भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 425, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 425
  • अध्याय १२२ * ४१५

तत्र संवर्तको नाम सोऽग्निः पिबति तज्जलम्।<br>अग्निः समुद्रवासस्तु और्वोऽसौ वडवामुखः<sup></sup>॥ ७७इसे बडवाग्नि कहते हैं। जिसका मुख घोड़ीके समान है। (वह भी समुद्रके जलको सोखता रहता है।) पूर्वकालमें जब इन्द्र पर्वतोंका पक्षच्छेदन कर रहे थे, उस समय ये चारों पर्वत इन्द्रके भयसे भीत होकर लवणसागरमें भागकर छिप गये थे। ये पर्वत चन्द्रमाके शुक्लपक्षमें आनेपर दीखते हैं एवं कृष्णपक्ष आनेपर समुद्रमें डूब जाते हैं। भारतवर्षके जो भेद दीख पड़ते हैं, उनका वर्णन यहाँ किया गया। अन्य वर्षोंका वर्णन अन्यत्र किया जा चुका है। इन वर्षोंमें प्रत्येक वर्ष एक-दूसरेकी अपेक्षा उत्तरोत्तर गुणोंमें अधिक है। इन वर्षोंमें सभी प्राणी विभागपूर्वक आरोग्य और आयुके प्रमाणसे तथा धर्म, काम और अर्थसे युक्त होकर निवास करते हैं। उन सभी वर्षोंमें उन प्राणियोंकी अनेकों जातियाँ भी हैं। इस प्रकार इस विश्व एवं इस जगत्को धारण करती हुई पृथ्वी स्थित है॥ ७२—८२॥
इत्येते पर्वताविष्टाश्चत्वारो लवणोदधिम्।<br>छिद्यमानेषु पक्षेषु पुरा इन्द्रस्य वै भयात्॥ ७८
तेषां तु दृश्यते चन्द्रे शुक्ले कृष्णे समाप्लुतिः।<br>ते भारतस्य वर्षस्य भेदा येन प्रकीर्तिताः॥ ७९
इहोदितस्य दृश्यन्ते अन्ये त्वन्यत्र चोदिताः।<br>उत्तरोत्तरमेतेषां वर्षमुद्रिच्यते गुणैः॥ ८०
आरोग्यायःप्रमाणाभ्यां धर्मतः कामतोऽर्थतः।<br>समन्वितानि भूतानि तेषु वर्षेषु भागशः॥ ८१
वसन्ति नानाजातीनि तेषु सर्वेषु तानि वै।<br>इत्येतद् धारयद् विश्वं पृथ्वी जगदिदं स्थिता॥ ८२

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे जम्बूद्वीपवर्णनं नामैकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णनमें जम्बूद्वीपवर्णन नामक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२१॥


एक सौ बाईसवाँ अध्याय

शाकद्वीप, कुशद्वीप, क्रौञ्चद्वीप और शाल्मलद्वीपका वर्णन<sup></sup>

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
शाकद्वीपस्य वक्ष्यामि यथावदिह निश्चयम्।<br>कथ्यमानं निबोधध्वं शाकं द्वीपं द्विजोत्तमाः॥ १द्विजवरो! अब मैं शाकद्वीपका निश्चितरूपसे यथार्थ वर्णन कर रहा हूँ। आपलोग मेरे कथनानुसार शाकद्वीपके विषयमें जानकारी प्राप्त करें। शाकद्वीपका विस्तार जम्बूद्वीपके विस्तारसे दुगुना है और चारों ओरसे उसका फैलाव विस्तारसे भी तिगुना है। उस द्वीपसे यह लवणसागर घिरा हुआ है। शाकद्वीपमें अनेकों पुण्यमय जनपद हैं। वहाँके निवासी लम्बी आयु भोग कर मरते हैं। भला, उन क्षमाशील एवं तेजस्वी जनोंके प्रति दुर्भिक्षकी सम्भावना कहाँसे हो सकती है।
जम्बूद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः।<br>विस्तारात् त्रिगुणश्चापि परिणाहः समन्ततः॥ २
तेनावृतः समुद्रोऽयं द्वीपेन लवणोदधिः।<br>तत्र पुण्या जनपदाश्चिराच्च म्रियते जनः॥ ३

१. आर्यभट्टीय आदिके अनुसार वडवामुख दक्षिणी ध्रुवके पास एक स्थान है, जिस मार्गसे लोग पातालमें प्रवेश करते थे। बडवाग्निको वडवाचक्र, वडवाभृगु; हुतृ आदि भी कहा गया है। महावीरचरितमें इसके रूप आदिका भी वर्णन है।
२. प्रायः सभी पुराणोंके भुवनकोश-प्रकरणमें इन सभी द्वीपोंका वर्णन है, पर मत्स्यपुराणसे उनके नामक्रमादिमें कुछ भेद है। W. Kirifel के भुवनकोश—(Das Pnrana Von, Weltge-banden P, III.F. Bharatvarsha 1931) ग्रन्थमें इन सबका एकत्र सूक्ष्म तुलनात्मक अध्ययन विशेष महत्त्वका है।