भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 408

३१८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
कण्टकैर्मूलकैर्मूलशाकैस्तु विविधैस्तथा।<br>कह्लारैश्च विदार्या च रूरूटैः स्वादुकण्टकैः॥ २९<br><br>सभाण्डीरविदूसारराजजम्बूकवालुकैः ।<br>सुवर्चलाभिः सर्वाभिः सर्षपाभिस्तथैव च॥ ३०<br><br>काकोलीक्षीरकाकोली छत्रया चातिच्छत्रया।<br>कासमर्दीसहासद्भिः सकन्दलसकाण्डकैः॥ ३१<br><br>तथा क्षीरकशाकेन कालशाकेन चाप्यथ।<br>शिम्बीधान्यैस्तथा धान्यैः सर्वैर्निरवशेषतः॥ ३२फल, मूली, जड़वाले शाक तथा अनेकों प्रकारके काँटेदार वृक्ष शोभा पा रहे थे। कहीं श्वेत कमल, कंदविदारी, रूरूट (एक फलदार वृक्ष), स्वादुकण्टक, (सफेद पिडालू), भाण्डीर (एक प्रकारका वट), बिदूसार (बिदारकन्द), राजजम्बूक (बड़ी जामुन), वालुक (एक प्रकारका आँवला), सुवर्चला (सूर्यमुखी) तथा सभी प्रकारके सरसोंके पौधे भी विद्यमान थे। काकोली (कंकोल), क्षीरकाकोली (कंकोलका एक भेद), छत्रा (छत्ता), अतिच्छत्रा (तालमखाना), कासमर्दी (अडूसा), कन्दल (केलेका एक भेद), काण्डक (करैला), क्षीरशाक (दूधी), कालशाक (करेमू) नामक शाकों, सेमकी लताओं तथा सभी प्रकारके अन्नोंके पौधोंसे वह सारा प्रदेश सुशोभित हो रहा था॥ २९—३२॥
औषधीभिर्विचित्राभिर्दीप्यमानाभिरेव च।<br>आयुष्याभिर्यशस्याभिर्बल्याभिश्च नराधिप॥ ३३<br><br>जरामृत्युभयघ्नीभिः क्षुद्भयघ्नीभिरेव च।<br>सौभाग्यजननीभिश्च कृत्स्नाभिश्चाप्यनेकशः॥ ३४<br><br>तत्र वेणुलताभिश्च तथा कीचकवेणुभिः।<br>काशैः शशाङ्ककाशैश्च शरगुल्मैस्तथैव च॥ ३५<br><br>कुशगुल्मैस्तथा रम्यैर्गुल्मैश्चैक्षोर्मनोरमैः।<br>कार्पासजातिवर्गेण दुर्लभेन शुभेन च॥ ३६<br><br>तथा च कदलीखण्डैर्मनोहारिभिरुत्तमैः।<br>तथा मरकतप्रख्यैः प्रदेशैः शाद्वलान्वितैः॥ ३७<br><br>इरापुष्पसमायुक्तैः कुङ्कुमस्य च भागशः।<br>तगरातिविषामांसीग्रन्थिकैस्तु सुरागदैः॥ ३८<br><br>सुवर्णपुष्पैश्च तथा भूमिपुष्पैस्तथापरैः।<br>जम्बीरकैर्भूस्तृणकैः सरसैः सशुकैस्तथा॥ ३९<br><br>शृङ्गवेराजमोदाभिः कुबेरकप्रियालकैः।<br>जलजैश्च तथावर्णैर्नानावर्णैः सुगन्धिभिः॥ ४०<br><br>उदयादित्यसङ्काशैः सूर्यचन्द्रनिभैस्तथा।<br>तपनीयसवर्णैश्च अतसीपुष्पसन्निभैः॥ ४१<br><br>शुकपत्रनिभैश्चान्यैः स्थलपत्रैश्च भागशः।<br>पञ्चवर्णैः समाकीर्णैर्बहुवर्णैस्तथैव च॥ ४२नरेश्वर! वहाँ आयु, यश और बल प्रदान करनेवाली, वृद्धावस्था और मृत्युके भयको दूर करनेवाली, भूख-प्यासके कष्टकी विनाशिका एवं सौभाग्यप्रदायिनी सारी ओषधियाँ चित्र-विचित्ररूपमें देदीप्यमान हो रही थीं। वहाँ बाँसकी लताएँ फैली थीं तथा पोले बाँस हवाके संघर्षसे शब्द कर रहे थे। चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कास-पुष्पों, सरपत, कुश और ईंखके परम मनोहर रमणीय झाड़ियों तथा मनोरम एवं दुर्लभ कपास और मालतीके वृक्षों अथवा लताओंसे वह वन्य प्रदेश सुशोभित हो रहा था। वहाँ मनको चुरा लेनेवाले उत्तम जातिके केलेके वृक्ष भी लहलहा रहे थे। कोई-कोई प्रदेश मरकतमणिके तुल्य हरी-हरी घासोंसे हरे-भरे थे। कहीं कुङ्कुम और इरा (एक प्रकारकी नशीली मीठी लता)-के पुष्प बिखरे हुए थे। कहीं तगर, अतिविषा (अतीस नामकी जहरीली ओषधि), जटामासी और गुग्गुलकी भीनी सुगन्ध फैल रही थी। कहीं कनेरके पुष्पों, भूमिपर फैली हुई लताओंके फूलों, जम्बीर-वृक्षों और घासोंसे भूमि सुहावनी लग रही थी, जिसपर तोते विचर रहे थे। कहीं शृङ्गबेर (अदरख), अजमोदा, कुबेरक (तुनि) और प्रियालक (छोटी पियार)-के वृक्ष शोभा पा रहे थे तो कहीं अनेकों रंगोंके सुगन्धित कमलोंके पुष्प खिले हुए थे। उनमें कुछ पुष्प उगते हुए सूर्यके समान लाल, कुछ सूर्य-सरीखे चमकीले एवं चन्द्रमाके-से उज्ज्वल थे, कुछ सुवर्ण-सदृश पीतोज्ज्वल, कुछ अलसीके पुष्पके समान नीले तथा कुछ तोतेके पंखके सदृश हरे थे। इस प्रकार वहाँकी भूमि इन पाँचों रंगोंवाले तथा अन्यान्य रंग-बिरंगे स्थलपुष्पोंसे आच्छादित थी।
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