मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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| * अध्याय ११८ * | ३१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पीतयूथिकया चैव श्वेतयूथिकया तथा।<br>जात्या चम्पकजात्या च तुम्बरैश्चाप्यतुम्बरैः॥ १४<br>मोचैर्लोचैस्तु लकुचैस्तिलपुष्पकुशेशयैः।<br>तथा सुपुष्पावरणैश्चव्यकैः कामिवल्लभैः॥ १५<br>पुष्पाङ्कुरैश्च बकुलैः पारिभद्रहरिद्रकैः।<br>धाराकदम्बैः कुटजैः कदम्बैर्गिरिकूटजैः॥ १६<br>आदित्यमुस्तकैः कुम्भैः कुङ्कुमैः कामवल्लभैः।<br>कटुफलैर्बदरैर्नीपैर्दीपरिव महोज्ज्वलैः॥ १७<br>रक्तैः पालीवनैः श्वेतैर्दाडिमैश्चम्पकद्रुमैः।<br>बन्धूकैश्च सुबन्धूकैः कुञ्जकानां तु जातिभिः॥ १८<br>कुसुमैः पाटलाभिश्च मल्लिकाकारवीरकैः।<br>कुरबकैर्हिमवरैर्जम्बूभिर्नृपजम्बुभिः ॥ १९<br>बीजपूरैः सकर्पूरैर्गुरुभिश्चागुरुद्रुमैः।<br>बिम्बैश्च प्रतिबिम्बैश्च संतानकवितानकैः॥ २० | पीली जूही, सफेद जूही, मालती, चम्पाके समूह, तुम्बर (एक प्रकारकी धनिया), अतुम्बर, मोच (केला या सेमल), लोच (गोरखमुण्डी), लकुच (बड़हर), तिल तथा कमलके फूल, कामियोंको प्रिय लगनेवाले पुष्पाङ्कुरों (कुद्मलों) तथा प्रफुल्ल पुष्पोंसे युक्त चव्य (चाब नामक वृक्ष), वकुल (मौलसिरी), पारिभद्र (फरहद), हरिद्रक, धाराकदम्ब (कदम्बका एक भेद), कुटज (कुरैया), पर्वतशिखरोंपर उगनेवाले कदम्ब, आदित्यमुस्तक (मदार), कुम्भ (गुग्गुलका वृक्ष), कामदेवका प्रिय कुङ्कुम (केसर), कटुफल (कायफर), बेर, दीपककी भाँति अत्यन्त चमकीले कदम्ब, लाल रंगके पाली (पालीवत)-के वन, श्वेत अनार, चम्पाके वृक्ष, बन्धूक (दुपहरिया), सबन्धूक (तिलका पौधा), कुञ्जोंके समूह, लाल गुलाबके कुसुम, मल्लिका, करवीरक (कनेर), कुरबक (लाल कटसरैया), हिमवर, जम्बू (छोटी जामुन या कठजामुन), नृपजम्बू (बड़ी जामुन), बिजौरा, कपूर, गुरु, अगुरु, बिम्ब (एक फल), प्रतिबिम्ब और संतानक वृक्ष (कल्पवृक्ष) वितानकी तरह फैले हुए थे॥ ११—२०॥ |
| तथा गुग्गुलवृक्षैश्च हिन्तालधवलेक्षुभिः।<br>तृणशून्यैः करवीरैरशोकैश्चक्रमर्दनैः॥ २१<br>पीलुभिर्धातकीभिश्च चिरिबिल्वैः समाकुलैः।<br>तिन्तिडीकैस्तथा लोध्रैर्विडङ्गैः क्षीरिकाद्रुमैः॥ २२<br>अश्मन्तकैस्तथा कालैर्जम्बीरैः श्वेतकद्रुमैः।<br>भल्लातकैरिन्द्रयवैर्वल्गुजैः सिन्दुवारकैः॥ २३<br>करमर्दैः कासमर्दरविष्टकवरिष्टकैः।<br>रुद्राक्षैर्द्राक्षसम्भूतैः सप्ताहैः पुत्रजीवकैः॥ २४<br>कङ्कोलकैर्लवङ्गैश्च त्वग्द्रुमैः पारिजातकैः।<br>प्रतानैः पिप्पलीनां च नागवल्ल्यश्च भागशः॥ २५<br>मरीचस्य तथा गुल्मैर्नवमल्लिकया तथा।<br>मृद्वीकामण्डपैर्मुख्यैरतिमुक्तकमण्डपैः ॥ २६<br>त्रपुषैर्नीर्तिकानां च प्रतानैः सफलैः शुभैः।<br>कूष्माण्डानां प्रतापैश्च अलाबूनां तथा क्वचित्॥ २७<br>चिर्भिटस्य प्रतानैश्च पटोलीकारवेल्लकैः।<br>कर्कोटकीवितानैश्च वर्ताकैर्बृहतीफलैः॥ २८ | गुग्गुलवृक्ष, हिंताल, श्वेत ईंख, केतकी, कनेर, अशोक, चक्रमर्दन (चकवड़), पीलु, धातकी (धव), घने चिलबिल, तिन्तिडीक (इमली), लोध्र, विडंग, क्षीरिकाद्रुम (खिरनी), अश्मन्तक (लहसोड़ा), काल (रक्तचित्र नामका एक वृक्ष), जम्बीर, श्वेतक (वरुण या वरना नामक एक वृक्षविशेष), भल्लातक (भिलावा), इन्द्रयव, वल्गुज (सोमराजी नामसे प्रसिद्ध), सिन्दुवार, करमर्द (करौंदा), कासमर्द (कसौंदी), अविष्टक (मिर्च), वरिष्ठक (हुरहुर), रुद्राक्षके वृक्ष, अंगूरकी लता, सप्तपर्ण, पुत्रजीवक (पतजुग), कंकोलक (शीतलचीनी), लौंग, त्वग्द्रुम (दालचीनी) और पारिजातके वृक्ष लहलहा रहे थे। कहीं पिप्पली (पीपर) तथा कहीं नागवल्लीकी लताएँ फैली हुई थीं। कहीं काली मिर्च और नवमल्लिकाकी लताओंके कुञ्ज बने हुए थे। कहीं अंगूर और माधवीकी लताओंके मण्डप शोभा पा रहे थे। कहीं फलोंसे लदी हुई नीले रंगके फूलोंवाली लताएँ, कहीं कुम्हड़े तथा कद्दूकी लताएँ और कहीं घुँघुची, परवल, कैरेला एवं कर्कोटकी (पीतघोषा)-की लताएँ शोभा दे रही थीं। कहीं बैगन और भटकटैयाके |