मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१२४- सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन
| * अध्याय १२२ * | ४२१ |
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| सर्वतः सुमहान् द्वीपश्चन्द्रवत् परिवेष्टितः ।<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव क्षीरोदाद् द्विगुणो मतः ॥ ७७ | भरे हुए सागरसे घिरा हुआ है। यह विस्तार एवं मण्डल (घेराव)-में क्षीरसागरसे दुगुना माना गया है॥ ६७-७७॥ | | ततः परं प्रवक्ष्यामि क्रौञ्चद्वीपं यथा तथा।<br>कुशद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः ॥ ७८<br>घृतोदकः समुद्रो वै क्रौञ्चद्वीपेन संवृतः ।<br>चक्रनेमिप्रमाणेण वृतो वृत्तेन सर्वशः ॥ ७९<br>तस्मिन् द्वीपे नराः श्रेष्ठा देवनो गिरिरुच्यते ।<br>देवनात् परतश्चापि गोविन्दो नाम पर्वतः ॥ ८०<br>गोविन्दात् परतश्चापि क्रौञ्चस्तु प्रथमो गिरिः ।<br>क्रौञ्चात् परः पावनकः पावनादन्धकारकः ॥ ८१<br>अन्धकारात् परे चापि देवावृन्नाम पर्वतः ।<br>देवावृतः परेणापि पुण्डरीको महान् गिरिः ॥ ८२<br>एते रत्नमयाः सप्त क्रौञ्चद्वीपस्य पर्वताः ।<br>परस्परस्य द्विगुणो विष्कम्भो वर्षपर्वतः ॥ ८३<br>वर्षाणि तस्य वक्ष्यामि नामतस्तु निबोधत ।<br>क्रौञ्चस्य कुशलो देशो वामनस्य मनोऽनुगः ॥ ८४<br>मनोऽनुगात् परे चोष्णास्तृतीयोऽपि स उच्यते ।<br>उष्णात् परे पावनकः पावनादन्धकारकः ॥ ८५<br>अन्धकारकदेशात् तु मुनिदेशस्तथापरः ।<br>मुनिदेशात् परे चापि प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः ॥ ८६<br>सिद्धचारणसंकीर्णो गौरप्रायः शुचिर्जनः ।<br>श्रुतास्तत्रैव नद्यस्तु प्रतिवर्षं गताः शुभाः ॥ ८७<br>गौरी कुमुद्वती चैव संध्या रात्रिर्मनोजवा ।<br>ख्यातिश्च पुण्डरीका च गङ्गा सप्तविधा स्मृता ॥ ८८<br>तासां सहस्रशश्चान्या नद्यः पार्श्वसमीपगाः ।<br>अभिगच्छन्ति ता नद्यो बहुलाश्च बहूदकाः ॥ ८९<br>तेषां निसर्गो देशानामानुपूर्व्येण सर्वशः ।<br>न शक्यो विस्तराद् वक्तुमपि वर्षशतैरपि ॥ ९०<br>सर्गो यश्च प्रजानां तु संहारो यश्च तेषु वै । | इसके बाद अब मैं क्रौञ्चद्वीपका यथार्थरूपसे वर्णन कर रहा हूँ। इसका विस्तार कुशद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। चक्केकी भाँति गोलाकार उस क्रौञ्चद्वीपसे घृतसागर चारों ओरसे घिरा हुआ है। श्रेष्ठ ऋषियो! इस क्रौञ्चद्वीपमें देवन नामक पर्वत बतलाया जाता है। देवनके बाद गोविन्द नामक पर्वत है। गोविन्दके बाद क्रौञ्च नामक पहला पर्वत है। क्रौञ्चके बाद पावनक, पावनकके बाद अन्धकारक और अन्धकारकके बाद देवावृत् नामक पर्वत है। देवावृत्के बाद पुण्डरीक नामक विशाल पर्वत है। क्रौञ्चद्वीपके ये सातों पर्वत रत्नमय हैं। इस द्वीपके वर्ष पर्वतके रूपमें स्थित विष्कम्भ पर्वत परस्पर एक-दूसरेसे दुगुने हैं। अब इस द्वीपके वर्षोंका नाम बतला रहा हूँ, सुनिये। क्रौञ्च पर्वतके प्रदेशका नाम कुशल है। वामन पर्वतका प्रदेश मनोऽनुग कहलाता है। मनोऽनुगके बाद तीसरा उष्ण प्रदेश कहा जाता है। उष्णके बाद पावनक, पावनकके बाद अन्धकारक और अन्धकारकके बाद दूसरा मुनिदेश है। मुनिदेशके बाद दुन्दुभिस्वन नामक देश कहा जाता है। यह द्वीप सिद्धों एवं चारणोंसे व्याप्त है। यहाँके निवासी प्रायः गौर वर्णके एवं परम पवित्र होते हैं। इस द्वीपके प्रत्येक वर्षमें मङ्गलमयी नदियाँ भी प्रवाहित होती हैं, ऐसा सुना गया है। वहाँ गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति और पुण्डरीका—ये सात प्रकारकी गङ्गा बतलायी जाती हैं। इनके अगल-बगलमें बहनेवाली अगाध जलसे भरी हुई हजारों अन्य नदियाँ भी हैं, जो इन्हीं प्रमुख नदियोंमें आकर मिली हैं। उन पर्वतीय प्रदेशोंकी सर्वथा आनुपूर्वी स्वाभाविकी स्थितिका तथा वहाँकी प्रजाओंकी सृष्टि एवं संहारका विस्तारपूर्वक वर्णन सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता ॥ ७८-९० १/२ ॥ | | अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि शाल्मलस्य निबोधत ॥ ९१<br>शाल्मलो द्विगुणो द्वीपः क्रौञ्चद्वीपस्य विस्तरात् ।<br>परिवार्य समुद्रं तु घृतमण्डोदकं स्थितः ॥ ९२ | इसके बाद मैं शाल्मलद्वीपका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। शाल्मलद्वीप क्रौञ्चद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। यह घृतमण्डोदसागरको घेरकर स्थित है। इसमें पुण्यमय जनपद हैं। वहाँके निवासी क्षमाशील एवं तेजस्वी होते |
| ४२२ | * मत्स्यपुराण * |
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| तत्र पुण्या जनपदाश्चिराच्च म्रियते जनः।<br>कुत एव तु दुर्भिक्षं क्षमातेजोयुता हि ते॥ ९३ | हैं तथा दीर्घायुका उपभोग कर मृत्युको प्राप्त होते हैं। वहाँ अकालकी कोई सम्भावना ही नहीं है। वहाँ पहले | | प्रथमः सूर्यसङ्काशः सुमना नाम पर्वतः।<br>पीतस्तु मध्यमश्चासीत् ततः कुम्भमयो गिरिः॥ ९४ | पर्वतका नाम सुमना है, जो सूर्यके समान चमकीला होनेके कारण पीले रंगका है। उसके बाद दूसरा कुम्भमय नामक पर्वत है। उसका दूसरा नाम सर्वसुख | | नाम्ना सर्वसुखो नाम दिव्यौषधिसमन्वितः।<br>तृतीयश्चैव सौवर्णो भृङ्गपत्रनिभो गिरिः॥ ९५ | है। वह दिव्य ओषधियोंसे सम्पन्न है। तीसरा स्वर्णसम्पन्न एवं भ्रमरके पंखके समान रंगवाला रोहित नामक विशाल पर्वत है। यह पर्वतश्रेष्ठ दिव्य है। सुमना | | सुमहान् रोहितो नाम दिव्यो गिरिवरो हि सः।<br>सुमनाः कुशलो देशः सुखोदर्कः सुखोदयः॥ ९६ | पर्वतका देश कुशल एवं दूसरे सर्वसुख पर्वतका देश सुखोदय है, जो सभी सुखोंको उत्पन्न करनेवाला है। तीसरे रोहित पर्वतका प्रदेश रोहिण नामसे विख्यात है। | | रोहितो यस्तृतीयस्तु रोहिणो नाम विश्रुतः।<br>तत्र रत्नान्यनेकानि स्वयं रक्षति वासवः॥ ९७ | वहाँ अनेकों प्रकारके रत्नोंकी खानें हैं, जिनकी रक्षा प्रजापतिको साथ लेकर स्वयं इन्द्र करते हैं और वे ही | | प्रजापतिमुपादाय प्रसन्नो विदधत् स्वयम्।<br>न तत्र मेघा वर्षन्ति शीतोष्णं च न तद्विधम्॥ ९८ | प्रसन्नतापूर्वक वहाँकी प्रजाओंके लिये कार्यका विधान करते हैं। वहाँ न तो मेघ वर्षा करते हैं, न शीत एवं उष्णकी ही अधिकता रहती है। इन तीनों द्वीपोंमें | | वर्णाश्रमाणां वार्ता वा त्रिषु द्वीपेषु विद्यते।<br>न ग्रहो न च चन्द्रोऽस्ति ईर्ष्यासूया भयं तथा॥ ९९ | वर्णाश्रमकी चर्चा चलती रहती है। अर्थात् यहाँ वर्णाश्रमका पूर्णरूपसे प्रचार है। यहाँ न ग्रहगण हैं, न चन्द्रमा हैं और न यहाँके निवासियोंमें ईर्ष्या, असूया और भय ही | | उद्भिदान्युदकान्यत्र गिरिप्रस्रवणानि च।<br>भोजनं षड्रसं तत्र तेषां स्वयमुपस्थितम्॥ १०० | देखा जाता है। यहाँ पर्वतोंसे झरते हुए जल ही अन्नके उत्पादक हैं। वहाँके निवासियोंके लिये षट्-रसयुक्त भोजन स्वयं ही प्राप्त हो जाता है। उनमें न तो ऊँच- | | अधमोत्तमं न तेष्वस्ति न लोभो न परिग्रहः।<br>आरोग्यबलवन्तश्च एकान्तसुखिनो नराः॥ १०१ | नीचका भाव है, न लोभ है और न परिग्रह (दान लेनेकी प्रवृत्ति) ही है। वे नीरोग एवं बलवान् होते हैं तथा एकान्त सुखका उपभोग करते हैं। वे लोग तीस हजार वर्षतककी | | त्रिंशद्वर्षसहस्राणि मानसीं सिद्धिमास्थिताः।<br>सुखमायुश्च रूपं च धर्मैश्वर्यं तथैव च॥ १०२ | मानसी सिद्धिको प्राप्त होकर सुख, दीर्घायु, सुन्दर रूप, धर्म और ऐश्वर्यका उपभोग करते हुए जीवन-यापन करते हैं। कुश, क्रौञ्च और शाल्मल—इन तीनों द्वीपोंमें | | शाल्मलान्तेषु विज्ञेयं द्वीपेषु त्रिषु सर्वतः।<br>व्याख्यातः शाल्मलानां द्वीपानां तु विधिः शुभः॥ १०३ | यही स्थिति समझनी चाहिये। इस प्रकार मैं इन तीनों द्वीपोंकी शुभमयी विधिका विवरण बतला चुका। इस |
| * अध्याय १२३ * | ४२३ |
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| परिमण्डलस्तु द्वीपस्य चक्रवत् परिवेष्टितः ।<br>सुरोदेन समुद्रेण द्विगुणेन समन्वितः ॥ १०४ ॥ | शाल्मलद्वीपका मण्डल (घेरा) दुगुने परिमाणवाले सुरोदसागरसे चारों ओर चक्रकी भाँति गोलाकार घिरा हुआ है॥९१-१०४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे द्वीपवर्णनं नाम द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णन-प्रसङ्गमें द्वीप-वर्णन नामक एक सौ बाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १२२ ॥
एक सौ तेईसवाँ अध्याय
गोमेदकद्वीप* और पुष्करद्वीपका वर्णन
| सूत उवाच | |
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| गोमेदकं प्रवक्ष्यामि षष्ठं द्वीपं तपोधनाः ।<br>सुरोदकसमुद्रस्तु गोमेदेन समावृतः ॥ १ | सूतजी कहते हैं—तपोधन ऋषियो! अब मैं छठे गोमेदक द्वीपका वर्णन कर रहा हूँ। गोमेदक द्वीपसे सुरोदकसागर घिरा हुआ है। इसका विस्तार शाल्मलद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। उस द्वीपमें उच्च शिखरोंवाले दो पर्वत हैं—ऐसा जानना चाहिये। उनमें पहलेका नाम सुमना है। यह पर्वत अञ्जनके समान काले रंगसे सुशोभित है। दूसरा पर्वत कुमुद नामवाला है, जो सभी प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न, सुवर्णमय, शोभाशाली और वृक्षादिकी समृद्धियोंसे युक्त है। यह गोमेदक द्वीप छठे सुरोदसागरकी अपेक्षा दुगुने परिमाणवाले इक्षुरसोदसागरसे घिरा हुआ है। इसमें धातकी और कुमुद नामक दो अत्यन्त विस्तृत प्रदेश हैं, जो ‘हव्यपुत्र’ नामसे विख्यात हैं। सुमना पर्वतका जो प्रथम वर्ष है, उसीको धातकीखण्ड कहते हैं। यही धातकी नामक प्रथम पर्वतका प्रथम वर्ष कहलाता है। गोमेद नामसे जो वर्ष कहा गया है, उसीको सर्वसुख भी कहते हैं। इसके बाद दूसरे कुमुदपर्वतका प्रदेश भी कुमुद नामसे विख्यात है। ये दोनों पर्वत अन्य सभी पर्वतोंसे ऊँचे हैं। इस गोमेदक द्वीपके पूर्वभागमें सुमना नामक पर्वत स्थित है, जो पूर्वसे पश्चिम समुद्रतक फैला हुआ है। इसी प्रकार इस द्वीपके पश्चिमार्ध भागमें कुमुद नामक पर्वत स्थित है। इन पर्वतोंके चरण-प्रान्तोंसे वह देश दो भागोंमें विभक्त हो गया है। इस द्वीपका दक्षिणार्ध भाग धातकीखण्ड कहलाता है |
