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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

३१८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
कण्टकैर्मूलकैर्मूलशाकैस्तु विविधैस्तथा।<br>कह्लारैश्च विदार्या च रूरूटैः स्वादुकण्टकैः॥ २९<br><br>सभाण्डीरविदूसारराजजम्बूकवालुकैः ।<br>सुवर्चलाभिः सर्वाभिः सर्षपाभिस्तथैव च॥ ३०<br><br>काकोलीक्षीरकाकोली छत्रया चातिच्छत्रया।<br>कासमर्दीसहासद्भिः सकन्दलसकाण्डकैः॥ ३१<br><br>तथा क्षीरकशाकेन कालशाकेन चाप्यथ।<br>शिम्बीधान्यैस्तथा धान्यैः सर्वैर्निरवशेषतः॥ ३२फल, मूली, जड़वाले शाक तथा अनेकों प्रकारके काँटेदार वृक्ष शोभा पा रहे थे। कहीं श्वेत कमल, कंदविदारी, रूरूट (एक फलदार वृक्ष), स्वादुकण्टक, (सफेद पिडालू), भाण्डीर (एक प्रकारका वट), बिदूसार (बिदारकन्द), राजजम्बूक (बड़ी जामुन), वालुक (एक प्रकारका आँवला), सुवर्चला (सूर्यमुखी) तथा सभी प्रकारके सरसोंके पौधे भी विद्यमान थे। काकोली (कंकोल), क्षीरकाकोली (कंकोलका एक भेद), छत्रा (छत्ता), अतिच्छत्रा (तालमखाना), कासमर्दी (अडूसा), कन्दल (केलेका एक भेद), काण्डक (करैला), क्षीरशाक (दूधी), कालशाक (करेमू) नामक शाकों, सेमकी लताओं तथा सभी प्रकारके अन्नोंके पौधोंसे वह सारा प्रदेश सुशोभित हो रहा था॥ २९—३२॥
औषधीभिर्विचित्राभिर्दीप्यमानाभिरेव च।<br>आयुष्याभिर्यशस्याभिर्बल्याभिश्च नराधिप॥ ३३<br><br>जरामृत्युभयघ्नीभिः क्षुद्भयघ्नीभिरेव च।<br>सौभाग्यजननीभिश्च कृत्स्नाभिश्चाप्यनेकशः॥ ३४<br><br>तत्र वेणुलताभिश्च तथा कीचकवेणुभिः।<br>काशैः शशाङ्ककाशैश्च शरगुल्मैस्तथैव च॥ ३५<br><br>कुशगुल्मैस्तथा रम्यैर्गुल्मैश्चैक्षोर्मनोरमैः।<br>कार्पासजातिवर्गेण दुर्लभेन शुभेन च॥ ३६<br><br>तथा च कदलीखण्डैर्मनोहारिभिरुत्तमैः।<br>तथा मरकतप्रख्यैः प्रदेशैः शाद्वलान्वितैः॥ ३७<br><br>इरापुष्पसमायुक्तैः कुङ्कुमस्य च भागशः।<br>तगरातिविषामांसीग्रन्थिकैस्तु सुरागदैः॥ ३८<br><br>सुवर्णपुष्पैश्च तथा भूमिपुष्पैस्तथापरैः।<br>जम्बीरकैर्भूस्तृणकैः सरसैः सशुकैस्तथा॥ ३९<br><br>शृङ्गवेराजमोदाभिः कुबेरकप्रियालकैः।<br>जलजैश्च तथावर्णैर्नानावर्णैः सुगन्धिभिः॥ ४०<br><br>उदयादित्यसङ्काशैः सूर्यचन्द्रनिभैस्तथा।<br>तपनीयसवर्णैश्च अतसीपुष्पसन्निभैः॥ ४१<br><br>शुकपत्रनिभैश्चान्यैः स्थलपत्रैश्च भागशः।<br>पञ्चवर्णैः समाकीर्णैर्बहुवर्णैस्तथैव च॥ ४२नरेश्वर! वहाँ आयु, यश और बल प्रदान करनेवाली, वृद्धावस्था और मृत्युके भयको दूर करनेवाली, भूख-प्यासके कष्टकी विनाशिका एवं सौभाग्यप्रदायिनी सारी ओषधियाँ चित्र-विचित्ररूपमें देदीप्यमान हो रही थीं। वहाँ बाँसकी लताएँ फैली थीं तथा पोले बाँस हवाके संघर्षसे शब्द कर रहे थे। चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कास-पुष्पों, सरपत, कुश और ईंखके परम मनोहर रमणीय झाड़ियों तथा मनोरम एवं दुर्लभ कपास और मालतीके वृक्षों अथवा लताओंसे वह वन्य प्रदेश सुशोभित हो रहा था। वहाँ मनको चुरा लेनेवाले उत्तम जातिके केलेके वृक्ष भी लहलहा रहे थे। कोई-कोई प्रदेश मरकतमणिके तुल्य हरी-हरी घासोंसे हरे-भरे थे। कहीं कुङ्कुम और इरा (एक प्रकारकी नशीली मीठी लता)-के पुष्प बिखरे हुए थे। कहीं तगर, अतिविषा (अतीस नामकी जहरीली ओषधि), जटामासी और गुग्गुलकी भीनी सुगन्ध फैल रही थी। कहीं कनेरके पुष्पों, भूमिपर फैली हुई लताओंके फूलों, जम्बीर-वृक्षों और घासोंसे भूमि सुहावनी लग रही थी, जिसपर तोते विचर रहे थे। कहीं शृङ्गबेर (अदरख), अजमोदा, कुबेरक (तुनि) और प्रियालक (छोटी पियार)-के वृक्ष शोभा पा रहे थे तो कहीं अनेकों रंगोंके सुगन्धित कमलोंके पुष्प खिले हुए थे। उनमें कुछ पुष्प उगते हुए सूर्यके समान लाल, कुछ सूर्य-सरीखे चमकीले एवं चन्द्रमाके-से उज्ज्वल थे, कुछ सुवर्ण-सदृश पीतोज्ज्वल, कुछ अलसीके पुष्पके समान नीले तथा कुछ तोतेके पंखके सदृश हरे थे। इस प्रकार वहाँकी भूमि इन पाँचों रंगोंवाले तथा अन्यान्य रंग-बिरंगे स्थलपुष्पोंसे आच्छादित थी।
* अध्याय ११८ *३९९
द्रष्टुर्दृष्ट्या हितमुदैः कुमुदैश्चन्द्रसन्निभैः।<br>तथा वह्निशिखाकारैर्गजवक्त्रोत्पलैः शुभैः॥ ४३<br><br>नीलोत्पलैः सकह्लारैर्गुञ्जातककसेरुकैः।<br>शृङ्गाटकमृणालैश्च करटै राजतोत्पलैः॥ ४४<br><br>जलजैः स्थलजैर्मूलैः फलैः पुष्पैर्विशेषतः।<br>विविधैश्चैव नीवारैर्मुनिभोज्यैर्नराधिप॥ ४५वह वनस्थली देखनेवालेकी दृष्टिको आनन्ददायक एवं चन्द्रमा-सरीखे उज्ज्वल कुमुद-पुष्पों तथा अग्निकी शिखाके सदृश एवं हाथीके मुखमें संलग्न उज्ज्वल उत्पल, नीले उत्पल, कह्लार, गुंजातक (घुँघुची), कसेरुक (कसेरा), शृङ्गाटक (सिंघाड़ा), कमलनाल, करट (कुसुम्भ) तथा चाँदीके समान उज्ज्वल उत्पलोंसे सुशोभित थी। इस प्रकार वह प्रदेश जल-कमल एवं स्थलकमल तथा मूल, फल और पुष्पोंसे विशेष शोभायमान था। नरेश्वर! वहाँ मुनियोंके खानेयोग्य अनेकों प्रकारके नीवार (तिन्नी) भी उगे हुए थे॥ ३३—४५॥
न तद्धान्यं न तत्सस्यं न तच्छाकं न तत् फलम्।<br>न तन्मूलं न तत् कन्दं न तत् पुष्पं नराधिप॥ ४६<br><br>नागलोकोद्भवं दिव्यं नरलोकभवं च यत्।<br>अनूपोत्थं वनोत्थं च तत्र यन्नास्ति पार्थिवः॥ ४७<br><br>सदा पुष्पफलं सर्वमजर्यमृतुयोगतः।<br>मद्रेश्वरः स ददृशे तपसा ह्यतियोगतः॥ ४८<br><br>ददृशे च तथा तत्र नानारूपान् पतत्रिणः।<br>मयूराञ् शतपत्रांश्च कलविङ्कांश्च कोकिलान्॥ ४९<br><br>तदा कादम्बकान् हंसान् कोयष्टीन् खञ्जरीटकान्।<br>कुररान् कालकूटांश्च खट्वाङ्गाँल्लुब्धकांस्तथा॥ ५०<br><br>गोश्वेदकांस्तथा कुम्भान्धार्तराष्ट्राञ्छुकांन्बकान्।<br>घातुकांश्चक्रवाकांश्च कटाकूण्टिट्टिभान् भटान्॥ ५१<br><br>पुत्रप्रियाँल्लोहपृष्ठान् गोचर्मगिरिवर्तकान्।<br>पारावतांश्च कमलान् सारिकाञ्जीवजी वकान्॥ ५२<br><br>लाववर्तकवार्ताकान् रक्तवर्त्मप्रभद्रकान्।<br>ताम्रचूदान् स्वर्णचूडाङ्कुकुटान् काष्ठकुक्कुटान्॥ ५३<br><br>कपिञ्जलान् कलविङ्कांस्तथा कुङ्कुमचूडकान्।<br>भृङ्गराजान् सीरपादान् भूलिङ्गाण्डिण्डिमान् नवान्॥ ५४<br><br>मञ्जुलीतकदात्यूहान् भारद्वाजांस्तथा चषान्।<br>एतांश्चान्यांश्च सुबहून् पक्षिसङ्घान् मनोहरान्॥ ५५नरेन्द्र! (यहाँतक कि) नागलोक, स्वर्गलोक, मृत्युलोक, जलप्राय स्थान तथा वनमें उत्पन्न होनेवाला ऐसा कोई भी अनाज, धान्य, शाक, फल, मूल, कन्द और फूल नहीं था, जो वहाँ विद्यमान न हो अर्थात् सभी प्राप्य थे। वहाँके वृक्ष ऋतुओंके अनुकूल सदा फूलों और फलोंसे लदे रहते थे। मद्रेश्वर पुरूरवाने अपनी तपस्याके प्रभावसे उस वनप्रान्तको देखा। राजाको वहाँ अनेकों प्रकारके रूप-रंगवाले पक्षी भी दीख पड़े। जैसे मोर, शतपत्र (कठफोरवा), कलविंक (गौरैया), कोयल, कादम्बक (कलहंस), हंस, कोयष्टि (जलकुकुट), खंजरीट (खिड़रिच), कुरर (कराँकुल), कालकूट (जलकौआ), लोभी खट्वाङ्ग (पक्षिविशेष), गोश्वेदक (हारिल), कुम्भ (डोम कौआ), धार्तराष्ट्र (काली चोंच और काले पैरोंवाले हंस), तोते, बगुले, निष्ठुर चक्रवाक, कटाकू (कर्कश ध्वनि करनेवाले विशेष पक्षी), टिटिहरी, भट (तीतर), पुत्रप्रिय (शरभ), लोहपृष्ठ (श्वेत चील्ह), गोचर्म (चरसा), गिरिवर्तक (बतख), कबूतर, कमल (सारस), मैना, जीवजीवक (चकोर), लवा, वर्तक (बटेर), वार्तीक (बटेरोंकी एक जाति), रक्तवर्त्म (मुर्गा), प्रभद्रक (हंसका एक भेद), ताम्रचूड (लाल शिखावाले मुर्गे), स्वर्णचूड (स्वर्ण-सदृश शिखावाले मुर्गे), सामान्य मुर्गे, काष्ठकुक्कुट (मुर्गेका एक भेद), कपिञ्जल (पपीहा), कलविंक (गौरैया), कुङ्कुमचूड (केसर-सरीखी शिखावाले पक्षी), भृङ्गराज (पक्षिविशेष), सीरपाद (बड़ा सारस), भूलिंग (भूमिमें रहनेवाले पक्षी), डिण्डिम (हारिल पक्षीकी एक जाति), नव (काक), मञ्जुलीतक (चील्हकी जातिविशेष), दात्यूह (जलकाक), भारद्वाज (भरदूल) तथा चाष (नीलकण्ठ)—इन्हें तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य बहुत-से मनोहर पक्षिसमूहोंको राजाने देखा॥ ४६—५५॥
४००* मत्स्यपुराण *
श्लोकअर्थ
श्वापदान् विविधाकारान् मृगांश्चैव महामृगान्।<br>व्याघ्रान् केसरिणः सिंहान्द्वीपिनः शरभान्वृकान्॥ ५६<br>ऋक्षांस्तरक्षूंश्च बहून् गोलाङ्गूलान् सवानरान्।<br>शशलोमान् सकादम्बान् मार्जारान् वायुवेगिनः॥ ५७<br>तथा मत्तांश्च मातङ्गान्महिषान् गवयान् वृषान्।<br>चमरान् सुमरांश्चैव तथा गौरखरानपि॥ ५८<br>उरभ्रांश्च तथा मेषान् सारङ्गानथ कूकुरान्।<br>नीलांश्चैव महानीलान् करालाञ् मृगमातृकान्॥ ५९<br>सदंष्ट्रालोमशरभान् क्रौञ्चाकारकशम्बरान्।<br>करालान् कृतमालांश्च कालपुच्छांश्च तोरणान्॥ ६०<br>उष्ट्रान् खड्गान् वराहांश्च तुरङ्गान् खरगर्दभान्।<br>एतानद्विष्टान् मद्रेशो विरुद्धांश्च परस्परम्॥ ६१<br>अविरुद्धान् वने दृष्ट्वा विस्मयं परमं ययौ।<br>तच्चाश्रमपदं पुण्यं बभूवात्रेः पुरा नृप॥ ६२<br>तत्प्रसादात् प्रभावयुक्तं स्थावरैर्जङ्गमैस्तथा।<br>हिंसन्ति हि न चान्योन्यं हिंसकास्तु परस्परम्॥ ६३इसी प्रकार राजाको वहाँ विभिन्न रूप-रंगवाले जंगली जीव भी देखनेको मिले। जैसे—हिरन, बारहसिंगे, बाघ, सिंह, शेर, चीता, शरभ (अष्टपदी), भेड़िया, रीछ, तरक्षु (लकड़ा), बहुत-से लाङ्गूली वानर, सामान्य वानर, वायु-सरीखे वेगशाली खरगोश, लोमड़ी, वनबिलाव, बिलाव, मतवाले हाथी, भैंसे, नीलगाय, बैल, चमर (सुरा गाय), सुमर (बालमृग), श्वेत रंगके गधे, भेड़, मेढ़, मृग, कुत्ते, नीले एवं गाढ़े नीले रंगवाले भयानक मृगमातृक (कस्तूरी मृग), बड़ी-बड़ी दाढ़ों एवं रोमोंसे युक्त शरभ (अष्टपदी), क्रौंच पक्षीके आकारवाले शम्बर (साबर मृग), भयानक कृतमाल (एक प्रकारका हिरन), काली पूँछोंवाले तोरण (सियार), ऊँट, गैंड़े, सूअर, घोड़े, खच्चर, गधे* आदि जीवोंको उस वनमें परस्पर विरुद्धस्वभाववाले होनेपर भी द्वेषरहित होकर निवास करते देखकर मद्रेश्वर पुरूरवा विस्मयविमुग्ध हो गये। राजन्! पूर्वकालमें उसी स्थानपर महर्षि अत्रिका पुण्यमय आश्रम था। उन ऋषिकी कृपासे वह प्रदेश स्थावर-जङ्गम प्राणियोंसे भरा हुआ अत्यन्त सुहावना था और वहाँ हिंसक जीव भी परस्पर एक-दूसरेकी हिंसा नहीं करते थे॥ ५६-६३॥
क्रव्यादाः प्राणिनस्तत्र सर्वे क्षीरफलाशनाः।<br>निर्मितास्तत्र चात्यर्थमत्रिणा सुमहात्मना॥ ६४<br>शैलनितम्बदेशेषु न्यवसच्च स्वयं नृपः।<br>पयः क्षरन्ति ते दिव्यममृतस्वादु ह्यकण्टकम्॥ ६५<br>क्वचिद् राजन् महिष्यश्च क्वचिदाजाश्च सर्वशः।<br>शिलाः क्षीरेण सम्पूर्णा दध्ना चान्यत्र वा बहिः॥ ६६<br>सम्पश्यन् परमां प्रीतिमवाप वसुधाधिपः।<br>सरांसि तत्र दिव्यानि नद्यश्च विमलोदकाः॥ ६७<br>प्रणालिकानि चोष्णानि शीतलानि च भागशः।<br>कन्दराणि च शैलस्य सुसेव्यानि पदे पदे॥ ६८<br>हिमपातो न तत्रास्ति समन्तात् पञ्चयोजनम्।<br>उपत्यका सुशैलस्य शिखरस्य न विद्यते॥ ६९<br>तत्रास्ति राजञ्छिखरं पर्वतेन्द्रस्य पाण्डुरम्।<br>हिमपातं घना यत्र कुर्वन्ति सहिताः सदा॥ ७०महर्षि अत्रिने उस आश्रममें ऐसा उत्तम वातावरण बना दिया था कि वहाँके सभी मांसभोजी जीव दूध और फलका ही आहार करते थे। राजन्! मद्रेश्वरने पर्वतके उसी नितम्बप्रदेश (निचले भाग)-में अपना निवास-स्थान बनाया। वहाँ सब ओर कहीं भैंसों तो कहीं बकरियोंके स्तनोंसे अमृतके समान स्वादिष्ट दिव्य दूध झरता रहता था, जिससे वहाँकी शिलाएँ भीतर-बाहर—सब ओर दूध एवं दहीसे सराबोर रहती थीं। यह देखकर भूपाल पुरूरवाको परम हर्ष प्राप्त हुआ। वहाँ दिव्य सरोवर थे तथा निर्मल जलसे भरी हुई नदियाँ बह रही थीं। नालियोंमें कहीं गरम तो कहीं शीतल जल बह रहा था। उस पर्वतकी कन्दराएँ पग-पगपर सेवन करने योग्य थीं। उस आश्रमके चारों ओर पाँच योजनके घेरेमें हिम-पात नहीं होता था। उस सुन्दर पर्वतके शिखरके नीचे उपत्यका (मैदानी भूमि) नहीं थी (जिसके कारण वह प्रदेश जनशून्य था)। राजन्! वहाँ उस पर्वतराजका एक पीले रंगका शिखर है, जिसपर बादल संगठित होकर सदा हिमकी वर्षा किया

