भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४२२* मत्स्यपुराण *

| तत्र पुण्या जनपदाश्चिराच्च म्रियते जनः।<br>कुत एव तु दुर्भिक्षं क्षमातेजोयुता हि ते॥ ९३ | हैं तथा दीर्घायुका उपभोग कर मृत्युको प्राप्त होते हैं। वहाँ अकालकी कोई सम्भावना ही नहीं है। वहाँ पहले | | प्रथमः सूर्यसङ्काशः सुमना नाम पर्वतः।<br>पीतस्तु मध्यमश्चासीत् ततः कुम्भमयो गिरिः॥ ९४ | पर्वतका नाम सुमना है, जो सूर्यके समान चमकीला होनेके कारण पीले रंगका है। उसके बाद दूसरा कुम्भमय नामक पर्वत है। उसका दूसरा नाम सर्वसुख | | नाम्ना सर्वसुखो नाम दिव्यौषधिसमन्वितः।<br>तृतीयश्चैव सौवर्णो भृङ्गपत्रनिभो गिरिः॥ ९५ | है। वह दिव्य ओषधियोंसे सम्पन्न है। तीसरा स्वर्णसम्पन्न एवं भ्रमरके पंखके समान रंगवाला रोहित नामक विशाल पर्वत है। यह पर्वतश्रेष्ठ दिव्य है। सुमना | | सुमहान् रोहितो नाम दिव्यो गिरिवरो हि सः।<br>सुमनाः कुशलो देशः सुखोदर्कः सुखोदयः॥ ९६ | पर्वतका देश कुशल एवं दूसरे सर्वसुख पर्वतका देश सुखोदय है, जो सभी सुखोंको उत्पन्न करनेवाला है। तीसरे रोहित पर्वतका प्रदेश रोहिण नामसे विख्यात है। | | रोहितो यस्तृतीयस्तु रोहिणो नाम विश्रुतः।<br>तत्र रत्नान्यनेकानि स्वयं रक्षति वासवः॥ ९७ | वहाँ अनेकों प्रकारके रत्नोंकी खानें हैं, जिनकी रक्षा प्रजापतिको साथ लेकर स्वयं इन्द्र करते हैं और वे ही | | प्रजापतिमुपादाय प्रसन्नो विदधत् स्वयम्।<br>न तत्र मेघा वर्षन्ति शीतोष्णं च न तद्विधम्॥ ९८ | प्रसन्नतापूर्वक वहाँकी प्रजाओंके लिये कार्यका विधान करते हैं। वहाँ न तो मेघ वर्षा करते हैं, न शीत एवं उष्णकी ही अधिकता रहती है। इन तीनों द्वीपोंमें | | वर्णाश्रमाणां वार्ता वा त्रिषु द्वीपेषु विद्यते।<br>न ग्रहो न च चन्द्रोऽस्ति ईर्ष्यासूया भयं तथा॥ ९९ | वर्णाश्रमकी चर्चा चलती रहती है। अर्थात् यहाँ वर्णाश्रमका पूर्णरूपसे प्रचार है। यहाँ न ग्रहगण हैं, न चन्द्रमा हैं और न यहाँके निवासियोंमें ईर्ष्या, असूया और भय ही | | उद्भिदान्युदकान्यत्र गिरिप्रस्रवणानि च।<br>भोजनं षड्रसं तत्र तेषां स्वयमुपस्थितम्॥ १०० | देखा जाता है। यहाँ पर्वतोंसे झरते हुए जल ही अन्नके उत्पादक हैं। वहाँके निवासियोंके लिये षट्-रसयुक्त भोजन स्वयं ही प्राप्त हो जाता है। उनमें न तो ऊँच- | | अधमोत्तमं न तेष्वस्ति न लोभो न परिग्रहः।<br>आरोग्यबलवन्तश्च एकान्तसुखिनो नराः॥ १०१ | नीचका भाव है, न लोभ है और न परिग्रह (दान लेनेकी प्रवृत्ति) ही है। वे नीरोग एवं बलवान् होते हैं तथा एकान्त सुखका उपभोग करते हैं। वे लोग तीस हजार वर्षतककी | | त्रिंशद्वर्षसहस्राणि मानसीं सिद्धिमास्थिताः।<br>सुखमायुश्च रूपं च धर्मैश्वर्यं तथैव च॥ १०२ | मानसी सिद्धिको प्राप्त होकर सुख, दीर्घायु, सुन्दर रूप, धर्म और ऐश्वर्यका उपभोग करते हुए जीवन-यापन करते हैं। कुश, क्रौञ्च और शाल्मल—इन तीनों द्वीपोंमें | | शाल्मलान्तेषु विज्ञेयं द्वीपेषु त्रिषु सर्वतः।<br>व्याख्यातः शाल्मलानां द्वीपानां तु विधिः शुभः॥ १०३ | यही स्थिति समझनी चाहिये। इस प्रकार मैं इन तीनों द्वीपोंकी शुभमयी विधिका विवरण बतला चुका। इस |