| शाल्मलस्य तु विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः ।<br>तस्मिन् द्वीपे तु विज्ञेयौ पर्वतौ द्वौ समाहितौ ॥ २ | |
| प्रथमः सुमना नाम भात्यञ्जनमयो गिरिः ।<br>द्वितीयः कुमुदो नाम सर्वौषधिसमन्वितः ॥ ३ | |
| शातकौम्भमयः श्रीमान् विज्ञेयः सुमहाचितः ।<br>समुद्रेक्षुरसोदेन वृतो गोमेदकश्च सः ॥ ४ | |
| षष्ठेन तु समुद्रेण सुरोदाद् द्विगुणेन च ।<br>धातकी कुमुदश्चैव हव्यपुत्रौ सुविस्तृतौ ॥ ५ | |
| सौमनं प्रथमं वर्षं धातकीखण्डमुच्यते ।<br>धातकिनः स्मृतं तद् वै प्रथमं प्रथमस्य तु ॥ ६ | |
| गोमेदं यत्स्मृतं वर्षं नाम्ना सर्वसुखं तु तत् ।<br>कुमुदस्य द्वितीयस्य द्वितीयं कुमुदं ततः ॥ ७ | |
| एतौ द्वौ पर्वतौ वृत्तौ शेषौ सर्वसमुच्छ्रितौ ।<br>पूर्वेण तस्य द्वीपस्य सुमनाः पर्वतः स्थितः ॥ ८ | |
| प्राक्पश्चिमायतः पादैरासमुद्रादिति स्थितः ।<br>पश्चार्धं कुमुदस्तस्य एवमेव स्थितस्तु वै ॥ ९ | |
| एतैः पर्वतपादैस्तु स देशो वै द्विधा कृतः ।<br>दक्षिणार्धे तु द्वीपस्य धातकीखण्डमुच्यते ॥ १० |
* इस द्वीपका वर्णन प्रायः अन्य पुराणोंमें नहीं है। पर सिद्धान्तशिरोमणि गोलाध्याय ३। २५ आदिमें इसका वर्णन है। अन्य पुराणमें गोमेद प्लक्षद्वीपमें एक मर्यादा पर्वतमात्र है।
| ४२४ | * मत्स्यपुराण * |
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| कुमुदं तूत्तरे तस्य द्वितीयं वर्षमुत्तमम्।<br>एतौ जनपदौ द्वौ तु गोमेदस्य तु विस्तृतौ॥ ११ | तथा इसके उत्तरार्ध भागमें कुमुद नामक दूसरा श्रेष्ठ वर्ष है। गोमेदक द्वीपके ये दोनों प्रदेश अत्यन्त विस्तृत माने जाते हैं॥१-११॥ | | इतः परं प्रवक्ष्यामि सप्तमं द्वीपमुत्तमम्।<br>समुद्रेक्षुरसं चैव गोमेदाद् द्विगुणं हि सः॥ १२<br>आवृत्य तिष्ठति द्वीपः पुष्करः पुष्करैर्वृतः।<br>पुष्करेण वृतः श्रीमांश्चित्रसानुर्महागिरिः॥ १३<br>कूटैश्चित्रैर्मणिमयैः शिलाजालसमुद्भवैः।<br>द्वीपस्यैव तु पूर्वार्धे चित्रसानुः स्थितो महान्॥ १४<br>परिमण्डलसहस्राणि विस्तीर्णः सप्तविंशतिः।<br>ऊर्ध्वं स वै चतुर्विंशद् योजनानां महाचलः॥ १५<br>द्वीपार्धस्य परिक्षिसः पश्चिमे मानसो गिरिः।<br>स्थितो वेलासमीपे तु पूर्वचन्द्र इवोदितः॥ १६<br>योजनानां सहस्राणि सार्धं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>तस्य पुत्रो महावीतः पश्चिमार्धस्य रक्षिता॥ १७<br>पूर्वार्धे पर्वतस्यापि द्विधा देशस्तु स स्मृतः।<br>स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः॥ १८<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव गोमेदाद् द्विगुणेन तु।<br>त्रिंशद्वर्षसहस्राणि तेषु जीवन्ति मानवाः॥ १९<br>विपर्ययो न तेष्वस्ति एतत् स्वाभाविकं स्मृतम्।<br>आरोग्यं सुखबाहुल्यं मानसीं सिद्धिमास्थिताः॥ २० | इसके बाद अब मैं सातवें सर्वोत्तम द्वीपका वर्णन कर रहा हूँ, जो पुष्करों (कमलों)-से व्याप्त होनेके कारण पुष्कर नामसे प्रसिद्ध है। यह परिमाणमें गोमेदकद्वीपसे दुगुना है और इक्षुरसोदक-सागरको घेरकर स्थित है। पुष्करद्वीपमें चित्रसानु (विचित्र शिखरोंवाला) नामक शोभाशाली महान् पर्वत है। यह अनेकों चित्र-विचित्र मणिमय शिखरों तथा शिलासमूहोंसे सुशोभित है। यह महान् पर्वत चित्रसानु द्वीपके पूर्वार्ध भागमें स्थित है। यह महान् गिरि सत्ताईस योजन विस्तृत और चौबीस योजन ऊँचा है। इस द्वीपके पश्चिमार्ध भागमें समुद्रतटपर मानस नामक पर्वत स्थित है, जो पूर्व दिशामें निकले हुए चन्द्रमाके समान शोभायमान है। यह साढ़े पचास हजार योजन ऊँचा है। मानस पर्वतके पूर्वार्धमें स्थित रहते हुए भी इसका पुत्र महावीत नामक पर्वत द्वीपके पश्चिमार्ध भागकी रक्षा करता है। इस प्रकार वह प्रदेश दो भागोंमें विभक्त कहा जाता है। पुष्करद्वीप स्वादिष्ट जलवाले महासागरसे घिरा हुआ है। यह विस्तार एवं मण्डल (घेराव)-में गोमेदक द्वीपसे दुगुना है। इस द्वीपके अन्तःस्थित प्रदेशोंके मानव तीस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। उनमें वृद्धावस्थाका प्रवेश नहीं होता। वे स्वाभाविक रूपसे युवावस्था, नीरोगता, अत्यधिक सुख और मानसी सिद्धिसे युक्त होते हैं॥१२-२०॥ | | सुखमायुश्च रूपं च त्रिषु द्वीपेषु सर्वशः।<br>अधमोत्तमौ न तेष्वास्तां तुल्यास्ते वीर्यरूपतः॥ २१<br>न तत्र वध्यवधकौ नेर्ष्यासूया भयं तथा।<br>न लोभो न च दम्भो वा न च द्वेषः परिग्रहः॥ २२<br>सत्यानृते न तेष्वास्तां धर्माधर्मौ तथैव च।<br>वर्णाश्रमाणां वार्ता च पाशुपाल्यं वणिक् कृषिः॥ २३<br>त्रयीविद्या दण्डनीतिः शुश्रूषा दण्ड एव च।<br>न तत्र वर्षं नद्यो वा शीतोष्णं न च विद्यते॥ २४<br>उद्भिदान्युदकानि स्युर्गिरिप्रस्रवणानि च।<br>तुल्योत्तरकुरुणां तु कालस्तत्र तु सर्वदा॥ २५ | तीनों द्वीपोंमें सर्वत्र सुख, दीर्घायु और सुन्दर रूपकी सुलभता रहती है। उनमें ऊँच-नीचका भाव नहीं होता। पराक्रम और रूपकी दृष्टिसे वे एकतुल्य होते हैं। उनमें न कोई वध करनेयोग्य होता है और न मारनेवाला ही पाया जाता है। उनमें ईर्ष्या, असूया, भय, लोभ, दम्भ, द्वेष और संग्रहका नामतक नहीं है। उनमें सत्य-असत्य एवं धर्म-अधर्मका विवाद, वर्णाश्रमकी चर्चा, पशुपालन, व्यवसाय, खेती, त्रयीविद्या, दण्डनीति (शत्रुओं या अपराधियोंको दण्ड देकर वशमें करनेकी नीति), नौकरी और परस्पर दण्ड-विधान भी नहीं पाया जाता। वहाँ न तो वर्षा होती है, न नदियाँ ही हैं तथा सर्दी-गरमी भी नहीं पड़ती। पर्वतोंसे टपकते हुए जल ही अन्न और जलका काम पूरा करते हैं। वहाँ सर्वदा उत्तरकुरु देशके सदृश समय |
| * अध्याय १२३ * | ४२५ |
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| सर्वतः सुखकालोऽसौ जराक्लेशविवर्जितः ।<br>सर्गस्तु धातकीखण्डे महावीते तथैव च ॥ २६<br><br>एवं द्वीपाः समुद्रैस्तु समं समभिरावृताः ।<br>द्वीपस्यानन्तरो यस्तु समुद्रस्तत्समस्तु वै ॥ २७<br><br>एवं द्वीपसमुद्राणां वृद्धिर्ज्ञेया परस्परम् ।<br>अपां चैव समुद्रेकात् समुद्र इति संज्ञितः ॥ २८<br><br>ऋषद्वसन्त्यो वर्षेषु प्रजा यत्र चतुर्विधाः ।<br>ऋषिरित्येष गमने वर्ष त्वेतेन तेषु वै ॥ २९<br><br>उदयतीन्दौ पूर्वे तु समुद्रः पूर्यते सदा ।<br>प्रक्षीयमाणे बहुले क्षीयतेऽस्तमिते च वै ॥ ३०<br><br>आपूर्यमाणो ह्युदधिरात्मनैवाभिपूर्थ्यते ।<br>ततो वै क्षीयमाणे तु स्वात्मन्येव ह्यपां क्षयः ॥ ३१<br><br>उदयात् पयसां योगात् पुष्णन्त्यापो यथा स्वयम् ।<br>तथा स तु समुद्रोऽपि वर्धते शशिनोदये ॥ ३२<br><br>अन्यूनानतिरिक्तात्मा वर्धन्त्यापो ह्रसन्ति च ।<br>उदयेऽस्तमये चेन्दोः पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः ॥ ३३<br><br>क्षयवृद्धी समुद्रस्य शशिवृद्धिक्षये तथा ।<br>दशोत्तराणि पञ्चाहुरङ्गुलानां शतानि च ॥ ३४<br><br>अपां वृद्धिः क्षयो दृष्टः समुद्राणां तु पर्वसु ।<br>द्विरापत्त्वात् स्मृतो द्वीपो दधनाच्चोदधिः स्मृतः ॥ ३५<br><br>निगीर्णत्वाच्च गिरयो पर्वबन्धाच्च पर्वताः ।<br>शाकद्वीपे तु वै शाकः पर्वतस्तेन चोच्यते ॥ ३६<br><br>कुशद्वीपे कुशस्तम्बो मध्ये जनपदस्य तु ।<br>क्रौञ्चद्वीपे गिरिः क्रौञ्चस्तस्य नाम्ना निगद्यते ॥ ३७<br><br>शाल्मलिः शाल्मलद्वीपे पूज्यते स महाद्रुमः ।<br>गोमेदके तु गोमेदः पर्वतस्तेन चोच्यते ॥ ३८<br><br>न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः ।<br>पूज्यते स महादेवैर्ब्रह्मांशोऽव्यक्तसम्भवः ॥ ३९ | बना रहता है। वहाँ सब लोग सर्वत्र वृद्धावस्थाके कष्टसे रहित सुखमय समय व्यतीत करते हैं। यही स्थिति धातकीखण्ड तथा महावीत—दोनों प्रदेशोंमें पायी जाती है। इस प्रकार सातों द्वीप पृथक्-पृथक् सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। जो समुद्र जिस द्वीपके बाद पड़ता है, वह परिमाणमें उसी द्वीपके बराबर माना गया है। इस प्रकार द्वीपों और समुद्रोंकी परस्पर वृद्धि समझनी चाहिये। जलकी सम्यक् प्रकारसे वृद्धि होनेके कारण इस जलराशिको समुद्र कहते हैं। ‘ऋषि’ धातुका अर्थ गमन है, इसीसे ‘वर्ष’ शब्द बनता है। उन वर्षोंमें चार प्रकारकी प्रजाएँ सुखपूर्वक निवास करती हैं। पूर्व दिशामें चन्द्रमाके उदय होनेपर समुद्र सर्वदा जलसे पूर्ण हो जाता है अर्थात् उसमें ज्वार आ जाता है और वही चन्द्रमा जब अस्त हो जाते हैं तब समुद्रका बढ़ा हुआ जल अत्यन्त क्षीण हो जाता है अर्थात् भाटा हो जाता है। जलकी वृद्धिके समय समुद्र अपनी मर्यादाके भीतर ही बढ़ता है और क्षीण होते समय मर्यादाके अंदर ही उसके जलका क्षय होता है ॥ २१—३१ ॥<br><br>जिस प्रकार चन्द्रमाके उदय होनेपर चन्द्र-किरणोंका जलके साथ संयोग होनेसे जल अपने-आप उछलने लगता है, उसी प्रकार समुद्र भी बढ़ने लगता है। यद्यपि शुक्लपक्ष और कृष्णपक्षमें चन्द्रमाके उदय और अस्त-कालमें जल बढ़ता और घटता है, तथापि समुद्रकी मर्यादामें न्यूनता या अधिकता नहीं दीख पड़ती। चन्द्रमाकी वृद्धि और क्षयके अवसरपर समुद्रका भी उत्कर्ष और अपकर्ष होता है। पानीका यह चढ़ाव-उतार एक सौ पंद्रह अङ्गुलतक बतलाया जाता है। पर्वके अवसरोंपर समुद्रोंके जलोंका यह ज्वारभाटा स्पष्ट दीखनेमें आता है। दो ओर जलसे घिरा होनेके कारण समुद्रस्थ प्रदेशको द्वीप कहते हैं और जलको धारण करनेके कारण समुद्रको उदधि कहा जाता है। (सभी वस्तुओंको) आत्मसात् कर लेनेके कारण ‘गिरि’ और (पृथ्वीके) संधिस्थानको बाँधनेके कारण ‘पर्वत’ नाम पड़ा है। शाकद्वीपमें शाक नामक पर्वत है, इसी कारण उसे शाकद्वीप कहते हैं। कुशद्वीपमें जनपदके मध्यभागमें विशाल कुशस्तम्ब (कुशका गुल्म) है (इसीलिये वह कुशद्वीप कहा जाता है)। क्रौञ्चद्वीपमें क्रौञ्च नामक पर्वत है, अतः उसीके नामपर वह क्रौञ्चद्वीप कहलाता है। शाल्मलद्वीपमें सेमलका महान् वृक्ष है, उसकी वहाँके लोग पूजा करते हैं। (इसीसे उसे शाल्मलद्वीप कहा जाता है।) गोमेदकद्वीपमें गोमेद नामका पर्वत है, अतः उसीके नामपर द्वीपको गोमेदक नामसे पुकारते हैं। पुष्करद्वीपमें कमलके समान बरगदका वृक्ष है, इसी कारण उसे पुष्करद्वीप कहते हैं। वह वटवृक्ष अव्यक्त ब्रह्माके अंशसे समुद्भूत हुआ है, इसीलिये प्रधान-प्रधान |