* नामावलिमें एक ही नाम कई बार आये हैं, अतः उनसे उस जातिके विभिन्न भेदोंको समझना चाहिये।

१२१- कैलास पर्वतका वर्णन, गङ्गाकी सात धाराओंका वृत्तान्त तथा जम्बूद्वीपका विवरण

* अध्याय ११९ *४०१
तत्रास्ति चापरं शृङ्गं यत्र तोयघना घनाः।<br>नित्यमेवाभिवर्षन्ति शिलाभिः शिखरं वरम्॥ ७१<br>तदाश्रमं मनोहारि यत्र कामधरा धरा।<br>सुरमुख्योपयोगित्वाच्छाखिनां सफलाः फलाः॥ ७२<br>सदोपगीतभ्रमरसुरस्त्रीसेवितं परम्।<br>सर्वपापक्षयकरं शैलस्येव प्रहारकम्॥ ७३<br>वानरैः क्रीडमानैश्च देशाद् देशान् नराधिप।<br>हिमपुञ्जाः कृतास्तत्र चन्द्रबिम्बसमप्रभाः॥ ७४<br>तदाश्रमं समंताच्च हिमसंरुद्धकन्दरैः।<br>शैलवाटैः परिवृतमगम्यं मनुजैः सदा॥ ७५<br>पूर्वाराधितभावोऽसौ महाराजः पुरूरवाः।<br>तदाश्रमपदं प्राप्तो देवदेवप्रसादतः॥ ७६<br>तदाश्रमं श्रमशमनं मनोहरं<br>मनोहरैः कुसुमशतैरलङ्कृतम् ।<br>कृतं स्वयं रुचिरमथात्रिणा शुभं<br>शुभावहं तद् ददृशे स मद्रराट्॥ ७७करते हैं। वहीं एक दूसरा शिखर भी है, उस सुन्दर शिखरपर जलसे बोझिल हुए बादल बड़ी-बड़ी शिलाओंके साथ नित्य बरसते रहते हैं। जहाँ वह मनको लुभानेवाला आश्रम स्थित है, वहाँकी पृथ्वी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली है। प्रधान देवताओंके उपयोगमें आनेके कारण वहाँके वृक्षोंके फल भी सफलताको प्राप्त करते रहते हैं। वह श्रेष्ठ आश्रम सदा भ्रमरोंकी गुंजारसे गुंजायमान एवं देवाङ्गनाओंसे सुसेवित तथा उस पर्वतके प्रहरीकी तरह सम्पूर्ण पापोंका विनाशक था। नरेश्वर! एक स्थानसे दूसरे स्थानपर क्रीडा करते हुए बन्दरोंने वहाँकी बर्फराशिको चाँदनीके समान उज्ज्वल बना दिया था। वह आश्रम चारों ओरसे हिमाच्छादित कन्दराओं और कँकरीले-पथरीले मार्गोंसे घिरा हुआ था, इसलिये वह मनुष्योंके लिये सदा अगम्य था। पूर्वजन्मकी आराधनाके प्रभावसे युक्त महाराज पुरूरवा देवाधिदेव भगवान्‌की कृपासे उस आश्रमपर पहुँचे थे। वह आश्रम थकावटको दूर करनेवाला, मनोहर, मनोमोहक पुष्पोंसे अलंकृत, स्वयं महर्षिद्वारा सुन्दररूपमें निर्मित, मङ्गलमय एवं शुभकारक था, उसे मद्रराज पुरूरवाने देखा॥ ६४–७७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशेऽत्र्याश्रमवर्णनं नामाष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें अत्रि-आश्रमवर्णन नामक एक सौ अठारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ११८ ॥


एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय

आश्रमस्थ विवरमें पुरूरवा* का प्रवेश, आश्रमकी शोभाका वर्णन तथा पुरूरवाकी तपस्या

सूत उवाच<br>तत्र यौ तौ महाशृङ्गौ महावर्णौ महाहिमौ।<br>तृतीयं तु तयोर्मध्ये शृङ्गमत्यन्तमुच्छ्रितम्॥ १<br>नित्यातपशिलाजालं सदाभ्रपरिवर्जितम्।<br>तस्याधस्ताद् वृक्षगणो दिशां भागे च पश्चिमे॥ २<br>जातीलतापरिक्षिप्तं विवरं चारुदर्शनम्।<br>दृष्ट्वैव कौतुकाविष्टस्तं विवेश महीपतिः॥ ३**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! वहाँ सदा हिमाच्छादित तथा रंग-बिरंगे जो दो महान् शिखर थे, उनके बीचमें एक तीसरा शिखर था, जो अत्यन्त ऊँचा था। वह बादलोंसे सदा शून्य रहता था, जिससे उसकी शिलाएँ नित्य सन्तप्त बनी रहती थीं। उस शिखरके नीचे पश्चिम दिशामें वृक्षोंके समूह शोभा पा रहे थे। उन्हींके बीचमें एक अत्यन्त सुन्दर विवर (छिद्र) था, जो मालतीकी लताओंसे आच्छादित था। उसे देखते ही राजा पुरूरवा आश्चर्यचकित हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने उस विवरमें

* इस पुराणमें—यजुर्वेद ५। २, ऋग्वेद १०। ९५, शतपथब्रा० ११। ५ आदिमें संकथित पुरूरवाके कथानकका सर्वाधिक विस्तारसे उपवृंहण हुआ है और कई बार उसकी पुनरुक्ति भी हुई है। इससे विक्रमोर्वशीयमें कालिदास एवं पार्जीटर आदि आधुनिक पाश्चात्त्य विद्वान् लेखक बहुत प्रभावित हुए हैं। निघण्टु ५। ४ तथा यास्क्रीय निरुक्त १०। ४६ एवं ऋग्वेद १०। ९५। २ के अनुसार ये सूर्य या मूल प्राणतत्त्व हैं। पाणि० ६। ३। १३७ के अनुसार यहाँ 'पुरू' में दीर्घ हुआ है।

४०२ * मत्स्यपुराण *

तमसा चातिनिबिडं नल्वमात्रं सुसंकटम्।<br>नल्वमात्रमतिक्रम्य स्वप्रभाभरणोज्ज्वलम्॥ ४<br>तमुच्छ्रितमथात्यन्तं गम्भीरं परिवर्तुलम्।<br>न तत्र सूर्यस्तपति न विराजति चन्द्रमाः॥ ५<br>तथापि दिवसाकारं प्रकाशं तदहर्निशम्।<br>क्रोशाधिकपरीमाणं सरसा च विराजितम्॥ ६<br>समंतात् सरसस्तस्य शैललग्ना तु वेदिका।<br>सौवर्णै राजतैर्वृक्षैर्विद्रुमैरुपशोभितम्॥ ७<br>नानामाणिक्यकुसुमैः सुप्रभाभरणोज्ज्वलैः।<br>तस्मिन् सरसि पद्मानि पद्मरागच्छदानि तु॥ ८<br>वज्रकेशरजालानि सुगन्धीनि तथा युतम्।<br>पत्रैर्मरकतैर्नीलैर्वैदूर्यस्य महीपते॥ ९<br>कर्णिकाश्च तथा तेषां जातरूपस्य पार्थिव।<br>तस्मिन् सरसि या भूमिः सा तु वज्रसमाकुला॥ १०<br>नानारत्नैरुपचिता जलजानां समाश्रया।<br>कपर्दिकानां शुक्तीनां शङ्खानां च महीपते॥ ११<br>मकराणां च मत्स्यानां चण्डानां कच्छपैः सह।<br>तत्र मरकतखण्डानि वज्राणां च सहस्त्रशः॥ १२<br>पद्मरागेन्द्रनीलानि महानीलानि पार्थिव।<br>पुष्परागानि सर्वाणि तथा कर्केतनानि च॥ १३<br>तुत्थकस्य तु खण्डानि तथा शेषस्य भागशः।<br>रा(ला)जावर्तस्य मुख्यस्य रुधिराक्षस्य चाप्यथ॥ १४<br>सूर्येन्दुकान्तयश्चैव नीलो वर्णान्तिकश्च यः।<br>ज्योतीरसस्य रम्यस्य स्यमन्तस्य च भागशः॥ १५<br>सुरोरगवलक्षाणां स्फटिकस्य तथैव च।<br>गोमेदपित्तकानां च धूलीमरकतस्य च॥ १६<br>वैदूर्यसौगन्धिकयोस्तथा राजमणेर्नृप।<br>वज्रस्यैव च मुख्यस्य तथा ब्रह्ममणेरपि॥ १७<br>मुक्ताफलानि मुक्तानां ताराविग्रहधारिणीम्॥ १८प्रवेश किया। वह मार्ग चार सौ हाथ (एक फर्लांग)-तक घने अन्धकारसे समावृत होनेके कारण अत्यन्त संकटमय था। उस चार सौ हाथकी दूरी पार कर लेनेपर राजा ऐसे स्थानपर पहुँचे, जो अपनी कान्तिसे ही उद्भासित हो रहा था। वह स्थान ऊँचा, अत्यन्त गम्भीर और गोलाकार था तथा एक कोसके विस्तारवाला था। यद्यपि वहाँ न सूर्य तपते थे न चन्द्रमा ही विराजमान थे, तथापि वह दिनकी भाँति रात-दिन प्रकाशयुक्त बना रहता था। वहाँ एक सरोवर भी था। जो सुवर्ण, चाँदी और मूँगेके समान रंग-बिरंगे वृक्षोंसे सुशोभित था। उन वृक्षोंमें नाना प्रकारके मणियोंके सदृश परमोत्कृष्ट कान्तिसे युक्त फूल खिले हुए थे। उस सरोवरके चारों ओर शिलाओंकी वेदी बनी हुई थी, भूपाल! उस सरोवरमें विभिन्न प्रकारके कमल खिले हुए थे, जिनके पुष्पदल पद्मरागमणि-सरीखे, केसर-समूह हीरेके-से और पत्ते नीले वैदूर्य मणिके समान चमक रहे थे और वे सुगन्धसे भरे हुए थे। उनकी कर्णिका (छत्ता) सुवर्णके समान चमकीली थी॥ १-९ $\frac{१}{२}$॥<br><br>उस सरोवरमें जो भूमि थी, वह हीरेसे आच्छादित थी, साथ ही वह नाना प्रकारके दूसरे रत्नोंसे भी मण्डित थी। महीपाल! वहाँ जलमें उत्पन्न होनेवाली कौड़ी, सीपी और शङ्ख भी वर्तमान थे। वह कछुओंके साथ-साथ भयानक घड़ियालों और मछलियोंका वासस्थान था। राजन्! उसमें कहीं मरकतमणि तथा हीरेके हजारों टुकड़े पड़े थे। कहीं पद्मराग (माणिक्य या लाल), इन्द्रनील (नीलम), महानील, पुष्पराग (पुखराज), कर्केतन, तुत्थक तथा शेष मणियोंके खण्ड चमक रहे थे। कहीं लाजावर्त, मुख्य, रुधिराक्ष, सूर्यकान्त, चन्द्रकान्त, नीलवर्णान्तिक, ज्योतीरस, रम्य एवं स्यमन्तक मणियोंके टुकड़े यत्र-तत्र बिखरे पड़े थे। कहीं सुरमणि, सर्पमणि, वलक्षमणि और स्फटिकमणिकी चट्टानें चमक रही थीं, तो कहीं गोमेद, पित्तक, धूलीमणि, मरकत, वैदूर्य, सौगन्धिक, राजमणि, हीरा, मुख्य तथा ब्रह्ममणिके खण्ड दृष्टिगोचर हो रहे थे। कहीं-कहीं बिखरे हुए मोती* अपनी प्रभा फैला रहे थे, जो ताराओंके समान लग रहे थे।

