मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ४१४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| परस्परेण द्विगुणा धर्मतः कामतोऽर्थतः।<br>हेमकूटस्य पृष्ठे तु सर्पाणां तत् सरः स्मृतम्॥ ६४<br>सरस्वती प्रभवति तस्माज्ज्योतिष्मती तु या।<br>अवगाढे ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ॥ ६५<br>सरो विष्णुपदं नाम निषधे पर्वतोत्तमे।<br>यस्मादग्रे प्रभवति गन्धर्वानुकुले च ते॥ ६६<br>मेरोः पार्श्वात् प्रभवति हृदश्चन्द्रप्रभो महान्।<br>जम्बूश्चैव नदी पुण्या यस्यां जाम्बूनदं स्मृतम्॥ ६७<br>पयोदस्तु ह्रदो नीलः स शुभः पुण्डरीकवान्।<br>पुण्डरीकात् पयोदाच्च तस्माद् द्वे सम्प्रसूतयाम्॥ ६८<br>सरसस्तु सरस्वैतत् स्मृतमुत्तरमानसम्।<br>मृग्या च मृगकान्ता च तस्माद् द्वे सम्प्रसूतयाम्॥ ६९<br>ह्रदाः कुरुषु विख्याताः पद्ममीनकुलाकुलाः।<br>नाम्ना ते वैजया नाम द्वादशोदधिसन्निभाः॥ ७०<br>तेभ्यः शान्ती च मध्वी च द्वे नद्यौ सम्प्रसूतयाम्।<br>किम्पुरुषाद्यानि यान्यष्टौ तेषु देवो न वर्षति॥ ७१<br>उद्भिदान्युदकान्यत्र प्रवहन्ति सरिद्वराः।<br>बलाहकश्च ऋषभो चक्रो मैनाक एव च॥ ७२ | वह धर्म, काम और अर्थके अनुसार परस्पर दुगुना फल देनेवाली होती है। हेमकूट पर्वतके पृष्ठभागपर जो सर्पोंका सरोवर बतलाया जाता है, उसीसे सरस्वती और ज्योतिष्मती नामकी दो नदियाँ निकली हैं। वे क्रमशः पूर्व और पश्चिम समुद्रमें जाकर मिली हैं। पर्वतश्रेष्ठ निषधपर विष्णुपद नामक सरोवर है, जो उसी पर्वतके अग्रभागसे निकला हुआ है। वे दोनों (नाग और विष्णुपद) सरोवर गन्धर्वोंके अनुकूल हैं। मेरुके पार्श्वभागसे चन्द्रप्रभ नामक महान् सरोवर तथा पुण्यसलिला जम्बू नदी निकलती है। जम्बू नदीमें जाम्बूनद नामक सुवर्ण पाया जाता है। वहीं पयोद और पुण्डरीकवान् नामक दो सरोवर और हैं, जिनका जल क्रमशः नील और श्वेत है। इन पुण्डरीक और पयोद सरोवरोंसे दो सरोवर और प्रकट हुए हैं। उनमें एक सरोवरसे निकला हुआ सर उत्तरमानस नामसे प्रसिद्ध है। उससे मृग्या और मृगकान्ता नामकी दो नदियाँ निकली हैं। कुरुदेशमें सागरके समान अगाध एवं विस्तृत बारह ह्रद हैं, जो कमलों और मछलियोंसे भरे रहते हैं, वे 'वैजय' नामसे विख्यात हैं। उनसे शान्ती और मध्वी नामकी दो नदियाँ निकली हैं। किम्पुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं, उनमें इन्द्रदेव वर्षा नहीं करते, अपितु वहाँकी बड़ी-बड़ी नदियाँ ही अन्नोत्पादक जलको प्रवाहित करती हैं॥ ६१—७१ ½॥ |
| विनिविष्टाः प्रतिदिशं निमग्ना लवणाम्बुधिम्।<br>चन्द्रकान्तस्तथा द्रोणः सुमहांच्छ शिलोच्चयः॥ ७३ | बलाहक, ऋषभ, चक्र और मैनाक—ये चारों पर्वत क्रमशः चारों दिशाओंमें लवणसागरतक फैले हुए हैं। |
| उद्गायता उदीच्यां तु अवगाढा महोदधिम्।<br>चक्रो बधिरकश्चैव तथा नारदपर्वतः॥ ७४ | चन्द्रकान्त, द्रोण तथा सुमहान्—इन पर्वतोंका विस्तार उत्तर दिशामें महासागरतक है। |
| प्रतीचीमायतास्ते वै प्रतिष्ठास्ते महोदधिम्।<br>जीमूतो द्रावणश्चैव मैनाकश्चन्द्रपर्वतः॥ ७५ | चक्र, बधिरक और नारद—ये पर्वत पश्चिम दिशामें फैले हुए हैं। इनका विस्तार महासागरतक है। |
| आयतास्ते महाशैलाः समुद्रं दक्षिणां प्रति।<br>चक्रमैनाकयोर्मध्ये दिवि संदक्षिणापथे॥ ७६ | जीमूत, द्रावण, मैनाक और चन्द्र—ये महापर्वत दक्षिण दिशामें दक्षिण समुद्रतक विस्तृत हैं। दक्षिणापथके समुद्रमें चक्र और मैनाक पर्वतके मध्यमें संवर्तक नामक अग्निका निवास है। वह उस सागरके जलको पीता है। समुद्रमें निवास करनेवाला और्व नामक अग्नि है, |
१२३- गोमेदकद्वीप और पुष्करद्वीपका वर्णन
- अध्याय १२२ * ४१५
| तत्र संवर्तको नाम सोऽग्निः पिबति तज्जलम्।<br>अग्निः समुद्रवासस्तु और्वोऽसौ वडवामुखः<sup>१</sup>॥ ७७ | इसे बडवाग्नि कहते हैं। जिसका मुख घोड़ीके समान है। (वह भी समुद्रके जलको सोखता रहता है।) पूर्वकालमें जब इन्द्र पर्वतोंका पक्षच्छेदन कर रहे थे, उस समय ये चारों पर्वत इन्द्रके भयसे भीत होकर लवणसागरमें भागकर छिप गये थे। ये पर्वत चन्द्रमाके शुक्लपक्षमें आनेपर दीखते हैं एवं कृष्णपक्ष आनेपर समुद्रमें डूब जाते हैं। भारतवर्षके जो भेद दीख पड़ते हैं, उनका वर्णन यहाँ किया गया। अन्य वर्षोंका वर्णन अन्यत्र किया जा चुका है। इन वर्षोंमें प्रत्येक वर्ष एक-दूसरेकी अपेक्षा उत्तरोत्तर गुणोंमें अधिक है। इन वर्षोंमें सभी प्राणी विभागपूर्वक आरोग्य और आयुके प्रमाणसे तथा धर्म, काम और अर्थसे युक्त होकर निवास करते हैं। उन सभी वर्षोंमें उन प्राणियोंकी अनेकों जातियाँ भी हैं। इस प्रकार इस विश्व एवं इस जगत्को धारण करती हुई पृथ्वी स्थित है॥ ७२—८२॥ |
| इत्येते पर्वताविष्टाश्चत्वारो लवणोदधिम्।<br>छिद्यमानेषु पक्षेषु पुरा इन्द्रस्य वै भयात्॥ ७८ | |
| तेषां तु दृश्यते चन्द्रे शुक्ले कृष्णे समाप्लुतिः।<br>ते भारतस्य वर्षस्य भेदा येन प्रकीर्तिताः॥ ७९ | |
| इहोदितस्य दृश्यन्ते अन्ये त्वन्यत्र चोदिताः।<br>उत्तरोत्तरमेतेषां वर्षमुद्रिच्यते गुणैः॥ ८० | |
| आरोग्यायःप्रमाणाभ्यां धर्मतः कामतोऽर्थतः।<br>समन्वितानि भूतानि तेषु वर्षेषु भागशः॥ ८१ | |
| वसन्ति नानाजातीनि तेषु सर्वेषु तानि वै।<br>इत्येतद् धारयद् विश्वं पृथ्वी जगदिदं स्थिता॥ ८२ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे जम्बूद्वीपवर्णनं नामैकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णनमें जम्बूद्वीपवर्णन नामक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२१॥
एक सौ बाईसवाँ अध्याय
शाकद्वीप, कुशद्वीप, क्रौञ्चद्वीप और शाल्मलद्वीपका वर्णन<sup>२</sup>
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
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| शाकद्वीपस्य वक्ष्यामि यथावदिह निश्चयम्।<br>कथ्यमानं निबोधध्वं शाकं द्वीपं द्विजोत्तमाः॥ १ | द्विजवरो! अब मैं शाकद्वीपका निश्चितरूपसे यथार्थ वर्णन कर रहा हूँ। आपलोग मेरे कथनानुसार शाकद्वीपके विषयमें जानकारी प्राप्त करें। शाकद्वीपका विस्तार जम्बूद्वीपके विस्तारसे दुगुना है और चारों ओरसे उसका फैलाव विस्तारसे भी तिगुना है। उस द्वीपसे यह लवणसागर घिरा हुआ है। शाकद्वीपमें अनेकों पुण्यमय जनपद हैं। वहाँके निवासी लम्बी आयु भोग कर मरते हैं। भला, उन क्षमाशील एवं तेजस्वी जनोंके प्रति दुर्भिक्षकी सम्भावना कहाँसे हो सकती है। |
| जम्बूद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः।<br>विस्तारात् त्रिगुणश्चापि परिणाहः समन्ततः॥ २ | |
| तेनावृतः समुद्रोऽयं द्वीपेन लवणोदधिः।<br>तत्र पुण्या जनपदाश्चिराच्च म्रियते जनः॥ ३ |
१. आर्यभट्टीय आदिके अनुसार वडवामुख दक्षिणी ध्रुवके पास एक स्थान है, जिस मार्गसे लोग पातालमें प्रवेश करते थे। बडवाग्निको वडवाचक्र, वडवाभृगु; हुतृ आदि भी कहा गया है। महावीरचरितमें इसके रूप आदिका भी वर्णन है।
२. प्रायः सभी पुराणोंके भुवनकोश-प्रकरणमें इन सभी द्वीपोंका वर्णन है, पर मत्स्यपुराणसे उनके नामक्रमादिमें कुछ भेद है। W. Kirifel के भुवनकोश—(Das Pnrana Von, Weltge-banden P, III.F. Bharatvarsha 1931) ग्रन्थमें इन सबका एकत्र सूक्ष्म तुलनात्मक अध्ययन विशेष महत्त्वका है।
४१६ * मत्स्यपुराण *
| कुत एव च दुर्भिक्षं क्षमातेजोयुतेष्विह।<br>तत्रापि पर्वताः शुभ्राः सप्तैव मणिभूषिताः॥ ४<br>शाकद्वीपादिषु त्वेषु सप्त सप्त नगास्त्रिषु।<br>ऋज्वायताः प्रतिदिशं निविष्टा वर्षपर्वताः॥ ५<br>रत्नाकूराद्रिनामानः सानुमन्तो महाचिताः।<br>समोदिताः प्रतिदिशं द्वीपविस्तारमानतः॥ ६<br>उभयत्रावगाढौ च लवणक्षीरसागरौ।<br>शाकद्वीपे तु वक्ष्यामि सप्त दिव्यान् महाचलान्॥ ७<br>देवर्षिगन्धर्वयुतः प्रथमो मेरुरुच्यते।<br>प्रागायतः स सौवर्ण उदयो नाम पर्वतः॥ ८<br>तत्र मेघास्तु वृष्ट्यर्थं प्रभवन्त्यपयान्ति च।<br>तस्यापरेण सुमहाञ्जलधारो महागिरिः॥ ९<br>स वै चन्द्रः समाख्यातः सर्वौषधिसमन्वितः।<br>तस्मान्नित्यमुपादत्ते वासवः परमं जलम्॥ १०<br><br>नारदो नाम चैवोक्तो दुर्गशैलो महाचितः।<br>तत्राचलौ समुत्पन्नौ पूर्वं नारदपर्वतौ॥ ११<br>तस्यापरेण सुमहाञ्श्यामो नाम महागिरिः।<br>यत्र श्यामत्वमापन्नाः प्रजाः पूर्वमिमाः किल॥ १२<br>स एव दुन्दुभिर्नाम श्यामपर्वतसंनिभः।<br>शब्दमृत्युः पुरा तस्मिन् दुन्दुभिस्ताडितः सुरैः॥ १३<br>रत्नमालान्तरमयः शाल्मलश्चान्तरालकृत्।<br>तस्यापरेण रजतो महानस्तो गिरिः स्मृतः॥ १४<br>स वै सोमक इत्युक्तो देवैर्यत्रामृतं पुरा।<br>सम्भृतं च हृतं चैव मातुरर्थे गरुत्मता॥ १५<br>तस्यापरे चाम्बिकेयः सुमनाश्चैव स स्मृतः।<br>हिरण्याक्षो वराहेण तस्मिञ्शैले निषूदितः॥ १६<br>आम्बिकेयात् परो रम्यः सर्वौषधिनिषेवितः।<br>विभ्राजस्तु समाख्यातः स्फाटिकस्तु महान् गिरिः॥ १७ | इस द्वीपमें भी मणियोंसे विभूषित श्वेत रंगके सात पर्वत हैं। शाकद्वीप आदि तीन द्वीपोंमें सात-सात पर्वत हैं, जो चारों दिशाओंमें सीधे फैले हुए हैं। ये ही वहाँ वर्षपर्वत कहलाते हैं। ये रत्नाकूराद्रि नामवाले वर्षपर्वत ऊँचे शिखरोंसे युक्त तथा वृक्षोंसे सम्पन्न हैं। ये द्वीप विस्तारके परिमाणकी समानतामें चारों दिशाओंमें फैले हुए हैं और एक ओर क्षीरसागरतक तथा दूसरी ओर लवणसागरतक पहुँच गये हैं। अब मैं शाकद्वीपके सातों दिव्य महापर्वतोंका वर्णन कर रहा हूँ। उनमें पहला पर्वत मेरु कहा जाता है, जो देवो, ऋषियों और गन्धर्वोंसे सुसेवित है। वह स्वर्णमय पर्वत पूर्व दिशामें फैला हुआ है। उसका दूसरा नाम 'उदयगिरि' है। वहाँ मेघगण वृष्टि करनेके लिये आते हैं और (जल बरसाकर) चले जाते हैं। उसके पार्श्वभागमें सम्पूर्ण ओषधियोंसे सम्पन्न जलधार नामक अत्यन्त विशाल पर्वत है। वह चन्द्र नामसे भी विख्यात है। उसी पर्वतसे इन्द्र नित्य अधिक-से-अधिक जल ग्रहण करते हैं॥ १—१०॥<br><br>वहीं महान् समृद्धिशाली नारद नामक पर्वत है, जिसे दुर्गशैल भी कहते हैं। पूर्वकालमें ये दोनों नारद और दुर्गशैल पर्वत यहीं उत्पन्न हुए थे। उसके बाद श्याम नामक अत्यन्त विशाल पर्वत है, जहाँ पूर्वकालमें ये सारी प्रजाएँ श्यामलतको प्राप्त हो गयी थीं। श्यामपर्वतके सदृश काले रंगवाला वहीं दुन्दुभि पर्वत भी है, जिसपर प्राचीनकालमें देवताओंद्धारा दुन्दुभिके बजाये जानेपर उसके शब्दसे ही (शत्रुओंकी) मृत्यु हो जाती थी। इसके अन्तःप्रदेशमें रत्नोंके समूह भरे पड़े हैं और यह सेमलके वृक्षोंसे सुशोभित है। उसके बाद महान् अस्ताचल है, जो रजतमय है। उसे सोमक भी कहते हैं। इसी पर्वतपर पूर्वकालमें गरुड़ने अपनी माताके हितार्थ देवताओंद्धारा संचित किये गये अमृतका अपहरण किया था। उसके बाद आम्बिकेय नामक महापर्वत है, जिसे सुमना भी कहते हैं। इसी पर्वतपर वराहभगवान्ने हिरण्याक्षक वध किया था। आम्बिकेय पर्वतके बाद सम्पूर्ण ओषधियोंसे परिपूर्ण एवं स्फटिककी शिलाओंसे व्याप्त परम रमणीय महान् पर्वत है, जो विभ्राज नामसे विख्यात है। इससे अग्नि विशेष उद्दीप्त होती है, इसी |