| ४२६ | * मत्स्यपुराण * |
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| तस्मिन् स वसति ब्रह्मा साध्यैः सार्धं प्रजापतिः।<br>तत्र देवा उपासन्ते त्रयस्त्रिंशन्महर्षिभिः॥ ४०<br><br>स तत्र पूज्यते देवो देवैर्महर्षिसत्तमैः।<br>जम्बूद्वीपात् प्रवर्तन्ते रत्नानि विविधानि च॥ ४१ | देवगण उसकी पूजा करते हैं। उस द्वीपमें साध्यगणोंके साथ प्रजापति ब्रह्मा निवास करते हैं। वहाँ महर्षियोंके साथ तैंतीस देवता उपासना करते हैं। वहाँ श्रेष्ठ महर्षियों एवं देवताओंद्वारा देवाधिदेव ब्रह्माकी पूजा की जाती है। जम्बूद्वीपसे अनेकों प्रकारके रत्न (अन्यान्य द्वीपोंमें) प्रवर्तित होते हैं॥ ३२—४१॥ | | द्वीपेषु तेषु सर्वेषु प्रजानां क्रमशैस्तु वै।<br>आर्जवाद् ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च॥ ४२<br><br>आरोग्यायुष्प्रमाणाभ्यां द्विगुणं द्विगुणं ततः।<br>द्वीपेषु तेषु सर्वेषु यथोक्तं वर्षकेषु च॥ ४३<br><br>गोपायन्ते प्रजास्तत्र सर्वैः सहजपण्डितैः।<br>भोजनं चाप्रयत्नेन सदा स्वयमुपस्थितम्॥ ४४ | उपर्युक्त उन सभी द्वीपों और वर्षोंमें क्रमशः प्रजाओंकी सरलता, ब्रह्मचर्य, सत्यवादिता, इन्द्रियनिग्रह, नीरोगता और आयुका प्रमाण एक-दूसरेसे दुगुना बढ़ता जाता है। वे सभी स्वाभाविक ही पण्डित होते हैं, अतः उनके द्वारा स्वयं प्रजाओंकी रक्षा होती रहती है। वहाँ भोजन अनायास ही स्वयं उपस्थित हो जाता है, जो छहों रसोंसे युक्त और महान् बलदायक होता है। उसे ही वहाँके निवासी खाते हैं। | | षड्रसं तन्महावीर्यं तत्र ते भुञ्जते जनाः।<br>परेण पुष्करस्याथ आवृत्त्यावस्थितो महान्॥ ४५<br><br>स्वादूदकसमुद्रस्तु स समन्ताद्वेष्टयन्।<br>स्वादूदकस्य परितः शैलस्तु परिमण्डलः॥ ४६<br><br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते।<br>आलोकस्तत्र चार्वाक् च निरालोकस्ततः परम्॥ ४७ | पुष्करद्वीपके बाद स्वादिष्ट जलसे परिपूर्ण महासागर उस द्वीपको चारों ओरसे घेरकर अवस्थित है। उस स्वादिष्ट जलवाले सागरके चारों ओर एक मण्डलाकार पर्वत है, जो प्रकाश और अन्धकारसे युक्त है। उसीको 'लोकालोक' नामसे पुकारा जाता है। उसका अगला भाग प्रकाशयुक्त तथा पिछला भाग अन्धकारसे आच्छादित रहता है। | | लोकविस्तारमात्रं तु पृथिव्यर्थं तु बाह्यतः।<br>प्रतिच्छन्नं समन्तात् तु उदकेनावृतं महत्॥ ४८<br><br>भूमेर्दशगुणाश्चापः समन्तात् पालयन्ति गाम्। | उसका विस्तार लोकोंके विस्तारके बराबर है, किंतु वह बाहरसे पृथ्वीके अर्धभाग-जितना दीख पड़ता है। वह महान् पर्वत चारों ओर जल-राशिसे आच्छन्न एवं घिरा हुआ है। पृथ्वीसे दसगुना जल चारों ओरसे पृथ्वीकी रक्षा करता है। | | अद्भ्यो दशगुणश्चाग्निः सर्वतो धारयत्यपः॥ ४९<br><br>अग्नेर्दशगुणो वायुर्धारयञ्ज्योतिरास्थितः।<br>तिर्यक् च मण्डलो वायुर्भूतान्यावेष्ट्य धारयन्॥ ५० | जलसे दसगुनी अग्नि सब ओरसे जलको धारण करती है। अग्निसे दसगुनी वायु तेजको धारण करके स्थित है। वह वायुमण्डल तिरछा होकर समस्त प्राणियोंमें प्रविष्ट हो सबको धारण किये हुए है। | | दशाधिकं तथाऽऽकाशं वायोर्भूतान्यधारयत्।<br>भूतानि धारयन् व्योम तस्माद् दशगुणस्तु वै॥ ५१ | वायुसे दसगुना आकाश भूतोंको धारण किये हुए है। | | भूतादितो दशगुणं महद्भूतान्यधारयत्।<br>महत्तत्त्वं ह्यनन्तेन अव्यक्तेन तु धार्यते॥ ५२ | उस आकाशसे दसगुना भूतादि अर्थात् तामस अहंकार है। उस भूतादिसे दसगुना महद्भूत (महत्तत्त्व) है और वह महत्तत्त्व अनन्त अव्यक्तद्वारा धारण किया जाता है। | | आधाराधेयभावेन विकारास्ते विकारिणाम्।<br>पृथ्व्यादयो विकारास्ते परिच्छिन्नाः परस्परम्॥ ५३ | इन विकृतिशील तत्त्वोंके विकार आधाराधेयभावसे कल्पित हैं। ये पृथ्वी आदि विकार परस्पर विभक्त हैं, |
- अध्याय १२३ * | ४२७ ---|---:
| परस्पराधिकाश्चैव प्रविष्टाश्च परस्परम्।<br>एवं परस्परोत्पन्ना धार्यन्ते च परस्परम्॥ ५४ | परस्पर एक-दूसरेसे अधिक तथा एक-दूसरेमें घुसे हुए भी हैं। इसी प्रकार ये परस्पर उत्पन्न होते हैं और परस्पर एक-दूसरेको धारण भी करते हैं*॥ ४२—५४॥ |
| यस्मात् प्रविष्टास्तेऽन्योन्यं तस्मात् ते स्थिरतां गताः।<br>आसंस्ते ह्यविशेषाश्च विशेषा अन्यवेशनात्॥ ५५<br><br>पृथ्व्यादयस्तु वाय्वन्ताः परिच्छिन्नास्तु तत्र ते।<br>भूतेभ्यः परतस्तेभ्यो ह्यालोकः सर्वतः स्मृतः॥ ५६<br><br>तथा ह्यालोक आकाशे परिच्छिन्नानि सर्वशः।<br>पात्रे महति पात्राणि यथा ह्यन्तर्गतानि च॥ ५७<br><br>भवन्त्यन्योन्यहीनानि परस्परसमाश्रयात्।<br>तथा ह्यालोक आकाशे भेदास्त्वन्तर्गतागताः॥ ५८<br><br>कृतान्येतानि तत्त्वानि अन्योन्यस्याधिकानि च।<br>यावदेतानि तत्त्वानि तावदुत्पत्तिरुच्यते॥ ५९<br><br>जन्तूनामिह संस्कारो भूतेष्वन्तर्गतेषु वै।<br>प्रत्याख्यायेह भूतानि कार्योत्पत्तिर्न विद्यते॥ ६०<br><br>तस्मात् परिमिता भेदाः स्मृताः कार्यात्मकास्तु वै।<br>ते कारणात्मकाश्चैव स्युर्भेदा महदादयः॥ ६१<br><br>इत्येवं संनिवेशोऽयं पृथ्व्याक्रान्तस्तु भागशः।<br>सप्तद्वीपसमुद्राणां याथातथ्येन वै मया॥ ६२<br><br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव प्रसंख्यानेन चैव हि।<br>विश्वरूपं प्रधानस्य परिमाणैकदेशिनः॥ ६३<br><br>एतावत् संनिवेशस्तु मया सम्यक् प्रकाशितः।<br>एतावदेव श्रोतव्यं संनिवेशस्य पार्थिव॥ ६४ | चूँकि ये सभी परस्पर एक-दूसरेमें प्रविष्ट-से हैं, इसीलिये स्थिरताको प्राप्त हुए हैं। पहले इनमें कोई विशेषता नहीं थी, परंतु एक-दूसरेमें प्रविष्ट हो जानेसे ये विशिष्ट हो गये हैं। पृथ्वीसे लेकर वायुतकके सभी तत्त्व परस्पर विभक्त हैं। इन तत्त्वोंसे परे सारा जगत् निर्जन है। (अन्य सभी तत्त्व) प्रकाशमान आकाशमें सर्वत्र व्याप्त हैं। जिस प्रकार छोटे-छोटे पात्र बड़े पात्रके अन्तर्गत समा जाते हैं और परस्पर समाश्रयण होनेके कारण एक-दूसरेसे छोटे होते जाते हैं, उसी प्रकार ये सारे भेद प्रकाशमान आकाशके अन्तर्गत विलीन हो जाते हैं। ये तत्त्व परस्पर एक-दूसरेसे अधिक परिमाणवाले बनाये गये हैं। जबतक ये तत्त्व वर्तमान रहते हैं, तभीतक प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है। इस जगत्में इन्हीं तत्त्वोंके अन्तर्गत प्राणियोंकी व्यवस्थिति होती है। इन तत्त्वोंका प्रत्याख्यान कर देनेपर किसी प्रकार कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसीलिये वे परिमित (पृथ्वीसे वायुतक) तत्त्व कार्यात्मक कहे जाते हैं तथा महत्तत्त्व आदि भेद कारणात्मक हैं। इस प्रकार विभागपूर्वक पृथ्वीसे आच्छादित मण्डल, सातों द्वीपों और सातों समुद्रोंका यथार्थरूपसे गणनासहित विस्तार एवं मण्डल तथा परिमाणमें एकदेशी प्रधान तत्त्वका इसे विश्वरूप जानना चाहिये। राजन्! मैंने इस मण्डलका यहाँतक सम्यक् प्रकारसे वर्णन कर दिया; क्योंकि मण्डलके वृत्तान्तको यहाँतक ही सुनना चाहिये॥ ५५—६४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे सप्त द्वीपनिवेशनं नाम त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें सप्तद्वीपनिवेशन नामक एक सौ तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२३॥
* यह वर्णन अन्य पुराणमें भी है। पर इन सबोंका आचार्य यामुनने 'स्तोत्ररत्नम्'में परमात्मसम्बन्धसहित—
'यदण्डमण्डान्तरगोचरं च यद्दशोत्तराण्यावरणानि यानि च। गुणाः प्रधानं पुरुषाः परं पदं परात्परं ब्रह्म च ते विभूतयः॥'
इस एक ही श्लोकमें बड़े संक्षेपमें, पर सुन्दर शब्दों तथा भावोंमें चित्रण कर दिया है।
१२५- सूर्यकी गति और उनके रथका वर्णन
४२८ * मत्स्यपुराण *
मत्स्यावतार-कथा-प्रसंग
श्रुतिनि हित हरि मच्छ रूप धार्यौ। सदा ही भक्त-संकट निवार्यौ॥
चतुरमुख कह्यौ, सँख असुर श्रुति लै गयो, सत्यब्रत कह्यौ परलय दिखायौ।
भक्त-बत्सल, कृपाकरन, असरन-सरन, मत्स्यकौ रूप तब धारि आयौ॥
स्नान करि अंजली जल जबै नृप लियौ, मत्स्य जौ देखि कह्यो डारि दीजै।
मत्स्य कह्यौ, मैं गही आइ तुम्हरी सरन, करि कृपा मोहिं अब राखि लीजै॥
नृप सुनत बचन, चकित प्रथम है रह्यौ, कह्यौ, मछ बचन किहिं भाँति भाष्यौ।
पुनि कमंडल धर्यौ, तहाँ सो बढ़ि गयौ, कुंभ धरि बहुरि पुनि माट राख्यौ॥
पुनि धर्यौ खाड़, तालाब मैं पुनि धर्यौ, नदी मैं बहुरि पुनि डारि दीन्हौ।
बहुरि जब बढ़ि गयौ, सिंधु तब लै गयौ, तहाँ हरि-रूप नृप चीन्हि लीन्हौ॥
कह्यौ करि बिनय तुम ब्रह्म जो अनंत हौ, मत्स्यकौ रूप किहिं काज कीन्हौ!