* यहाँ श्लोक ८ से लेकर १९ तकके-बारह श्लोकोंमें-३२ मुख्य मणियोंके उल्लेखपूर्वक सम्पूर्ण रत्नशास्त्रका संक्षेपमें निरूपण हुआ है। गरुडपुराण ६८-७८, विष्णुधर्मो० २। १५, युक्तिकल्पतरु, बृहत्संहिता, रत्नसारमें इनका विस्तृत परिचय है।

* अध्याय १११ *

४०३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सुखोष्णं चैव तत् तोयं स्नानाच्छीतविनाशनम्।<br>वैदूर्यस्य शिला मध्ये सरसस्तस्य शोभना ॥ १९<br><br>प्रमाणेन तथा सा च द्वे च राजन् धनुःशते।<br>चतुरस्रा तथा रम्या तपसा निर्मितात्रिणा ॥ २०<br><br>बिलद्वारसमो देशो यत्र यत्र हिरण्मयः।<br>प्रदेशः स तु राजेन्द्र द्वीपे तस्मिन् मनोहरे ॥ २१उस सरोवरका जल कुछ गुनगुना गरम था, जो स्नान करनेसे ठण्डकको दूर कर देता था। उस सरोवरके मध्यमें वैदूर्यमणिकी एक सुन्दर शिला थी। राजन्! उस रमणीय शिलाको महर्षि अत्रिने अपनी तपस्याके प्रभावसे निर्मित किया था। वह आठ सौ हाथ (दो फर्लांग) विस्तृत एवं चौकोर थी। राजेन्द्र! उस मनोहर द्वीपमें सारा प्रदेश बिलद्वारके समान स्वर्णमय था॥१०—२१॥
तथा पुष्करिणी रम्या तस्मिन् राजञ्शिलातले।<br>सुशीतामलपानीया जलजैश्च विराजिता ॥ २२<br><br>आकाशप्रतिमा राजंश्चतुरस्रा मनोहरा।<br>तस्यास्तदुदकं स्वादु लघु शीतं सुगन्धिकम् ॥ २३<br><br>न क्षिणोति यथा कण्ठं कुक्षिं नापूरयत्यपि।<br>तृप्तिं विधत्ते परमां शरीरे च महत् सुखम् ॥ २४<br><br>मध्ये तु तस्याः प्रासादं निर्मितं तपसात्रिणा।<br>रुक्मसेतुप्रवेशान्तं सर्वरत्नमयं शुभम् ॥ २५<br><br>शशाङ्करश्मेः संकाशं प्रासादं रजतं हितम्।<br>रम्यवैदूर्यसोपानं विद्रुमामलसारकम् ॥ २६<br><br>इन्द्रनीलमहास्तम्भं मरकतासक्तवेदिकम्।<br>वज्रांशुजालैः स्फुरितं रम्यं दृष्टिमनोंरमम् ॥ २७<br><br>प्रासादे तत्र भगवान् देवदेवो जनार्दनः।<br>भोगिभोगावलीसुप्तः सर्वालङ्कारभूषितः ॥ २८<br><br>जान्वाच्य कुञ्चितस्त्वेको देवदेवस्य चक्रिणः।<br>फणीन्द्रसंनिविष्टोऽङ्घ्रिर्द्वितीयश्च तथानघ ॥ २९<br><br>लक्ष्म्युत्सङ्गतोऽङ्घ्रिस्तु शेषभोगप्रशायिनः।<br>फणीन्द्रभोगसंन्यस्तबाहुः केयूरभूषणः ॥ ३०राजन्! उस शिलातलपर एक रमणीय पुष्करिणी (पोखरी) थी, जो चौकोर, मनोमोहिनी तथा आकाशके समान निर्मल थी। वह अत्यन्त शीतल एवं निर्मल जलसे परिपूर्ण तथा कमलोंसे सुशोभित थी। उसका वह जल सुस्वादु, पचनेमें हलका, शीतल और सुगन्धयुक्त था। वह जैसे गलेको कष्ट नहीं पहुँचाता था, उसी प्रकार कुक्षिको भी वायुसे परिपूर्ण नहीं करता था, अर्थात् वायुविकार नहीं उत्पन्न करता था, अपितु शरीरमें पहुँचकर परम तृप्ति उत्पन्न करता तथा महान् सुख पहुँचाता था। उस पुष्करिणी (बावली)-के मध्यभागमें महर्षि अत्रिने अपनी तपस्याके बलसे एक महलका निर्माण किया था। वह सुन्दर प्रासाद चाँदीका बना हुआ था, जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान चमक रहा था। उसमें सभी प्रकारके रत्न जड़े गये थे तथा भीतर प्रवेश करनेके लिये सोनेकी सीढ़ियाँ बनी थीं, जिनमें रमणीय वैदूर्य एवं निर्मल मूँगे लगे हुए थे। उसमें इन्द्रनील मणिके विशाल खम्भे लगे थे। उसकी वेदिका अर्थात् फर्शपर मरकतमणि जड़ी हुई थी। हीरेकी किरणोंसे चमचमाता हुआ वह रमणीय महल देखते ही मनको लुभा लेता था। उस महलमें देवाधिदेव भगवान् जनार्दन (मूर्ति-रूपसे) सम्पूर्ण आभूषणोंसे विभूषित होकर शेषनागके फणोंपर शयन कर रहे थे। अनघ! देवाधिदेव चक्रधारी भगवान्‌का एक चरण घुटनेसे मुड़ा हुआ था और दूसरा चरण शेषनागके ऊपरसे होता हुआ लक्ष्मीकी गोदमें स्थित था। शेषनागके फणोंपर शयन करनेवाले भगवान्‌का बाजूबंदसे विभूषित एक हाथ शेषनागके फणोंपर स्थापित था ॥२२—३०॥
अङ्गुलीपष्ठविन्यस्तदेवशीर्षधरं भुजम्।<br>एकं वै देवदेवस्य द्वितीयं तु प्रसारितम् ॥ ३१उस हाथकी अङ्गुलियोंका पृष्ठभाग शेषके सिरपर रखा हुआ था। उनका दूसरा हाथ फैला हुआ था।
४०४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
समाकुञ्चितजानुस्थमणिबन्धेन शोभितम्।<br>किञ्चिदाकुञ्चितं चैव नाभिदेशकरस्थितम्॥ ३२<br><br>तृतीयं तु भुजं तस्य चतुर्थं तु तथा शृणु।<br>आत्तसंतानकुसुमं घ्राणदेशानुसर्पिणम्॥ ३३<br><br>लक्ष्म्या संवाह्यमानाङ्घ्रिः पद्मपत्रनिभैः करैः।<br>संतानमालामुकुटं हारकेयूरभूषितम्॥ ३४<br><br>भूषितं च तथा देवमङ्गदैरङ्गुलीयकैः।<br>फणीन्द्रफणविन्यस्तचारुरत्नशिखोज्ज्वलम्॥ ३५<br><br>अज्ञातवस्तुचरितं प्रतिष्ठितमथात्रिणा।<br>सिद्धानुपूर्व्यं सततं संतानकुसुमार्चितम्॥ ३६<br><br>दिव्यगन्धानुलिप्ताङ्गं दिव्यधूपेन धूपितम्।<br>सुरसैः सुफलैर्हृद्यैः सिद्धैरुपहृतैः सदा॥ ३७<br><br>शोभितोत्तमपार्श्वं तं देवमुत्पलशीर्षकम्।तीसरे हाथका मणिबन्ध मुड़े हुए घुटनेपर सुशोभित था तथा कुछ मुड़कर नाभिदेशपर फैले हुए पहले हाथपर अवलम्बित था। अब उनके चौथे हाथकी दशा सुनो। चौथे हाथमें भगवान् कल्पवृक्षका पुष्प धारण किये हुए थे और उसे अपनी नासिकातक ले गये थे। उस समय लक्ष्मी अपने कमल-दलके समान कोमल हाथोंसे भगवान्‌का चरण दबा रही थीं। भगवान्‌के मस्तकपर कल्पवृक्षके पुष्पोंकी मालाओंका मुकुट शोभा दे रहा था। वे हार, केयूर, बाजूबंद और अँगूठीसे विभूषित तथा शेषनागके फणोंपर रखे हुए सुन्दर रत्नोंसे प्रकाशित हो रहे थे। एवं इनकी विशेषता यह थी कि महर्षि अत्रिने उनकी स्थापना की थी। उनका चरित्र वस्तुतः जाना नहीं जा सकता। सिद्धगण सदा उनकी पूजा करते थे। कल्पवृक्षके पुष्पोंद्वारा उनकी अर्चना होती थी। उनके अङ्गोंमें दिव्य चन्दनका अनुलेप था तथा वे दिव्य धूपसे धूपित थे। सिद्धगण उन्हें सदा सरस एवं मनोहर फलोंका उपहार देते थे। वे उत्तम पार्श्वसे सुशोभित थे तथा उनके मस्तकपर कमल शोभा पा रहा था॥ ३१-३७ १/२ ॥
ततः सम्मुखमुद्वीक्ष्य ववन्दे स नराधिपः॥ ३८<br><br>जानुभ्यां शिरसा चैव गत्वा भूमिं यथाविधि।<br>नाम्नां सहस्रेण तथा तुष्टाव मधुसूदनम्॥ ३९<br><br>प्रदक्षिणमथो चक्रे स तूत्थाय पुनः पुनः।<br>रम्यमायतनं दृष्ट्वा तत्रोवासाश्रमे पुनः॥ ४०<br><br>बिलाद् बहिर्गुहां काञ्चिदाश्रित्य सुमनोहराम्।<br>तपश्चकार तत्रैव पूजयन् मधुसूदनम्॥ ४१<br><br>नानाविधैस्तथा पुष्पैः फलमूलैः सगोरसैः।<br>नित्यं त्रिषवणस्नायी वह्निपूजापरायणः॥ ४२<br><br>देववापीजलैः कुर्वन् सततं प्राणधारणम्।<br>सर्वाहारपरित्यागं कृत्वा तु मनुजेश्वरः॥ ४३<br><br>अनास्तृतगुहाशायी कालं नयति पार्थिवः।<br>त्यक्ताहारक्रियश्चैव केवलं तोयतो नृपः।<br>न तस्य ग्लानिमायाति शरीरं च तदद्भुतम्॥ ४४ऐसे भगवान् (-की मूर्ति)-को अपने सम्मुख देखकर राजा पुरूरवाने विधिपूर्वक घुटने टेककर और मस्तकको भूमिपर रखकर भगवान्‌को प्रणाम किया तथा सहस्रनामोंद्वारा उन मधुसूदनका स्तवन किया और उठकर बारम्बार उनकी प्रदक्षिणा की। पुनः उस रमणीय देवमन्दिरको देखकर उसी आश्रममें निवास करनेका निश्चय किया। तत्पश्चात् उस बिलसे बाहर निकलकर वे किसी अतिशय मनोहारिणी गुफाका आश्रय लेकर नाना प्रकारके पुष्पों, फलों, मूलों तथा गोरसोंद्वारा भगवान् मधुसूदनकी पूजा करते हुए वहीं तपस्यामें संलग्न हो गये। वे नित्य त्रिकाल स्नान तथा अग्निहोत्र करते थे। वे नरेश सभी प्रकारके आहारका परित्याग कर सदा उस देववापी (पोखरी)-के जलसे ही प्राणोंकी रक्षा करते थे। राजा बिना बिछौनेके ही गुफामें शयन करते हुए समय बिता रहे थे। यद्यपि राजाने भोजन करना छोड़ दिया था और केवल जलपर ही निर्भर थे, तथापि उन्हें किसी प्रकारकी ग्लानि नहीं होती थी, प्रत्युत उनका शरीर अद्भुत तेजोमय हो गया
* अध्याय १२० *४०५

| एवं स राजा तपसि प्रसक्तः<br>सम्पूजयन् देववरं सदैव।<br>तत्राश्रमे कालमुवास कञ्चित्<br>स्वर्गोपमे दुःखमविन्दमानः॥ ४५॥ | था। इस प्रकार राजा पुरूरवाने तपस्यामें दत्तचित्त होकर सदा देवश्रेष्ठ भगवान् विष्णुकी पूजा करते हुए दुःखकी कुछ भी परवा न कर उस स्वर्गतुल्य आश्रममें कुछ कालतक निवास किया॥ ३८–४५॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे आयतनवर्णनं नामैकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ ११९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णनमें आयतनवर्णन नामक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११९॥


