भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 433
* अध्याय १२३ *४२३

| परिमण्डलस्तु द्वीपस्य चक्रवत् परिवेष्टितः ।<br>सुरोदेन समुद्रेण द्विगुणेन समन्वितः ॥ १०४ ॥ | शाल्मलद्वीपका मण्डल (घेरा) दुगुने परिमाणवाले सुरोदसागरसे चारों ओर चक्रकी भाँति गोलाकार घिरा हुआ है॥९१-१०४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे द्वीपवर्णनं नाम द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णन-प्रसङ्गमें द्वीप-वर्णन नामक एक सौ बाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १२२ ॥


एक सौ तेईसवाँ अध्याय

गोमेदकद्वीप* और पुष्करद्वीपका वर्णन

सूत उवाच
गोमेदकं प्रवक्ष्यामि षष्ठं द्वीपं तपोधनाः ।<br>सुरोदकसमुद्रस्तु गोमेदेन समावृतः ॥ १सूतजी कहते हैं—तपोधन ऋषियो! अब मैं छठे गोमेदक द्वीपका वर्णन कर रहा हूँ। गोमेदक द्वीपसे सुरोदकसागर घिरा हुआ है। इसका विस्तार शाल्मलद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। उस द्वीपमें उच्च शिखरोंवाले दो पर्वत हैं—ऐसा जानना चाहिये। उनमें पहलेका नाम सुमना है। यह पर्वत अञ्जनके समान काले रंगसे सुशोभित है। दूसरा पर्वत कुमुद नामवाला है, जो सभी प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न, सुवर्णमय, शोभाशाली और वृक्षादिकी समृद्धियोंसे युक्त है। यह गोमेदक द्वीप छठे सुरोदसागरकी अपेक्षा दुगुने परिमाणवाले इक्षुरसोदसागरसे घिरा हुआ है। इसमें धातकी और कुमुद नामक दो अत्यन्त विस्तृत प्रदेश हैं, जो ‘हव्यपुत्र’ नामसे विख्यात हैं। सुमना पर्वतका जो प्रथम वर्ष है, उसीको धातकीखण्ड कहते हैं। यही धातकी नामक प्रथम पर्वतका प्रथम वर्ष कहलाता है। गोमेद नामसे जो वर्ष कहा गया है, उसीको सर्वसुख भी कहते हैं। इसके बाद दूसरे कुमुदपर्वतका प्रदेश भी कुमुद नामसे विख्यात है। ये दोनों पर्वत अन्य सभी पर्वतोंसे ऊँचे हैं। इस गोमेदक द्वीपके पूर्वभागमें सुमना नामक पर्वत स्थित है, जो पूर्वसे पश्चिम समुद्रतक फैला हुआ है। इसी प्रकार इस द्वीपके पश्चिमार्ध भागमें कुमुद नामक पर्वत स्थित है। इन पर्वतोंके चरण-प्रान्तोंसे वह देश दो भागोंमें विभक्त हो गया है। इस द्वीपका दक्षिणार्ध भाग धातकीखण्ड कहलाता है
शाल्मलस्य तु विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः ।<br>तस्मिन् द्वीपे तु विज्ञेयौ पर्वतौ द्वौ समाहितौ ॥ २
प्रथमः सुमना नाम भात्यञ्जनमयो गिरिः ।<br>द्वितीयः कुमुदो नाम सर्वौषधिसमन्वितः ॥ ३
शातकौम्भमयः श्रीमान् विज्ञेयः सुमहाचितः ।<br>समुद्रेक्षुरसोदेन वृतो गोमेदकश्च सः ॥ ४
षष्ठेन तु समुद्रेण सुरोदाद् द्विगुणेन च ।<br>धातकी कुमुदश्चैव हव्यपुत्रौ सुविस्तृतौ ॥ ५
सौमनं प्रथमं वर्षं धातकीखण्डमुच्यते ।<br>धातकिनः स्मृतं तद् वै प्रथमं प्रथमस्य तु ॥ ६
गोमेदं यत्स्मृतं वर्षं नाम्ना सर्वसुखं तु तत् ।<br>कुमुदस्य द्वितीयस्य द्वितीयं कुमुदं ततः ॥ ७
एतौ द्वौ पर्वतौ वृत्तौ शेषौ सर्वसमुच्छ्रितौ ।<br>पूर्वेण तस्य द्वीपस्य सुमनाः पर्वतः स्थितः ॥ ८
प्राक्पश्चिमायतः पादैरासमुद्रादिति स्थितः ।<br>पश्चार्धं कुमुदस्तस्य एवमेव स्थितस्तु वै ॥ ९
एतैः पर्वतपादैस्तु स देशो वै द्विधा कृतः ।<br>दक्षिणार्धे तु द्वीपस्य धातकीखण्डमुच्यते ॥ १०

* इस द्वीपका वर्णन प्रायः अन्य पुराणोंमें नहीं है। पर सिद्धान्तशिरोमणि गोलाध्याय ३। २५ आदिमें इसका वर्णन है। अन्य पुराणमें गोमेद प्लक्षद्वीपमें एक मर्यादा पर्वतमात्र है।