भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 431
* अध्याय १२२ *४२१

| सर्वतः सुमहान् द्वीपश्चन्द्रवत् परिवेष्टितः ।<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव क्षीरोदाद् द्विगुणो मतः ॥ ७७ | भरे हुए सागरसे घिरा हुआ है। यह विस्तार एवं मण्डल (घेराव)-में क्षीरसागरसे दुगुना माना गया है॥ ६७-७७॥ | | ततः परं प्रवक्ष्यामि क्रौञ्चद्वीपं यथा तथा।<br>कुशद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः ॥ ७८<br>घृतोदकः समुद्रो वै क्रौञ्चद्वीपेन संवृतः ।<br>चक्रनेमिप्रमाणेण वृतो वृत्तेन सर्वशः ॥ ७९<br>तस्मिन् द्वीपे नराः श्रेष्ठा देवनो गिरिरुच्यते ।<br>देवनात् परतश्चापि गोविन्दो नाम पर्वतः ॥ ८०<br>गोविन्दात् परतश्चापि क्रौञ्चस्तु प्रथमो गिरिः ।<br>क्रौञ्चात् परः पावनकः पावनादन्धकारकः ॥ ८१<br>अन्धकारात् परे चापि देवावृन्नाम पर्वतः ।<br>देवावृतः परेणापि पुण्डरीको महान् गिरिः ॥ ८२<br>एते रत्नमयाः सप्त क्रौञ्चद्वीपस्य पर्वताः ।<br>परस्परस्य द्विगुणो विष्कम्भो वर्षपर्वतः ॥ ८३<br>वर्षाणि तस्य वक्ष्यामि नामतस्तु निबोधत ।<br>क्रौञ्चस्य कुशलो देशो वामनस्य मनोऽनुगः ॥ ८४<br>मनोऽनुगात् परे चोष्णास्तृतीयोऽपि स उच्यते ।<br>उष्णात् परे पावनकः पावनादन्धकारकः ॥ ८५<br>अन्धकारकदेशात् तु मुनिदेशस्तथापरः ।<br>मुनिदेशात् परे चापि प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः ॥ ८६<br>सिद्धचारणसंकीर्णो गौरप्रायः शुचिर्जनः ।<br>श्रुतास्तत्रैव नद्यस्तु प्रतिवर्षं गताः शुभाः ॥ ८७<br>गौरी कुमुद्वती चैव संध्या रात्रिर्मनोजवा ।<br>ख्यातिश्च पुण्डरीका च गङ्गा सप्तविधा स्मृता ॥ ८८<br>तासां सहस्रशश्चान्या नद्यः पार्श्वसमीपगाः ।<br>अभिगच्छन्ति ता नद्यो बहुलाश्च बहूदकाः ॥ ८९<br>तेषां निसर्गो देशानामानुपूर्व्येण सर्वशः ।<br>न शक्यो विस्तराद् वक्तुमपि वर्षशतैरपि ॥ ९०<br>सर्गो यश्च प्रजानां तु संहारो यश्च तेषु वै । | इसके बाद अब मैं क्रौञ्चद्वीपका यथार्थरूपसे वर्णन कर रहा हूँ। इसका विस्तार कुशद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। चक्केकी भाँति गोलाकार उस क्रौञ्चद्वीपसे घृतसागर चारों ओरसे घिरा हुआ है। श्रेष्ठ ऋषियो! इस क्रौञ्चद्वीपमें देवन नामक पर्वत बतलाया जाता है। देवनके बाद गोविन्द नामक पर्वत है। गोविन्दके बाद क्रौञ्च नामक पहला पर्वत है। क्रौञ्चके बाद पावनक, पावनकके बाद अन्धकारक और अन्धकारकके बाद देवावृत् नामक पर्वत है। देवावृत्के बाद पुण्डरीक नामक विशाल पर्वत है। क्रौञ्चद्वीपके ये सातों पर्वत रत्नमय हैं। इस द्वीपके वर्ष पर्वतके रूपमें स्थित विष्कम्भ पर्वत परस्पर एक-दूसरेसे दुगुने हैं। अब इस द्वीपके वर्षोंका नाम बतला रहा हूँ, सुनिये। क्रौञ्च पर्वतके प्रदेशका नाम कुशल है। वामन पर्वतका प्रदेश मनोऽनुग कहलाता है। मनोऽनुगके बाद तीसरा उष्ण प्रदेश कहा जाता है। उष्णके बाद पावनक, पावनकके बाद अन्धकारक और अन्धकारकके बाद दूसरा मुनिदेश है। मुनिदेशके बाद दुन्दुभिस्वन नामक देश कहा जाता है। यह द्वीप सिद्धों एवं चारणोंसे व्याप्त है। यहाँके निवासी प्रायः गौर वर्णके एवं परम पवित्र होते हैं। इस द्वीपके प्रत्येक वर्षमें मङ्गलमयी नदियाँ भी प्रवाहित होती हैं, ऐसा सुना गया है। वहाँ गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति और पुण्डरीका—ये सात प्रकारकी गङ्गा बतलायी जाती हैं। इनके अगल-बगलमें बहनेवाली अगाध जलसे भरी हुई हजारों अन्य नदियाँ भी हैं, जो इन्हीं प्रमुख नदियोंमें आकर मिली हैं। उन पर्वतीय प्रदेशोंकी सर्वथा आनुपूर्वी स्वाभाविकी स्थितिका तथा वहाँकी प्रजाओंकी सृष्टि एवं संहारका विस्तारपूर्वक वर्णन सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता ॥ ७८-९० १/२ ॥ | | अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि शाल्मलस्य निबोधत ॥ ९१<br>शाल्मलो द्विगुणो द्वीपः क्रौञ्चद्वीपस्य विस्तरात् ।<br>परिवार्य समुद्रं तु घृतमण्डोदकं स्थितः ॥ ९२ | इसके बाद मैं शाल्मलद्वीपका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। शाल्मलद्वीप क्रौञ्चद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। यह घृतमण्डोदसागरको घेरकर स्थित है। इसमें पुण्यमय जनपद हैं। वहाँके निवासी क्षमाशील एवं तेजस्वी होते |