एक सौ बीसवाँ* अध्याय

राजा पुरूरवाकी तपस्या, गन्धर्वों और अप्सराओंकी क्रीडा, महर्षि अत्रिका आगमन तथा राजाको वरप्राप्ति

| सूत उवाच<br><br>स त्वाश्रमपदे रम्ये त्यक्ताहारपरिच्छदः।<br>क्रीडाविहारं गन्धर्वैः पश्यत्यप्सरसां सह॥ १<br><br>कृत्वा पुष्पोच्चयं भूरि ग्रथयित्वा तथा स्रजः।<br>अर्घ्यं निवेद्य देवाय गन्धर्वेभ्यस्तदा ददौ॥ २<br><br>पुष्पोच्चयप्रसक्तानां क्रीडन्तीनां यथासुखम्।<br>चेष्टा नानाविधाकाराः पश्यन्नपि न पश्यति॥ ३<br><br>काचित् पुष्पोच्चये सक्ता लताजालेन वेष्टिता।<br>सखीजनेन संत्यक्ता कान्तेनाभिसमुज्झिता॥ ४<br><br>काचित् कमलगन्धाभा निःश्वासपवनाहतैः।<br>मधुपैराकुलमुखी कान्तेन परिमोचिता॥ ५<br><br>मकरन्दसमाक्रान्तनयना काचिदङ्गना।<br>कान्तनिःश्वासवातेन नीरजस्ककृतेक्षणा॥ ६<br><br>काचिदुच्चीय पुष्पाणि ददौ कान्तस्य भामिनी।<br>कान्तसंग्रथितैः पुष्पै रराज कृतशेखरा॥ ७ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इस प्रकार राजकीय सामग्रियों तथा आहारका परित्याग कर राजा पुरूरवा उस रमणीय आश्रममें निवास करने लगे। वहाँ उन्हें गन्धर्वोंके साथ अप्सराओंका क्रीडाविहार भी देखनेको मिलता था। राजा बहुत-से फूलोंको तोड़कर उसकी माला गूँथते थे और उन्हें अर्घ्यसहित पहले भगवान् विष्णुको निवेदित कर पुनः गन्धर्वोंको दे देते थे। वे वहाँ पुष्प-चयनमें लगी हुई एवं सुखपूर्वक क्रीडा करती हुई अप्सराओंकी विभिन्न प्रकारकी चेष्टाओंको देखकर भी अनदेखी कर जाते थे। वहाँ पुष्प-चयनमें निरत कोई अप्सरा लता-समूहमें उलझ गयी और सखियाँ उसे उसी दशामें छोड़कर चलती बनीं, तब उसके पतिने आकर उसे बन्धन-मुक्त किया। किसी अप्सराके शरीरसे कमलकी-सी गन्ध निकल रही थी। इस कारण उसकी निःश्वासवायुसे आकृष्ट होकर भ्रमर उसके ऊपर मँडरा रहे थे। उन भ्रमरोंसे उसका मुख ढक-सा गया था; तब उसके पतिने उसे उस कष्टसे मुक्त किया। किसी अप्सराकी आँखें पुष्प-रजसे आक्रान्त हो गयीं, तब उसके पतिने अपनी श्वासवायुसे फूँककर उन्हें धूलरहित कर दिया। किसी सुन्दरीने पुष्पोंको एकत्रकर अपने पतिको दे दिया। तत्पश्चात् वह अपने पतिद्वारा गूँथी गयी पुष्पमालाको अपने मस्तकपर रखकर सुशोभित |


* इस अध्यायके अनेक शब्दालंकारोंसे उद्दीपित अधिकांश श्लोक भागवत १०। ३३ से मिलते हैं। कोई एक-दूसरेसे अवश्य प्रभावित है। वैसे इस प्रकारका वर्णन गर्गसंहिता, ब्रह्मवैवर्तपुराणके रासप्रकरणोंमें तथा भागवतके रामनारायणकृत भावविभाविक तथा किशोरीदासकृता विशुद्धरसदीपिकामें इनकी भी पूरी व्याख्या है।

४०६* मत्स्यपुराण *
संस्कृतहिन्दी
उच्चीय स्वयमुद्ग्रथ्य कान्तेन कृतशेखरा।<br>कृतकृत्यमिवात्मानं मेने मन्मथवर्धिनी ॥ ८होने लगी। तभी किसीके पतिने पुष्प-चयन करके अपने ही हाथों माला गूँथकर उसे अपनी पत्नीके मस्तकपर रखकर उसे सुसज्जित कर दिया, इससे उसने अपनेको कृतकृत्य मान लिया॥१—८॥
अस्त्यस्मिन् गहने कुञ्जे विशिष्टकुसुमा लता।<br>काचिदेवं रहो नीता रमणेन रिरंसुना ॥ ९कोई पतिद्वारा झुकायी गयी लतासे फूल तोड़ रही
कान्तसंनामितलता कुसुमानि विचिन्वती।<br>सर्वाभ्यः काचिदात्मानं मेने सर्वगुणाधिकम् ॥ १०थी, जिससे वह अपनेको सभी सखियोंसे सम्पूर्ण गुणोंमें बढ़-चढ़कर मान रही थी। कुछ सुन्दरी देवाङ्गनाएँ
काश्चित् पश्यन्ति भूपालं नलिनीषु पृथक् पृथक्।<br>क्रीडमानास्तु गन्धर्वैर्देवरामा मनोरमाः ॥ ११गन्धर्वोंके साथ पृथक्-पृथक् क्रीडा करती हुई कमलसमूहोंके बीचसे राजाकी ओर देख रही थीं। कोई
काचिदाताडयत् कान्तमुदकेन शुचिस्मिता।<br>ताड्यमानाथ कान्तेन प्रीतिं काचिदुपाययौ ॥ १२सुन्दरी अपने पतिके ऊपर जल उछाल रही थी और किसीके ऊपर उसका पति जल फेंक रहा था, जिससे
कान्तं च ताडयामास जातखेदा वराङ्गना।<br>अदृश्यत वरारोहा श्वासनृत्यत्पयोधरा ॥ १३उसे बड़ी प्रसन्नता हो रही थी। कोई देवाङ्गना खिन्न मनसे अपने पतिके ऊपर जल उछाल रही थी। पतिके
कान्ताम्बुताडनाकृष्टकेशपाशनिबन्धना ।<br>केशाकुलमुखी भाति मधुपैरिव पद्मिनी ॥ १४ऊपर जल फेंकनेसे किसीकी चोटी खुल गयी थी, जिससे उसका मुख बालोंसे ढक गया था। उस समय
स्वचक्षुःसदृशैः पुष्पैः संच्छन्ने नलिनीवने।<br>छन्ना काचिच्चिरात् प्राप्ता कान्तेनान्विष्य यत्नतः ॥ १५वह ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो भ्रमरोंसे घिरी हुई कमलिनी हो। कोई अपने नेत्रोंके समान कमल-
स्नाता शीतापदेशेन काचित् प्राहाङ्गना भृशम्।<br>रमणालिङ्गनं चक्रे मनोऽभिलषितं चिरम् ॥ १६पुष्पोंसे ढके हुए उस कमलिनीके वनमें छिप गयी थी, जिसे उसके पतिने बड़ी देरके बाद प्रयत्नपूर्वक खोजकर
जलार्द्रवसनं सूक्ष्ममङ्गलीनां शुचिस्मिता।<br>धारयन्ती जनं चक्रे काचित् तत्र समन्मथम् ॥ १७प्राप्त किया। किसीको उसका पति गलेमें पड़ी हुई मालाके
कण्ठमाल्यगुणैः काचित् कान्तेन कृष्यताम्भसि।<br>त्रुट्यत्स्त्रग्दामपतितं रमणं प्राहसच्चिरम् ॥ १८धागेको पकड़कर जलमें खींच रहा था, किंतु उस धागेके टूट
काचिद्दुग्ना सखीदत्तजानुदेशे नखक्षता।<br>सम्भ्रान्ता कान्तशरणं मग्ना काचिद् गता चिरम् ॥ १९
काचित् पृष्ठकृतादित्या केशनिस्तोयकारिणी।<br>शिलातलगता भर्त्रा दृष्टा कामार्तचक्षुषा ॥ २०
कृत्तमाल्यं विलुलितं संक्रान्तकुचकुङ्कुमम्।<br>रतिक्रीडितकान्तेव रराज तत् सरोदकम् ॥ २१
सुस्रातदेवगंधर्वदेवरामागणेन च।<br>पूज्यमानं च ददृशे देवदेवं जनार्दनम् ॥ २२

१२२- शाकद्वीप, कुशद्वीप, क्रौञ्चद्वीप और शाल्मलद्वीपका वर्णन

* अध्याय १२० *४०७
क्वचिच्च ददृशे राजा लतागृहगताः स्त्रियः।<br>मण्डयन्तीः स्वगात्राणि कान्तसंन्यस्तमानसाः॥ २३<br>काचिदादर्शनकरा व्यग्रा दूतीमुखोद्गतम्।<br>शृण्वती कान्तवचनमधिका तु तथा बभौ॥ २४<br>काचित् सत्वरिता दूत्या भूषणानां विपर्ययम्।<br>कुर्वाणा नैव बुबुधे मन्मथाविष्टचेतना॥ २५जानेपर जब वह गिर पड़ा, तब वह बड़ी देरतक हँसती रही। इस प्रकार राजाने स्नानसे निवृत्त हुई सभी देव-देवियों एवं गन्धर्व-अप्सराओंद्वारा भगवान् जनार्दनको पूजित होते हुए देखा॥ ९—२५॥
वायुनुन्नातिसुरभिकुसुमोत्करमण्डिते ।<br>काचित् पिबन्ती ददृशे मैरेयं नीलशाद्वले॥ २६<br>पाययामास रमणं स्वयं काचिद् वराङ्गना।<br>काचित् पपौ वरारोहा कान्तपाणिसमर्पितम्॥ २७<br>काचित् स्वनेत्रचपलनीलोत्पलयुतं पयः।<br>पीत्वा पप्रच्छ रमणं क्व गतौ तौ ममोत्पलौ॥ २८<br>त्वयैव पीतौ तौ नूनमित्युक्ता रमणेन सा।<br>तथा विदित्वा मुग्धत्वाद् बभूव व्रीडिता भृशम्॥ २९<br>काचित् कान्तार्पितं सुभ्रूः कान्तपीतावशेषितम्।<br>सविशेषरसं पानं पपौ मन्मथवर्धनम्॥ ३०<br>आपानगोष्ठीषु तथा तासां स नरपुङ्गवः।<br>शुश्राव विविधं गीतं तन्त्रीस्वरविमिश्रितम्॥ ३१<br>प्रदोषसमये ताश्च देवदेवं जनार्दनम्।<br>राजन् सदोपनृत्यन्ति नानावाद्यपुरःसराः॥ ३२<br>याममात्रे गते रात्रौ विनिर्गत्य गुहामुखात्।<br>आवसन् संयुताः कान्तैः परर्द्धिरचितां गुहाम्॥ ३३<br>नानागन्धान्वितलतां नानागन्धसुगन्धिनीम्।<br>नानाविचित्रशयनां कुसुमोत्करमण्डिताम्॥ ३४<br>एवमप्सरसां पश्यन् क्रीडितानि स पर्वते।<br>तपस्तेपे महाराजन् केशवार्पितमानसः॥ ३५<br>तमूचुर्नृपतिं गत्वा गन्धर्वाप्सरसां गणाः।<br>राजन् स्वर्गोपमं देशमिमं प्राप्तोऽस्यरिंदम॥ ३६<br>वयं हि ते प्रदास्यामो मनसः काङ्क्षितान् वरान्।<br>तानादाय गृहं गच्छ तिष्ठेह यदि वा पुनः॥ ३७राजन्! वे अप्सराएँ सदा प्रदोषकालमें देवाधिदेव भगवान् जनार्दनके समक्ष नाना प्रकारके बाजोंके साथ नृत्य करती थीं। एक पहर रात बीत जानेपर वे गुफाके मुखद्वारसे बाहर निकलकर अपने पतियोंके साथ ऐसी सजी-सजायी गुफामें निवास करती थीं, जिसपर अनेकों प्रकारके गन्धोंवाली लताएँ फैली हुई थीं, जिसमेंसे विभिन्न प्रकारकी सुगन्ध निकल रही थी, जो पुष्पसमूहसे सुशोभित थी तथा जिसमें अनेकों विचित्र शय्याएँ बिछी थीं। महाराज! इस प्रकार उस पर्वतपर अप्सराओंकी क्रीडाका अवलोकन करते हुए राजा पुरूरवा भगवान् केशवमें मनको एकाग्र करके तपस्या करते रहे। एक दिन यूथ-के-यूथ गन्धर्व और अप्सराएँ राजाके निकट जाकर उनसे बोलीं—'शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! (बड़े सौभाग्यसे) आप इस स्वर्गतुल्य देशमें आ गये हैं, अतः हमलोग आपको मनोऽभिलषित वर प्रदान करेंगी। उन्हें ग्रहणकर यदि आपकी इच्छा हो तो घर चले जाइये अथवा यहीं रहिये'॥ २६—३७॥
राजोवाच<br>अमोघदर्शनाः सर्वे भवन्तस्त्वमितौजसः।<br>वरं वितरताद्यैव प्रसादं मधुसूदनात्॥ ३८राजाने कहा— गन्धर्वो एवं अप्सराओ! आपलोग अमित तेजस्वी हैं, इससे आपलोगोंका दर्शन कभी निष्फल नहीं होता, इसलिये आपलोग आज ही मुझे ऐसा वरदान दें, जिससे भगवान् मधुसूदनकी कृपा प्राप्त हो जाय। यह