| * अध्याय १२२ * | ४१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यस्माद् विभ्राजते वह्निर्विभ्राजस्तेन स स्मृतः।<br>सैवेह केशवत्युक्तो यतो वायुः प्रवाति च॥ १८ | कारण इसे विभ्राज कहते हैं। इसीको 'केशव' भी कहते हैं। यहींसे वायुकी गति प्रारम्भ होती है॥ ११–१८॥ |
| तेषां वर्षाणि वक्ष्यामि पर्वतानां द्विजोत्तमाः।<br>शृणुध्वं नामतस्तानि यथावदनुपूर्वशः॥ १९<br>द्विनामान्येव वर्षाणि यथैव गिरयस्तथा।<br>उदयस्योदयं वर्षं जलधारेति विश्रुतम्॥ २०<br>नाम्ना गतभयं नाम वर्षं तत् प्रथमं स्मृतम्।<br>द्वितीयं जलधारस्य सुकुमारमिति स्मृतम्॥ २१<br>तदेव शैशिरं नाम वर्षं तत् परिकीर्तितम्।<br>नारदस्य च कौमारं तदेव च सुखोदयम्॥ २२<br>श्यामपर्वतवर्षं तदनीचक्रमिति स्मृतम्।<br>आनन्दकमिति प्रोक्तं तदेव मुनिभिः शुभम्॥ २३<br>सोमकस्य शुभं वर्षं विज्ञेयं कुसुमोत्करम्।<br>तदेवासितमित्युक्तं वर्षं सोमकसंज्ञितम्॥ २४<br>आम्बिकेयस्य मैनाकं क्षेमकं चैव तत्स्मृतम्।<br>तदेव ध्रुवमित्युक्तं वर्षं विभ्राजसंज्ञितम्॥ २५ | द्विजवरो ! अब मैं उन पर्वतोंके वर्षोंका यथार्थरूपसे नामनिर्देशानुसार आनुपूर्वी वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। जिस प्रकार वहाँके पर्वत दो नामवाले हैं, उसी तरह वर्षोंके भी दो-दो नाम हैं। उदयपर्वतके वर्ष उदय और जलधार नामसे प्रसिद्ध हैं। उनमें जो पहला उदय वर्ष है, वह गतभय नामसे अभिहित होता है। दूसरे जलधार पर्वतके वर्षको सुकुमार कहते हैं। वही शैशिर वर्षके नामसे भी विख्यात है। नारदपर्वतके वर्षका नाम कौमार है। उसीको सुखोदय भी कहते हैं। श्यामपर्वतका वर्ष अनीचक्र नामसे कहा जाता है। उसी मङ्गलमय वर्षको मुनिगण आनन्दक नामसे पुकारते हैं। सोमक पर्वतके कल्याणमय वर्षको कुसुमोत्कर नामसे जानना चाहिये। उसी सोमक नामवाले वर्षको असित भी कहा जाता है। आम्बिकेय पर्वतके वर्ष मैनाक और क्षेमक नामसे प्रसिद्ध हैं। (सातवें केसर पर्वतके वर्षका नाम) विभ्राज है। वही ध्रुव नामसे भी कहा जाता है॥ १९–२५॥ |
| द्वीपस्य परिणाहं च ह्रस्वदीर्घत्वमेव च।<br>जम्बूद्वीपेन संख्यातं तस्य मध्ये वनस्पतिम्॥ २६<br>शाको नाम महावृक्षः प्रजास्तस्य महानुगाः।<br>एतेषु देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः॥ २७<br>विहरन्ति रमन्ते च दृश्यमानाश्च तैः सह।<br>तत्र पुण्या जनपदाश्चातुर्वर्ण्यसमन्विताः॥ २८<br>तेषु नद्यश्च सप्तैव प्रतिवर्षं समुद्रगाः।<br>द्विनाम्ना चैव ताः सर्वा गङ्गाः सप्तविधाः स्मृताः॥ २९ | शाकद्वीपका विस्तार तथा लम्बाई-चौड़ाई जम्बूद्वीपके परिमाणसे अधिक है। (यह ऊपर बतला चुके हैं।) इस द्वीपके मध्यभागमें शाक नामका एक महान् वनस्पति है। इस द्वीपकी प्रजाएँ महापुरुषोंका अनुगमन करनेवाली हैं। इन वर्षोंमें देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण विहार करते हैं और उनकी रमणीयता देखते हुए प्रजाओंके साथ क्रीडा करते हैं। इस द्वीपमें चारों वर्णोंकी प्रजाओंसे सम्पन्न सुन्दर जनपद हैं। इनमें प्रत्येक वर्षमें समुद्रगामिनी सात नदियाँ भी हैं और वे सभी दो नामोंवाली हैं। केवल गङ्गा सात प्रकारकी बतलायी जाती हैं। |
| प्रथमा सुकुमारीति गङ्गा शिवजला शुभा।<br>अनुप्ता च नाम्नैषा नदी सम्परिकीर्तिता॥ ३०<br>सुकुमारी तपःसिद्धा द्वितीया नामतः सती।<br>नन्दा च पावनी चैव तृतीया परिकीर्तिता॥ ३१<br>शिबिका च चतुर्थी स्याद् द्विविधा च पुनः स्मृता।<br>इक्षुश्च पञ्चमी ज्ञेया तथैव च पुनः कुहूः॥ ३२ | मङ्गलमयी एवं पुण्यसलिला प्रथमा गङ्गा सुकुमारी नामसे कही जाती हैं। यही नदी अनुप्ता नामसे भी प्रसिद्ध है। दूसरी गङ्गा तपःसिद्धा सुकुमारी हैं। ये ही सती नामसे भी प्रसिद्ध हैं। तीसरी गङ्गा नन्दा और पावनी नामसे विख्यात हैं। चौथी गङ्गा शिबिका हैं, इन्हींको द्विविधा भी कहा जाता है। इक्षुको पाँचवीं गङ्गा समझना चाहिये। उसी प्रकार पुनः इन्हें कुहू भी कहते हैं। |
४१८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वेणुका चामृता चैव षष्ठी सम्परिकीर्तिता ।<br>सुकृता च गभस्ती च सप्तमी परिकीर्तिता ॥ ३३<br>एताः सप्त महाभागाः प्रतिवर्षं शिवोदकाः ।<br>भावयन्ति जनं सर्वं शाकद्वीपनिवासिनम् ॥ ३४<br>अभिगच्छन्ति ताश्चान्या नदनद्यः सरांसि च ।<br>बहूदकपरिस्रावा यतो वर्षति वासवः ॥ ३५ | छठी गङ्गा वेणुका और अमृता नामसे प्रसिद्ध हैं। सातवीं गङ्गाको सुकृता और गभस्ती कहा जाता है। कल्याणमय जलसे परिपूर्ण एवं महान् भाग्यशालिनी ये सातों गङ्गाएँ शाकद्वीपके प्रत्येक वर्षके सभी प्राणियोंको पवित्र करती हैं। दूसरे बड़े-बड़े नद, नदियाँ और सरोवर भी इन्हीं गङ्गाकी धाराओंमें आकर मिलते हैं, जिसके कारण ये सभी अथाह जल बहानेवाली हैं। इन्हींसे जल ग्रहण कर इन्द्र वर्षा करते हैं॥ २६-३५॥ |
| तासां तु नामधेयानि परिमाणं तथैव च ।<br>न शक्यं परिसंख्यातुं पुण्यास्ताः सरिदुत्तमाः ॥ ३६<br>ताः पिबन्ति सदा हृष्टा नदीर्जनपदास्तु ते ।<br>एते शान्तमयाः प्रोक्ताः प्रमोदा ये च वै शिवाः ॥ ३७<br>आनन्दाश्च सुखाश्चैव क्षेमकाश्च नवैः सह ।<br>वर्णाश्रमाचारयुता देशास्ते सप्त विश्रुताः ॥ ३८<br>आरोग्या बलिनश्चैव सर्वे मरणवर्जिताः ।<br>अवसर्पिणी न तेष्वस्ति तथैवोत्सर्पिणी पुनः ॥ ३९<br>न तत्रास्ति युगावस्था चतुर्युगकृता क्वचित् ।<br>त्रेतायुगसमः कालः सदा तत्र प्रवर्तते ॥ ४०<br>शाकद्वीपादिषु ज्ञेयं पञ्चस्वेतेषु सर्वशः ।<br>देशस्य तु विचारेण कालः स्वाभाविकः स्मृतः ॥ ४१<br>न तेषु सङ्करः कश्चिद् वर्णाश्रमकृतः क्वचित् ।<br>धर्मस्य चाव्यभीचारादेकान्तसुखिनः प्रजाः ॥ ४२<br>न तेषु माया लोभो वा ईर्ष्यासूया भयं कुतः ।<br>विपर्ययो न तेष्वस्ति तद्वै स्वाभाविकं स्मृतम् ॥ ४३<br>कालो नैव च तेष्वस्ति न दण्डो न च दाण्डिकः ।<br>स्वधर्मेण च धर्मज्ञास्ते रक्षन्ति परस्परम् ॥ ४४ | उन सहायक नदियोंके नाम और परिमाणकी गणना नहीं की जा सकती। ये सभी श्रेष्ठ नदियाँ पुण्यतोया हैं। इनके तटपर निवास करनेवाले जनपदवासी सदा हर्षपूर्वक इनका जल पीते हैं। उनके तटपर स्थित शान्तमय, प्रमोद, शिव, आनन्द, सुख, क्षेमक और नव—ये सात विश्व-विख्यात देश हैं। यहाँ वर्ण और आश्रमके धर्मोंका सुचारूरूपसे पालन होता है। यहाँके सभी निवासी नीरोग, बलवान् और मृत्युसे रहित होते हैं। उनमें अवसर्पिणी (अधोगामिनी) तथा उत्सर्पिणी (ऊर्ध्वगामिनी) क्रिया नहीं होती है। वहाँ कहीं भी चारों युगोंद्वारा की गयी युगव्यवस्था नहीं है। वहाँ सदा त्रेतायुगके समान ही समय वर्तमान रहता है। शाकद्वीप आदि इन पाँचों द्वीपोंमें ऐसी ही दशा जाननी चाहिये; क्योंकि देशके विचारसे ही कालकी स्वाभाविक गति जानी जाती है। उन द्वीपोंमें कहीं भी वर्ण एवं आश्रमजन्य संकर नहीं पाया जाता। इस प्रकार धर्मका परित्याग न करनेके कारण वहाँकी प्रजा एकान्त सुखका अनुभव करती है। उनमें न तो माया (छल-कपट) है, न लोभ, तब भला ईर्ष्या, असूया और भय कैसे हो सकते हैं? उनमें धर्मका विपर्यय भी नहीं देखा जाता। धर्म तो उनके लिये स्वाभाविक कर्म माना गया है। उनपर कालका कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वहाँ न तो दण्डका विधान है, न कोई दण्ड देनेवाला ही है। वहाँके निवासी धर्मके ज्ञाता हैं, अतः वे स्वधर्मानुसार परस्पर एक-दूसरेकी रक्षा करते रहते हैं॥ ३६-४४॥ |
| परिमण्डलस्तु सुमहान् द्वीपो वै कुशसंज्ञकः ।<br>नदीजलैः परिवृतः पर्वतैश्चाभ्रसंनिभैः ॥ ४५<br>सर्वधातुविचित्रैश्च मणिविद्रुमभूषितैः ।<br>अन्यैश्च विविधाकारै रम्यैर्जनपदैस्तथा ॥ ४६ | कुश नामक द्वीप अत्यन्त विशाल मण्डलवाला है। उसके चारों ओर नदियोंका जल प्रवाहित होता रहता है। वह बादल-सदृश रंगवाले, सम्पूर्ण धातुओंसे युक्त होनेके कारण रंगे-बिरंगे तथा मणियों और मूँगोंसे विभूषित पर्वतोंद्वारा घिरा हुआ है। उसमें चारों ओर विभिन्न आकारवाले रमणीय जनपद तथा फूल-फलोंसे लदे हुए |
* अध्याय १२२ * ४१९