बेद-बिधि चहत, तुम प्रलय देखन कहत, तुम दुहुँनि हेत अवतार लीन्हौ॥
कबहुँ बाराह, नरसिंह कबहुँ भयौ, कबहुँ मैं कच्छकौ रूप लीन्हौ।
कबहुँ भयौ राम, बसुदेव-सुत कबहुँ भयौ, और बहु रूप हित-भक्त कीन्हौ॥
सातवें दिवस दिखराइहौं प्रलय तोहिं सप्त-रिषि नाव मैं बैठि आवैं।
तोहिं बैठारिहौं नावमैं हाथ गहि, बहुरि हम ज्ञान तोहिं कहि सुनावैं॥
सर्प इक आइहै बहुरि तुम्हरे निकट, ताहि सों नाव मम सृंग बाँधौ।
यहै कहि भए अँतरधान तब मत्स्य प्रभु, बहुरि नृप आपनौ कर्म साधौ॥
सातवैं दिवस आयौ निकट जलधि जब, नृप कह्यौ अब कहाँ नाव पावैं।
आइ गइ नाव, तब रिषिन तासों कह्यौ, आउ हम नृपति तुमकौं बचावैं॥
पुनि कह्यौ, मत्स्य हरि अब कहाँ पाइय, रिषिन कह्यौ, ध्यान चित माहिं धारौ।
मत्स्य अरु सर्पु तिहिं ठौर परगट भए, बाँधि नृप नाव यौं कहि उचारौ॥
ज्यौं महाराज या जलधितैं पार कियौ, भव-जलधि पार त्यों करो स्वामी।
अहं-ममता हमैं सदा लागी रहै, मोह-मद-क्रोध-जुत मंद कामी॥
कर्म सुख-हित करत, होत तहँ दुःख नित, तऊ नर मूढ नाहीं सँभारत।
करन-कारन महराज हैं आप हो, ध्यान प्रभुकौ न मन माहिं धारत॥
बिन तुम्हारी कृपा गति नहीं नरनिकी, जानि मोहिं आपनौ कृपा कीजै।
जनम अरु मरनमैं सदा दुःखित देहु मोहिं ज्ञान जिहिं सदा जीजै॥
मत्स्य भगवान कह्यौ ज्ञान पुनि नृपति सों, भयो सो पुरान सब जगत जान्यौ।
लह्यो नृप ज्ञान, कह्यौ आँखि अब मीचि तू, मत्स्य कह्यौ सो नृपति मान्यौ॥
आँखिकौं खोलि जब नृपति देख्यौ बहुरि, कह्यौ, हरि प्रलय-माया दिखाई।
कह्यौ जो ज्ञान भगवान, सो आनि उर, नृपति निज आपु इहिं बिधि बिताई॥
बहुरि सँखासुरहि मारि, बेद आनि दिए, चतुरमुख बिबिध अस्तुति सुनाई।
सूरके प्रभूकी नित्य लीला नई, सकै कहि कौन, यह कछुक गाई॥
('सूरदास' १६। ४४३)
* अध्याय १२४ * | ४२९
एक सौ चौबीसवाँ अध्याय
सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इसके बाद अब मैं सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन कर रहा हूँ। ये सूर्य और चन्द्रमा सातों द्वीपों एवं सातों समुद्रोंके विस्तारको तथा समग्र भूतलके अर्धभागको और उसके बाहरके अन्य प्रदेशोंको ये अपने प्रकाशसे उद्भासित करते हैं। ये विश्वकी अन्तिम सीमातक प्रकाश फैलाते हैं। तुलना परिभ्रमणके प्रमाणको लेकर ही विद्वान् लोग आकाशकी करते हैं। सूर्य सामान्यतः तीनों लोकोंमें शीघ्रतापूर्वक भ्रमण करते हैं। 'अव' धातु रक्षण और प्रकाशार्थक है। प्रकाश फैलाने तथा प्राणियोंकी रक्षा करनेके कारण सूर्यको 'रवि' कहा जाता है। पुनः सूर्य और चन्द्रमाका प्रमाण बतला रहा हूँ। महनीय होनेके कारण पृथ्वीके लिये 'मही' शब्दका प्रयोग किया जाता है। अब भारतवर्षका तथा सूर्य-मण्डलके व्यासका परिमाण योजनोंमें बतला रहा हूँ, उसे सुनिये। सूर्य-मण्डलका परिमाण नौ हजार योजन है। इस मण्डलमें परिणाह (घेरा) विस्तारसे तिगुना अर्थात् सत्ताईस हजार योजन है। व्यास और मण्डलकी दृष्टिसे भी सूर्यसे चन्द्रमा बहुत छोटे हैं। पुनः सातों द्वीपों और समुद्रोंसहित पृथ्वीमण्डलके विस्तारका प्रमाण, जिन्हें विद्वानोंने पुराणोंमें बतलाया है, (योजनोंकी संख्यामें) बतला रहा हूँ॥१—९॥ <br><br> पूर्वकालमें जो पुराणोंके ज्ञाता हो चुके हैं, वे भी आजकलके पुराणोंके तुल्य ही थे। पूर्वकालके विद्वान् एवं आधुनिक विद्वान्—दोनोंके मत इस विषयमें समान हैं। अतः वर्तमानकालिक विद्वानोंके अनुसार भूतलका परिमाण बतला रहा हूँ। आधुनिक विद्वानोंने दिव्यलोककी स्थितिको भी पृथ्वीमण्डलके बराबर ही माना है। समूची पृथिवी पचास करोड़ योजनोंमें विस्तृत मानी गयी है। | | अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम्।<br>सूर्याचन्द्रमसावेतौ भ्रमन्तौ यावदेव तु॥१¹<br>सप्तद्वीपसमुद्राणां द्वीपानां भाति विस्तरः।<br>विस्तरार्थं पृथिव्यास्तु भवेदन्ध्रत्र बाह्यतः॥२<br>पर्याप्तपरिमाणं च चन्द्रादित्यौ प्रकाशतः।<br>पर्याप्तपारिमाण्यात्तु भूमेस्तुल्यं दिवः स्मृतम्॥३<br>भवति त्रीणि माँल्लोकान् सूर्यो यस्मात् परिभ्रमन्।<br>अव धातुः प्रकाशाख्यो अवनात्तु रविः स्मृतः॥४<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रमाणं चन्द्रसूर्ययोः।<br>महित्वान्महीशब्दो ह्यस्मिन्नर्थे निगद्यते॥५<br>अस्य भारतवर्षस्य विष्कम्भं तु सुविस्तरम्।<br>मण्डलं भास्करस्याथ योजनैस्तन्निबोधत॥६<br>नवयोजनसाहस्रो विस्तारो भास्करस्य तु।<br>विस्तारात् त्रिगुणश्चापि परिणाहोऽत्र मण्डले॥७<br>विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव भास्कराद् द्विगुणः शशी।<br>अतः पृथिव्या वक्ष्यामि प्रमाणं योजनैः पुनः॥८<br>सप्तद्वीपसमुद्राया विस्तारो मण्डलस्य तु।<br>इत्येतदिह संख्यातं पुराणे परिमाणतः॥९<br>तद्वक्ष्यामि प्रसंख्याय साम्प्रतं चाभिमानिभिः।<br>अभिमानिनो ह्यतीता ये तुल्यास्ते साम्प्रतैस्त्विह॥१०<br>देवा ये वै ह्यतीतास्तु रूपैर्नामभिरेव च।<br>तस्माद्वै साम्प्रतैर्देवैर्वक्ष्यामि² वसुधातलम्॥११<br>दिव्यस्य संनिवेशो वै साम्प्रतैरेव कृत्स्नशः।<br>शतार्धकोटिविस्तारा पृथिवी कृत्स्नशः स्मृता॥१२ | |
१. इस अध्यायके सभी श्लोक वायुपु० ५०।५६—१६९ (किसी प्रतिमें ५१।१—११३) तथा ब्रह्माण्डपुराणसे सर्वांशमें मिल जाते हैं। उनके श्लोक विशेष शुद्ध हैं।
२. यहाँ 'विद्वांसो ह वै देवाः' के अनुसार विद्वान् ही देवता हैं।
४३० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्याश्चार्धप्रमाणं च मेरोर्वै चतुरन्तरम्।<br>मेरोर्मध्यात् प्रतिदिशं कोटिरेका तु सा स्मृता॥ १३<br>तथा शतसहस्राणामेकोननवतिं पुनः।<br>पञ्चाशच्च सहस्राणि पृथिव्याः स तु विस्तरः॥ १४<br>पृथिव्या विस्तरं कृत्स्नं योजनैस्तन्निबोधत।<br>तिस्रः कोट्यस्तु विस्तारात्संख्यातास्तु चतुर्दिशम्॥ १५<br>विस्तारं त्रिगुणं चैव पृथिव्यन्तरमण्डलम्।<br>गणितं योजनानां तु कोट्यस्त्वेकादश स्मृताः॥ १६<br>तथा शतसहस्राणां सप्तत्रिंशाधिकास्तु ताः।<br>इत्येतद्वै प्रसंख्यातं पृथिव्यन्तरमण्डलम्॥ १७<br>तारकासंनिवेशस्य दिवि यावत्तु मण्डलम्।<br>पर्यांसः संनिवेशस्य भूमेस्तावत्तु मण्डलम्॥ १८<br>पर्यांसपरिमाणं च भूमेस्तुल्यं दिवः स्मृतम्।<br>समानापि लोकानामेतन्मानं प्रकीर्तितम्॥ १९<br>ज्योतिर्गणप्रचारस्य प्रमाणं परिवक्ष्यते।<br>मेरोः प्राच्यां दिशायां तु मानसोत्तरमूर्धनि॥ २०<br>वस्वौकसारा माहेन्द्री पुण्या हेमपरिष्कृता।<br>दक्षिणेन पुनर्मेरोर्मानसस्य तु पृष्ठतः॥ २१<br>वैवस्वतो निवसति यमः संयमने पुरे।<br>प्रतीच्यां तु पुनर्मेरोर्मानसस्य तु मूर्धनि॥ २२<br>सुखा नाम पुरी रम्या वरुणस्यापि धीमतः।<br>दिश्युत्तरस्यां मेरोस्तु मानसस्यैव मूर्धनि॥ २३<br>तुल्या महेन्द्रपुर्यापि सोमस्यापि विभावरी।<br>मानसोत्तरपृष्ठे तु लोकपालाश्चतुर्दिशम्॥ २४<br>स्थिता धर्मव्यवस्थार्थं लोकसंरक्षणाय च।<br>लोकपालोपरिष्टात् तु सर्वतो दक्षिणायने॥ २५<br>काष्ठागतस्य सूर्यस्य गतिस्तत्र निबोधत।<br>दक्षिणोपक्रमे सूर्यः क्षिप्तेषुरिव सर्पति॥ २६ | उसका आधा भाग मेरु पर्वतके उत्तरोत्तर फैला हुआ है और मेरु पर्वतके मध्यभागमें वह चारों ओर एक करोड़ योजन विस्तारवाली कही जाती है। इसी तरह पृथ्वीके अर्धभागका विस्तार नवासी लाख, पचास हजार योजन बतलाया जाता है। अब योजनके परिमाणसे पृथ्वीके समूचे विस्तारको सुनिये। इसका विस्तार चारों दिशाओंमें तीन करोड़ योजन माना गया है। यही सातों द्वीपों और समुद्रोंसे घिरी हुई पृथ्वीका विस्तार है। पृथ्वीका आन्तरिक मण्डल बाह्य मण्डलसे तिगुना अधिक है। इस प्रकार उसका परिमाण ग्यारह करोड़ सैंतीस लाख योजन माना गया है। यही पृथ्वीके आन्तरिक मण्डलकी गणना की गयी है। आकाश-मण्डलमें जितने तारागणोंकी स्थिति है, उतना ही समग्र पृथ्वीमण्डलका विस्तार माना गया है। इस प्रकार पृथ्वीमण्डलके परिमाणके बराबर आकाशमण्डल भी है। अब ज्योतिर्गणके प्रचारकी बात सुनिये। मेरु पर्वतकी पूर्व दिशामें मानसोत्तर पर्वतके शिखरपर वस्वौकसारा नामकी महेन्द्रकी पुण्यमयी नगरी है, जो सुवर्णसे सुसज्जित है। पुनः मेरुकी दक्षिण दिशामें मानसपर्वतके पृष्ठभागपर संयमनी पुरी है, जिसमें सूर्यके पुत्र यमराज निवास करते हैं। पुनः मेरुकी पश्चिम दिशामें मानसपर्वतके शिखरपर बुद्धिमान् वरुणकी सुखा नामकी रमणीय पुरी है। मेरुकी उत्तर दिशामें मानसपर्वतके शिखरपर महेन्द्रपुरीके समान चन्द्रदेवकी विभावरी पुरी है। उसी मानसोत्तर पर्वतके पृष्ठभागकी चारों दिशाओंमें लोकपालगण धर्मकी व्यवस्था और लोकोंकी रक्षा करनेके लिये स्थित हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य उन लोकपालोंसे ऊपर होकर भ्रमण करते हैं॥ १०—२५॥<br><br>दक्षिण दिशाका आश्रय लेनेपर सूर्यकी जैसी गति होती है, उसे सुनिये। दक्षिणायनकालमें सूर्य छोड़े गये बाणकी तरह शीघ्रगतिसे चलते हैं। वे ज्योतिष्चक्रको सदा साथ लिये रहते हैं। (इस प्रकार भ्रमण करते हुए) |