४०८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृतहिन्दी
एवमस्त्वित्यथोक्तस्तैः स तु राजा पुरूरवाः।<br>तत्रोवास सुखी मासं पूजयन्तो जनार्दनम्॥ ३९<br>प्रिय एव सदैवासीद् गन्धर्वाप्सरसां नृपः।<br>तुतोष स जनो राज्ञस्तस्यालौल्येन कर्मणा॥ ४०<br>मासस्य मध्ये स नृपः प्रविष्ट-<br>  स्तदाश्रमं रत्नसहस्रचित्रम्।<br>तोयाशनस्तत्र ह्युवास मासं<br>  यावत्सितान्तो नृप फाल्गुनस्य॥ ४१<br>फाल्गुनामलपक्षान्ते राजा स्वप्ने पुरूरवाः।<br>तस्यैव देवदेवस्य श्रुतवान् गदितं शुभम्॥ ४२<br>रात्र्यामस्यां व्यतीतायामत्रिणा त्वं समेष्यसि।<br>तेन राजन् समागम्य कृतकृत्यो भविष्यसि॥ ४३<br>स्वप्नमेवं स राजर्षिर्दृष्ट्वा देवेन्द्रविक्रमः।<br>प्रत्यूषकाले विधिवत् स्नातः स प्रयतेन्द्रियः॥ ४४<br>कृतकृत्यो यथाकामं पूजयित्वा जनार्दनम्।<br>ददर्शात्रिं मुनिं राजा प्रत्यक्षं तपसां निधिम्॥ ४५<br>स्वप्नं तु देवदेवस्य न्यवेदयत धार्मिकः।<br>ततः शुश्राव वचनं देवतानां समीरितम्॥ ४६<br>एवमेतन्महीपाल नात्र कार्या विचारणा।<br>एवं प्रसादं सम्प्राप्य देवदेवाज्जनार्दनात्॥ ४७<br>कृतदेवार्चनो राजा तथा हुतहुताशनः।<br>सर्वान् कामानवाप्तोऽसौ वरदानेन केशवात्॥ ४८सुनकर वे 'एवमस्तु—ऐसा ही होगा'—ऐसा कहकर वहाँसे चले गये। तत्पश्चात् राजा पुरूरवा वहाँ एक मासतक भगवान् जनार्दनकी पूजा करते हुए सुखपूर्वक निवास करते रहे। वे सदा गन्धर्वों एवं अप्सराओंके प्रेमपात्र बने रहे। वे लोग राजाके निर्लोभ कर्मसे परम संतुष्ट थे। राजन्! उस मासके बीचमें ही राजा पुरूरवाने हजारों रत्नोंसे चित्रित उस आश्रममें प्रवेश किया। वहाँ वे एक मासतक केवल जल पीकर तबतक निवास करते रहे, जबतक फाल्गुनमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथि नहीं आ गयी। राजा पुरूरवाने फल्गुनमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथिकी रातमें स्वप्नमें उन्हीं देवाधिदेव भगवान् विष्णुद्वारा कहे जाते हुए इस प्रकारके मङ्गलमय शब्दोंको सुना—'राजन्! इस रात्रिके व्यतीत हो जानेपर अत्रिसे तुम्हारी भेंट होगी और उनसे मिलकर तुम कृतकृत्य हो जाओगे। देवराजके समान पराक्रमी राजर्षि पुरूरवाको जब इस प्रकारका स्वप्न दीख पड़ा, तब उन्होंने प्रातःकाल उठकर इन्द्रियोंको संयत रखते हुए विधिपूर्वक स्नान किया और इच्छानुसार भगवान् जनार्दनकी पूजा की। तत्पश्चात् उन्हें तपोधन महर्षि अत्रिका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ, जिससे वे कृतकृत्य हो गये। तब धर्मात्मा राजाने महर्षि अत्रिसे देवाधिदेव भगवान्द्वारा दिखाये गये स्वप्नके वृत्तान्तको कह सुनाया। उसी समय उन्होंने देवताओंद्धारा कहे हुए इस वचनको फिर सुना—'महीपाल! यह ऐसा ही होगा, इसमें तुम्हें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।' इस प्रकार देवाधिदेव भगवान् जनार्दनकी कृपा प्राप्तकर राजाने देवार्चन किया और अग्निमें आहुतियाँ डालीं। इस तरह भगवान् केशवके वरदानसे उनकी सारी कामनाएँ पूरी हो गयीं॥३८—४८॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे ऐलाश्रमवर्णनं नाम विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णनमें ऐलाश्रमवर्णन नामक एक सौ बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२०॥

* अध्याय १२१ * ४०९


एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय

कैलास पर्वतका वर्णन, गङ्गाकी सात धाराओंका वृत्तान्त तथा जम्बूद्वीपका विवरण

संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br><br>तस्याश्रमस्योत्तरतस्त्रिपुरारिनिषेवितः ।<br>नानारत्नमयैः शृङ्गैः कल्पद्रुमसमन्वितैः ॥ १<br><br>मध्ये हिमवतः पृष्ठे कैलासो नाम पर्वतः ।<br>तस्मिन् निवसति श्रीमान् कुबेरः सह गुह्यकैः ॥ २<br><br>अप्सरोऽनुगतो राजा मोदते ह्यलकाधिपः ।<br>कैलासपादसम्भूतं पुण्यं शीतजलं शुभम् ॥ ३<br><br>मन्दोदकं नाम सरः पयस्तु दधिसंनिभम् ।<br>तस्मात् प्रवहते दिव्या नदी मन्दाकिनी शुभा ॥ ४<br><br>दिव्यं च नन्दनं तत्र तस्यास्तीरे महद्वनम् ।<br>प्रागुत्तरेण कैलासाद् दिव्यं सौगन्धिकं गिरिम् ॥ ५<br><br>सर्वधातुमयं दिव्यं सुवेलं पर्वतं प्रति ।<br>चन्द्रप्रभो नाम गिरिः यः शुभ्रो रत्नसंनिभः ॥ ६<br><br>तत्समीपे सरो दिव्यमच्छोदं नाम विश्रुतम् ।<br>तस्मात् प्रभवते दिव्या नदी ह्याच्छोदिका शुभा ॥ ७<br><br>तस्यास्तीरे वनं दिव्यं महच्चैत्ररथं शुभम् ।<br>तस्मिन् गिरौ निवसति मणिभद्रः सहानुगः ॥ ८<br><br>यक्षसेनापतिः शूरो गुह्यकैः परिवारितः ।<br>पुण्या मन्दाकिनी नाम नदी ह्याच्छोदिका शुभा ॥ ९**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! उस आश्रमकी उत्तर दिशामें हिमालय पर्वतके पृष्ठ-भागके मध्यमें कैलास नामक पर्वत स्थित है। उसपर त्रिपुरासुरके संहारक शंकरजी निवास करते हैं। उसके शिखर नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित हैं तथा उनपर कल्पवृक्ष शोभा पा रहे हैं। उस पर्वतपर श्रीमान् कुबेर गुह्यकोंके साथ निवास करते हैं। इस प्रकार अलकापुरीके अधीश्वर राजा कुबेर अप्सराओंद्वारा अनुगमन किये जाते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं। कैलासके पाद (उपत्यका)-से एक मन्दोदक नामक सरोवर प्रकट हुआ है, जिसका जल बड़ा पवित्र, निर्मल एवं शीतल है। उसका जल दहीके समान उज्ज्वल है। उसी सरोवरसे मङ्गलमयी दिव्य मन्दाकिनी नदी प्रवाहित होती है। वहाँ उस नदीके तटपर नन्दन नामक दिव्य एवं महान् वन है। कैलासकी पूर्वोत्तर दिशामें चन्द्रप्रभ नामक पर्वत है, जो रत्न-सदृश चमकदार है। वह सभी प्रकारकी धातुओंसे विभूषित तथा अनेकों प्रकारकी सुगन्धसे सुवासित दिव्य सुबेल पर्वततक फैला हुआ है। उसके निकट अच्छोद (अच्छावत) नामसे विख्यात एक दिव्य सरोवर है, उससे अच्छोदिका (अच्छोदा) नामकी कल्याणमयी दिव्य नदी उद्भूत हुई है। उस नदीके तटपर चैत्ररथ नामक दिव्य एवं सुन्दर महान् वन है। उस पर्वतपर शूरवीर यक्ष-सेनापति मणिभद्र गुह्यकोंसे घिरे हुए अपने अनुयायियोंके साथ निवास करते हैं। पुण्यमयी मन्दाकिनी तथा कल्याणकारिणी अच्छोदा—ये दोनों नदियाँ पृथ्वी-मण्डलके मध्यभागसे प्रवाहित होती हुई महासागरमें मिली हैं॥ १—९ १/२ ॥
महीमण्डलमध्ये तु प्रविष्टा सा महोदधिम् ।<br>कैलासदक्षिणे प्राच्यां शिवं सर्वौषधिं गिरिम् ॥ १०कैलासके दक्षिण-पूर्व दिशामें लाल वर्णवाला हेमशृङ्ग नामक एक विशाल पर्वत है। वह दिव्य सुवेल पर्वततक
४१०* मत्स्यपुराण *

| मनःशिलामयं दिव्यं सुवेलं पर्वतं प्रति।<br>लोहितो हेमशृङ्गस्तु गिरिः सूर्यप्रभो महान्॥ ११<br><br>तस्य पादे महद् दिव्यं लोहितं सुमहत्सरः।<br>तस्मात् प्रभवते पुण्यो लौहित्यश्च नदो महान्॥ १२<br><br>दिव्यारण्यं विशोकं च तस्य तीरे महद् वनम्।<br>तस्मिन् गिरौ निवसति यक्षो मणिधरो वशी॥ १३<br><br>सौम्यैः सुधार्मिकैश्चैव गुह्यकैः परिवारितः।<br>कैलासात् पश्चिमोदीच्यां ककुद्मानौषधिगिरिः॥ १४<br><br>ककुद्मति च रुद्रस्य उत्पत्तिश्च ककुद्मिनः।<br>तदञ्जनं त्रैककुदं शैलं त्रिककुदं प्रति॥ १५<br><br>सर्वधातुमयस्तत्र सुमहान् वैद्युतो गिरिः।<br>तस्य पादे महद् दिव्यं मानसं सिद्धसेवितम्॥ १६<br><br>तस्मात् प्रभवते पुण्या सरयूर्लोकपावनी।<br>यस्यास्तीरे वनं दिव्यं वैभ्राजं नाम विश्रुतम्॥ १७<br><br>कुवेरानुचरस्तस्मिन् प्रहेतितनयो वशी।<br>ब्रह्मधाता निवसति राक्षसोऽनन्तविक्रमः॥ १८<br><br>कैलासात् पश्चिमामाशां दिव्यः सर्वौषधिगिरिः।<br>वरुणः पर्वतश्रेष्ठो रूक्मधातुविभूषितः॥ १९<br><br>भवस्य दयितः श्रीमान् पर्वतो हैमसंनिभः।<br>शातकौम्भमयैर्दिव्यैः शिलाजालैः समाचितः॥ २०<br><br>शतसंख्यैस्तापनीयैः शृङ्गैर्दिवमिवोल्लिखन्।<br>शृङ्गवान् सुमहादिव्यो दुर्गः शैलो महाचितः॥ २१<br><br>तस्मिन् गिरौ निवसति गिरिशो धूम्रलोचनः।<br>तस्य पादात् प्रभवति शैलोदं नाम तत्सरः॥ २२ | फैला हुआ है। उसकी कान्ति सूर्यके समान है। वह मङ्गलप्रद पर्वत सभी प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न तथा मैनशिल नामक धातुसे परिपूर्ण है। उसके पाद-प्रान्तमें एक विशाल दिव्य सरोवर है, जिसका नाम लोहित है। वह पुण्यमय लौहित्य (ब्रह्मपुत्र) नामक महान् नदका उद्गमस्थान है। उस नदके तटपर विशोक नामक एक दिव्य एवं विस्तृत वन है। उस पर्वतपर मणिधर नामक यक्ष इन्द्रियोंको वशमें करके परम धार्मिक एवं सौम्य-स्वभाववाले गुह्यकोंके साथ निवास करता है। कैलासकी पश्चिमोत्तर दिशामें ककुद्मान् नामक पर्वत है, जिसपर सभी प्रकारकी ओषधियाँ सुलभ हैं। वह अञ्जन-जैसा काला तथा तीन शिखरोंसे सुशोभित है। उस ककुद्मान् पर्वतपर भगवान् रुद्रके गण ककुद्मी (नन्दिकेश्वर)-की उत्पत्ति हुई है। वहीं समस्त धातुओंसे सम्पन्न वैद्युत नामक अत्यन्त महान् पर्वत है, जो त्रिककुद् पर्वततक विस्तृत है। उसके पाद-प्रान्तमें सिद्धोंद्वारा सेवित एक महान् दिव्य मानस सरोवर है। उस सरोवरसे लोकपावनी पुण्य-सलिला सरयू* निकली हुई हैं, जिनके तटपर (वरुणका) वैभ्राज नामक सुप्रसिद्ध दिव्य वन है। उस वनमें प्रहेतिका पुत्र ब्रह्मधाता नामक राक्षस निवास करता है। वह जितेन्द्रिय, अनन्तपराक्रमी और कुबेरका अनुचर है॥ १०—१८॥<br><br>कैलासकी पश्चिम दिशामें सम्पूर्ण ओषधियोंसे सम्पन्न वरुण नामक दिव्य पर्वत है। वह पर्वतश्रेष्ठ सुवर्ण आदि धातुओंसे विभूषित, भगवान् शंकरका प्रियपात्र, शोभाशाली, स्वर्णसदृश चमकीला और स्वर्णमयी दिव्य शिलाओंसे सम्पन्न है। वह अपने स्वर्णसरीखे चमकदार सैकड़ों शिखरोंसे आकाशको छूता हुआ-सा दीख पड़ता है। वहीं शृङ्गवान् नामका एक महान् दिव्य पर्वत है, जो समृद्धिशाली एवं दुर्गम है। उस पर्वतपर धूम्रलोचन भगवान् शिव निवास करते हैं। उस पर्वतके पाद-प्रान्तमें शैलोद नामक सरोवर है। उसीसे मङ्गलमयी पुण्यतोया शैलोदका नामकी नदी प्रवाहित होती है। उसे चक्षुषी |