| वृक्षैः पुष्पफलोपेतैः सर्वतो धनधान्यवान्।<br>नित्यं पुष्पफलोपेतः सर्वरत्नसमावृतः॥ ४७<br>आवृतः पशुभिः सर्वैर्ग्राम्यारण्यैश्च सर्वशः।<br>आनुपूर्व्यात् समासेन कुशद्वीपं निबोधत॥ ४८<br>अथ तृतीयं वक्ष्यामि कुशद्वीपं च कृत्स्नशः।<br>कुशद्वीपेन क्षीरोदः सर्वतः परिवारितः॥ ४९<br>शाकद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्वितः।<br>तत्रापि पर्वताः सप्त विज्ञेया रत्नयोनयः॥ ५०<br>रत्नाकरास्तथा नद्यस्तेषां नामानि मे शृणु।<br>द्विनामानश्च ते सर्वे शाकद्वीपे यथा तथा॥ ५१<br>प्रथमः सूर्यसंकाशः कुमुदो नाम पर्वतः।<br>विद्रुमोच्चय इत्युक्तः स एव च महीधरः॥ ५२<br>सर्वधातुमयैः शृङ्गैः शिलाजालसमन्वितैः।<br>द्वितीयः पर्वतस्तत्र उन्नतो नाम विश्रुतः॥ ५३<br>हेमपर्वत इत्युक्तः स एव च महीधरः।<br>हरितालमयैः शृङ्गैर्द्वीपमावृत्य सर्वशः॥ ५४<br>बलाहकस्तृतीयस्तु भात्यञ्जनमयो गिरिः।<br>द्युतिमान् नामतः प्रोक्तः स एव च महीधरः॥ ५५<br>चतुर्थः पर्वतो द्रोणो यत्रौषध्यो महाबलाः।<br>विशल्यकरणी चैव मृतसंजीवनी तथा॥ ५६<br>पुष्यवान् नाम सैवोक्तः पर्वतः सुमहाचितः।<br>कङ्कस्तु पञ्चमस्तेषां पर्वतो नाम सारवान्॥ ५७<br>कुशेशय इति प्रोक्तः पुनः स पृथिवीधरः।<br>दिव्यपुष्पफलोपेतो दिव्यवीरुत्समन्वितः॥ ५८<br>षष्ठस्तु पर्वतस्तत्र महिषो मेघसंनिभः।<br>स एव तु पुनः प्रोक्तो हरिरित्यभिविश्रुतः॥ ५९<br>तस्मिन् सोऽग्निर्निवसति महिषो नाम योऽप्सुजः।<br>सप्तमः पर्वतस्तत्र ककुद्मान् स हि भाष्यते॥ ६० | वृक्षोंके समूह शोभायमान हो रहे हैं। वह धन-धान्यसे परिपूर्ण है। वह सदा पुष्पों और फलोंसे युक्त रहता है। उसमें सभी प्रकारके रत्न पाये जाते हैं। वह सर्वत्र ग्रामीण एवं जंगली पशुओंसे भरा हुआ है। उस कुशद्वीपका संक्षेपमें आनुपूर्वी वर्णन सुनिये। अब मैं तीसरे कुशद्वीपका समग्ररूपसे वर्णन कर रहा हूँ। कुशद्वीपसे क्षीरसागर चारों ओरसे घिरा हुआ है। यह शाकद्वीपके दुगुने विस्तारसे युक्त है। यहाँ भी रत्नोंकी खानोंसे युक्त सात पर्वत जानना चाहिये। यहाँकी नदियाँ भी रत्नोंकी भण्डार हैं। अब मुझसे उनका नाम सुनिये। जैसे शाकद्वीपमें सभी पर्वतों और नदियोंके दो नाम थे, वैसे ही यहाँके भी पर्वत एवं नदी दो नामवाली हैं। पहला सूर्यके समान चमकीला कुमुद नामक पर्वत है। वह पर्वत विद्रुमोच्चय नामसे भी कहा जाता है। वहाँ दूसरा पर्वत उन्नत नामसे विख्यात है। वह सम्पूर्ण धातुओंसे परिपूर्ण एवं शिला-समूहोंसे समन्वित शिखरोंसे युक्त है। वही पर्वत हेमपर्वत नामसे अभिहित होता है॥ ४५—५३ १/२ ॥<br><br>तीसरा बलाहक पर्वत है, जो अञ्जनके समान काला है। यह अपने हरितालमय शिखरोंसे सर्वत्र द्वीपको आवृत किये हुए है। यही पर्वत द्युतिमान् नामसे भी पुकारा जाता है। चौथा पर्वत द्रोण है। इस महान् गिरिपर विशल्यकरणी और मृतसंजीवनी आदि महाबलवती ओषधियाँ पायी जाती हैं। वही महान् समृद्धिशाली पर्वत पुष्यवान् नामसे विख्यात है। उनमें पाँचवाँ कङ्क पर्वत है, जो सारयुक्त पदार्थोंसे सम्पन्न है। इस पर्वतको कुशेशय भी कहते हैं। वहाँ छठा महिष पर्वत है, जो मेघ-सदृश काला है। वह दिव्य पुष्पों एवं फलोंसे युक्त तथा दिव्य वृक्षोंसे सम्पन्न है। वही पुनः हरि नामसे विख्यात है। उस पर्वतपर महिष नामक अग्नि, जो जलसे उत्पन्न हुआ है, निवास करता है। वहाँ सातवें पर्वतको ककुद्मान् कहा जाता है। उसीको मन्दर जानना चाहिये। वह |
मत्स्यावतार-कथा-प्रसङ्ग
४२० * मत्स्यपुराण *
| मन्दरः सैव विज्ञेयः सर्वधातुमयः शुभः।<br>मन्द इत्येष यो धातुरपामर्थे प्रकाशकः॥ ६१<br>अपां विदारणाच्चैव मन्दरः स निगद्यते।<br>तत्र रत्नान्यनेकानि स्वयं रक्षति वासवः॥ ६२<br>प्रजापतिमुपादाय प्रजाभ्यो विदधत् स्वयम्।<br>तेषामन्तरविष्कम्भो द्विगुणः समुदाहृतः॥ ६३<br>इत्येते पर्वताः सप्त कुशद्वीपे प्रभाषिताः।<br>तेषां वर्षाणि वक्ष्यामि सप्तैव तु विभागशः॥ ६४<br>कुमुदस्य स्मृतः श्वेत उन्नतश्चैव स स्मृतः।<br>उन्नतस्य तु विज्ञेयं वर्षं लोहितसंज्ञकम्॥ ६५<br>वेणुमण्डलकं चैव तथैव परिकीर्तितम्।<br>बलाहकस्य जीमूतः स्वैरथाकारमित्यपि॥ ६६<br>द्रोणस्य हरिकं नाम लवणं च पुनः स्मृतम्।<br>कङ्कस्यापि ककुन्नाम धृतिमच्चैव तत् स्मृतम्॥ ६७<br>महिषं महिषस्यापि पुनश्चापि प्रभाकरम्।<br>ककुद्मिनस्तु तद्वर्षं कपिलं नाम विश्रुतम्॥ ६८<br>एतान्यपि विशिष्टानि सप्त सप्त पृथक् पृथक्।<br>वर्षाणि पर्वताश्चैव नदीस्तेषु निबोधत॥ ६९<br>तत्रापि नद्यः सप्तैव प्रतिवर्षं हि ताः स्मृताः।<br>द्विनामवत्यस्ताः सर्वाः सर्वाः पुण्यजलाः स्मृताः॥ ७०<br>धूतपापा नदी नाम योनिश्चैव पुनः स्मृता।<br>सीता द्वितीया विज्ञेया सा चैव हि निशा स्मृता॥ ७१<br>पवित्रा तृतीया विज्ञेया वितृष्णापि च या पुनः।<br>चतुर्थी ह्रादिनीत्युक्ता चन्द्रभा इति च स्मृता॥ ७२<br>विद्युच्च पञ्चमी प्रोक्ता शुक्ला चैव विभाव्यते।<br>पुण्ड्रा षष्ठी तु विज्ञेया पुनश्चैव विभावरी॥ ७३<br>महती सप्तमी प्रोक्ता पुनश्चैषा धृतिः स्मृता।<br>अन्यास्ताभ्योऽपि संजाताः शतशोऽथ सहस्रशः॥ ७४<br>अभिगच्छन्ति ता नद्यो यतो वर्षति वासवः।<br>इत्येष संनिवेशो वः कुशद्वीपस्य वर्णितः॥ ७५<br>शाकद्वीपेन विस्तारः प्रोक्तस्तस्य सनातनः।<br>कुशद्वीपः समुद्रेण घृतमण्डोदकेन च॥ ७६ | सम्पूर्ण धातुओंसे युक्त और अत्यन्त सुन्दर है। जो यह मंद धातु है, वह जलरूप अर्थको प्रकट करनेवाली है, अतः जलका विदारण करके निकलनेके कारण इस पर्वतको मन्दर कहा जाता है। उस पर्वतपर अनेकों प्रकारके रत्न पाये जाते हैं, जिनकी रक्षा प्रजापतिको साथ लेकर स्वयं इन्द्र करते हैं। साथ ही स्वयं इन्द्र वहाँकी प्रजाओंकी भी देख-भाल करते हैं। इनके अन्तर-विष्कम्भ पर्वत परिमाणमें दुगुने बतलाये जाते हैं। कुशद्वीपमें ये सात पर्वत कहे गये हैं। अब मैं इनके सात वर्षोंका विभागपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ। कुमुद पर्वतके वर्षका नाम श्वेत है। इसे उन्नत नामसे भी पुकारते हैं। उन्नत पर्वतका लोहित नामक वर्ष जानना चाहिये। इसे वेणुमण्डलक भी कहते हैं। बलाहक पर्वतका वर्ष जीमूत है, इसीका नाम स्वैरथाकार भी है॥५४-६६॥<br>द्रोणपर्वतके वर्षका नाम हरिक है, इसे लवण भी कहते हैं। कङ्क पर्वतका वर्ष ककुद् है, इसे धृतिमान् भी कहा जाता है। महिष पर्वतके वर्षका नाम महिष है, इसे प्रभाकर नामसे अभिहित किया जाता है। ककुद्मी पर्वतका जो वर्ष है, वह कपिल नामसे विख्यात है। कुशद्वीपमें ये सातों विशिष्ट वर्ष तथा सात पर्वत पृथक्-पृथक् हैं। अब उन वर्षोंकी नदियोंको सुनिये। वहाँ प्रत्येक वर्षमें नदियाँ भी सात ही बतलायी जाती हैं। वे सभी दो नामोंवाली तथा पुण्यसलिला हैं। उनमें पहली नदीका नाम धूतपापा है, उसे योनि भी कहते हैं। दूसरी नदीको सीता नामसे जानना चाहिये। वही निशा भी कही जाती है। पवित्राको तीसरी नदी समझना चाहिये। उसीका नाम वितृष्णा भी है। चौथी ह्लादिनी नामसे पुकारी जाती है, यही चन्द्रमा नामसे भी प्रसिद्ध है। पाँचवीं नदीको विद्युत् कहते हैं, यही शुक्ला नामसे भी अभिहित होती है। पुण्ड्राको छठी नदी जानना चाहिये, इसको विभावरी भी कहते हैं। सातवीं नदीका नाम महती है, यही धृति नामसे भी कही जाती है। इनके अतिरिक्त अन्य भी छोटी-बड़ी सैकड़ों-हजारों नदियाँ हैं, जो इन्हीं प्रमुख नदियोंमें जाकर मिली हैं। इन्हींसे जल ग्रहण करके इन्द्र यहाँ वर्षा करते हैं। इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे कुशद्वीपकी संस्थितिका वर्णन कर दिया तथा उसके शाकद्वीपसे दुगुने सनातन विस्तारको भी बतला दिया। यह महान् कुशद्वीप चारों ओरसे चन्द्रमाकी भाँति घृत और मट्ठेसे |
१२४- सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन
| * अध्याय १२२ * | ४२१ |
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| सर्वतः सुमहान् द्वीपश्चन्द्रवत् परिवेष्टितः ।<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव क्षीरोदाद् द्विगुणो मतः ॥ ७७ | भरे हुए सागरसे घिरा हुआ है। यह विस्तार एवं मण्डल (घेराव)-में क्षीरसागरसे दुगुना माना गया है॥ ६७-७७॥ | | ततः परं प्रवक्ष्यामि क्रौञ्चद्वीपं यथा तथा।<br>कुशद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः ॥ ७८<br>घृतोदकः समुद्रो वै क्रौञ्चद्वीपेन संवृतः ।<br>चक्रनेमिप्रमाणेण वृतो वृत्तेन सर्वशः ॥ ७९<br>तस्मिन् द्वीपे नराः श्रेष्ठा देवनो गिरिरुच्यते ।<br>देवनात् परतश्चापि गोविन्दो नाम पर्वतः ॥ ८०<br>गोविन्दात् परतश्चापि क्रौञ्चस्तु प्रथमो गिरिः ।<br>क्रौञ्चात् परः पावनकः पावनादन्धकारकः ॥ ८१<br>अन्धकारात् परे चापि देवावृन्नाम पर्वतः ।<br>देवावृतः परेणापि पुण्डरीको महान् गिरिः ॥ ८२<br>एते रत्नमयाः सप्त क्रौञ्चद्वीपस्य पर्वताः ।<br>परस्परस्य द्विगुणो विष्कम्भो वर्षपर्वतः ॥ ८३<br>वर्षाणि तस्य वक्ष्यामि नामतस्तु निबोधत ।<br>क्रौञ्चस्य कुशलो देशो वामनस्य मनोऽनुगः ॥ ८४<br>मनोऽनुगात् परे चोष्णास्तृतीयोऽपि स उच्यते ।<br>उष्णात् परे पावनकः पावनादन्धकारकः ॥ ८५<br>अन्धकारकदेशात् तु मुनिदेशस्तथापरः ।<br>मुनिदेशात् परे चापि प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः ॥ ८६<br>सिद्धचारणसंकीर्णो गौरप्रायः शुचिर्जनः ।<br>श्रुतास्तत्रैव नद्यस्तु प्रतिवर्षं गताः शुभाः ॥ ८७<br>गौरी कुमुद्वती चैव संध्या रात्रिर्मनोजवा ।<br>ख्यातिश्च पुण्डरीका च गङ्गा सप्तविधा स्मृता ॥ ८८<br>तासां सहस्रशश्चान्या नद्यः पार्श्वसमीपगाः ।<br>अभिगच्छन्ति ता नद्यो बहुलाश्च बहूदकाः ॥ ८९<br>तेषां निसर्गो देशानामानुपूर्व्येण सर्वशः ।<br>न शक्यो विस्तराद् वक्तुमपि वर्षशतैरपि ॥ ९०<br>सर्गो यश्च प्रजानां तु संहारो यश्च तेषु वै । | इसके बाद अब मैं क्रौञ्चद्वीपका यथार्थरूपसे वर्णन कर रहा हूँ। इसका विस्तार कुशद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। चक्केकी भाँति गोलाकार उस क्रौञ्चद्वीपसे घृतसागर चारों ओरसे घिरा हुआ है। श्रेष्ठ ऋषियो! इस क्रौञ्चद्वीपमें देवन नामक पर्वत बतलाया जाता है। देवनके बाद गोविन्द नामक पर्वत है। गोविन्दके बाद क्रौञ्च नामक पहला पर्वत है। क्रौञ्चके बाद पावनक, पावनकके बाद अन्धकारक और अन्धकारकके बाद देवावृत् नामक पर्वत है। देवावृत्के बाद पुण्डरीक नामक विशाल पर्वत है। क्रौञ्चद्वीपके ये सातों पर्वत रत्नमय हैं। इस द्वीपके वर्ष पर्वतके रूपमें स्थित विष्कम्भ पर्वत परस्पर एक-दूसरेसे दुगुने हैं। अब इस द्वीपके वर्षोंका नाम बतला रहा हूँ, सुनिये। क्रौञ्च पर्वतके प्रदेशका नाम कुशल है। वामन पर्वतका प्रदेश मनोऽनुग कहलाता है। मनोऽनुगके बाद तीसरा उष्ण प्रदेश कहा जाता है। उष्णके बाद पावनक, पावनकके बाद अन्धकारक और अन्धकारकके बाद दूसरा मुनिदेश है। मुनिदेशके बाद दुन्दुभिस्वन नामक देश कहा जाता है। यह द्वीप सिद्धों एवं चारणोंसे व्याप्त है। यहाँके निवासी प्रायः गौर वर्णके एवं परम पवित्र होते हैं। इस द्वीपके प्रत्येक वर्षमें मङ्गलमयी नदियाँ भी प्रवाहित होती हैं, ऐसा सुना गया है। वहाँ गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति और पुण्डरीका—ये सात प्रकारकी गङ्गा बतलायी जाती हैं। इनके अगल-बगलमें बहनेवाली अगाध जलसे भरी हुई हजारों अन्य नदियाँ भी हैं, जो इन्हीं प्रमुख नदियोंमें आकर मिली हैं। उन पर्वतीय प्रदेशोंकी सर्वथा आनुपूर्वी स्वाभाविकी स्थितिका तथा वहाँकी प्रजाओंकी सृष्टि एवं संहारका विस्तारपूर्वक वर्णन सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता ॥ ७८-९० १/२ ॥ | | अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि शाल्मलस्य निबोधत ॥ ९१<br>शाल्मलो द्विगुणो द्वीपः क्रौञ्चद्वीपस्य विस्तरात् ।<br>परिवार्य समुद्रं तु घृतमण्डोदकं स्थितः ॥ ९२ | इसके बाद मैं शाल्मलद्वीपका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। शाल्मलद्वीप क्रौञ्चद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। यह घृतमण्डोदसागरको घेरकर स्थित है। इसमें पुण्यमय जनपद हैं। वहाँके निवासी क्षमाशील एवं तेजस्वी होते |
| ४२२ | * मत्स्यपुराण * |
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| तत्र पुण्या जनपदाश्चिराच्च म्रियते जनः।<br>कुत एव तु दुर्भिक्षं क्षमातेजोयुता हि ते॥ ९३ | हैं तथा दीर्घायुका उपभोग कर मृत्युको प्राप्त होते हैं। वहाँ अकालकी कोई सम्भावना ही नहीं है। वहाँ पहले | | प्रथमः सूर्यसङ्काशः सुमना नाम पर्वतः।<br>पीतस्तु मध्यमश्चासीत् ततः कुम्भमयो गिरिः॥ ९४ | पर्वतका नाम सुमना है, जो सूर्यके समान चमकीला होनेके कारण पीले रंगका है। उसके बाद दूसरा कुम्भमय नामक पर्वत है। उसका दूसरा नाम सर्वसुख | | नाम्ना सर्वसुखो नाम दिव्यौषधिसमन्वितः।<br>तृतीयश्चैव सौवर्णो भृङ्गपत्रनिभो गिरिः॥ ९५ | है। वह दिव्य ओषधियोंसे सम्पन्न है। तीसरा स्वर्णसम्पन्न एवं भ्रमरके पंखके समान रंगवाला रोहित नामक विशाल पर्वत है। यह पर्वतश्रेष्ठ दिव्य है। सुमना | | सुमहान् रोहितो नाम दिव्यो गिरिवरो हि सः।<br>सुमनाः कुशलो देशः सुखोदर्कः सुखोदयः॥ ९६ | पर्वतका देश कुशल एवं दूसरे सर्वसुख पर्वतका देश सुखोदय है, जो सभी सुखोंको उत्पन्न करनेवाला है। तीसरे रोहित पर्वतका प्रदेश रोहिण नामसे विख्यात है। | | रोहितो यस्तृतीयस्तु रोहिणो नाम विश्रुतः।<br>तत्र रत्नान्यनेकानि स्वयं रक्षति वासवः॥ ९७ | वहाँ अनेकों प्रकारके रत्नोंकी खानें हैं, जिनकी रक्षा प्रजापतिको साथ लेकर स्वयं इन्द्र करते हैं और वे ही | | प्रजापतिमुपादाय प्रसन्नो विदधत् स्वयम्।<br>न तत्र मेघा वर्षन्ति शीतोष्णं च न तद्विधम्॥ ९८ | प्रसन्नतापूर्वक वहाँकी प्रजाओंके लिये कार्यका विधान करते हैं। वहाँ न तो मेघ वर्षा करते हैं, न शीत एवं उष्णकी ही अधिकता रहती है। इन तीनों द्वीपोंमें | | वर्णाश्रमाणां वार्ता वा त्रिषु द्वीपेषु विद्यते।<br>न ग्रहो न च चन्द्रोऽस्ति ईर्ष्यासूया भयं तथा॥ ९९ | वर्णाश्रमकी चर्चा चलती रहती है। अर्थात् यहाँ वर्णाश्रमका पूर्णरूपसे प्रचार है। यहाँ न ग्रहगण हैं, न चन्द्रमा हैं और न यहाँके निवासियोंमें ईर्ष्या, असूया और भय ही | | उद्भिदान्युदकान्यत्र गिरिप्रस्रवणानि च।<br>भोजनं षड्रसं तत्र तेषां स्वयमुपस्थितम्॥ १०० | देखा जाता है। यहाँ पर्वतोंसे झरते हुए जल ही अन्नके उत्पादक हैं। वहाँके निवासियोंके लिये षट्-रसयुक्त भोजन स्वयं ही प्राप्त हो जाता है। उनमें न तो ऊँच- | | अधमोत्तमं न तेष्वस्ति न लोभो न परिग्रहः।<br>आरोग्यबलवन्तश्च एकान्तसुखिनो नराः॥ १०१ | नीचका भाव है, न लोभ है और न परिग्रह (दान लेनेकी प्रवृत्ति) ही है। वे नीरोग एवं बलवान् होते हैं तथा एकान्त सुखका उपभोग करते हैं। वे लोग तीस हजार वर्षतककी | | त्रिंशद्वर्षसहस्राणि मानसीं सिद्धिमास्थिताः।<br>सुखमायुश्च रूपं च धर्मैश्वर्यं तथैव च॥ १०२ | मानसी सिद्धिको प्राप्त होकर सुख, दीर्घायु, सुन्दर रूप, धर्म और ऐश्वर्यका उपभोग करते हुए जीवन-यापन करते हैं। कुश, क्रौञ्च और शाल्मल—इन तीनों द्वीपोंमें | | शाल्मलान्तेषु विज्ञेयं द्वीपेषु त्रिषु सर्वतः।<br>व्याख्यातः शाल्मलानां द्वीपानां तु विधिः शुभः॥ १०३ | यही स्थिति समझनी चाहिये। इस प्रकार मैं इन तीनों द्वीपोंकी शुभमयी विधिका विवरण बतला चुका। इस |
| * अध्याय १२३ * | ४२३ |
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| परिमण्डलस्तु द्वीपस्य चक्रवत् परिवेष्टितः ।<br>सुरोदेन समुद्रेण द्विगुणेन समन्वितः ॥ १०४ ॥ | शाल्मलद्वीपका मण्डल (घेरा) दुगुने परिमाणवाले सुरोदसागरसे चारों ओर चक्रकी भाँति गोलाकार घिरा हुआ है॥९१-१०४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे द्वीपवर्णनं नाम द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णन-प्रसङ्गमें द्वीप-वर्णन नामक एक सौ बाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १२२ ॥
एक सौ तेईसवाँ अध्याय
गोमेदकद्वीप* और पुष्करद्वीपका वर्णन
| सूत उवाच | |
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| गोमेदकं प्रवक्ष्यामि षष्ठं द्वीपं तपोधनाः ।<br>सुरोदकसमुद्रस्तु गोमेदेन समावृतः ॥ १ | सूतजी कहते हैं—तपोधन ऋषियो! अब मैं छठे गोमेदक द्वीपका वर्णन कर रहा हूँ। गोमेदक द्वीपसे सुरोदकसागर घिरा हुआ है। इसका विस्तार शाल्मलद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। उस द्वीपमें उच्च शिखरोंवाले दो पर्वत हैं—ऐसा जानना चाहिये। उनमें पहलेका नाम सुमना है। यह पर्वत अञ्जनके समान काले रंगसे सुशोभित है। दूसरा पर्वत कुमुद नामवाला है, जो सभी प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न, सुवर्णमय, शोभाशाली और वृक्षादिकी समृद्धियोंसे युक्त है। यह गोमेदक द्वीप छठे सुरोदसागरकी अपेक्षा दुगुने परिमाणवाले इक्षुरसोदसागरसे घिरा हुआ है। इसमें धातकी और कुमुद नामक दो अत्यन्त विस्तृत प्रदेश हैं, जो ‘हव्यपुत्र’ नामसे विख्यात हैं। सुमना पर्वतका जो प्रथम वर्ष है, उसीको धातकीखण्ड कहते हैं। यही धातकी नामक प्रथम पर्वतका प्रथम वर्ष कहलाता है। गोमेद नामसे जो वर्ष कहा गया है, उसीको सर्वसुख भी कहते हैं। इसके बाद दूसरे कुमुदपर्वतका प्रदेश भी कुमुद नामसे विख्यात है। ये दोनों पर्वत अन्य सभी पर्वतोंसे ऊँचे हैं। इस गोमेदक द्वीपके पूर्वभागमें सुमना नामक पर्वत स्थित है, जो पूर्वसे पश्चिम समुद्रतक फैला हुआ है। इसी प्रकार इस द्वीपके पश्चिमार्ध भागमें कुमुद नामक पर्वत स्थित है। इन पर्वतोंके चरण-प्रान्तोंसे वह देश दो भागोंमें विभक्त हो गया है। इस द्वीपका दक्षिणार्ध भाग धातकीखण्ड कहलाता है |
| शाल्मलस्य तु विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः ।<br>तस्मिन् द्वीपे तु विज्ञेयौ पर्वतौ द्वौ समाहितौ ॥ २ | |
| प्रथमः सुमना नाम भात्यञ्जनमयो गिरिः ।<br>द्वितीयः कुमुदो नाम सर्वौषधिसमन्वितः ॥ ३ | |
| शातकौम्भमयः श्रीमान् विज्ञेयः सुमहाचितः ।<br>समुद्रेक्षुरसोदेन वृतो गोमेदकश्च सः ॥ ४ | |
| षष्ठेन तु समुद्रेण सुरोदाद् द्विगुणेन च ।<br>धातकी कुमुदश्चैव हव्यपुत्रौ सुविस्तृतौ ॥ ५ | |
| सौमनं प्रथमं वर्षं धातकीखण्डमुच्यते ।<br>धातकिनः स्मृतं तद् वै प्रथमं प्रथमस्य तु ॥ ६ | |
| गोमेदं यत्स्मृतं वर्षं नाम्ना सर्वसुखं तु तत् ।<br>कुमुदस्य द्वितीयस्य द्वितीयं कुमुदं ततः ॥ ७ | |
| एतौ द्वौ पर्वतौ वृत्तौ शेषौ सर्वसमुच्छ्रितौ ।<br>पूर्वेण तस्य द्वीपस्य सुमनाः पर्वतः स्थितः ॥ ८ | |
| प्राक्पश्चिमायतः पादैरासमुद्रादिति स्थितः ।<br>पश्चार्धं कुमुदस्तस्य एवमेव स्थितस्तु वै ॥ ९ | |
| एतैः पर्वतपादैस्तु स देशो वै द्विधा कृतः ।<br>दक्षिणार्धे तु द्वीपस्य धातकीखण्डमुच्यते ॥ १० |
* इस द्वीपका वर्णन प्रायः अन्य पुराणोंमें नहीं है। पर सिद्धान्तशिरोमणि गोलाध्याय ३। २५ आदिमें इसका वर्णन है। अन्य पुराणमें गोमेद प्लक्षद्वीपमें एक मर्यादा पर्वतमात्र है।
| ४२४ | * मत्स्यपुराण * |