| ज्योतिषां चक्रमादाय सततं परिगच्छति।<br>मध्यगश्चामरावत्यां यदा भवति भास्करः॥ २७ | जिस समय सूर्य अमरावती पुरीमें पहुँचते हैं, उस समय वे गगनमण्डलके मध्यभागमें रहते हैं अर्थात् मध्याह्न होता है। उसी समय वे यमराजकी संयमनीपुरीमें |
| वैवस्वते संयमने उद्यन् सूर्यः प्रदृश्यते।<br>सुखायामर्धरात्रस्तु विभावर्यास्तमेति च॥ २८ | उदित होते हुए और विभावरी नगरीमें अस्त होते हुए दीखते हैं तथा सुखा नगरीमें आधी रात होती है। |
| * अध्याय १२४ * | ४३१ |
|---|---|
| वैवस्वते संयमने मध्याह्ने तु रविर्यदा।<br>सुखायामथ वारुण्यामुत्तिष्ठन् स तु दृश्यते॥ २९<br>विभावर्यामर्धरात्रं माहेन्द्रयामस्तमेव च।<br>सुखायामथ वारुण्यां मध्याह्ने तु रविर्यदा॥ ३०<br>विभावर्यां सोमपुर्यामुत्तिष्ठति विभावसुः।<br>महेन्द्रस्यामरावत्यामुद्गच्छति दिवाकरः॥ ३१<br>सुखायामथ वारुण्यां मध्याह्ने तु रविर्यदा।<br>स शीघ्रमेव पर्येति भानुरालातचक्रवत्॥ ३२ | इसी प्रकार जब सूर्य मध्याह्नकालमें यमराजकी संयमनी-पुरीमें पहुँचते हैं, तब वरुणकी सुखानगरीमें उगते हुए और महेन्द्रकी वस्वौकसारा (अमरावती) पुरीमें अस्त होते हुए दीखते हैं तथा विभावरी पुरीमें आधी रात होती है। जब दोपहरके समय सूर्य वरुणकी सुखानगरीमें पहुँचते हैं, तब चन्द्रदेवकी पुरी विभावरीमें उदय होते हैं। जब सूर्य महेन्द्रकी अमरावतीपुरीमें उदय होते हैं, तब वरुणकी सुखानगरीमें अस्त होते (दीखते) हैं और संयमनीपुरीमें आधी रात होती है। इस प्रकार सूर्य अलातचक्र (जलती बनेठी)-की भाँति बड़ी शीघ्रतासे चक्कर लगाते हैं॥ २६-३२॥ |
| भ्रमन् वै भ्रममाणानि ऋक्षाणि चरते रविः।<br>एवं चतुर्षु पार्श्वेषु दक्षिणान्तेषु सर्पति॥ ३३<br>उदयास्तमये वासावुत्तिष्ठति पुनः पुनः।<br>पूर्वाह्ने चापराह्ने च द्वौ द्वौ देवालयौ तु सः॥ ३४<br>पतत्येकं तु मध्याह्ने भाभिरेव च रश्मिभिः।<br>उदितो वर्धमानाभिर्मध्याह्ने तपसे रविः॥ ३५<br>अतः परं ह्सन्तीभिर्गोभिरस्तं स गच्छति।<br>उदयास्तमयाभ्यां च स्मृते पूर्वापरे तु वै॥ ३६<br>यादृक्पुरस्तात्तपति तादृक्पृष्ठे तु पार्श्वयोः।<br>यत्रोदयस्तु दृश्येत तेषां स उदयः स्मृतः॥ ३७<br>प्रणाशं गच्छते यत्र तेषामस्तः स उच्यते।<br>सर्वेषामुत्तरे मेरुर्लोकालोकस्तु दक्षिणे॥ ३८<br>विदूरभावादर्कस्य भूमेर्लेखावृतस्य च।<br>ह्रियन्ते रश्मयो यस्मात्तेन रात्रौ न दृश्यते॥ ३९<br>ऊर्ध्वं शतसहस्त्रांशुः स्थितस्तत्र प्रदृश्यते।<br>एवं पुष्करमध्ये तु यदा भवति भास्करः॥ ४०<br>त्रिंशद्भागं च मेदिन्या मुहूर्तेन स गच्छति।<br>योजनानां सहस्त्रस्य इमां संख्यां निबोधत॥ ४१<br>पूर्णं शतसहस्त्राणामेकत्रिंशच्च सा स्मृता।<br>पञ्चाशच्च सहस्त्राणि तथान्यान्यधिकानि च॥ ४२<br>मौहूर्तिकी गतिर्ह्यैषा सूर्यस्य तु विधीयते। | इस प्रकार स्वयं भ्रमण करते हुए सूर्य नक्षत्रोंको भी भ्रमण कराते हैं। वे चारों दक्षिणान्त पार्श्व भागोंमें चलते रहते हैं। उदय और अस्तके समय वे पुनः-पुनः उदय और अस्त होते रहते हैं और पूर्वाह्न एवं अपराह्नमें दो-दो देवपुरियोंमें तथा मध्याह्नके समय एक पुरीमें पहुँचते हैं। इस प्रकार सूर्य उदय होकर अपनी बढ़ती हुई तेजस्विनी किरणोंसे दोपहरके समय तपते हैं और उसके बाद धीरे-धीरे ह्रासको प्राप्त होती हुई उन्हीं किरणोंके साथ अस्त हो जाते हैं। सूर्यके इसी उदय और अस्तसे पूर्व और पश्चिम दिशाका ज्ञान होता है। यों तो सूर्य जैसे पूर्व दिशामें तपते हैं, उसी तरह पश्चिम तथा पार्श्वभाग (उत्तर और दक्षिण)-में भी प्रकाश फैलाते हैं, परंतु उन दिशाओंमें जहाँ सूर्यका उदय दीखता है, वही उदय-स्थान कहलाता है तथा जिस दिशामें सूर्य अदृश्य हो जाते हैं, उसे अस्त-स्थान कहते हैं। मेरुपर्वत सभी पर्वतोंसे उत्तर तथा लोकालोक पर्वत दक्षिण दिशामें स्थित है, इसलिये सूर्यके बहुत दूर हो जाने तथा पृथिवीकी छायासे आवृत होनेके कारण उनकी किरणें अवरुद्ध हो जाती हैं, इसी कारण सूर्य रातमें नहीं दीख पड़ते। इस प्रकार एक लाख किरणोंसे सुशोभित सूर्य जब पुष्करद्वीपके मध्यभागमें पहुँचते हैं, तब वहाँ ऊँचाईपर स्थित होनेके कारण दीख पड़ते हैं। सूर्य एक मुहूर्त (दो घड़ी)-में पृथिवीके तीसवें भागतक पहुँच जाते हैं। उनकी गतिका प्रमाण योजनोंके हजारोंकी गणनामें सुनिये। सूर्यकी एक मुहूर्तकी गतिका परिमाण इकतीस लाख पचास हजार योजनसे भी अधिक बतलाया जाता है॥ ३३-४२ १/२॥ |
| एतेन क्रमयोगेन यदा काष्ठां तु दक्षिणाम्॥ ४३<br>परिगच्छति सूर्योऽसौ मासं काष्ठामुदग्दिनात्।<br>मध्येन पुष्करस्याथ भ्रमते दक्षिणायने॥ ४४ | इसी क्रमसे जब सूर्य दक्षिण दिशामें जाते हैं, तब (वहाँ छह महीनेतक भ्रमण करनेके पश्चात् पुनः) सातवें मासमें उत्तर दिशाकी ओर लौटते हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य पुष्करद्वीपके मध्यमें भ्रमण करते हैं। |
१२६- सूर्य-रथपर प्रत्येक मासमें भिन्न-भिन्न देवताओंका अधिरोहण तथा चन्द्रमाकी विचित्र गति
| ४३२ | * मत्स्यपुराण * |
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| मानसोत्तरमेरोस्तु अन्तरं त्रिगुणं स्मृतम्।<br>सर्वतो दक्षिणस्यां तु काष्ठायां तन्निबोधत ॥ ४५<br>नव कोट्यः प्रसंख्याता योजनैः परिमण्डलम्।<br>तथा शतसहस्राणि चत्वारिंशच्च पञ्च च ॥ ४६<br>अहोरात्रात् पतङ्गस्य गतिरेषा विधीयते।<br>दक्षिणादिङ्निवृत्तोऽसौ विषुवस्थो यदा रविः ॥ ४७<br>क्षीरोदस्य समुद्रस्योत्तरतोऽपि दिशं चरन्।<br>मण्डलं विषुवच्चापि योजनैस्तन्निबोधत ॥ ४८<br>तिस्रः कोट्यस्तु सम्पूर्णा विषुवस्यापि मण्डलम्।<br>तथा शतसहस्राणि विंशत्येकाधिकानि तु ॥ ४९<br>श्रवणे चोत्तरां काष्ठां चित्रभानुर्यदा भवेत्।<br>गोमेदस्य परे द्वीपे उत्तरां च दिशं चरन् ॥ ५०<br>उत्तरायाः प्रमाणं तु काष्ठाया मण्डलस्य तु।<br>दक्षिणोत्तरमध्यानि तानि विद्याद् यथाक्रमम् ॥ ५१<br>स्थानं जरद्गवं मध्ये तथैरावतमुत्तरम्।<br>वैश्वानरं दक्षिणतो निर्दिष्टमिह तत्त्वतः ॥ ५२<br>नागवीथ्युत्तरा वीथी ह्याजवीथिस्तु दक्षिणा। | मानसोत्तर और मेरु पर्वतके बीचमें पुष्करद्वीपसे तिगुना अन्तर है। अब दक्षिण दिशामें सूर्यकी गतिका परिमाण सुनिये। यह (दक्षिणायन-) मण्डल नौ करोड़ पैंतालीस लाख योजन विस्तृत बतलाया गया है। यह सूर्यकी एक दिन-रातकी गति है। दक्षिणायनसे निवृत्त होकर जब सूर्य विषुव (खगोलीय विषुवद्वृत्त और क्रान्तिवृत्तका कटान-बिन्दु) स्थानपर स्थित होते हैं, तब वे क्षीरसागरकी उत्तर दिशामें भ्रमण करते हैं। अब विषुवन्मण्डलका परिमाण योजनोंमें सुनिये। वह विषुवन्मण्डल तीन करोड़ इक्कीस लाख योजनके परिमाणवाला है। श्रवणनक्षत्रमें जब सूर्य उत्तर दिशामें चले जाते हैं, तब वे गोमेदद्वीपके बादवाले द्वीपकी उत्तर दिशामें भ्रमण करते हैं। अब उत्तर दिशाके मण्डलका तथा दक्षिण और उत्तरके मध्यभागका प्रमाण क्रमशः सुनिये। इनके मध्यमें जरद्गव, उत्तरमें ऐरावत और दक्षिणमें वैश्वानर नामक स्थान सिद्धान्ततः निर्दिष्ट किये गये हैं। उत्तर दिशामें सूर्यके मार्गको नागवीथी तथा दक्षिणदिशाके मार्गको अजवीथी कहते हैं॥ ४३—५२ १/२ ॥ | | उभे आषाढमूलं तु अजवीथ्युदयास्त्रयः ॥ ५३<br>अभिजित्पूर्वतः स्वातिं नागवीथ्युदयास्त्रयः।<br>अश्विनी कृत्तिका याम्या नागवीथ्यस्त्रयः स्मृताः ॥ ५४<br>रोहिण्यार्द्रा मृगशिरो नागवीथिरिति स्मृता।<br>पुष्यश्लेषापुनर्वस्वां वीथी चैरावती स्मृता ॥ ५५<br>तिस्रस्तु वीथयो ह्येता उत्तरो मार्ग उच्यते।<br>पूर्वोत्तरफाल्गुन्यौ मघा चैवार्षभी भवेत् ॥ ५६<br>पूर्वोत्तरप्रोष्ठपदौ गोवीथी रेवती स्मृता।<br>श्रवणं च धनिष्ठा च वारुणं च जरद्गवम् ॥ ५७<br>एतास्तु वीथयस्तिस्रो मध्यमो मार्ग उच्यते।<br>हस्तश्चित्रा तथा स्वाती ह्याजवीथिरिति स्मृता ॥ ५८<br>ज्येष्ठा विशाखा मैत्रं च मृगवीथी तथोच्यते।<br>मूलं पूर्वोत्तराषाढे वीथी वैश्वानरी भवेत् ॥ ५९<br>स्मृतास्तिस्रस्तु वीथ्यस्ता मार्गे वै दक्षिणे पुनः।<br>काष्ठयोरन्तरं चैतद् वक्ष्यते योजनैः पुनः ॥ ६०<br>एतच्छतसहस्राणामेकत्रिंशत्तु वै स्मृतम्।<br>शतानि त्रीणि चान्यानि त्रयस्त्रिंशत्तथैव च ॥ ६१<br>काष्ठयोरन्तरं ह्येतद् योजनानां प्रकीर्तितम्।<br>काष्ठयोर्लेखयोश्चैव अयने दक्षिणोत्तरे ॥ ६२ | दोनों आषाढ़ अर्थात् पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़ और मूल—ये तीनों अजवीथी हैं। अभिजित्, श्रवण और स्वाती—ये तीनों नागवीथी हैं। अश्विनी, भरणी और कृत्तिका—ये तीनों नागवीथी नामसे प्रसिद्ध हैं। रोहिणी, आर्द्रा और मृगशिरा भी नागवीथी कहलाते हैं। पुष्य, श्लेषा और पुनर्वसु—ये तीनों ऐरावती वीथी कहे जाते हैं। ये तीनों वीथियाँ उत्तर दिशाका मार्ग कहलाती हैं। पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी और मघा—ये तीनों 'आर्षभी' वीथी हैं। पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद और रेवती—ये तीनों 'गोवीथी' नामसे पुकारे जाते हैं। श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा—ये तीनों 'जरद्गववीथी' हैं। ये तीनों वीथियाँ मध्यम मार्ग कहलाती हैं। हस्त, चित्रा और स्वाती—ये तीनों 'अजवीथी' कहलाते हैं। ज्येष्ठा, विशाखा और अनुराधा—ये 'मृगवीथी' कहलाते हैं। मूल, पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़—ये 'वैश्वानर'-वीथी हैं। ये तीनों वीथियाँ दक्षिण-मार्गमें बतलायी गयी हैं। अब उत्तर और दक्षिण—दोनों दिशाओंका अन्तर योजनोंमें बतला रहा हूँ। इन दोनों दिशाओंका अन्तर इकतीस लाख तीन हजार छः सौ योजन बतलाया जाता है। अब उत्तरायण और दक्षिणायन-कालमें दोनों दिशाओं और दोनों रेखाओंका |