* इस अध्यायका हिमालयसे सम्बद्ध भौगोलिक विवरण बड़े महत्त्वका है और यह वर्णन बहुत कुछ कालिकापुराणसे मिलता है।

* अध्याय १२१ * । ४११

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मात् प्रभवते पुण्या नदी शैलोदका शुभा।<br>सा चक्षुषी तयोर्मध्ये प्रविष्टा पश्चिमोदधिम्॥ २३<br>अस्त्युत्तरेण कैलासाच्छिवः सर्वौषधो गिरिः।<br>गौरं तु पर्वतश्रेष्ठं हरितालमयं प्रति॥ २४<br>हिरण्यशृङ्गः सुमहान् दिव्यौषधिमयो गिरिः।<br>तस्य पादे महद् दिव्यं सरः काञ्चनवालुकम्॥ २५<br>रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः।<br>गङ्गार्थे स तु राजर्षिरुवास बहुलाः समाः॥ २६<br>दिवं यास्यन्तु मे पूर्वे गङ्गातोयाप्लुतास्थिकाः।<br>तत्र त्रिपथगा देवी प्रथमं तु प्रतिष्ठिता॥ २७<br>सोमपादात् प्रसूता सा सप्तधा प्रविभज्यते।<br>यूपा मणिमयास्तत्र विमानाश्च हिरण्मयाः॥ २८<br>तत्रेष्ट्वा क्रतुभिः सिद्धः शक्रः सुरगणैः सह।<br>दिव्यश्छायापथस्तत्र नक्षत्राणां तु मण्डलम्॥ २९<br>दृश्यते भासुरा रात्रौ देवी त्रिपथगा तु सा।<br>अन्तरिक्षं दिवं चैव भावयित्वा भुवं गता॥ ३०<br>भवोत्तमाङ्गे पतिता संरुद्धा योगमायया।<br>तस्या ये बिन्दवः केचित्क्रुद्धायाः पतिता भुवि॥ ३१<br>कृतं तु तैर्बहुसरस्ततो बिन्दुसरः स्मृतम्।<br>ततस्तस्या निरुद्धाया भवेन सहसा रुषा॥ ३२<br>ज्ञात्वा तस्या ह्यभिप्रायं क्रूरं देव्याश्चिकीर्षितम्।<br>भित्त्वा विशामि पातालं स्रोतसा गृह्य शङ्करम्॥ ३३<br>अथावलेपं तं ज्ञात्वा तस्याः क्रुद्धस्तु शङ्करः।<br>तिरोभावयितुं बुद्धिरासीदङ्गेषु तां नदीम्॥ ३४<br>एतस्मिन्नेव काले तु दृष्ट्वा राजानमग्रतः।<br>धमनीसंततं क्षीणं क्षुधाव्याकुलितेन्द्रियम्॥ ३५भी कहते हैं। वह उन दोनों पर्वतोंके बीचसे बहती हुई पश्चिम-सागरमें जा मिली है। कैलासकी उत्तर दिशामें हिरण्यशृङ्ग नामका अत्यन्त विशाल पर्वत है, जो हरितालसे परिपूर्ण पर्वतश्रेष्ठ गौरतक फैला हुआ है। इस कल्याणकारी पर्वतपर दिव्य ओषधियाँ प्राप्त होती हैं। इसके पादप्रान्तमें बिन्दुसर नामक अत्यन्त रमणीय दिव्य सरोवर है, जो सुवर्णके समान बालुकासे युक्त है। यहींपर राजर्षि भगीरथने 'मेरे पूर्वज गङ्गाजलसे हड्डियोंके अभिषिक्त हो जानेपर स्वर्गलोकको चले जायँ, इस भावनासे भावित होकर गङ्गाको भूतलपर लानेके लिये बहुत वर्षोंतक (तप करते हुए) निवास किया था। इसलिये त्रिपथगा* गङ्गादेवी सर्वप्रथम वहीं प्रतिष्ठित हुई थीं और सोम पर्वतके पादसे निकलकर सात भागोंमें विभक्त हो गयीं। उस सरोवरके तटपर अनेकों मणिमय यज्ञस्तम्भ तथा स्वर्णमय विमान शोभा पा रहे थे। वहाँ देवताओंके साथ इन्द्रने यज्ञोंका अनुष्ठान कर सिद्धि लाभ किया था। वहाँ दिव्य छायापथ तथा नक्षत्रोंका मण्डल विद्यमान है। वहाँ त्रिपथगा गङ्गादेवी रातमें चमकती हुई दीख पड़ती हैं॥ १९—२९ १/२ ॥<br><br>गङ्गादेवी स्वर्गलोक और अन्तरिक्षलोकको पवित्र कर भूतलपर आयीं और वे शिवजीके मस्तकपर गिरीं। तब शिवजीने अपनी योगमायाके बलसे उन्हें वहीं रोक दिया। (इससे गङ्गादेवी क्रुद्ध हो गयीं।) उस समय उन कुपित हुई गङ्गादेवीकी जो कुछ बूँदें पृथ्वीपर गिरीं, उनसे 'बहुसर' नामक एक सरोवर बन गया, वही आगे चलकर 'बिन्दुसर' नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस समय शिवजीके सहसा रोक लिये जानेपर गङ्गादेवी क्रुद्ध होकर ऐसा विचार करने लगीं कि मैं अपनी धाराके साथ शङ्करको बहाती हुई पृथ्वीको फोड़कर पातालमें प्रवेश कर जाऊँगी। जब शङ्करजीको गङ्गाकी यह कुचेष्टा और क्रूर अभिप्राय ज्ञात हुआ, तब वे उसे गङ्गाका अभिमान समझकर क्रुद्ध हो गये और उस नदी-रूपिणी गङ्गाको अपने अङ्गोंमें ही लीन कर लेनेका विचार करने लगे; परंतु ठीक इसी समय राजा भगीरथ, जिनकी इन्द्रियाँ भूखसे व्याकुल हो गयी थीं तथा जिनके शरीरमें नसेंमात्र दीख रही थीं, शिवजीके सम्मुख आ गये।

* वाल्मी० रामायण (१। ४४। ६)-के अनुसार गङ्गा भू, पाताल, स्वर्ग—इन तीन पथों—मार्गोंको भावित—पवित्र करनेके कारण 'त्रिपथगा' कही जाती हैं—'त्रीन् पथो भावयतीति तस्मात्त्रिपथगा स्मृता।'

४१२ * मत्स्यपुराण *


| अनेन तोषितश्चाहं नद्यर्थे पूर्वमेव तु।<br>बुद्ध्वास्य वरदानं तु ततः कोपं न्ययच्छत॥ ३६<br><br>ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा यदुक्तं धारयन् नदीम्।<br>ततो विसर्जयामास संरुद्धां स्वेन तेजसा॥ ३७<br><br>नदीं भगीरथस्यार्थे तपसोग्रेण तोषितः।<br>ततो विसर्जयामास सप्त स्रोतांसि गङ्गया॥ ३८ | उन क्षीणकाय नरेशको देखकर शङ्करजी विचारमें पड़ गये कि इसने तो पहले ही इस नदीको भूतलपर लानेके लिये तपस्याद्वारा मुझे संतुष्ट कर लिया है। फिर अपने द्वारा राजाको दिये गये वरदानको यादकर उन्होंने अपने क्रोधको रोक लिया। तत्पश्चात् गङ्गा नदीको धारण करते समय ब्रह्माद्वारा कहे गये वचनोंको सुनकर तथा भगीरथकी उग्र तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शङ्करने अपने तेजसे रोकी हुई गङ्गा नदीको छोड़ दिया। इसके बाद गङ्गा सात धाराओंमें विभक्त होकर प्रवाहित हुई॥ ३०—३८॥ | | त्रीणि प्राचीमभिमुखं प्रतीचीं त्रीण्यथैव तु।<br>स्रोतांसि त्रिपथायास्तु प्रत्यपद्यन्त सप्तधा॥ ३९<br><br>नलिनी ह्लादिनी चैव पावनी चैव प्राच्यगाः।<br>सीता चक्षुश्च सिन्धुश्च तिस्त्रस्ता वै प्रतीच्यगाः॥ ४०<br><br>सप्तमी त्वनुगा तासां दक्षिणेन भगीरथम्।<br>तस्माद् भागीरथी सा वै प्रविष्टा दक्षिणोदधिम्॥ ४१<br><br>सप्त चैताः प्लावयन्ति वर्षं तु हिमसाह्वयम्।<br>प्रसूताः सप्त नद्यस्तु शुभा बिन्दुसरोद्भवाः॥ ४२<br><br>तान् देशान् प्लावयन्ति स्म म्लेच्छप्रायांश्च सर्वशः।<br>सशैलान् कुकुरान् रौध्रान् बर्बरान् यवनान् खसान्॥ ४३<br><br>पुलिन्दांश्च कुलत्थांश्च अङ्गलौक्यान् वरांश्च यान्।<br>कृत्वा द्विधा हिमवन्तं प्रविष्टा दक्षिणोदधिम्॥ ४४ | त्रिपथगा गङ्गाकी तीन धाराएँ पूर्वाभिमुखी तथा तीन पश्चिमाभिमुखी प्रवाहित हुई (और सातवीं धारा स्वयं भागीरथी गङ्गा थीं)। इस प्रकार वे सात धाराओंमें विभक्त हो गयीं। उनमें पूर्व दिशामें बहनेवाली धाराओंका नाम नलिनी, ह्लादिनी और पावनी है तथा पश्चिम दिशामें प्रवाहित होनेवाली तीनों धाराएँ सीता, चक्षु और सिंधु नामसे कही गयी हैं। उनमें सातवीं धारा भगीरथके पीछे-पीछे दक्षिण दिशाकी ओर चली और दक्षिणसागरमें प्रविष्ट हो गयी, इसी कारण वह भागीरथी नामसे प्रसिद्ध हुई। ये ही सातों धाराएँ हिमवर्षको आप्लावित करती हैं। इस प्रकार ये सातों नदियाँ बिन्दुसरसे निकली हुई हैं। ये सब ओरसे उन म्लेच्छप्राय देशोंको सींचती हैं, जो पर्वतीय कुकुर, रौध्र, बर्बर, यवन, खस, पुलिन्द, कुलत्थ, अङ्गलौक्य और वर नामसे कहे जाते हैं। इस प्रकार गङ्गा हिमवान्‌को दो भागोंमें विभक्त कर दक्षिणसमुद्रमें प्रवेश कर गयी हैं। | | अथ वीरमरूंश्चैव कालिकांश्चैव शूलिकान्।<br>तुषारान् बर्बरान् कारान् पह्लवान् पारदाञ्छकान्॥ ४५<br><br>एताञ्जनपदांश्चक्षुः प्लावयित्वोदधिं गता।<br>दरदोर्जगुडांश्चैव गान्धारानौरसान् कुहून्॥ ४६<br><br>शिवपौरानिन्द्रमरून् वसतीन् समतेजसम्।<br>सैन्धवानुर्वशांन् बर्बान् कुपथान् भीमरोमकान्॥ ४७<br><br>शुनामुखांश्चोर्दमरून् सिन्धुरेतान् निषेवते।<br>गन्धर्वान् किंनरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान्॥ ४८<br><br>कलापग्रामकांश्चैव तथा किम्पुरुषान् नरान्।<br>किरातांश्च पुलिन्दांश्च कुरून् वै भारतानपि॥ ४९ | इसके बाद चक्षु (वंक्षु) नदी वीरमरु, कालिक, शूलिक, तुषार, बर्बर, कार, पह्लव, पारद और शक—इन देशोंको आप्लावित कर समुद्रमें मिल गयी है। सिन्धु नदी दरद, उर्जगुड, गान्धार, औरस, कुहू, शिवपौर, इन्द्रमरु, वसति, सैन्धव, उर्वश, वर्ब, कुपथ, भीमरोभक, शुनामुख और उर्दमरु—इन देशोंकी सेवा करती अर्थात् इन देशोंमें बहती है। मङ्गलमयी गङ्गा गन्धर्व, किंनर, यक्ष, राक्षस, विद्याधर, नाग, कलापग्रामवासी जन, किम्पुरुष, किरात, पुलिन्द, कुरु, भारत, पाञ्चाल, कौशिक मत्स्य (विराट), मगध, अङ्ग, |

