मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४१४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| परस्परेण द्विगुणा धर्मतः कामतोऽर्थतः।<br>हेमकूटस्य पृष्ठे तु सर्पाणां तत् सरः स्मृतम्॥ ६४<br>सरस्वती प्रभवति तस्माज्ज्योतिष्मती तु या।<br>अवगाढे ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ॥ ६५<br>सरो विष्णुपदं नाम निषधे पर्वतोत्तमे।<br>यस्मादग्रे प्रभवति गन्धर्वानुकुले च ते॥ ६६<br>मेरोः पार्श्वात् प्रभवति हृदश्चन्द्रप्रभो महान्।<br>जम्बूश्चैव नदी पुण्या यस्यां जाम्बूनदं स्मृतम्॥ ६७<br>पयोदस्तु ह्रदो नीलः स शुभः पुण्डरीकवान्।<br>पुण्डरीकात् पयोदाच्च तस्माद् द्वे सम्प्रसूतयाम्॥ ६८<br>सरसस्तु सरस्वैतत् स्मृतमुत्तरमानसम्।<br>मृग्या च मृगकान्ता च तस्माद् द्वे सम्प्रसूतयाम्॥ ६९<br>ह्रदाः कुरुषु विख्याताः पद्ममीनकुलाकुलाः।<br>नाम्ना ते वैजया नाम द्वादशोदधिसन्निभाः॥ ७०<br>तेभ्यः शान्ती च मध्वी च द्वे नद्यौ सम्प्रसूतयाम्।<br>किम्पुरुषाद्यानि यान्यष्टौ तेषु देवो न वर्षति॥ ७१<br>उद्भिदान्युदकान्यत्र प्रवहन्ति सरिद्वराः।<br>बलाहकश्च ऋषभो चक्रो मैनाक एव च॥ ७२ | वह धर्म, काम और अर्थके अनुसार परस्पर दुगुना फल देनेवाली होती है। हेमकूट पर्वतके पृष्ठभागपर जो सर्पोंका सरोवर बतलाया जाता है, उसीसे सरस्वती और ज्योतिष्मती नामकी दो नदियाँ निकली हैं। वे क्रमशः पूर्व और पश्चिम समुद्रमें जाकर मिली हैं। पर्वतश्रेष्ठ निषधपर विष्णुपद नामक सरोवर है, जो उसी पर्वतके अग्रभागसे निकला हुआ है। वे दोनों (नाग और विष्णुपद) सरोवर गन्धर्वोंके अनुकूल हैं। मेरुके पार्श्वभागसे चन्द्रप्रभ नामक महान् सरोवर तथा पुण्यसलिला जम्बू नदी निकलती है। जम्बू नदीमें जाम्बूनद नामक सुवर्ण पाया जाता है। वहीं पयोद और पुण्डरीकवान् नामक दो सरोवर और हैं, जिनका जल क्रमशः नील और श्वेत है। इन पुण्डरीक और पयोद सरोवरोंसे दो सरोवर और प्रकट हुए हैं। उनमें एक सरोवरसे निकला हुआ सर उत्तरमानस नामसे प्रसिद्ध है। उससे मृग्या और मृगकान्ता नामकी दो नदियाँ निकली हैं। कुरुदेशमें सागरके समान अगाध एवं विस्तृत बारह ह्रद हैं, जो कमलों और मछलियोंसे भरे रहते हैं, वे 'वैजय' नामसे विख्यात हैं। उनसे शान्ती और मध्वी नामकी दो नदियाँ निकली हैं। किम्पुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं, उनमें इन्द्रदेव वर्षा नहीं करते, अपितु वहाँकी बड़ी-बड़ी नदियाँ ही अन्नोत्पादक जलको प्रवाहित करती हैं॥ ६१—७१ ½॥ |
| विनिविष्टाः प्रतिदिशं निमग्ना लवणाम्बुधिम्।<br>चन्द्रकान्तस्तथा द्रोणः सुमहांच्छ शिलोच्चयः॥ ७३ | बलाहक, ऋषभ, चक्र और मैनाक—ये चारों पर्वत क्रमशः चारों दिशाओंमें लवणसागरतक फैले हुए हैं। |
| उद्गायता उदीच्यां तु अवगाढा महोदधिम्।<br>चक्रो बधिरकश्चैव तथा नारदपर्वतः॥ ७४ | चन्द्रकान्त, द्रोण तथा सुमहान्—इन पर्वतोंका विस्तार उत्तर दिशामें महासागरतक है। |
| प्रतीचीमायतास्ते वै प्रतिष्ठास्ते महोदधिम्।<br>जीमूतो द्रावणश्चैव मैनाकश्चन्द्रपर्वतः॥ ७५ | चक्र, बधिरक और नारद—ये पर्वत पश्चिम दिशामें फैले हुए हैं। इनका विस्तार महासागरतक है। |
| आयतास्ते महाशैलाः समुद्रं दक्षिणां प्रति।<br>चक्रमैनाकयोर्मध्ये दिवि संदक्षिणापथे॥ ७६ | जीमूत, द्रावण, मैनाक और चन्द्र—ये महापर्वत दक्षिण दिशामें दक्षिण समुद्रतक विस्तृत हैं। दक्षिणापथके समुद्रमें चक्र और मैनाक पर्वतके मध्यमें संवर्तक नामक अग्निका निवास है। वह उस सागरके जलको पीता है। समुद्रमें निवास करनेवाला और्व नामक अग्नि है, |