| * अध्याय १२४ * | ४३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
| ते वक्ष्यामि प्रसंख्याय योजनैस्तु निबोधत।<br>एकैकमन्तरं तस्या नियुतान्येकसप्ततिः॥ ६३<br>सहस्राण्यतिरिक्ता च ततोऽन्या पञ्चविंशतिः।<br>लेखयोः काष्ठयोश्चैव बाह्याभ्यन्तरयोश्चरन्॥ ६४<br>अभ्यन्तरं स पर्यति मण्डलान्युत्तरायणे।<br>बाह्यतो दक्षिणेनैव सततं सूर्यमण्डलम्॥ ६५<br>चरन्नसावुदीच्यां च ह्यशीत्या मण्डलाच्छतम्।<br>अभ्यन्तरं स पर्यति क्रमते मण्डलानि तु॥ ६६ | अन्तर योजनोंमें परिगणित करके बतला रहा हूँ, सुनिये। उनमें एकसे दूसरीका अन्तर एकहत्तर लाख पचीस हजार योजन है। सूर्य दोनों दिशाओं और रेखाओंके बाहरी और भीतरी भागमें चक्कर लगाते हैं। यह सूर्यमण्डल सदा उत्तरायणमें मण्डलोंके भीतर और दक्षिणायनमें बाहरसे चक्कर लगाता है। उत्तर दिशामें विचरते हुए सूर्य एक सौ अस्सी मण्डलोंके भीतरसे गुजरते हुए उन्हें पार करते हैं॥ ६३-६६॥ |
| प्रमाणं मण्डलस्यापि योजनानां निबोधत।<br>योजनानां सहस्राणि दश चाष्टौ तथा स्मृतम्॥ ६७<br>अधिकान्यष्टपञ्चाशद्योजनानि तु वै पुनः।<br>विष्कम्भो मण्डलस्यैव तिर्यक् स तु विधीयते॥ ६८<br>अहस्तु चरते नाभेः सूर्यो वै मण्डलं क्रमात्।<br>कुलालचक्रपर्यन्तो यथा चन्द्रो रविस्तथा॥ ६९<br>दक्षिणे चक्रवत्सूर्यस्तथा शीघ्रं निवर्तते।<br>तस्मात् प्रकृष्टां भूमिं तु कालेनाल्पेन गच्छति॥ ७०<br>सूर्यो द्वादशभिः शीघ्रं मुहूर्तैर्दक्षिणायने।<br>त्रयोदशार्धमृक्षाणां मध्ये चरति मण्डलम्॥ ७१<br>मुहूर्तैस्तानि ऋक्षाणि नक्तमष्टादशैश्चरन्।<br>कुलालचक्रमध्यस्थो यथा मन्दं प्रसर्पति॥ ७२<br>उदग्याने तथा सूर्यः सर्पते मन्दविक्रमः।<br>तस्माद् दीर्घेण कालेन भूमिं सोऽल्पां प्रसर्पति॥ ७३<br>सूर्योऽष्टादशभिरहो मुहूर्तैरुदगायने।<br>त्रयोदशानां मध्ये तु ऋक्षाणां चरते रविः।<br>मुहूर्तैस्तानि ऋक्षाणि रात्रौ द्वादशभिश्चरन्॥ ७४<br>ततो मन्दतरं ताभ्यां चक्रं तु भ्रमते पुनः।<br>मृत्पिण्ड इव मध्यस्थो भ्रमतेऽसौ ध्रुवस्तथा॥ ७५<br>मुहूर्तैस्त्रिंशता तावदहोरात्रं ध्रुवो भ्रमन्।<br>उभयोः काष्ठयोर्मध्ये भ्रमते मण्डलानि तु॥ ७६ | अब मण्डलका प्रमाण योजनोंकी गणनामें सुनिये। इसका परिमाण अठारह हजार अट्ठावन योजन बतलाया जाता है। इस मण्डलका व्यास तिरछा जानना चाहिये। सूर्य दिनभर कुम्हारके चाककी तरह नाभिमण्डलपर चक्कर लगाते हैं। सूर्यकी भाँति चन्द्रमा भी वैसा ही भ्रमण करते हैं। उसी प्रकार दक्षिणायनमें भी सूर्य चाककी तरह शीघ्रतापूर्वक चलते हुए उसे पार करते हैं। इसी कारण वे इतनी विस्तृत भूमिको थोड़े ही समयमें पार कर जाते हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य साढ़े तेरह नक्षत्रोंके मण्डलको शीघ्रतापूर्वक मध्यभागसे गुजरते हुए बारह मुहूर्तोंमें पार करते हैं, किंतु रातके समय उन्हीं नक्षत्रोंको पार करनेमें उन्हें अठारह मुहूर्त लगता है। जैसे कुम्हारके चाकके मध्यभागमें स्थित वस्तुकी गति मन्द हो जाती है, वैसे ही उत्तरायणके समय सूर्य मन्दगतिसे चलते हैं। इसी कारण थोड़ी-सी भूमि पार करनेमें उन्हें अधिक समय लगाना पड़ता है। उत्तरायणके समय सूर्य दिनके अठारह मुहूर्तोंमें तेरह नक्षत्रोंके मध्यमें विचरते हैं, किंतु रातमें उन्हीं नक्षत्रोंको पार करनेमें उन्हें बारह मुहूर्त लगते हैं। वह चक्र उन दोनों गतियोंसे मन्दतर गतिमें घूमता है। चाकके मध्यभागमें रखे हुए मृत्पिण्डकी तरह ध्रुव भी उस चक्रके मध्यमें स्थित होकर घूमते रहते हैं। ध्रुव तीस मुहूर्त अर्थात् दिन-रातभरमें दोनों दिशाओंके मध्यवर्ती मण्डलोंमें भ्रमण करते हैं॥ ६७-७६॥ |
| उत्तरक्रमणेऽर्कस्य दिवा मन्दगतिः स्मृता।<br>तस्यैव तु पुनर्नक्तं शीघ्रा सूर्यस्य वै गतिः॥ ७७<br>दक्षिणप्रक्रमे वापि दिवा शीघ्रं विधीयते।<br>गतिः सूर्यस्य वै नक्तं मन्दा चापि विधीयते॥ ७८ | उत्तरायणके समय दिनमें सूर्यकी गति मन्द और रात्रिके समय उन्हीं सूर्यकी गति तेज बतलायी गयी है। उसी तरह दक्षिणायन-कालमें सूर्यकी गति दिनमें तेज और रात्रिमें मन्द कही गयी है। |
| ४३४ | * मत्स्यपुराण * |
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| एवं गतिविशेषेण विभजन् रात्र्यहानि तु।<br>अजवीथ्यां दक्षिणायां लोकालोकस्य चोत्तरम्॥ ७९<br>लोकसंतानतो ह्येष वैश्वानरपथाद् बहिः।<br>व्युष्टिर्यावत्प्रभा सौरी पुष्करात् सम्प्रवर्तते॥ ८०<br>पार्श्वेभ्यो बाह्यतस्तावल्लोकालोकश्च पर्वतः।<br>योजनानां सहस्राणि दशोर्ध्वं चोच्छ्रितो गिरिः॥ ८१<br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च पर्वतः परिमण्डलः।<br>नक्षत्रचन्द्रसूर्याश्च ग्रहास्तारागणैः सह॥ ८२<br>अभ्यन्तरे प्रकाशन्ते लोकालोकस्य वै गिरेः।<br>एतावानेव लोकस्तु निरालोकस्ततः परम्॥ ८३<br>लोक आलोकने धातुर्निरालोकस्त्वलोकता।<br>लोकालोकौ तु संधत्ते तस्मात्सूर्यः परिभ्रमन्॥ ८४<br>तस्मात् संध्येति तामाहुरुषाव्युष्ट्यर्थथान्तरम्।<br>उषा रात्रिः स्मृता विप्रैर्व्युष्टिश्चापि अहःस्मृतम्॥ ८५<br><br>त्रिंशत्कलो मुहूर्तस्तु अहस्ते दश पञ्च च।<br>ह्रासो वृद्धिरहर्भागैर्दिवसानां यथा तु वै॥ ८६<br>संध्यामुहूर्तमात्रायां ह्रासवृद्धी तु ते स्मृते।<br>लेखाप्रभृत्यथादित्ये त्रिमुहूर्तगते तु वै॥ ८७<br>प्रातः स्मृतस्ततः कालो भागांश्चाहुश्च पञ्च च।<br>तस्मात् प्रातर्गतात् कालान्मुहूर्ताः सङ्गवस्त्रयः॥ ८८<br>मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तस्तु तस्मात् कालादनन्तरम्।<br>तस्मान्मध्यंदिनात् कालादपराह्न इति स्मृतः॥ ८९<br>त्रय एव मुहूर्तास्तु काल एष स्मृतो बुधैः।<br>अपराह्नव्यतीताच्च कालः सायं स उच्यते॥ ९०<br>दश पञ्च मुहूर्ताह्नो मुहूर्तास्त्रय एव च।<br>दश पञ्चमुहूर्त्तं वै अहस्तु विषुवे स्मृतम्॥ ९१<br>वर्धयतो ह्रसत्येव अयने दक्षिणोत्तरे।<br>अहस्तु ग्रसते रात्रिं रात्रिस्तु ग्रसते अहः॥ ९२ | इस प्रकार अपनी विशेष गतिसे रात-दिनका विभाजन करते हुए सूर्य दक्षिण दिशामें अजवीथीसे गुजरते हुए लोकालोक पर्वतकी उत्तर दिशामें पहुँचते हैं। वहाँसे लोक-संतानक और वैश्वानर नामक पर्वतोंके बाहरी मार्गसे चलते हुए वे पुष्करद्वीपपर पहुँचते हैं। वहाँ सूर्यकी प्रभातकालिकी प्रभा होती है। इस मार्गके पार्श्वभागमें लोकालोक पर्वत पड़ता है, जो दस हजार योजन ऊँचा है। यह पर्वत मण्डलाकार है और इसका एक भाग प्रकाशयुक्त एवं दूसरा भाग तिमिराच्छन्न रहता है। इस लोकालोक पर्वतके भीतर सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र और तारागणोंके साथ सभी ग्रह प्रकाशित होते हैं। इस प्रकार जहाँतक प्रकाश होता है, उतनेको ही लोक माना गया है और शेष भाग निरालोक (तमसाच्छन्न) है। 'लोकृ' धातुका अर्थ दर्शन अर्थात् आलोकन है, इसलिये जो आलोक दृष्टिथसे दूर है, वह अनालोकता है। सूर्य परिभ्रमण करते हुए जिस समय लोकालोकपर्वत (प्रकाशित और अप्रकाशित प्रदेशकी संधि)-पर पहुँचते हैं, उस समयको संध्या कहते हैं। उषःकाल और व्युष्टिमें अन्तर है। ब्राह्मणोंने उषःकालको रात्रिमें और व्युष्टिको दिनमें परिगणित किया है॥ ७७-८५॥<br><br>तीस कलाका एक मुहूर्त होता है और एक दिनमें पंद्रह मुहूर्त होते हैं। जिस प्रकार अहर्गणके हिसाबसे दिनोंकी ह्रास-वृद्धि होती है, उसी तरह संध्याके मुहूर्तमें भी ह्रास-वृद्धि माने गये हैं। तीन-तीन मुहूर्तोंके हिसाबसे दिनके पाँच भाग माने गये हैं। सूर्योदय होनेके पश्चात् तीन मुहूर्ततकका काल प्रातःकाल कहा जाता है। उस प्रातःकालके व्यतीत होनेपर तीन मुहूर्ततकका समय संगवकाल कहलाता है। उस संगवकालके बाद तीन मुहूर्ततक मध्याह्न नामसे अभिहित होता है। उस मध्याह्नकालके बादका समय अपराह्न कहा जाता है। इसका भी समय विद्वानोंनें तीन मुहूर्त ही माना है। अपराह्नके बीत जानेके बादका काल सायं कहलाता है। इस प्रकार पंद्रह मुहूर्तोंका दिन तीन-तीन मुहूर्तोंके हिसाबसे पाँच भागोंमें विभक्त है। इसी प्रकार (रातमें भी १५ मुहूर्त होती है) दोनों विषुवोंमें (ठीक) पंद्रह मुहूर्तका दिन होता है—शरद् और वसन्त-ऋतुओंके मध्य (मेष-तुलासंक्रान्ति)-का समय विषुव कहलाता है, उत्तरायणमें दिन रात्रिको दक्षिणायनमें रात्रि दिनको |