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| कुमुदं तूत्तरे तस्य द्वितीयं वर्षमुत्तमम्।<br>एतौ जनपदौ द्वौ तु गोमेदस्य तु विस्तृतौ॥ ११ | तथा इसके उत्तरार्ध भागमें कुमुद नामक दूसरा श्रेष्ठ वर्ष है। गोमेदक द्वीपके ये दोनों प्रदेश अत्यन्त विस्तृत माने जाते हैं॥१-११॥ | | इतः परं प्रवक्ष्यामि सप्तमं द्वीपमुत्तमम्।<br>समुद्रेक्षुरसं चैव गोमेदाद् द्विगुणं हि सः॥ १२<br>आवृत्य तिष्ठति द्वीपः पुष्करः पुष्करैर्वृतः।<br>पुष्करेण वृतः श्रीमांश्चित्रसानुर्महागिरिः॥ १३<br>कूटैश्चित्रैर्मणिमयैः शिलाजालसमुद्भवैः।<br>द्वीपस्यैव तु पूर्वार्धे चित्रसानुः स्थितो महान्॥ १४<br>परिमण्डलसहस्राणि विस्तीर्णः सप्तविंशतिः।<br>ऊर्ध्वं स वै चतुर्विंशद् योजनानां महाचलः॥ १५<br>द्वीपार्धस्य परिक्षिसः पश्चिमे मानसो गिरिः।<br>स्थितो वेलासमीपे तु पूर्वचन्द्र इवोदितः॥ १६<br>योजनानां सहस्राणि सार्धं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>तस्य पुत्रो महावीतः पश्चिमार्धस्य रक्षिता॥ १७<br>पूर्वार्धे पर्वतस्यापि द्विधा देशस्तु स स्मृतः।<br>स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः॥ १८<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव गोमेदाद् द्विगुणेन तु।<br>त्रिंशद्वर्षसहस्राणि तेषु जीवन्ति मानवाः॥ १९<br>विपर्ययो न तेष्वस्ति एतत् स्वाभाविकं स्मृतम्।<br>आरोग्यं सुखबाहुल्यं मानसीं सिद्धिमास्थिताः॥ २० | इसके बाद अब मैं सातवें सर्वोत्तम द्वीपका वर्णन कर रहा हूँ, जो पुष्करों (कमलों)-से व्याप्त होनेके कारण पुष्कर नामसे प्रसिद्ध है। यह परिमाणमें गोमेदकद्वीपसे दुगुना है और इक्षुरसोदक-सागरको घेरकर स्थित है। पुष्करद्वीपमें चित्रसानु (विचित्र शिखरोंवाला) नामक शोभाशाली महान् पर्वत है। यह अनेकों चित्र-विचित्र मणिमय शिखरों तथा शिलासमूहोंसे सुशोभित है। यह महान् पर्वत चित्रसानु द्वीपके पूर्वार्ध भागमें स्थित है। यह महान् गिरि सत्ताईस योजन विस्तृत और चौबीस योजन ऊँचा है। इस द्वीपके पश्चिमार्ध भागमें समुद्रतटपर मानस नामक पर्वत स्थित है, जो पूर्व दिशामें निकले हुए चन्द्रमाके समान शोभायमान है। यह साढ़े पचास हजार योजन ऊँचा है। मानस पर्वतके पूर्वार्धमें स्थित रहते हुए भी इसका पुत्र महावीत नामक पर्वत द्वीपके पश्चिमार्ध भागकी रक्षा करता है। इस प्रकार वह प्रदेश दो भागोंमें विभक्त कहा जाता है। पुष्करद्वीप स्वादिष्ट जलवाले महासागरसे घिरा हुआ है। यह विस्तार एवं मण्डल (घेराव)-में गोमेदक द्वीपसे दुगुना है। इस द्वीपके अन्तःस्थित प्रदेशोंके मानव तीस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। उनमें वृद्धावस्थाका प्रवेश नहीं होता। वे स्वाभाविक रूपसे युवावस्था, नीरोगता, अत्यधिक सुख और मानसी सिद्धिसे युक्त होते हैं॥१२-२०॥ | | सुखमायुश्च रूपं च त्रिषु द्वीपेषु सर्वशः।<br>अधमोत्तमौ न तेष्वास्तां तुल्यास्ते वीर्यरूपतः॥ २१<br>न तत्र वध्यवधकौ नेर्ष्यासूया भयं तथा।<br>न लोभो न च दम्भो वा न च द्वेषः परिग्रहः॥ २२<br>सत्यानृते न तेष्वास्तां धर्माधर्मौ तथैव च।<br>वर्णाश्रमाणां वार्ता च पाशुपाल्यं वणिक् कृषिः॥ २३<br>त्रयीविद्या दण्डनीतिः शुश्रूषा दण्ड एव च।<br>न तत्र वर्षं नद्यो वा शीतोष्णं न च विद्यते॥ २४<br>उद्भिदान्युदकानि स्युर्गिरिप्रस्रवणानि च।<br>तुल्योत्तरकुरुणां तु कालस्तत्र तु सर्वदा॥ २५ | तीनों द्वीपोंमें सर्वत्र सुख, दीर्घायु और सुन्दर रूपकी सुलभता रहती है। उनमें ऊँच-नीचका भाव नहीं होता। पराक्रम और रूपकी दृष्टिसे वे एकतुल्य होते हैं। उनमें न कोई वध करनेयोग्य होता है और न मारनेवाला ही पाया जाता है। उनमें ईर्ष्या, असूया, भय, लोभ, दम्भ, द्वेष और संग्रहका नामतक नहीं है। उनमें सत्य-असत्य एवं धर्म-अधर्मका विवाद, वर्णाश्रमकी चर्चा, पशुपालन, व्यवसाय, खेती, त्रयीविद्या, दण्डनीति (शत्रुओं या अपराधियोंको दण्ड देकर वशमें करनेकी नीति), नौकरी और परस्पर दण्ड-विधान भी नहीं पाया जाता। वहाँ न तो वर्षा होती है, न नदियाँ ही हैं तथा सर्दी-गरमी भी नहीं पड़ती। पर्वतोंसे टपकते हुए जल ही अन्न और जलका काम पूरा करते हैं। वहाँ सर्वदा उत्तरकुरु देशके सदृश समय |
| * अध्याय १२३ * | ४२५ |
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| सर्वतः सुखकालोऽसौ जराक्लेशविवर्जितः ।<br>सर्गस्तु धातकीखण्डे महावीते तथैव च ॥ २६<br><br>एवं द्वीपाः समुद्रैस्तु समं समभिरावृताः ।<br>द्वीपस्यानन्तरो यस्तु समुद्रस्तत्समस्तु वै ॥ २७<br><br>एवं द्वीपसमुद्राणां वृद्धिर्ज्ञेया परस्परम् ।<br>अपां चैव समुद्रेकात् समुद्र इति संज्ञितः ॥ २८<br><br>ऋषद्वसन्त्यो वर्षेषु प्रजा यत्र चतुर्विधाः ।<br>ऋषिरित्येष गमने वर्ष त्वेतेन तेषु वै ॥ २९<br><br>उदयतीन्दौ पूर्वे तु समुद्रः पूर्यते सदा ।<br>प्रक्षीयमाणे बहुले क्षीयतेऽस्तमिते च वै ॥ ३०<br><br>आपूर्यमाणो ह्युदधिरात्मनैवाभिपूर्थ्यते ।<br>ततो वै क्षीयमाणे तु स्वात्मन्येव ह्यपां क्षयः ॥ ३१<br><br>उदयात् पयसां योगात् पुष्णन्त्यापो यथा स्वयम् ।<br>तथा स तु समुद्रोऽपि वर्धते शशिनोदये ॥ ३२<br><br>अन्यूनानतिरिक्तात्मा वर्धन्त्यापो ह्रसन्ति च ।<br>उदयेऽस्तमये चेन्दोः पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः ॥ ३३<br><br>क्षयवृद्धी समुद्रस्य शशिवृद्धिक्षये तथा ।<br>दशोत्तराणि पञ्चाहुरङ्गुलानां शतानि च ॥ ३४<br><br>अपां वृद्धिः क्षयो दृष्टः समुद्राणां तु पर्वसु ।<br>द्विरापत्त्वात् स्मृतो द्वीपो दधनाच्चोदधिः स्मृतः ॥ ३५<br><br>निगीर्णत्वाच्च गिरयो पर्वबन्धाच्च पर्वताः ।<br>शाकद्वीपे तु वै शाकः पर्वतस्तेन चोच्यते ॥ ३६<br><br>कुशद्वीपे कुशस्तम्बो मध्ये जनपदस्य तु ।<br>क्रौञ्चद्वीपे गिरिः क्रौञ्चस्तस्य नाम्ना निगद्यते ॥ ३७<br><br>शाल्मलिः शाल्मलद्वीपे पूज्यते स महाद्रुमः ।<br>गोमेदके तु गोमेदः पर्वतस्तेन चोच्यते ॥ ३८<br><br>न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः ।<br>पूज्यते स महादेवैर्ब्रह्मांशोऽव्यक्तसम्भवः ॥ ३९ | बना रहता है। वहाँ सब लोग सर्वत्र वृद्धावस्थाके कष्टसे रहित सुखमय समय व्यतीत करते हैं। यही स्थिति धातकीखण्ड तथा महावीत—दोनों प्रदेशोंमें पायी जाती है। इस प्रकार सातों द्वीप पृथक्-पृथक् सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। जो समुद्र जिस द्वीपके बाद पड़ता है, वह परिमाणमें उसी द्वीपके बराबर माना गया है। इस प्रकार द्वीपों और समुद्रोंकी परस्पर वृद्धि समझनी चाहिये। जलकी सम्यक् प्रकारसे वृद्धि होनेके कारण इस जलराशिको समुद्र कहते हैं। ‘ऋषि’ धातुका अर्थ गमन है, इसीसे ‘वर्ष’ शब्द बनता है। उन वर्षोंमें चार प्रकारकी प्रजाएँ सुखपूर्वक निवास करती हैं। पूर्व दिशामें चन्द्रमाके उदय होनेपर समुद्र सर्वदा जलसे पूर्ण हो जाता है अर्थात् उसमें ज्वार आ जाता है और वही चन्द्रमा जब अस्त हो जाते हैं तब समुद्रका बढ़ा हुआ जल अत्यन्त क्षीण हो जाता है अर्थात् भाटा हो जाता है। जलकी वृद्धिके समय समुद्र अपनी मर्यादाके भीतर ही बढ़ता है और क्षीण होते समय मर्यादाके अंदर ही उसके जलका क्षय होता है ॥ २१—३१ ॥<br><br>जिस प्रकार चन्द्रमाके उदय होनेपर चन्द्र-किरणोंका जलके साथ संयोग होनेसे जल अपने-आप उछलने लगता है, उसी प्रकार समुद्र भी बढ़ने लगता है। यद्यपि शुक्लपक्ष और कृष्णपक्षमें चन्द्रमाके उदय और अस्त-कालमें जल बढ़ता और घटता है, तथापि समुद्रकी मर्यादामें न्यूनता या अधिकता नहीं दीख पड़ती। चन्द्रमाकी वृद्धि और क्षयके अवसरपर समुद्रका भी उत्कर्ष और अपकर्ष होता है। पानीका यह चढ़ाव-उतार एक सौ पंद्रह अङ्गुलतक बतलाया जाता है। पर्वके अवसरोंपर समुद्रोंके जलोंका यह ज्वारभाटा स्पष्ट दीखनेमें आता है। दो ओर जलसे घिरा होनेके कारण समुद्रस्थ प्रदेशको द्वीप कहते हैं और जलको धारण करनेके कारण समुद्रको उदधि कहा जाता है। (सभी वस्तुओंको) आत्मसात् कर लेनेके कारण ‘गिरि’ और (पृथ्वीके) संधिस्थानको बाँधनेके कारण ‘पर्वत’ नाम पड़ा है। शाकद्वीपमें शाक नामक पर्वत है, इसी कारण उसे शाकद्वीप कहते हैं। कुशद्वीपमें जनपदके मध्यभागमें विशाल कुशस्तम्ब (कुशका गुल्म) है (इसीलिये वह कुशद्वीप कहा जाता है)। क्रौञ्चद्वीपमें क्रौञ्च नामक पर्वत है, अतः उसीके नामपर वह क्रौञ्चद्वीप कहलाता है। शाल्मलद्वीपमें सेमलका महान् वृक्ष है, उसकी वहाँके लोग पूजा करते हैं। (इसीसे उसे शाल्मलद्वीप कहा जाता है।) गोमेदकद्वीपमें गोमेद नामका पर्वत है, अतः उसीके नामपर द्वीपको गोमेदक नामसे पुकारते हैं। पुष्करद्वीपमें कमलके समान बरगदका वृक्ष है, इसी कारण उसे पुष्करद्वीप कहते हैं। वह वटवृक्ष अव्यक्त ब्रह्माके अंशसे समुद्भूत हुआ है, इसीलिये प्रधान-प्रधान |
| ४२६ | * मत्स्यपुराण * |
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| तस्मिन् स वसति ब्रह्मा साध्यैः सार्धं प्रजापतिः।<br>तत्र देवा उपासन्ते त्रयस्त्रिंशन्महर्षिभिः॥ ४०<br><br>स तत्र पूज्यते देवो देवैर्महर्षिसत्तमैः।<br>जम्बूद्वीपात् प्रवर्तन्ते रत्नानि विविधानि च॥ ४१ | देवगण उसकी पूजा करते हैं। उस द्वीपमें साध्यगणोंके साथ प्रजापति ब्रह्मा निवास करते हैं। वहाँ महर्षियोंके साथ तैंतीस देवता उपासना करते हैं। वहाँ श्रेष्ठ महर्षियों एवं देवताओंद्वारा देवाधिदेव ब्रह्माकी पूजा की जाती है। जम्बूद्वीपसे अनेकों प्रकारके रत्न (अन्यान्य द्वीपोंमें) प्रवर्तित होते हैं॥ ३२—४१॥ | | द्वीपेषु तेषु सर्वेषु प्रजानां क्रमशैस्तु वै।<br>आर्जवाद् ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च॥ ४२<br><br>आरोग्यायुष्प्रमाणाभ्यां द्विगुणं द्विगुणं ततः।<br>द्वीपेषु तेषु सर्वेषु यथोक्तं वर्षकेषु च॥ ४३<br><br>गोपायन्ते प्रजास्तत्र सर्वैः सहजपण्डितैः।<br>भोजनं चाप्रयत्नेन सदा स्वयमुपस्थितम्॥ ४४ | उपर्युक्त उन सभी द्वीपों और वर्षोंमें क्रमशः प्रजाओंकी सरलता, ब्रह्मचर्य, सत्यवादिता, इन्द्रियनिग्रह, नीरोगता और आयुका प्रमाण एक-दूसरेसे दुगुना बढ़ता जाता है। वे सभी स्वाभाविक ही पण्डित होते हैं, अतः उनके द्वारा स्वयं प्रजाओंकी रक्षा होती रहती है। वहाँ भोजन अनायास ही स्वयं उपस्थित हो जाता है, जो छहों रसोंसे युक्त और महान् बलदायक होता है। उसे ही वहाँके निवासी खाते हैं। | | षड्रसं तन्महावीर्यं तत्र ते भुञ्जते जनाः।<br>परेण पुष्करस्याथ आवृत्त्यावस्थितो महान्॥ ४५<br><br>स्वादूदकसमुद्रस्तु स समन्ताद्वेष्टयन्।<br>स्वादूदकस्य परितः शैलस्तु परिमण्डलः॥ ४६<br><br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते।<br>आलोकस्तत्र चार्वाक् च निरालोकस्ततः परम्॥ ४७ | पुष्करद्वीपके बाद स्वादिष्ट जलसे परिपूर्ण महासागर उस द्वीपको चारों ओरसे घेरकर अवस्थित है। उस स्वादिष्ट जलवाले सागरके चारों ओर एक मण्डलाकार पर्वत है, जो प्रकाश और अन्धकारसे युक्त है। उसीको 'लोकालोक' नामसे पुकारा जाता है। उसका अगला भाग प्रकाशयुक्त तथा पिछला भाग अन्धकारसे आच्छादित रहता है। | | लोकविस्तारमात्रं तु पृथिव्यर्थं तु बाह्यतः।<br>प्रतिच्छन्नं समन्तात् तु उदकेनावृतं महत्॥ ४८<br><br>भूमेर्दशगुणाश्चापः समन्तात् पालयन्ति गाम्। | उसका विस्तार लोकोंके विस्तारके बराबर है, किंतु वह बाहरसे पृथ्वीके अर्धभाग-जितना दीख पड़ता है। वह महान् पर्वत चारों ओर जल-राशिसे आच्छन्न एवं घिरा हुआ है। पृथ्वीसे दसगुना जल चारों ओरसे पृथ्वीकी रक्षा करता है। | | अद्भ्यो दशगुणश्चाग्निः सर्वतो धारयत्यपः॥ ४९<br><br>अग्नेर्दशगुणो वायुर्धारयञ्ज्योतिरास्थितः।<br>तिर्यक् च मण्डलो वायुर्भूतान्यावेष्ट्य धारयन्॥ ५० | जलसे दसगुनी अग्नि सब ओरसे जलको धारण करती है। अग्निसे दसगुनी वायु तेजको धारण करके स्थित है। वह वायुमण्डल तिरछा होकर समस्त प्राणियोंमें प्रविष्ट हो सबको धारण किये हुए है। | | दशाधिकं तथाऽऽकाशं वायोर्भूतान्यधारयत्।<br>भूतानि धारयन् व्योम तस्माद् दशगुणस्तु वै॥ ५१ | वायुसे दसगुना आकाश भूतोंको धारण किये हुए है। | | भूतादितो दशगुणं महद्भूतान्यधारयत्।<br>महत्तत्त्वं ह्यनन्तेन अव्यक्तेन तु धार्यते॥ ५२ | उस आकाशसे दसगुना भूतादि अर्थात् तामस अहंकार है। उस भूतादिसे दसगुना महद्भूत (महत्तत्त्व) है और वह महत्तत्त्व अनन्त अव्यक्तद्वारा धारण किया जाता है। | | आधाराधेयभावेन विकारास्ते विकारिणाम्।<br>पृथ्व्यादयो विकारास्ते परिच्छिन्नाः परस्परम्॥ ५३ | इन विकृतिशील तत्त्वोंके विकार आधाराधेयभावसे कल्पित हैं। ये पृथ्वी आदि विकार परस्पर विभक्त हैं, |
- अध्याय १२३ * | ४२७ ---|---:
| परस्पराधिकाश्चैव प्रविष्टाश्च परस्परम्।<br>एवं परस्परोत्पन्ना धार्यन्ते च परस्परम्॥ ५४ | परस्पर एक-दूसरेसे अधिक तथा एक-दूसरेमें घुसे हुए भी हैं। इसी प्रकार ये परस्पर उत्पन्न होते हैं और परस्पर एक-दूसरेको धारण भी करते हैं*॥ ४२—५४॥ |
| यस्मात् प्रविष्टास्तेऽन्योन्यं तस्मात् ते स्थिरतां गताः।<br>आसंस्ते ह्यविशेषाश्च विशेषा अन्यवेशनात्॥ ५५<br><br>पृथ्व्यादयस्तु वाय्वन्ताः परिच्छिन्नास्तु तत्र ते।<br>भूतेभ्यः परतस्तेभ्यो ह्यालोकः सर्वतः स्मृतः॥ ५६<br><br>तथा ह्यालोक आकाशे परिच्छिन्नानि सर्वशः।<br>पात्रे महति पात्राणि यथा ह्यन्तर्गतानि च॥ ५७<br><br>भवन्त्यन्योन्यहीनानि परस्परसमाश्रयात्।<br>तथा ह्यालोक आकाशे भेदास्त्वन्तर्गतागताः॥ ५८<br><br>कृतान्येतानि तत्त्वानि अन्योन्यस्याधिकानि च।<br>यावदेतानि तत्त्वानि तावदुत्पत्तिरुच्यते॥ ५९<br><br>जन्तूनामिह संस्कारो भूतेष्वन्तर्गतेषु वै।<br>प्रत्याख्यायेह भूतानि कार्योत्पत्तिर्न विद्यते॥ ६०<br><br>तस्मात् परिमिता भेदाः स्मृताः कार्यात्मकास्तु वै।<br>ते कारणात्मकाश्चैव स्युर्भेदा महदादयः॥ ६१<br><br>इत्येवं संनिवेशोऽयं पृथ्व्याक्रान्तस्तु भागशः।<br>सप्तद्वीपसमुद्राणां याथातथ्येन वै मया॥ ६२<br><br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव प्रसंख्यानेन चैव हि।<br>विश्वरूपं प्रधानस्य परिमाणैकदेशिनः॥ ६३<br><br>एतावत् संनिवेशस्तु मया सम्यक् प्रकाशितः।<br>एतावदेव श्रोतव्यं संनिवेशस्य पार्थिव॥ ६४ | चूँकि ये सभी परस्पर एक-दूसरेमें प्रविष्ट-से हैं, इसीलिये स्थिरताको प्राप्त हुए हैं। पहले इनमें कोई विशेषता नहीं थी, परंतु एक-दूसरेमें प्रविष्ट हो जानेसे ये विशिष्ट हो गये हैं। पृथ्वीसे लेकर वायुतकके सभी तत्त्व परस्पर विभक्त हैं। इन तत्त्वोंसे परे सारा जगत् निर्जन है। (अन्य सभी तत्त्व) प्रकाशमान आकाशमें सर्वत्र व्याप्त हैं। जिस प्रकार छोटे-छोटे पात्र बड़े पात्रके अन्तर्गत समा जाते हैं और परस्पर समाश्रयण होनेके कारण एक-दूसरेसे छोटे होते जाते हैं, उसी प्रकार ये सारे भेद प्रकाशमान आकाशके अन्तर्गत विलीन हो जाते हैं। ये तत्त्व परस्पर एक-दूसरेसे अधिक परिमाणवाले बनाये गये हैं। जबतक ये तत्त्व वर्तमान रहते हैं, तभीतक प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है। इस जगत्में इन्हीं तत्त्वोंके अन्तर्गत प्राणियोंकी व्यवस्थिति होती है। इन तत्त्वोंका प्रत्याख्यान कर देनेपर किसी प्रकार कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसीलिये वे परिमित (पृथ्वीसे वायुतक) तत्त्व कार्यात्मक कहे जाते हैं तथा महत्तत्त्व आदि भेद कारणात्मक हैं। इस प्रकार विभागपूर्वक पृथ्वीसे आच्छादित मण्डल, सातों द्वीपों और सातों समुद्रोंका यथार्थरूपसे गणनासहित विस्तार एवं मण्डल तथा परिमाणमें एकदेशी प्रधान तत्त्वका इसे विश्वरूप जानना चाहिये। राजन्! मैंने इस मण्डलका यहाँतक सम्यक् प्रकारसे वर्णन कर दिया; क्योंकि मण्डलके वृत्तान्तको यहाँतक ही सुनना चाहिये॥ ५५—६४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे सप्त द्वीपनिवेशनं नाम त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें सप्तद्वीपनिवेशन नामक एक सौ तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२३॥
* यह वर्णन अन्य पुराणमें भी है। पर इन सबोंका आचार्य यामुनने 'स्तोत्ररत्नम्'में परमात्मसम्बन्धसहित—
'यदण्डमण्डान्तरगोचरं च यद्दशोत्तराण्यावरणानि यानि च। गुणाः प्रधानं पुरुषाः परं पदं परात्परं ब्रह्म च ते विभूतयः॥'
इस एक ही श्लोकमें बड़े संक्षेपमें, पर सुन्दर शब्दों तथा भावोंमें चित्रण कर दिया है।
१२५- सूर्यकी गति और उनके रथका वर्णन
४२८ * मत्स्यपुराण *
मत्स्यावतार-कथा-प्रसंग
श्रुतिनि हित हरि मच्छ रूप धार्यौ। सदा ही भक्त-संकट निवार्यौ॥
चतुरमुख कह्यौ, सँख असुर श्रुति लै गयो, सत्यब्रत कह्यौ परलय दिखायौ।
भक्त-बत्सल, कृपाकरन, असरन-सरन, मत्स्यकौ रूप तब धारि आयौ॥
स्नान करि अंजली जल जबै नृप लियौ, मत्स्य जौ देखि कह्यो डारि दीजै।
मत्स्य कह्यौ, मैं गही आइ तुम्हरी सरन, करि कृपा मोहिं अब राखि लीजै॥
नृप सुनत बचन, चकित प्रथम है रह्यौ, कह्यौ, मछ बचन किहिं भाँति भाष्यौ।
पुनि कमंडल धर्यौ, तहाँ सो बढ़ि गयौ, कुंभ धरि बहुरि पुनि माट राख्यौ॥
पुनि धर्यौ खाड़, तालाब मैं पुनि धर्यौ, नदी मैं बहुरि पुनि डारि दीन्हौ।
बहुरि जब बढ़ि गयौ, सिंधु तब लै गयौ, तहाँ हरि-रूप नृप चीन्हि लीन्हौ॥
कह्यौ करि बिनय तुम ब्रह्म जो अनंत हौ, मत्स्यकौ रूप किहिं काज कीन्हौ!
बेद-बिधि चहत, तुम प्रलय देखन कहत, तुम दुहुँनि हेत अवतार लीन्हौ॥
कबहुँ बाराह, नरसिंह कबहुँ भयौ, कबहुँ मैं कच्छकौ रूप लीन्हौ।
कबहुँ भयौ राम, बसुदेव-सुत कबहुँ भयौ, और बहु रूप हित-भक्त कीन्हौ॥
सातवें दिवस दिखराइहौं प्रलय तोहिं सप्त-रिषि नाव मैं बैठि आवैं।
तोहिं बैठारिहौं नावमैं हाथ गहि, बहुरि हम ज्ञान तोहिं कहि सुनावैं॥
सर्प इक आइहै बहुरि तुम्हरे निकट, ताहि सों नाव मम सृंग बाँधौ।
यहै कहि भए अँतरधान तब मत्स्य प्रभु, बहुरि नृप आपनौ कर्म साधौ॥
सातवैं दिवस आयौ निकट जलधि जब, नृप कह्यौ अब कहाँ नाव पावैं।
आइ गइ नाव, तब रिषिन तासों कह्यौ, आउ हम नृपति तुमकौं बचावैं॥
पुनि कह्यौ, मत्स्य हरि अब कहाँ पाइय, रिषिन कह्यौ, ध्यान चित माहिं धारौ।
मत्स्य अरु सर्पु तिहिं ठौर परगट भए, बाँधि नृप नाव यौं कहि उचारौ॥
ज्यौं महाराज या जलधितैं पार कियौ, भव-जलधि पार त्यों करो स्वामी।
अहं-ममता हमैं सदा लागी रहै, मोह-मद-क्रोध-जुत मंद कामी॥
कर्म सुख-हित करत, होत तहँ दुःख नित, तऊ नर मूढ नाहीं सँभारत।
करन-कारन महराज हैं आप हो, ध्यान प्रभुकौ न मन माहिं धारत॥
बिन तुम्हारी कृपा गति नहीं नरनिकी, जानि मोहिं आपनौ कृपा कीजै।
जनम अरु मरनमैं सदा दुःखित देहु मोहिं ज्ञान जिहिं सदा जीजै॥
मत्स्य भगवान कह्यौ ज्ञान पुनि नृपति सों, भयो सो पुरान सब जगत जान्यौ।
लह्यो नृप ज्ञान, कह्यौ आँखि अब मीचि तू, मत्स्य कह्यौ सो नृपति मान्यौ॥
आँखिकौं खोलि जब नृपति देख्यौ बहुरि, कह्यौ, हरि प्रलय-माया दिखाई।
कह्यौ जो ज्ञान भगवान, सो आनि उर, नृपति निज आपु इहिं बिधि बिताई॥
बहुरि सँखासुरहि मारि, बेद आनि दिए, चतुरमुख बिबिध अस्तुति सुनाई।
सूरके प्रभूकी नित्य लीला नई, सकै कहि कौन, यह कछुक गाई॥
('सूरदास' १६। ४४३)
* अध्याय १२४ * | ४२९
एक सौ चौबीसवाँ अध्याय
सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इसके बाद अब मैं सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन कर रहा हूँ। ये सूर्य और चन्द्रमा सातों द्वीपों एवं सातों समुद्रोंके विस्तारको तथा समग्र भूतलके अर्धभागको और उसके बाहरके अन्य प्रदेशोंको ये अपने प्रकाशसे उद्भासित करते हैं। ये विश्वकी अन्तिम सीमातक प्रकाश फैलाते हैं। तुलना परिभ्रमणके प्रमाणको लेकर ही विद्वान् लोग आकाशकी करते हैं। सूर्य सामान्यतः तीनों लोकोंमें शीघ्रतापूर्वक भ्रमण करते हैं। 'अव' धातु रक्षण और प्रकाशार्थक है। प्रकाश फैलाने तथा प्राणियोंकी रक्षा करनेके कारण सूर्यको 'रवि' कहा जाता है। पुनः सूर्य और चन्द्रमाका प्रमाण बतला रहा हूँ। महनीय होनेके कारण पृथ्वीके लिये 'मही' शब्दका प्रयोग किया जाता है। अब भारतवर्षका तथा सूर्य-मण्डलके व्यासका परिमाण योजनोंमें बतला रहा हूँ, उसे सुनिये। सूर्य-मण्डलका परिमाण नौ हजार योजन है। इस मण्डलमें परिणाह (घेरा) विस्तारसे तिगुना अर्थात् सत्ताईस हजार योजन है। व्यास और मण्डलकी दृष्टिसे भी सूर्यसे चन्द्रमा बहुत छोटे हैं। पुनः सातों द्वीपों और समुद्रोंसहित पृथ्वीमण्डलके विस्तारका प्रमाण, जिन्हें विद्वानोंने पुराणोंमें बतलाया है, (योजनोंकी संख्यामें) बतला रहा हूँ॥१—९॥ <br><br> पूर्वकालमें जो पुराणोंके ज्ञाता हो चुके हैं, वे भी आजकलके पुराणोंके तुल्य ही थे। पूर्वकालके विद्वान् एवं आधुनिक विद्वान्—दोनोंके मत इस विषयमें समान हैं। अतः वर्तमानकालिक विद्वानोंके अनुसार भूतलका परिमाण बतला रहा हूँ। आधुनिक विद्वानोंने दिव्यलोककी स्थितिको भी पृथ्वीमण्डलके बराबर ही माना है। समूची पृथिवी पचास करोड़ योजनोंमें विस्तृत मानी गयी है। | | अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम्।<br>सूर्याचन्द्रमसावेतौ भ्रमन्तौ यावदेव तु॥१¹<br>सप्तद्वीपसमुद्राणां द्वीपानां भाति विस्तरः।<br>विस्तरार्थं पृथिव्यास्तु भवेदन्ध्रत्र बाह्यतः॥२<br>पर्याप्तपरिमाणं च चन्द्रादित्यौ प्रकाशतः।<br>पर्याप्तपारिमाण्यात्तु भूमेस्तुल्यं दिवः स्मृतम्॥३<br>भवति त्रीणि माँल्लोकान् सूर्यो यस्मात् परिभ्रमन्।<br>अव धातुः प्रकाशाख्यो अवनात्तु रविः स्मृतः॥४<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रमाणं चन्द्रसूर्ययोः।<br>महित्वान्महीशब्दो ह्यस्मिन्नर्थे निगद्यते॥५<br>अस्य भारतवर्षस्य विष्कम्भं तु सुविस्तरम्।<br>मण्डलं भास्करस्याथ योजनैस्तन्निबोधत॥६<br>नवयोजनसाहस्रो विस्तारो भास्करस्य तु।<br>विस्तारात् त्रिगुणश्चापि परिणाहोऽत्र मण्डले॥७<br>विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव भास्कराद् द्विगुणः शशी।<br>अतः पृथिव्या वक्ष्यामि प्रमाणं योजनैः पुनः॥८<br>सप्तद्वीपसमुद्राया विस्तारो मण्डलस्य तु।<br>इत्येतदिह संख्यातं पुराणे परिमाणतः॥९<br>तद्वक्ष्यामि प्रसंख्याय साम्प्रतं चाभिमानिभिः।<br>अभिमानिनो ह्यतीता ये तुल्यास्ते साम्प्रतैस्त्विह॥१०<br>देवा ये वै ह्यतीतास्तु रूपैर्नामभिरेव च।<br>तस्माद्वै साम्प्रतैर्देवैर्वक्ष्यामि² वसुधातलम्॥११<br>दिव्यस्य संनिवेशो वै साम्प्रतैरेव कृत्स्नशः।<br>शतार्धकोटिविस्तारा पृथिवी कृत्स्नशः स्मृता॥१२ | |
१. इस अध्यायके सभी श्लोक वायुपु० ५०।५६—१६९ (किसी प्रतिमें ५१।१—११३) तथा ब्रह्माण्डपुराणसे सर्वांशमें मिल जाते हैं। उनके श्लोक विशेष शुद्ध हैं।
२. यहाँ 'विद्वांसो ह वै देवाः' के अनुसार विद्वान् ही देवता हैं।
४३० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्याश्चार्धप्रमाणं च मेरोर्वै चतुरन्तरम्।<br>मेरोर्मध्यात् प्रतिदिशं कोटिरेका तु सा स्मृता॥ १३<br>तथा शतसहस्राणामेकोननवतिं पुनः।<br>पञ्चाशच्च सहस्राणि पृथिव्याः स तु विस्तरः॥ १४<br>पृथिव्या विस्तरं कृत्स्नं योजनैस्तन्निबोधत।<br>तिस्रः कोट्यस्तु विस्तारात्संख्यातास्तु चतुर्दिशम्॥ १५<br>विस्तारं त्रिगुणं चैव पृथिव्यन्तरमण्डलम्।<br>गणितं योजनानां तु कोट्यस्त्वेकादश स्मृताः॥ १६<br>तथा शतसहस्राणां सप्तत्रिंशाधिकास्तु ताः।<br>इत्येतद्वै प्रसंख्यातं पृथिव्यन्तरमण्डलम्॥ १७<br>तारकासंनिवेशस्य दिवि यावत्तु मण्डलम्।<br>पर्यांसः संनिवेशस्य भूमेस्तावत्तु मण्डलम्॥ १८<br>पर्यांसपरिमाणं च भूमेस्तुल्यं दिवः स्मृतम्।<br>समानापि लोकानामेतन्मानं प्रकीर्तितम्॥ १९<br>ज्योतिर्गणप्रचारस्य प्रमाणं परिवक्ष्यते।<br>मेरोः प्राच्यां दिशायां तु मानसोत्तरमूर्धनि॥ २०<br>वस्वौकसारा माहेन्द्री पुण्या हेमपरिष्कृता।<br>दक्षिणेन पुनर्मेरोर्मानसस्य तु पृष्ठतः॥ २१<br>वैवस्वतो निवसति यमः संयमने पुरे।<br>प्रतीच्यां तु पुनर्मेरोर्मानसस्य तु मूर्धनि॥ २२<br>सुखा नाम पुरी रम्या वरुणस्यापि धीमतः।<br>दिश्युत्तरस्यां मेरोस्तु मानसस्यैव मूर्धनि॥ २३<br>तुल्या महेन्द्रपुर्यापि सोमस्यापि विभावरी।<br>मानसोत्तरपृष्ठे तु लोकपालाश्चतुर्दिशम्॥ २४<br>स्थिता धर्मव्यवस्थार्थं लोकसंरक्षणाय च।<br>लोकपालोपरिष्टात् तु सर्वतो दक्षिणायने॥ २५<br>काष्ठागतस्य सूर्यस्य गतिस्तत्र निबोधत।<br>दक्षिणोपक्रमे सूर्यः क्षिप्तेषुरिव सर्पति॥ २६ | उसका आधा भाग मेरु पर्वतके उत्तरोत्तर फैला हुआ है और मेरु पर्वतके मध्यभागमें वह चारों ओर एक करोड़ योजन विस्तारवाली कही जाती है। इसी तरह पृथ्वीके अर्धभागका विस्तार नवासी लाख, पचास हजार योजन बतलाया जाता है। अब योजनके परिमाणसे पृथ्वीके समूचे विस्तारको सुनिये। इसका विस्तार चारों दिशाओंमें तीन करोड़ योजन माना गया है। यही सातों द्वीपों और समुद्रोंसे घिरी हुई पृथ्वीका विस्तार है। पृथ्वीका आन्तरिक मण्डल बाह्य मण्डलसे तिगुना अधिक है। इस प्रकार उसका परिमाण ग्यारह करोड़ सैंतीस लाख योजन माना गया है। यही पृथ्वीके आन्तरिक मण्डलकी गणना की गयी है। आकाश-मण्डलमें जितने तारागणोंकी स्थिति है, उतना ही समग्र पृथ्वीमण्डलका विस्तार माना गया है। इस प्रकार पृथ्वीमण्डलके परिमाणके बराबर आकाशमण्डल भी है। अब ज्योतिर्गणके प्रचारकी बात सुनिये। मेरु पर्वतकी पूर्व दिशामें मानसोत्तर पर्वतके शिखरपर वस्वौकसारा नामकी महेन्द्रकी पुण्यमयी नगरी है, जो सुवर्णसे सुसज्जित है। पुनः मेरुकी दक्षिण दिशामें मानसपर्वतके पृष्ठभागपर संयमनी पुरी है, जिसमें सूर्यके पुत्र यमराज निवास करते हैं। पुनः मेरुकी पश्चिम दिशामें मानसपर्वतके शिखरपर बुद्धिमान् वरुणकी सुखा नामकी रमणीय पुरी है। मेरुकी उत्तर दिशामें मानसपर्वतके शिखरपर महेन्द्रपुरीके समान चन्द्रदेवकी विभावरी पुरी है। उसी मानसोत्तर पर्वतके पृष्ठभागकी चारों दिशाओंमें लोकपालगण धर्मकी व्यवस्था और लोकोंकी रक्षा करनेके लिये स्थित हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य उन लोकपालोंसे ऊपर होकर भ्रमण करते हैं॥ १०—२५॥<br><br>दक्षिण दिशाका आश्रय लेनेपर सूर्यकी जैसी गति होती है, उसे सुनिये। दक्षिणायनकालमें सूर्य छोड़े गये बाणकी तरह शीघ्रगतिसे चलते हैं। वे ज्योतिष्चक्रको सदा साथ लिये रहते हैं। (इस प्रकार भ्रमण करते हुए) |
| ज्योतिषां चक्रमादाय सततं परिगच्छति।<br>मध्यगश्चामरावत्यां यदा भवति भास्करः॥ २७ | जिस समय सूर्य अमरावती पुरीमें पहुँचते हैं, उस समय वे गगनमण्डलके मध्यभागमें रहते हैं अर्थात् मध्याह्न होता है। उसी समय वे यमराजकी संयमनीपुरीमें |
| वैवस्वते संयमने उद्यन् सूर्यः प्रदृश्यते।<br>सुखायामर्धरात्रस्तु विभावर्यास्तमेति च॥ २८ | उदित होते हुए और विभावरी नगरीमें अस्त होते हुए दीखते हैं तथा सुखा नगरीमें आधी रात होती है। |
| * अध्याय १२४ * | ४३१ |
|---|---|
| वैवस्वते संयमने मध्याह्ने तु रविर्यदा।<br>सुखायामथ वारुण्यामुत्तिष्ठन् स तु दृश्यते॥ २९<br>विभावर्यामर्धरात्रं माहेन्द्रयामस्तमेव च।<br>सुखायामथ वारुण्यां मध्याह्ने तु रविर्यदा॥ ३०<br>विभावर्यां सोमपुर्यामुत्तिष्ठति विभावसुः।<br>महेन्द्रस्यामरावत्यामुद्गच्छति दिवाकरः॥ ३१<br>सुखायामथ वारुण्यां मध्याह्ने तु रविर्यदा।<br>स शीघ्रमेव पर्येति भानुरालातचक्रवत्॥ ३२ | इसी प्रकार जब सूर्य मध्याह्नकालमें यमराजकी संयमनी-पुरीमें पहुँचते हैं, तब वरुणकी सुखानगरीमें उगते हुए और महेन्द्रकी वस्वौकसारा (अमरावती) पुरीमें अस्त होते हुए दीखते हैं तथा विभावरी पुरीमें आधी रात होती है। जब दोपहरके समय सूर्य वरुणकी सुखानगरीमें पहुँचते हैं, तब चन्द्रदेवकी पुरी विभावरीमें उदय होते हैं। जब सूर्य महेन्द्रकी अमरावतीपुरीमें उदय होते हैं, तब वरुणकी सुखानगरीमें अस्त होते (दीखते) हैं और संयमनीपुरीमें आधी रात होती है। इस प्रकार सूर्य अलातचक्र (जलती बनेठी)-की भाँति बड़ी शीघ्रतासे चक्कर लगाते हैं॥ २६-३२॥ |
| भ्रमन् वै भ्रममाणानि ऋक्षाणि चरते रविः।<br>एवं चतुर्षु पार्श्वेषु दक्षिणान्तेषु सर्पति॥ ३३<br>उदयास्तमये वासावुत्तिष्ठति पुनः पुनः।<br>पूर्वाह्ने चापराह्ने च द्वौ द्वौ देवालयौ तु सः॥ ३४<br>पतत्येकं तु मध्याह्ने भाभिरेव च रश्मिभिः।<br>उदितो वर्धमानाभिर्मध्याह्ने तपसे रविः॥ ३५<br>अतः परं ह्सन्तीभिर्गोभिरस्तं स गच्छति।<br>उदयास्तमयाभ्यां च स्मृते पूर्वापरे तु वै॥ ३६<br>यादृक्पुरस्तात्तपति तादृक्पृष्ठे तु पार्श्वयोः।<br>यत्रोदयस्तु दृश्येत तेषां स उदयः स्मृतः॥ ३७<br>प्रणाशं गच्छते यत्र तेषामस्तः स उच्यते।<br>सर्वेषामुत्तरे मेरुर्लोकालोकस्तु दक्षिणे॥ ३८<br>विदूरभावादर्कस्य भूमेर्लेखावृतस्य च।<br>ह्रियन्ते रश्मयो यस्मात्तेन रात्रौ न दृश्यते॥ ३९<br>ऊर्ध्वं शतसहस्त्रांशुः स्थितस्तत्र प्रदृश्यते।<br>एवं पुष्करमध्ये तु यदा भवति भास्करः॥ ४०<br>त्रिंशद्भागं च मेदिन्या मुहूर्तेन स गच्छति।<br>योजनानां सहस्त्रस्य इमां संख्यां निबोधत॥ ४१<br>पूर्णं शतसहस्त्राणामेकत्रिंशच्च सा स्मृता।<br>पञ्चाशच्च सहस्त्राणि तथान्यान्यधिकानि च॥ ४२<br>मौहूर्तिकी गतिर्ह्यैषा सूर्यस्य तु विधीयते। | इस प्रकार स्वयं भ्रमण करते हुए सूर्य नक्षत्रोंको भी भ्रमण कराते हैं। वे चारों दक्षिणान्त पार्श्व भागोंमें चलते रहते हैं। उदय और अस्तके समय वे पुनः-पुनः उदय और अस्त होते रहते हैं और पूर्वाह्न एवं अपराह्नमें दो-दो देवपुरियोंमें तथा मध्याह्नके समय एक पुरीमें पहुँचते हैं। इस प्रकार सूर्य उदय होकर अपनी बढ़ती हुई तेजस्विनी किरणोंसे दोपहरके समय तपते हैं और उसके बाद धीरे-धीरे ह्रासको प्राप्त होती हुई उन्हीं किरणोंके साथ अस्त हो जाते हैं। सूर्यके इसी उदय और अस्तसे पूर्व और पश्चिम दिशाका ज्ञान होता है। यों तो सूर्य जैसे पूर्व दिशामें तपते हैं, उसी तरह पश्चिम तथा पार्श्वभाग (उत्तर और दक्षिण)-में भी प्रकाश फैलाते हैं, परंतु उन दिशाओंमें जहाँ सूर्यका उदय दीखता है, वही उदय-स्थान कहलाता है तथा जिस दिशामें सूर्य अदृश्य हो जाते हैं, उसे अस्त-स्थान कहते हैं। मेरुपर्वत सभी पर्वतोंसे उत्तर तथा लोकालोक पर्वत दक्षिण दिशामें स्थित है, इसलिये सूर्यके बहुत दूर हो जाने तथा पृथिवीकी छायासे आवृत होनेके कारण उनकी किरणें अवरुद्ध हो जाती हैं, इसी कारण सूर्य रातमें नहीं दीख पड़ते। इस प्रकार एक लाख किरणोंसे सुशोभित सूर्य जब पुष्करद्वीपके मध्यभागमें पहुँचते हैं, तब वहाँ ऊँचाईपर स्थित होनेके कारण दीख पड़ते हैं। सूर्य एक मुहूर्त (दो घड़ी)-में पृथिवीके तीसवें भागतक पहुँच जाते हैं। उनकी गतिका प्रमाण योजनोंके हजारोंकी गणनामें सुनिये। सूर्यकी एक मुहूर्तकी गतिका परिमाण इकतीस लाख पचास हजार योजनसे भी अधिक बतलाया जाता है॥ ३३-४२ १/२॥ |