  • अध्याय १२१ * ४१३
पाञ्चालान् कौशिकान् मत्स्यान् मागधाङ्गांस्तथैव च।<br>सुह्मोत्तरांश्च वङ्गांश्च ताम्रलिप्तांस्तथैव च॥ ५०<br>एताञ्जनपदानार्यान् गङ्गा भावयते शुभा।<br>ततः प्रतिहता विन्ध्ये प्रविष्टा दक्षिणोदधिम्॥ ५१उत्तरसुह्म, वङ्ग और ताम्रलिप्त—इन आर्य देशोंको पवित्र करती हैं। इस प्रकार वे (हिमालयसे निकलकर) विन्ध्यपर्वतसे अवरुद्ध होकर पूर्वकी ओर आगे बढ़ती हुई दक्षिणसमुद्रमें मिल गयी हैं॥ ३९–५१॥
ततस्तु ह्लादिनी पुण्या प्राचीनाभिमुखी ययौ।<br>प्लावयन्त्युपकांश्चैव निषादानपि सर्वशः॥ ५२<br>धीवरानृषिकांश्चैव तथा नीलमुखानपि।<br>केकरानेककर्णांश्च किरातानपि चैव हि॥ ५३<br>कालञ्जरान् विकर्णांश्च कुशिकान् स्वर्गभौमकान्।<br>सा मण्डले समुद्रस्य तीरे भूत्वा तु सर्वशः॥ ५४<br>ततस्तु नलिनी चापि प्राचीमेव दिशं ययौ।<br>कुपथान् प्लावयन्ती सा इन्द्रद्युम्नसरांस्यपि॥ ५५<br>तथा खरपथान् देशान् वेत्रशङ्कुपथानपि।<br>मध्येनोजानकमरून् कुथप्रावरणान् ययौ॥ ५६<br>इन्द्रद्वीपसमीपे तु प्रविष्टा लवणोदधिम्।<br>ततस्तु पावनी प्रायात् प्राचीमाशां जवेन तु॥ ५७<br>तोमरान् प्लावयन्ती च हंसमार्गान् समूहकान्।<br>पूर्वान् देशांश्च सेवन्ती भित्त्वा सा बहुधा गिरिम्।<br>कर्णप्रावरणान् प्राप्य गता साश्वमुखानपि॥ ५८<br>सिक्त्वा पर्वतमेरुं सा गत्वा विद्याधरानपि।<br>शैमिमण्डलकोष्ठं तु सा प्रविष्टा महत्सरः॥ ५९<br>तासां नद्युपनद्योऽन्याः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>उपगच्छन्ति ता नद्यो यतो वर्षति वासवः॥ ६०इसी प्रकार पुण्यतोया ह्लादिनी, जो पूर्वाभिमुखी प्रवाहित होती है, उपका, निषाद, धीवर, ऋषिक, नीलमुख, केकर, अनेककर्ण, किरात, कालेंजर, विकर्ण, कुशिक और स्वर्गभौमक—इन सभी देशोंको सींचती हुई समुद्रमण्डलके तटपर पहुँचकर उसमें लीन हो गयी है।<br><br>नलिनी नदी भी बिन्दुसरसे निकलकर पूर्व दिशाकी ओर प्रवाहित हुई है। वह कुपथ, इन्द्रद्युम्नसर, खरपथ, वेत्र (ट) द्वीप, शङ्कुपथ आदि प्रदेशोंको सींचती हुई उज्जानक (जूनागढ़) मरुके मध्यभागसे बहती हुई कुथप्रावरणकी ओर चली गयी है तथा इन्द्रद्वीपके निकट लवणसागरमें मिल गयी है। उसी (मूल) सरोवरसे पावनी नदी बड़े वेगसे पूर्व दिशाकी ओर बहती है। वह तोमर, हंसमार्ग और समूहक देशोंको सींचती हुई पूर्वी देशोंमें जा पहुँचती है। वहाँ अनेकों प्रकारसे पर्वतको विदीर्ण करके कर्णप्रावरणमें पहुँचकर अश्वमुख देशमें चली जाती है। इसके बाद मेरु पर्वतको सींचती हुई विद्याधरोंके लोकोंमें जाकर शैमिमण्डलकोष्ठ नामक महान् सरोवरमें प्रवेश कर जाती है। इनकी छोटी-बड़ी सैकड़ों-हजारों सहायक नदियाँ भी हैं, जो पृथक्-पृथक् इन्हींमें आकर मिली हैं। इन्हींके जलको ग्रहण कर इन्द्र वर्षा करते हैं॥ ५२–६०॥
तीरे वंशौकसारायाः सुरभिर्नाम तद् वनम्।<br>हिरण्यशृङ्गो वसति विद्वान् कौबेरको वशी॥ ६१<br>यज्ञादपेतः सुमहान्मितौजाः सुविक्रमः।<br>तत्रागस्त्यैः परिवृता विद्वद्भिर्ब्रह्मराक्षसैः॥ ६२<br>कुबेरानुचरा ह्येते चत्वारस्तत्समाशिताः।<br>एवमेव तु विज्ञेया सिद्धिः पर्वतवासिनाम्॥ ६३वंशौकसाराके तटपर सुरभि नामक वह वन है, जिसमें जितेन्द्रिय एवं विद्वान् हिरण्यशृङ्ग निवास करता है। वह कुबेरका अनुचर, यज्ञसे विमुख, अमित तेजस्वी एवं परम पराक्रमी है। वहीं अगस्त्यगोत्रीय विद्वान् ब्रह्मराक्षसोंका भी निवासस्थान है। (उनकी संख्या चार है।) वे चारों कुबेरके अनुचर हैं, जो उसी हिरण्यशृङ्गके आश्रममें रहते हैं। इसी प्रकार पर्वतनिवासियोंकी सिद्धि समझनी चाहिये।
४१४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
परस्परेण द्विगुणा धर्मतः कामतोऽर्थतः।<br>हेमकूटस्य पृष्ठे तु सर्पाणां तत् सरः स्मृतम्॥ ६४<br>सरस्वती प्रभवति तस्माज्ज्योतिष्मती तु या।<br>अवगाढे ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ॥ ६५<br>सरो विष्णुपदं नाम निषधे पर्वतोत्तमे।<br>यस्मादग्रे प्रभवति गन्धर्वानुकुले च ते॥ ६६<br>मेरोः पार्श्वात् प्रभवति हृदश्चन्द्रप्रभो महान्।<br>जम्बूश्चैव नदी पुण्या यस्यां जाम्बूनदं स्मृतम्॥ ६७<br>पयोदस्तु ह्रदो नीलः स शुभः पुण्डरीकवान्।<br>पुण्डरीकात् पयोदाच्च तस्माद् द्वे सम्प्रसूतयाम्॥ ६८<br>सरसस्तु सरस्वैतत् स्मृतमुत्तरमानसम्।<br>मृग्या च मृगकान्ता च तस्माद् द्वे सम्प्रसूतयाम्॥ ६९<br>ह्रदाः कुरुषु विख्याताः पद्ममीनकुलाकुलाः।<br>नाम्ना ते वैजया नाम द्वादशोदधिसन्निभाः॥ ७०<br>तेभ्यः शान्ती च मध्वी च द्वे नद्यौ सम्प्रसूतयाम्।<br>किम्पुरुषाद्यानि यान्यष्टौ तेषु देवो न वर्षति॥ ७१<br>उद्भिदान्युदकान्यत्र प्रवहन्ति सरिद्वराः।<br>बलाहकश्च ऋषभो चक्रो मैनाक एव च॥ ७२वह धर्म, काम और अर्थके अनुसार परस्पर दुगुना फल देनेवाली होती है। हेमकूट पर्वतके पृष्ठभागपर जो सर्पोंका सरोवर बतलाया जाता है, उसीसे सरस्वती और ज्योतिष्मती नामकी दो नदियाँ निकली हैं। वे क्रमशः पूर्व और पश्चिम समुद्रमें जाकर मिली हैं। पर्वतश्रेष्ठ निषधपर विष्णुपद नामक सरोवर है, जो उसी पर्वतके अग्रभागसे निकला हुआ है। वे दोनों (नाग और विष्णुपद) सरोवर गन्धर्वोंके अनुकूल हैं। मेरुके पार्श्वभागसे चन्द्रप्रभ नामक महान् सरोवर तथा पुण्यसलिला जम्बू नदी निकलती है। जम्बू नदीमें जाम्बूनद नामक सुवर्ण पाया जाता है। वहीं पयोद और पुण्डरीकवान् नामक दो सरोवर और हैं, जिनका जल क्रमशः नील और श्वेत है। इन पुण्डरीक और पयोद सरोवरोंसे दो सरोवर और प्रकट हुए हैं। उनमें एक सरोवरसे निकला हुआ सर उत्तरमानस नामसे प्रसिद्ध है। उससे मृग्या और मृगकान्ता नामकी दो नदियाँ निकली हैं। कुरुदेशमें सागरके समान अगाध एवं विस्तृत बारह ह्रद हैं, जो कमलों और मछलियोंसे भरे रहते हैं, वे 'वैजय' नामसे विख्यात हैं। उनसे शान्ती और मध्वी नामकी दो नदियाँ निकली हैं। किम्पुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं, उनमें इन्द्रदेव वर्षा नहीं करते, अपितु वहाँकी बड़ी-बड़ी नदियाँ ही अन्नोत्पादक जलको प्रवाहित करती हैं॥ ६१—७१ ½॥
विनिविष्टाः प्रतिदिशं निमग्ना लवणाम्बुधिम्।<br>चन्द्रकान्तस्तथा द्रोणः सुमहांच्छ शिलोच्चयः॥ ७३बलाहक, ऋषभ, चक्र और मैनाक—ये चारों पर्वत क्रमशः चारों दिशाओंमें लवणसागरतक फैले हुए हैं।
उद्गायता उदीच्यां तु अवगाढा महोदधिम्।<br>चक्रो बधिरकश्चैव तथा नारदपर्वतः॥ ७४चन्द्रकान्त, द्रोण तथा सुमहान्—इन पर्वतोंका विस्तार उत्तर दिशामें महासागरतक है।
प्रतीचीमायतास्ते वै प्रतिष्ठास्ते महोदधिम्।<br>जीमूतो द्रावणश्चैव मैनाकश्चन्द्रपर्वतः॥ ७५चक्र, बधिरक और नारद—ये पर्वत पश्चिम दिशामें फैले हुए हैं। इनका विस्तार महासागरतक है।
आयतास्ते महाशैलाः समुद्रं दक्षिणां प्रति।<br>चक्रमैनाकयोर्मध्ये दिवि संदक्षिणापथे॥ ७६जीमूत, द्रावण, मैनाक और चन्द्र—ये महापर्वत दक्षिण दिशामें दक्षिण समुद्रतक विस्तृत हैं। दक्षिणापथके समुद्रमें चक्र और मैनाक पर्वतके मध्यमें संवर्तक नामक अग्निका निवास है। वह उस सागरके जलको पीता है। समुद्रमें निवास करनेवाला और्व नामक अग्नि है,

१२३- गोमेदकद्वीप और पुष्करद्वीपका वर्णन

  • अध्याय १२२ * ४१५

तत्र संवर्तको नाम सोऽग्निः पिबति तज्जलम्।<br>अग्निः समुद्रवासस्तु और्वोऽसौ वडवामुखः<sup></sup>॥ ७७इसे बडवाग्नि कहते हैं। जिसका मुख घोड़ीके समान है। (वह भी समुद्रके जलको सोखता रहता है।) पूर्वकालमें जब इन्द्र पर्वतोंका पक्षच्छेदन कर रहे थे, उस समय ये चारों पर्वत इन्द्रके भयसे भीत होकर लवणसागरमें भागकर छिप गये थे। ये पर्वत चन्द्रमाके शुक्लपक्षमें आनेपर दीखते हैं एवं कृष्णपक्ष आनेपर समुद्रमें डूब जाते हैं। भारतवर्षके जो भेद दीख पड़ते हैं, उनका वर्णन यहाँ किया गया। अन्य वर्षोंका वर्णन अन्यत्र किया जा चुका है। इन वर्षोंमें प्रत्येक वर्ष एक-दूसरेकी अपेक्षा उत्तरोत्तर गुणोंमें अधिक है। इन वर्षोंमें सभी प्राणी विभागपूर्वक आरोग्य और आयुके प्रमाणसे तथा धर्म, काम और अर्थसे युक्त होकर निवास करते हैं। उन सभी वर्षोंमें उन प्राणियोंकी अनेकों जातियाँ भी हैं। इस प्रकार इस विश्व एवं इस जगत्को धारण करती हुई पृथ्वी स्थित है॥ ७२—८२॥
इत्येते पर्वताविष्टाश्चत्वारो लवणोदधिम्।<br>छिद्यमानेषु पक्षेषु पुरा इन्द्रस्य वै भयात्॥ ७८
तेषां तु दृश्यते चन्द्रे शुक्ले कृष्णे समाप्लुतिः।<br>ते भारतस्य वर्षस्य भेदा येन प्रकीर्तिताः॥ ७९
इहोदितस्य दृश्यन्ते अन्ये त्वन्यत्र चोदिताः।<br>उत्तरोत्तरमेतेषां वर्षमुद्रिच्यते गुणैः॥ ८०
आरोग्यायःप्रमाणाभ्यां धर्मतः कामतोऽर्थतः।<br>समन्वितानि भूतानि तेषु वर्षेषु भागशः॥ ८१
वसन्ति नानाजातीनि तेषु सर्वेषु तानि वै।<br>इत्येतद् धारयद् विश्वं पृथ्वी जगदिदं स्थिता॥ ८२

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे जम्बूद्वीपवर्णनं नामैकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णनमें जम्बूद्वीपवर्णन नामक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२१॥