| * अध्याय १२४ * | ४३५ |
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| शरद्वसन्तयोर्मध्यं विषुवं तु विधीयते।<br>आलोकान्तः स्मृतो लोको लोकाच्चालोक उच्यते॥ ९३<br>लोकपालाः स्थितास्तत्र लोकालोकस्य मध्यतः।<br>चत्वारस्ते महात्मानस्तिष्ठन्त्याभूतसम्प्लवम्॥ ९४<br>सुधामा चैव वैराजः कर्दभश्च प्रजापतिः।<br>हिरण्यरोमा पर्जन्यः केतुमान् राजसश्च सः॥ ९५<br>निर्द्वन्द्वा निरभिमाना निस्तन्द्रा निष्परिग्रहाः।<br>लोकपालाः स्थितास्त्वेते लोकालोके चतुर्दिशम्॥ ९६ | ग्रसती है। जहाँतक सूर्यका प्रकाश पहुँचता है, उसे लोक कहते हैं और उस लोकके बाद जो तमसाच्छन्न प्रदेश है, उसे अलोक कहा जाता है। इसी लोक और अलोकके मध्यमें स्थित (लोकालोक) पर्वतपर चारों लोकपाल महाप्रलयपर्यन्त निवास करते हैं। उनके नाम हैं—वैराज सुधामा, प्रजापति कर्दम, पर्जन्य हिरण्यरोमा और राजस केतुमान्। ये सभी लोकपाल सुख-दुःख आदि द्वन्द्व, अभिमान, आलस्य और परिग्रहसे रहित होकर लोकालोकके चारों दिशाओंमें स्थित हैं॥ ८६—९६॥ | | उत्तरं यदगस्त्यस्य शृङ्गं देवर्षिसेवितम्।<br>पितृयाणः स्मृतः पन्था वैश्वानरपथाद् बहिः॥ ९७<br>तत्रासते प्रजाकामा ऋषयो येऽग्निहोत्रिणः।<br>लोकस्य संतानकराः पितृयाणे पथि स्थिताः॥ ९८<br>भूतारम्भकृतं कर्म आशिषश्च विशाम्पते।<br>प्रारभन्ते लोककामैस्तेषां पन्थाः स दक्षिणः॥ ९९<br>चलितं ते पुनर्धर्मं स्थापयन्ति युगे युगे।<br>संतततपसा चैव मर्यादाभिः श्रुतेन च॥ १००<br>जायमानास्तु पूर्वे वै पश्चिमानां गृहेषु ते।<br>पश्चिमाश्चैव पूर्वेषां जायन्ते निधनेष्विह॥ १०१<br>एवमावर्तमानास्ते वर्तन्त्याभूतसम्प्लवम्।<br>अष्टाशीतिसहस्राणि ऋषीणां गृहमेधिनाम्॥ १०२<br>सवितुर्दक्षिणं मार्गमाश्रित्याभूतसम्प्लवम्।<br>क्रियावतां प्रसङ्ख्यैषा ये श्मशानानि भेजिरे॥ १०३<br>लोकसंव्यवहारार्थं भूतारम्भकृतेन च।<br>इच्छाद्वेषरताच्चैव मैथुनोपगमाच्च वै॥ १०४<br>तथा कामकृतेनेह सेवनाद् विषयस्य च।<br>इत्येतैः कारणैः सिद्धाः श्मशानानीह भेजिरे॥ १०५ | लोकालोक पर्वतका जो उत्तरी शिखर है, वह अगस्त्यशिखर कहलाता है। देवर्षिगण उसका सेवन करते हैं। वह वैश्वानर-मार्गसे बाहर है और पितृयाण-मार्गके नामसे प्रसिद्ध है। उस पितृयाण-मार्गपर प्रजाभिलाषी अग्निहोत्री तथा लोगोंको संतान प्रदान करनेवाले ऋषिगण निवास करते हैं। राजन्! लौकिक कामनाओंसे युक्त वे ऋषिगण अपने आशीर्वादके प्रयोगसे प्राणियोंद्वारा आरम्भ किये गये कर्मको सफल बनाते हैं। उनका मार्ग दक्षिणायनमें है। वे प्रत्येक युगमें अपनी उग्र तपस्या तथा धर्मशास्त्रकी मर्यादाद्वारा मर्यादासे स्खलित हुए धर्मकी पुनः स्थापना करते हैं। इनमें जो पहले उत्पन्न हुए थे, वे अपनेसे पीछे उत्पन्न होनेवालोंके घरोंमें जन्म लेते हैं और पीछे उत्पन्न होनेवाले मृत्युके पश्चात् पूर्वजोंके गृहोंमें चले जाते हैं। इस प्रकार वे प्रलयपर्यन्त आवागमनके चक्करमें पड़े रहते हैं। इन क्रियानिष्ठ गृहस्थ ऋषियोंकी संख्या अठासी हजार है। ये सूर्यके दक्षिण मार्गका आश्रय लेकर प्रलयपर्यन्त स्थित रहते हैं। उन्हें श्मशानकी शरण लेनी पड़ती है अर्थात् ये मृत्युभागी होते हैं। लोक-व्यवहारकी रक्षाके लिये प्राणियोंद्वारा आरम्भ किये गये कर्मोंकी पूर्ति, इच्छा, द्वेषपरता, स्त्री-सहवास तथा स्वेच्छापूर्वक सांसारिक विषयभोगोंका सेवन—इन्हीं कारणोंसे उन ऋषियोंको इस लोकमें सिद्ध होते हुए भी श्मशानमें जाना पड़ता है ॥ ९७—१०५ ॥ | | प्रजैषिणः सप्तर्षयो द्वापरेष्विह जज्ञिरे।<br>संततिं ते जुगुप्सन्ते तस्मान्मृत्युजितस्तु तैः॥ १०६<br>अष्टाशीतिसहस्राणि तेषामप्यूर्ध्वरेतसाम्।<br>उदक्पन्थानमाश्रित्य तिष्ठन्त्याभूतसम्प्लवम्॥ १०७ | द्वापरयुगमें प्रजाभिलाषी सात ऋषि इस मृत्युलोकमें उत्पन्न हुए थे, किंतु आगे चलकर उन्हें संततिसे घृणा हो गयी, जिससे उन्होंने मृत्युको जीत लिया। इन ऊर्ध्वरेता ऋषियोंकी संख्या अठासी हजार है। ये सूर्यके उत्तर मार्गका आश्रय लेकर प्रलयपर्यन्त विद्यमान रहते हैं। |
४३६ * मत्स्यपुराण *
| ते सम्प्रयोगाल्लोकस्य मिथुनस्य च वर्जनात्।<br>ईर्ष्याद्वेषनिवृत्त्या च भूतारम्भविवर्जनात् ॥ १०८<br>ततोऽन्यकामसंयोगशब्दादेर्दोषदर्शनात् ।<br>इत्येतैः कारणैः शुद्धैस्तेऽमृतत्वं हि भेजिरे ॥ १०९<br>आभूतसम्प्लवस्थानममृतत्वं विभाव्यते ।<br>त्रैलोक्यस्थितिकालो हि न पुनर्मार्गगामिनाम् ॥ ११०<br>ब्रह्महत्याश्वमेधाभ्यां पुण्यपापकृतोऽपरम् ।<br>आभूतसम्प्लवान्ते तु क्षीयन्ते चोर्ध्वरेतसः ॥ १११<br>ऊर्ध्वोत्तरमृषिभ्यस्तु ध्रुवो यत्रानुसंस्थितः ।<br>एतद् विष्णुपदं दिव्यं तृतीयं व्योम्नि भास्वरम् ॥ ११२<br>यत्र गत्वा न शोचन्ति तद्विष्णोः परमं पदम् ।<br>धर्मे ध्रुवस्य तिष्ठन्ति ये तु लोकस्य काङ्क्षिणः ॥ ११३ | वे लोक-कल्याणकर्ता, स्त्री-पुरुष-सम्पर्करहित, ईर्ष्या, द्वेष आदिसे निवृत्त, प्राणियोंद्वारा आरम्भ किये गये कर्मोंके त्यागी तथा अन्यान्य कामसम्बन्धी वासनामय शब्दोंमें दोषदर्शी होते हैं। इन शुद्ध कारणोंसे सम्पन्न होनेके कारण उन्हें अमरताकी प्राप्ति हुई। प्रलयपर्यन्त स्थित रहनेवाले नैष्ठिक ऋषियोंका त्रिलोकीकी स्थितितक वर्तमान रहना अमरत्व कहलाता है। यह कामासक्त व्यक्तियोंको नहीं प्राप्त होता। ब्रह्महत्याजन्य पाप और अश्वमेधजन्य पुण्यसे ही इनमें अन्तर आता है। (भाव यह कि जैसे घोर पाप और महान् पुण्य प्रलयपर्यन्त जीवात्माके साथ लगे रहते हैं, बीचमें नष्ट नहीं होते, वैसे ही ऊर्ध्वरेताका शरीर भी तबतक स्थित रहता है।) सप्तर्षिमण्डलके ऊपर उत्तर दिशामें जहाँ ध्रुवका निवास है, वहीं भगवान् विष्णुका तीसरा दिव्य पद स्थित हुआ था, जो (अब भी) आकाशमें उद्भासित होता रहता है। भगवान् विष्णुके उस परमपदको प्राप्त कर लेनेपर जीवोंको शोक नहीं करना पड़ता। इसलिये जिन्हें ध्रुवलोक प्राप्त करनेकी आकाङ्क्षा होती है, वे सदा धर्म-सम्पादनमें ही लगे रहते हैं॥ १०८-११३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे चन्द्रसूर्यभुवनविस्तारो नाम चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें चन्द्र-सूर्य-भुवन-विस्तार नामक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १२४॥
एक सौ पचीसवाँ अध्याय
सूर्यकी गति और उनके रथका वर्णन
| एवं श्रुत्वा कथां दिव्याम्बुवाँल्लोमहर्षणिम्।<br>सूर्यचन्द्रमसोश्चारं ग्रहाणां चैव सर्वशः ॥ १ | इस प्रकार सूर्य और चन्द्रमाकी गति तथा सभी ग्रहोंके गतिचारकी सारी दिव्य कथाको सुनकर शौनकादि ऋषिगण लोमहर्षणके पुत्र सूतजीसे बोले ॥ १॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>भ्रमन्ति कथमेतानि ज्योतींषि रविमण्डले।<br>अव्यूहेनैव सर्वाणि तथा चासंकरेण वा ॥ २<br>कश्च भ्रामयते तानि भ्रमन्ति यदि वा स्वयम्।<br>एतद् वेदितुमिच्छामस्ततो निगद सत्तम ॥ ३ | ऋषियोंने पूछा — वक्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी ! ये ग्रह, नक्षत्र आदि ज्योतिर्गण तिर्यग्व्यूहमें निबद्ध हो सूर्यमण्डलमें किस प्रकार घूमते हैं? ये सभी परस्पर मिलकर घूमते हैं अथवा पृथक्-पृथक्? इन्हें कोई घुमाता है या ये स्वयं घूमते हैं? हमें इस रहस्यको जाननेकी विशेष उत्कण्ठा है, अतः आप इसका वर्णन कीजिये ॥२-३॥ |
| सूत उवाच<br>भूतसम्मोहनं ह्येतद् ब्रुवतो मे निबोधत।<br>प्रत्यक्षमपि दृश्यं तत् सम्मोहयति वै प्रजाः ॥ ४ | सूतजी कहते हैं — ऋषियो! यह विषय प्राणियोंको मोहमें डाल देनेवाला है; क्योंकि यह प्रत्यक्षरूपसे दृश्य होनेपर भी प्रजाओंको मोहित कर देता है। मैं इसका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये! |
| * अध्याय १२५ * | ४३७ |
|---|---|
