तीं कुङ्कुमं शुभम्।<br>स्वतीरद्रुमसम्भूतनानावर्णसुगन्धिनीम् ॥ १४<br>तरङ्गव्रातसंक्रान्तसूर्यमण्डलदुर्द्दशम् ।<br>सुरेभजनिताघातविकूलद्वयभूषिताम् ॥ १५<br>शक्रेभगण्डसलिलैर्देवस्त्रीकुचचन्दनैः ।<br>संयुक्तं सलिलं तस्याः षट्पदैरुपसेव्यते॥ १६ | राजन्! उस नदीमें दोपहरके समय अपनी सुन्दरताके मदसे उन्मत्त हुई यूथ-की-यूथ अप्सराएँ गन्धर्वोंके साथ सदा क्रीडा करती थीं। उन अप्सराओंके शरीरसे गिरे हुए सुन्दर कुङ्कुमको बहानेवाली वह नदी अपने तटपर उगे हुए वृक्षोंसे गिरे हुए पुष्पोंके कारण रंग-बिरंगवाली तथा सुगन्धसे व्याप्त थी, उसके तरंगसमूहसे आच्छादित होनेके कारण सूर्यमण्डलका दीखना कठिन हो गया था। वह ऐरावतद्वारा किये गये आघातसे चिह्नित तटोंसे विभूषित थी। उसका जल ऐरावतके गण्डस्थलसे बहते हुए मद-जल तथा देवाङ्गनाओंके स्तनोंपर लगे हुए |