एक सौ बाईसवाँ अध्याय

शाकद्वीप, कुशद्वीप, क्रौञ्चद्वीप और शाल्मलद्वीपका वर्णन<sup></sup>

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
शाकद्वीपस्य वक्ष्यामि यथावदिह निश्चयम्।<br>कथ्यमानं निबोधध्वं शाकं द्वीपं द्विजोत्तमाः॥ १द्विजवरो! अब मैं शाकद्वीपका निश्चितरूपसे यथार्थ वर्णन कर रहा हूँ। आपलोग मेरे कथनानुसार शाकद्वीपके विषयमें जानकारी प्राप्त करें। शाकद्वीपका विस्तार जम्बूद्वीपके विस्तारसे दुगुना है और चारों ओरसे उसका फैलाव विस्तारसे भी तिगुना है। उस द्वीपसे यह लवणसागर घिरा हुआ है। शाकद्वीपमें अनेकों पुण्यमय जनपद हैं। वहाँके निवासी लम्बी आयु भोग कर मरते हैं। भला, उन क्षमाशील एवं तेजस्वी जनोंके प्रति दुर्भिक्षकी सम्भावना कहाँसे हो सकती है।
जम्बूद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः।<br>विस्तारात् त्रिगुणश्चापि परिणाहः समन्ततः॥ २
तेनावृतः समुद्रोऽयं द्वीपेन लवणोदधिः।<br>तत्र पुण्या जनपदाश्चिराच्च म्रियते जनः॥ ३

१. आर्यभट्टीय आदिके अनुसार वडवामुख दक्षिणी ध्रुवके पास एक स्थान है, जिस मार्गसे लोग पातालमें प्रवेश करते थे। बडवाग्निको वडवाचक्र, वडवाभृगु; हुतृ आदि भी कहा गया है। महावीरचरितमें इसके रूप आदिका भी वर्णन है।
२. प्रायः सभी पुराणोंके भुवनकोश-प्रकरणमें इन सभी द्वीपोंका वर्णन है, पर मत्स्यपुराणसे उनके नामक्रमादिमें कुछ भेद है। W. Kirifel के भुवनकोश—(Das Pnrana Von, Weltge-banden P, III.F. Bharatvarsha 1931) ग्रन्थमें इन सबका एकत्र सूक्ष्म तुलनात्मक अध्ययन विशेष महत्त्वका है।

४१६ * मत्स्यपुराण *

| कुत एव च दुर्भिक्षं क्षमातेजोयुतेष्विह।<br>तत्रापि पर्वताः शुभ्राः सप्तैव मणिभूषिताः॥ ४<br>शाकद्वीपादिषु त्वेषु सप्त सप्त नगास्त्रिषु।<br>ऋज्वायताः प्रतिदिशं निविष्टा वर्षपर्वताः॥ ५<br>रत्नाकूराद्रिनामानः सानुमन्तो महाचिताः।<br>समोदिताः प्रतिदिशं द्वीपविस्तारमानतः॥ ६<br>उभयत्रावगाढौ च लवणक्षीरसागरौ।<br>शाकद्वीपे तु वक्ष्यामि सप्त दिव्यान् महाचलान्॥ ७<br>देवर्षिगन्धर्वयुतः प्रथमो मेरुरुच्यते।<br>प्रागायतः स सौवर्ण उदयो नाम पर्वतः॥ ८<br>तत्र मेघास्तु वृष्ट्यर्थं प्रभवन्त्यपयान्ति च।<br>तस्यापरेण सुमहाञ्जलधारो महागिरिः॥ ९<br>स वै चन्द्रः समाख्यातः सर्वौषधिसमन्वितः।<br>तस्मान्नित्यमुपादत्ते वासवः परमं जलम्॥ १०<br><br>नारदो नाम चैवोक्तो दुर्गशैलो महाचितः।<br>तत्राचलौ समुत्पन्नौ पूर्वं नारदपर्वतौ॥ ११<br>तस्यापरेण सुमहाञ्श्यामो नाम महागिरिः।<br>यत्र श्यामत्वमापन्नाः प्रजाः पूर्वमिमाः किल॥ १२<br>स एव दुन्दुभिर्नाम श्यामपर्वतसंनिभः।<br>शब्दमृत्युः पुरा तस्मिन् दुन्दुभिस्ताडितः सुरैः॥ १३<br>रत्नमालान्तरमयः शाल्मलश्चान्तरालकृत्।<br>तस्यापरेण रजतो महानस्तो गिरिः स्मृतः॥ १४<br>स वै सोमक इत्युक्तो देवैर्यत्रामृतं पुरा।<br>सम्भृतं च हृतं चैव मातुरर्थे गरुत्मता॥ १५<br>तस्यापरे चाम्बिकेयः सुमनाश्चैव स स्मृतः।<br>हिरण्याक्षो वराहेण तस्मिञ्शैले निषूदितः॥ १६<br>आम्बिकेयात् परो रम्यः सर्वौषधिनिषेवितः।<br>विभ्राजस्तु समाख्यातः स्फाटिकस्तु महान् गिरिः॥ १७ | इस द्वीपमें भी मणियोंसे विभूषित श्वेत रंगके सात पर्वत हैं। शाकद्वीप आदि तीन द्वीपोंमें सात-सात पर्वत हैं, जो चारों दिशाओंमें सीधे फैले हुए हैं। ये ही वहाँ वर्षपर्वत कहलाते हैं। ये रत्नाकूराद्रि नामवाले वर्षपर्वत ऊँचे शिखरोंसे युक्त तथा वृक्षोंसे सम्पन्न हैं। ये द्वीप विस्तारके परिमाणकी समानतामें चारों दिशाओंमें फैले हुए हैं और एक ओर क्षीरसागरतक तथा दूसरी ओर लवणसागरतक पहुँच गये हैं। अब मैं शाकद्वीपके सातों दिव्य महापर्वतोंका वर्णन कर रहा हूँ। उनमें पहला पर्वत मेरु कहा जाता है, जो देवो, ऋषियों और गन्धर्वोंसे सुसेवित है। वह स्वर्णमय पर्वत पूर्व दिशामें फैला हुआ है। उसका दूसरा नाम 'उदयगिरि' है। वहाँ मेघगण वृष्टि करनेके लिये आते हैं और (जल बरसाकर) चले जाते हैं। उसके पार्श्वभागमें सम्पूर्ण ओषधियोंसे सम्पन्न जलधार नामक अत्यन्त विशाल पर्वत है। वह चन्द्र नामसे भी विख्यात है। उसी पर्वतसे इन्द्र नित्य अधिक-से-अधिक जल ग्रहण करते हैं॥ १—१०॥<br><br>वहीं महान् समृद्धिशाली नारद नामक पर्वत है, जिसे दुर्गशैल भी कहते हैं। पूर्वकालमें ये दोनों नारद और दुर्गशैल पर्वत यहीं उत्पन्न हुए थे। उसके बाद श्याम नामक अत्यन्त विशाल पर्वत है, जहाँ पूर्वकालमें ये सारी प्रजाएँ श्यामलतको प्राप्त हो गयी थीं। श्यामपर्वतके सदृश काले रंगवाला वहीं दुन्दुभि पर्वत भी है, जिसपर प्राचीनकालमें देवताओंद्धारा दुन्दुभिके बजाये जानेपर उसके शब्दसे ही (शत्रुओंकी) मृत्यु हो जाती थी। इसके अन्तःप्रदेशमें रत्नोंके समूह भरे पड़े हैं और यह सेमलके वृक्षोंसे सुशोभित है। उसके बाद महान् अस्ताचल है, जो रजतमय है। उसे सोमक भी कहते हैं। इसी पर्वतपर पूर्वकालमें गरुड़ने अपनी माताके हितार्थ देवताओंद्धारा संचित किये गये अमृतका अपहरण किया था। उसके बाद आम्बिकेय नामक महापर्वत है, जिसे सुमना भी कहते हैं। इसी पर्वतपर वराहभगवान्‌ने हिरण्याक्षक वध किया था। आम्बिकेय पर्वतके बाद सम्पूर्ण ओषधियोंसे परिपूर्ण एवं स्फटिककी शिलाओंसे व्याप्त परम रमणीय महान् पर्वत है, जो विभ्राज नामसे विख्यात है। इससे अग्नि विशेष उद्दीप्त होती है, इसी |

* अध्याय १२२ *४१७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यस्माद् विभ्राजते वह्निर्विभ्राजस्तेन स स्मृतः।<br>सैवेह केशवत्युक्तो यतो वायुः प्रवाति च॥ १८कारण इसे विभ्राज कहते हैं। इसीको 'केशव' भी कहते हैं। यहींसे वायुकी गति प्रारम्भ होती है॥ ११–१८॥
तेषां वर्षाणि वक्ष्यामि पर्वतानां द्विजोत्तमाः।<br>शृणुध्वं नामतस्तानि यथावदनुपूर्वशः॥ १९<br>द्विनामान्येव वर्षाणि यथैव गिरयस्तथा।<br>उदयस्योदयं वर्षं जलधारेति विश्रुतम्॥ २०<br>नाम्ना गतभयं नाम वर्षं तत् प्रथमं स्मृतम्।<br>द्वितीयं जलधारस्य सुकुमारमिति स्मृतम्॥ २१<br>तदेव शैशिरं नाम वर्षं तत् परिकीर्तितम्।<br>नारदस्य च कौमारं तदेव च सुखोदयम्॥ २२<br>श्यामपर्वतवर्षं तदनीचक्रमिति स्मृतम्।<br>आनन्दकमिति प्रोक्तं तदेव मुनिभिः शुभम्॥ २३<br>सोमकस्य शुभं वर्षं विज्ञेयं कुसुमोत्करम्।<br>तदेवासितमित्युक्तं वर्षं सोमकसंज्ञितम्॥ २४<br>आम्बिकेयस्य मैनाकं क्षेमकं चैव तत्स्मृतम्।<br>तदेव ध्रुवमित्युक्तं वर्षं विभ्राजसंज्ञितम्॥ २५द्विजवरो ! अब मैं उन पर्वतोंके वर्षोंका यथार्थरूपसे नामनिर्देशानुसार आनुपूर्वी वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। जिस प्रकार वहाँके पर्वत दो नामवाले हैं, उसी तरह वर्षोंके भी दो-दो नाम हैं। उदयपर्वतके वर्ष उदय और जलधार नामसे प्रसिद्ध हैं। उनमें जो पहला उदय वर्ष है, वह गतभय नामसे अभिहित होता है। दूसरे जलधार पर्वतके वर्षको सुकुमार कहते हैं। वही शैशिर वर्षके नामसे भी विख्यात है। नारदपर्वतके वर्षका नाम कौमार है। उसीको सुखोदय भी कहते हैं। श्यामपर्वतका वर्ष अनीचक्र नामसे कहा जाता है। उसी मङ्गलमय वर्षको मुनिगण आनन्दक नामसे पुकारते हैं। सोमक पर्वतके कल्याणमय वर्षको कुसुमोत्कर नामसे जानना चाहिये। उसी सोमक नामवाले वर्षको असित भी कहा जाता है। आम्बिकेय पर्वतके वर्ष मैनाक और क्षेमक नामसे प्रसिद्ध हैं। (सातवें केसर पर्वतके वर्षका नाम) विभ्राज है। वही ध्रुव नामसे भी कहा जाता है॥ १९–२५॥
द्वीपस्य परिणाहं च ह्रस्वदीर्घत्वमेव च।<br>जम्बूद्वीपेन संख्यातं तस्य मध्ये वनस्पतिम्॥ २६<br>शाको नाम महावृक्षः प्रजास्तस्य महानुगाः।<br>एतेषु देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः॥ २७<br>विहरन्ति रमन्ते च दृश्यमानाश्च तैः सह।<br>तत्र पुण्या जनपदाश्चातुर्वर्ण्यसमन्विताः॥ २८<br>तेषु नद्यश्च सप्तैव प्रतिवर्षं समुद्रगाः।<br>द्विनाम्ना चैव ताः सर्वा गङ्गाः सप्तविधाः स्मृताः॥ २९शाकद्वीपका विस्तार तथा लम्बाई-चौड़ाई जम्बूद्वीपके परिमाणसे अधिक है। (यह ऊपर बतला चुके हैं।) इस द्वीपके मध्यभागमें शाक नामका एक महान् वनस्पति है। इस द्वीपकी प्रजाएँ महापुरुषोंका अनुगमन करनेवाली हैं। इन वर्षोंमें देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण विहार करते हैं और उनकी रमणीयता देखते हुए प्रजाओंके साथ क्रीडा करते हैं। इस द्वीपमें चारों वर्णोंकी प्रजाओंसे सम्पन्न सुन्दर जनपद हैं। इनमें प्रत्येक वर्षमें समुद्रगामिनी सात नदियाँ भी हैं और वे सभी दो नामोंवाली हैं। केवल गङ्गा सात प्रकारकी बतलायी जाती हैं।
प्रथमा सुकुमारीति गङ्गा शिवजला शुभा।<br>अनुप्ता च नाम्नैषा नदी सम्परिकीर्तिता॥ ३०<br>सुकुमारी तपःसिद्धा द्वितीया नामतः सती।<br>नन्दा च पावनी चैव तृतीया परिकीर्तिता॥ ३१<br>शिबिका च चतुर्थी स्याद् द्विविधा च पुनः स्मृता।<br>इक्षुश्च पञ्चमी ज्ञेया तथैव च पुनः कुहूः॥ ३२मङ्गलमयी एवं पुण्यसलिला प्रथमा गङ्गा सुकुमारी नामसे कही जाती हैं। यही नदी अनुप्ता नामसे भी प्रसिद्ध है। दूसरी गङ्गा तपःसिद्धा सुकुमारी हैं। ये ही सती नामसे भी प्रसिद्ध हैं। तीसरी गङ्गा नन्दा और पावनी नामसे विख्यात हैं। चौथी गङ्गा शिबिका हैं, इन्हींको द्विविधा भी कहा जाता है। इक्षुको पाँचवीं गङ्गा समझना चाहिये। उसी प्रकार पुनः इन्हें कुहू भी कहते हैं।