| एतेन क्रमयोगेन यदा काष्ठां तु दक्षिणाम्॥ ४३<br>परिगच्छति सूर्योऽसौ मासं काष्ठामुदग्दिनात्।<br>मध्येन पुष्करस्याथ भ्रमते दक्षिणायने॥ ४४ | इसी क्रमसे जब सूर्य दक्षिण दिशामें जाते हैं, तब (वहाँ छह महीनेतक भ्रमण करनेके पश्चात् पुनः) सातवें मासमें उत्तर दिशाकी ओर लौटते हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य पुष्करद्वीपके मध्यमें भ्रमण करते हैं। |
१२६- सूर्य-रथपर प्रत्येक मासमें भिन्न-भिन्न देवताओंका अधिरोहण तथा चन्द्रमाकी विचित्र गति
| ४३२ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| मानसोत्तरमेरोस्तु अन्तरं त्रिगुणं स्मृतम्।<br>सर्वतो दक्षिणस्यां तु काष्ठायां तन्निबोधत ॥ ४५<br>नव कोट्यः प्रसंख्याता योजनैः परिमण्डलम्।<br>तथा शतसहस्राणि चत्वारिंशच्च पञ्च च ॥ ४६<br>अहोरात्रात् पतङ्गस्य गतिरेषा विधीयते।<br>दक्षिणादिङ्निवृत्तोऽसौ विषुवस्थो यदा रविः ॥ ४७<br>क्षीरोदस्य समुद्रस्योत्तरतोऽपि दिशं चरन्।<br>मण्डलं विषुवच्चापि योजनैस्तन्निबोधत ॥ ४८<br>तिस्रः कोट्यस्तु सम्पूर्णा विषुवस्यापि मण्डलम्।<br>तथा शतसहस्राणि विंशत्येकाधिकानि तु ॥ ४९<br>श्रवणे चोत्तरां काष्ठां चित्रभानुर्यदा भवेत्।<br>गोमेदस्य परे द्वीपे उत्तरां च दिशं चरन् ॥ ५०<br>उत्तरायाः प्रमाणं तु काष्ठाया मण्डलस्य तु।<br>दक्षिणोत्तरमध्यानि तानि विद्याद् यथाक्रमम् ॥ ५१<br>स्थानं जरद्गवं मध्ये तथैरावतमुत्तरम्।<br>वैश्वानरं दक्षिणतो निर्दिष्टमिह तत्त्वतः ॥ ५२<br>नागवीथ्युत्तरा वीथी ह्याजवीथिस्तु दक्षिणा। | मानसोत्तर और मेरु पर्वतके बीचमें पुष्करद्वीपसे तिगुना अन्तर है। अब दक्षिण दिशामें सूर्यकी गतिका परिमाण सुनिये। यह (दक्षिणायन-) मण्डल नौ करोड़ पैंतालीस लाख योजन विस्तृत बतलाया गया है। यह सूर्यकी एक दिन-रातकी गति है। दक्षिणायनसे निवृत्त होकर जब सूर्य विषुव (खगोलीय विषुवद्वृत्त और क्रान्तिवृत्तका कटान-बिन्दु) स्थानपर स्थित होते हैं, तब वे क्षीरसागरकी उत्तर दिशामें भ्रमण करते हैं। अब विषुवन्मण्डलका परिमाण योजनोंमें सुनिये। वह विषुवन्मण्डल तीन करोड़ इक्कीस लाख योजनके परिमाणवाला है। श्रवणनक्षत्रमें जब सूर्य उत्तर दिशामें चले जाते हैं, तब वे गोमेदद्वीपके बादवाले द्वीपकी उत्तर दिशामें भ्रमण करते हैं। अब उत्तर दिशाके मण्डलका तथा दक्षिण और उत्तरके मध्यभागका प्रमाण क्रमशः सुनिये। इनके मध्यमें जरद्गव, उत्तरमें ऐरावत और दक्षिणमें वैश्वानर नामक स्थान सिद्धान्ततः निर्दिष्ट किये गये हैं। उत्तर दिशामें सूर्यके मार्गको नागवीथी तथा दक्षिणदिशाके मार्गको अजवीथी कहते हैं॥ ४३—५२ १/२ ॥ | | उभे आषाढमूलं तु अजवीथ्युदयास्त्रयः ॥ ५३<br>अभिजित्पूर्वतः स्वातिं नागवीथ्युदयास्त्रयः।<br>अश्विनी कृत्तिका याम्या नागवीथ्यस्त्रयः स्मृताः ॥ ५४<br>रोहिण्यार्द्रा मृगशिरो नागवीथिरिति स्मृता।<br>पुष्यश्लेषापुनर्वस्वां वीथी चैरावती स्मृता ॥ ५५<br>तिस्रस्तु वीथयो ह्येता उत्तरो मार्ग उच्यते।<br>पूर्वोत्तरफाल्गुन्यौ मघा चैवार्षभी भवेत् ॥ ५६<br>पूर्वोत्तरप्रोष्ठपदौ गोवीथी रेवती स्मृता।<br>श्रवणं च धनिष्ठा च वारुणं च जरद्गवम् ॥ ५७<br>एतास्तु वीथयस्तिस्रो मध्यमो मार्ग उच्यते।<br>हस्तश्चित्रा तथा स्वाती ह्याजवीथिरिति स्मृता ॥ ५८<br>ज्येष्ठा विशाखा मैत्रं च मृगवीथी तथोच्यते।<br>मूलं पूर्वोत्तराषाढे वीथी वैश्वानरी भवेत् ॥ ५९<br>स्मृतास्तिस्रस्तु वीथ्यस्ता मार्गे वै दक्षिणे पुनः।<br>काष्ठयोरन्तरं चैतद् वक्ष्यते योजनैः पुनः ॥ ६०<br>एतच्छतसहस्राणामेकत्रिंशत्तु वै स्मृतम्।<br>शतानि त्रीणि चान्यानि त्रयस्त्रिंशत्तथैव च ॥ ६१<br>काष्ठयोरन्तरं ह्येतद् योजनानां प्रकीर्तितम्।<br>काष्ठयोर्लेखयोश्चैव अयने दक्षिणोत्तरे ॥ ६२ | दोनों आषाढ़ अर्थात् पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़ और मूल—ये तीनों अजवीथी हैं। अभिजित्, श्रवण और स्वाती—ये तीनों नागवीथी हैं। अश्विनी, भरणी और कृत्तिका—ये तीनों नागवीथी नामसे प्रसिद्ध हैं। रोहिणी, आर्द्रा और मृगशिरा भी नागवीथी कहलाते हैं। पुष्य, श्लेषा और पुनर्वसु—ये तीनों ऐरावती वीथी कहे जाते हैं। ये तीनों वीथियाँ उत्तर दिशाका मार्ग कहलाती हैं। पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी और मघा—ये तीनों 'आर्षभी' वीथी हैं। पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद और रेवती—ये तीनों 'गोवीथी' नामसे पुकारे जाते हैं। श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा—ये तीनों 'जरद्गववीथी' हैं। ये तीनों वीथियाँ मध्यम मार्ग कहलाती हैं। हस्त, चित्रा और स्वाती—ये तीनों 'अजवीथी' कहलाते हैं। ज्येष्ठा, विशाखा और अनुराधा—ये 'मृगवीथी' कहलाते हैं। मूल, पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़—ये 'वैश्वानर'-वीथी हैं। ये तीनों वीथियाँ दक्षिण-मार्गमें बतलायी गयी हैं। अब उत्तर और दक्षिण—दोनों दिशाओंका अन्तर योजनोंमें बतला रहा हूँ। इन दोनों दिशाओंका अन्तर इकतीस लाख तीन हजार छः सौ योजन बतलाया जाता है। अब उत्तरायण और दक्षिणायन-कालमें दोनों दिशाओं और दोनों रेखाओंका |
| * अध्याय १२४ * | ४३३ |
|---|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
| ते वक्ष्यामि प्रसंख्याय योजनैस्तु निबोधत।<br>एकैकमन्तरं तस्या नियुतान्येकसप्ततिः॥ ६३<br>सहस्राण्यतिरिक्ता च ततोऽन्या पञ्चविंशतिः।<br>लेखयोः काष्ठयोश्चैव बाह्याभ्यन्तरयोश्चरन्॥ ६४<br>अभ्यन्तरं स पर्यति मण्डलान्युत्तरायणे।<br>बाह्यतो दक्षिणेनैव सततं सूर्यमण्डलम्॥ ६५<br>चरन्नसावुदीच्यां च ह्यशीत्या मण्डलाच्छतम्।<br>अभ्यन्तरं स पर्यति क्रमते मण्डलानि तु॥ ६६ | अन्तर योजनोंमें परिगणित करके बतला रहा हूँ, सुनिये। उनमें एकसे दूसरीका अन्तर एकहत्तर लाख पचीस हजार योजन है। सूर्य दोनों दिशाओं और रेखाओंके बाहरी और भीतरी भागमें चक्कर लगाते हैं। यह सूर्यमण्डल सदा उत्तरायणमें मण्डलोंके भीतर और दक्षिणायनमें बाहरसे चक्कर लगाता है। उत्तर दिशामें विचरते हुए सूर्य एक सौ अस्सी मण्डलोंके भीतरसे गुजरते हुए उन्हें पार करते हैं॥ ६३-६६॥ |
| प्रमाणं मण्डलस्यापि योजनानां निबोधत।<br>योजनानां सहस्राणि दश चाष्टौ तथा स्मृतम्॥ ६७<br>अधिकान्यष्टपञ्चाशद्योजनानि तु वै पुनः।<br>विष्कम्भो मण्डलस्यैव तिर्यक् स तु विधीयते॥ ६८<br>अहस्तु चरते नाभेः सूर्यो वै मण्डलं क्रमात्।<br>कुलालचक्रपर्यन्तो यथा चन्द्रो रविस्तथा॥ ६९<br>दक्षिणे चक्रवत्सूर्यस्तथा शीघ्रं निवर्तते।<br>तस्मात् प्रकृष्टां भूमिं तु कालेनाल्पेन गच्छति॥ ७०<br>सूर्यो द्वादशभिः शीघ्रं मुहूर्तैर्दक्षिणायने।<br>त्रयोदशार्धमृक्षाणां मध्ये चरति मण्डलम्॥ ७१<br>मुहूर्तैस्तानि ऋक्षाणि नक्तमष्टादशैश्चरन्।<br>कुलालचक्रमध्यस्थो यथा मन्दं प्रसर्पति॥ ७२<br>उदग्याने तथा सूर्यः सर्पते मन्दविक्रमः।<br>तस्माद् दीर्घेण कालेन भूमिं सोऽल्पां प्रसर्पति॥ ७३<br>सूर्योऽष्टादशभिरहो मुहूर्तैरुदगायने।<br>त्रयोदशानां मध्ये तु ऋक्षाणां चरते रविः।<br>मुहूर्तैस्तानि ऋक्षाणि रात्रौ द्वादशभिश्चरन्॥ ७४<br>ततो मन्दतरं ताभ्यां चक्रं तु भ्रमते पुनः।<br>मृत्पिण्ड इव मध्यस्थो भ्रमतेऽसौ ध्रुवस्तथा॥ ७५<br>मुहूर्तैस्त्रिंशता तावदहोरात्रं ध्रुवो भ्रमन्।<br>उभयोः काष्ठयोर्मध्ये भ्रमते मण्डलानि तु॥ ७६ | अब मण्डलका प्रमाण योजनोंकी गणनामें सुनिये। इसका परिमाण अठारह हजार अट्ठावन योजन बतलाया जाता है। इस मण्डलका व्यास तिरछा जानना चाहिये। सूर्य दिनभर कुम्हारके चाककी तरह नाभिमण्डलपर चक्कर लगाते हैं। सूर्यकी भाँति चन्द्रमा भी वैसा ही भ्रमण करते हैं। उसी प्रकार दक्षिणायनमें भी सूर्य चाककी तरह शीघ्रतापूर्वक चलते हुए उसे पार करते हैं। इसी कारण वे इतनी विस्तृत भूमिको थोड़े ही समयमें पार कर जाते हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य साढ़े तेरह नक्षत्रोंके मण्डलको शीघ्रतापूर्वक मध्यभागसे गुजरते हुए बारह मुहूर्तोंमें पार करते हैं, किंतु रातके समय उन्हीं नक्षत्रोंको पार करनेमें उन्हें अठारह मुहूर्त लगता है। जैसे कुम्हारके चाकके मध्यभागमें स्थित वस्तुकी गति मन्द हो जाती है, वैसे ही उत्तरायणके समय सूर्य मन्दगतिसे चलते हैं। इसी कारण थोड़ी-सी भूमि पार करनेमें उन्हें अधिक समय लगाना पड़ता है। उत्तरायणके समय सूर्य दिनके अठारह मुहूर्तोंमें तेरह नक्षत्रोंके मध्यमें विचरते हैं, किंतु रातमें उन्हीं नक्षत्रोंको पार करनेमें उन्हें बारह मुहूर्त लगते हैं। वह चक्र उन दोनों गतियोंसे मन्दतर गतिमें घूमता है। चाकके मध्यभागमें रखे हुए मृत्पिण्डकी तरह ध्रुव भी उस चक्रके मध्यमें स्थित होकर घूमते रहते हैं। ध्रुव तीस मुहूर्त अर्थात् दिन-रातभरमें दोनों दिशाओंके मध्यवर्ती मण्डलोंमें भ्रमण करते हैं॥ ६७-७६॥ |
| उत्तरक्रमणेऽर्कस्य दिवा मन्दगतिः स्मृता।<br>तस्यैव तु पुनर्नक्तं शीघ्रा सूर्यस्य वै गतिः॥ ७७<br>दक्षिणप्रक्रमे वापि दिवा शीघ्रं विधीयते।<br>गतिः सूर्यस्य वै नक्तं मन्दा चापि विधीयते॥ ७८ | उत्तरायणके समय दिनमें सूर्यकी गति मन्द और रात्रिके समय उन्हीं सूर्यकी गति तेज बतलायी गयी है। उसी तरह दक्षिणायन-कालमें सूर्यकी गति दिनमें तेज और रात्रिमें मन्द कही गयी है। |