| योऽसौ चतुर्दशर्क्षेषु शिशुमारो व्यवस्थितः।<br>उत्तानपादपुत्रोऽसौ मेढीभूतो ध्रुवो दिवि॥ ५<br>सैष भ्रमन् भ्रामयते चन्द्रादित्यौ ग्रहैः सह।<br>भ्रमन्तमनुसर्पन्ति नक्षत्राणि च चक्रवत्॥ ६<br>ध्रुवस्य मनसा यो वै भ्रमते ज्योतिषां गणः।<br>वातानीकमयैर्बन्धैर्ध्रुवे बद्धः प्रसर्पति॥ ७<br>तेषां भेदाश्च योगश्च तथा कालस्य निश्चयः।<br>अस्तोदयास्तथोत्पाता अयने दक्षिणोत्तरे॥ ८<br>विषुवद्ग्रहवर्णश्च सर्वमेतद् ध्रुवेरितम्।<br>जीमूता नाम ते मेघा यदेभ्यो जीवसम्भवः॥ ९<br>द्वितीय आवहन् वायुर्मेघास्ते त्वभिसंश्रिताः।<br>इतो योजनमात्राच्च अध्यर्धविकृता अपि॥ १०<br>वृष्टिसर्गस्तथा तेषां धारासारः प्रकीर्तितः।<br>पुष्करावर्तका नाम ते मेघाः पक्षसम्भवाः॥ ११<br>शक्रेण पक्षाश्छिन्ना वै पर्वतानां महौजसा।<br>कामगानां समृद्धानां भूतानां नाशमिच्छताम्॥ १२<br>पुष्करा नाम ते पक्षा बृहन्तस्तोयधारिणः।<br>पुष्करावर्तका नाम कारणेनेह शब्दिताः॥ १३<br>नानारूपधराश्चैव महाघोरस्वराश्च ते।<br>कल्पान्तवृष्टिकर्तारः कल्पान्ताग्नेर्नियामकाः॥ १४<br>वाय्वाधारा वहन्ते वै सामृताः कल्पसाधकाः।<br>यान्यस्याण्डस्य भिन्नस्य प्राकृतान्यभवंस्तदा॥ १५<br>यस्मिन् ब्रह्मा समुत्पन्नश्चतुर्वक्त्रः स्वयं प्रभुः।<br>तान्येवाण्डकपालानि सर्वे मेघाः प्रकीर्तिताः॥ १६<br>तेषामाप्यायनं धूमः सर्वेषामविशेषतः।<br>तेषां श्रेष्ठश्च पर्जन्यश्चत्वारश्चैव दिग्गजाः॥ १७<br>गजानां पर्वतानां च मेघानां भोगिभिः सह।<br>कुलमेकं द्विधाभूतं योनिरेका जलं स्मृतम्॥ १८ | आकाशमण्डलमें जो यह (चौदह) नक्षत्रोंके मध्यमें स्थित शिशुमार¹ नामक चक्र है वही उत्तानपादका पुत्र ध्रुव है, जो (उस चक्रमें) मेंढीके² समान है। वह ध्रुव स्वयं भ्रमण करता हुआ ग्रहोंके साथ सूर्य और चन्द्रमाको भी घुमाता है। नक्षत्रगण भी चक्रकी भाँति घूमते हुए ध्रुवके पीछे-पीछे चलते हैं। जो ज्योतिर्गण वायुमय बन्धनोंद्वारा ध्रुवमें निबद्ध है, वह ध्रुवके मानसिक संकल्पसे ही घूमता है। उन ज्योतिर्गणोंके भेद, योग, कालका निश्चय, अस्त, उदय, उत्पात, उत्तरायण एवं दक्षिणायनमें गमन, विषुवत् रेखापर स्थिति और ग्रहोंके वर्ण आदि सभी कार्य ध्रुवकी प्रेरणासे होते हैं। (भगणके नीचे मेघ हैं।) जिनसे जीवोंकी उत्पत्ति होती है, उन मेघोंको जीमूत कहते हैं। वे मेघ यहाँसे एक योजन दूर आवह नामक दूसरी वायुके आश्रयपर टिके हुए हैं। उनमें कुछ विकार उत्पन्न हो जानेपर वे ही वृष्टि करते हैं, जो महावृष्टि कही जाती है। पूर्वकालमें महान् ओजस्वी इन्द्रने प्राणियोंके कल्याणकी भावनासे स्वच्छन्दचारी एवं समृद्धिशाली पर्वतोंके पंखोंको काट डाला था। उन पंखोंसे उत्पन्न हुए मेघोंको पुष्करावर्तक कहते हैं। पर्वतोंके पंखोंका नाम पुष्कर था, वे बहुत बड़े-बड़े और जलसे भी परिपूर्ण थे, इसी कारण वे मेघ भी पुष्करावर्तक नामसे कहे गये हैं। ये अनेकों प्रकारके रूप धारण करनेवाले, महान् भयंकर गर्जनासे युक्त, कल्पान्तके समय वृष्टि करनेवाले, कल्पान्तकी अग्निके प्रशामक, अमृतयुक्त और कल्प अर्थात् प्रलयके साधक हैं॥ ४-१४॥<br><br>वे वायुके आधारपर चलते-फिरते हैं। इस अण्डके विदीर्ण होनेपर उससे जो प्राकृतिक कपाल निकले थे और जिसमें सामर्थ्यशाली स्वयं चतुर्मुख ब्रह्मा उत्पन्न हुए थे, उन्हीं अण्डकपालोंको सभी मेघोंके रूपमें बतलाया जाता है। उन सभी मेघोंको समानरूपसे तृप्त करनेवाला धूम है। उनमें पर्जन्य नामक मेघ सबसे श्रेष्ठ है। इसके अतिरिक्त ऐरावत, वामन, अञ्जन आदि चार दिग्गज हैं। हाथी, पर्वत, मेघ और सर्प—इन सबका कुल एक है जो दो भागोंमें विभक्त हो गया है; परंतु इनकी योनि (उत्पत्ति-स्थान) एक ही है, जो जल नामसे कही जाती |
१. शिशुमार (सूँस) एक जलीय जन्तु होता है, जो प्रायः सर्पवत् वृत्ताकार कुण्डल (गेंडुर) मारकर स्थित रहता है। उसके समान स्थितिको 'शिशुमार' चक्र कहते हैं। उसीके समान गोल होनेसे नक्षत्रमण्डलकी उससे उपमा दी गयी है।
२. दौरीके केन्द्रमें स्थित खम्भेको मेंढ़ी कहते हैं। उसके आश्रयपर कई बैल चलकर अन्नकणोंको रौंदते हैं। इस सम्बन्धमें विशेष जानकारीके लिये श्रीमद्भागवत तथा विष्णुपुराण देखना चाहिये।
१२७- ग्रहोंके रथका वर्णन और ध्रुवकी प्रशंसा
| ४३८ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| पर्जन्यो दिग्गजाश्चैव हेमन्ते शीतसम्भवम्।<br>तुषारवर्षं वर्षन्ति वृद्धा ह्यन्नविवृद्धये॥ १९<br>षष्ठः परिवहो नाम वायुस्तेषां परायणः।<br>योऽसौ बिभर्ति भगवान् गङ्गामाकाशगोचराम्॥ २०<br>दिव्यामृतजलां पुण्यां त्रिपथामिति विश्रुताम्।<br>तस्या विस्पन्दितं तोयं दिग्गजाः पृथुभिः करैः॥ २१<br>शीकरान् सम्प्रमुञ्चन्ति नीहार इति स स्मृतः।<br>दक्षिणेन गिरेर्योऽसौ हेमकूट इति स्मृतः॥ २२<br>उदङ् हिमवतः शैलस्योत्तरे चैव दक्षिणे।<br>पुण्ड्रं नाम समाख्यातं नगरं तत्र वै स्मृतम्॥ २३<br>तस्मिन् प्रवर्तते वर्षं तत् तुषारसमुद्भवम्।<br>ततो हिमवतो वायुर्हिमं तत्र समुद्भवम्॥ २४<br>आनयत्यात्मवेगेन सिञ्चमानो महागिरिम्।<br>हिमवन्तमतिक्रम्य वृष्टिशेषं ततः परम्॥ २५<br>इभास्ये च ततः पश्चादिदं भूतविवृद्धये।<br>वर्षद्वयं समाख्यातं सम्यग् वृष्टिविवृद्धये॥ २६<br>मेघाश्चाप्यायनं चैव सर्वमेतत् प्रकीर्तितम्।<br>सूर्य एव तु वृष्टीनां स्रष्टा समुपदिश्यते॥ २७<br>वर्षं घर्मं हिमं रात्रिं संध्ये चैव दिनं तथा।<br>शुभाशुभफलानीह ध्रुवात् सर्वं प्रवर्तते॥ २८<br>ध्रुवेणाधिष्ठिताश्चापः सूर्यो संगृह्य तिष्ठति।<br>सर्वभूतशरीरेषु त्वापो ह्यानुश्रिताश्च याः॥ २९<br>दह्यमानेषु तेष्वेह जङ्गमस्थावरेषु च।<br>धूमभूतास्तु ता ह्यापो निष्क्रमन्तीह सर्वशः॥ ३०<br>तेन चाभ्राणि जायन्ते स्थानमभ्रमयं स्मृतम्।<br>तेजोभिः सर्वलोकेभ्य आदत्ते रश्मिभिर्जलम्॥ ३१<br>समुद्राद् वायुसंयोगाद् वहन्त्यापो गभस्तयः।<br>ततस्त्वृतुवशात्काले परिवर्तन् दिवाकरः॥ ३२<br>नियच्छत्यापो मेघेभ्यः शुक्लाः शुक्लैस्तु रश्मिभिः।<br>अभ्रस्थाः प्रपतन्त्यापो वायुना समुदीरिताः॥ ३३<br>ततो वर्षति षण्मासान् सर्वभूतविवृद्धये।<br>वायुभिः स्तनितं चैव विद्युतस्त्वग्निजाः स्मृताः॥ ३४ | है। पर्जन्य मेघ और चारों वृद्ध दिग्गज हेमन्त-ऋतुमें अन्नकी वृद्धिके लिये शीतसे उत्पन्न हुए तुषारकी वर्षा करते हैं। परिवह नामक छठी वायु इनका आश्रय है। यह ऐश्वर्यशाली पवन आकाशगामिनी गङ्गाको, जो दिव्य अमृतरूपी जलसे परिपूर्ण, पुण्यमयी तथा त्रिपथगा नामसे विख्यात हैं, धारण करता है, गङ्गासे निकले हुए जलको दिग्गज अपने मोटे-मोटे शुण्डोंसे फुहारेके रूपमें छोड़ते हैं। उसे नीहार (कुहासा) कहते हैं। दक्षिण पार्श्वमें जो पर्वत है, वह हेमकूट नामसे प्रसिद्ध है। वह हिमालय पर्वतके उत्तर और दक्षिण—दोनों दिशाओंमें फैला हुआ है। वहाँ पुण्ड्र नामक एक प्रसिद्ध नगर है। उसी नगरमें वह तुषारसे उत्पन्न हुई वर्षा होती है। तदनन्तर हिमवान् पर्वतसे उद्भूत हुई वायु वहाँ उत्पन्न हुए शीकरों को अपने साथ ले आती है और बड़े वेगसे उस महान् गिरिको सींचती हुई उसका अतिक्रमण करके इभास्य नामक वर्षमें निकल जाती है। तत्पश्चात् प्राणियोंकी वृद्धिके लिये वहाँ शेष वृष्टि होती है। पहले जिन दो वर्षोंका वर्णन किया गया है, उनमें अच्छी तरह वृष्टि होती है। इस प्रकार मैंने मेघों तथा उनसे उत्पन्न हुई सारी वृष्टिका वर्णन कर दिया॥ १५—२६ १/२॥<br><br>सूर्य ही सब प्रकारकी वृष्टियोंके मूल कारण कहे जाते हैं। इस लोकमें वर्षा, धूप, हिम, रात्रि, दिन, दोनों संध्याएँ और शुभ एवं अशुभ कर्मोंके फल ध्रुवसे प्रवर्तित होते हैं। ध्रुवद्वारा अधिष्ठित जलको सूर्य ग्रहण करते हैं। जल सभी प्राणियोंके शरीरोंमें परमाणुरूपसे स्थित है। इसी कारण स्थावर-जङ्गम सभी प्राणियोंके शरीरोंके जलाये जानेपर उनमेंसे वह जल धुएँके रूपमें बाहर निकलता है। उसी धूमसे बादल बनते हैं, इसलिये धूमको अभ्रमय स्थान कहा जाता है। सूर्य अपनी तेजोमयी किरणोंद्वारा सभी लोक (स्थानों)-से जल ग्रहण करते हैं। इसी प्रकार वे ही किरणें वायुके संयोगसे समुद्रसे भी जल खींचती हैं। तदनन्तर सूर्य ऋतुओंके अनुसार समय-समयपर जलको परिवर्तित कर अपनी श्वेत किरणोंद्वारा वह शुद्ध जल मेघोंको देते हैं। तब वायुद्वारा प्रेरित हुआ वह मेघस्थित जल वर्षके रूपमें भूतलपर गिरता है। इस प्रकार सूर्य सभी प्राणियोंकी समृद्धिके निमित्त छः महीनेतक वर्षा करते हैं। उस समय वायुके आघातसे मेघ-निर्घोष भी होता है। (बिजली भी चमकती है।) ये बिजलियाँ अग्निसे प्रादुर्भूत बतलायी जाती हैं। |
* अध्याय १२५ * <span style="float: right;">४३९</span>
| मेहनाच्च मिहेर्धार्तोर्मेघत्वं व्यञ्जयन्ति च।<br>न भ्रश्यन्ते ततो ह्यापस्तस्मादब्भ्रस्य वै स्थितिः।<br>स्रष्टासौ वृष्टिसर्गस्य ध्रुवेणाधिष्ठितो रविः॥ ३५<br><br>ध्रुवेणाधिष्ठितो वायुर्वृष्टिं संहरते पुनः।<br>ग्रहात्रिवृत्त्या सूर्यात्तु चरते ऋक्षमण्डलम्॥ ३६<br><br>चारस्यान्ते विशत्यर्कं ध्रुवेण समधिष्ठितम्।<br>अतः सूर्यरथस्यापि सन्निवेशं प्रचक्षते।<br>स्थितेन त्वेकचक्रेण पञ्चारेण त्रिणाभिना॥ ३७ | 'मिह सेचने' अर्थात् 'मिह' धातु सेचन अथवा मेहनके अर्थमें प्रयुक्त होती है, इसलिये 'मिह'—धातुसे मेघ शब्द निष्पन्न होता है। इसी प्रकार 'अपो विभ्रति' या 'न भ्रश्यन्ते आपो यस्मात्' जिससे जल नहीं गिरते, उसे अब्भ्र या अभ्र कहते हैं। इस तरह ध्रुवद्वारा अधिकृत सूर्य वृष्टिसर्गकी सृष्टि करते हैं। पुनः ध्रुवद्वारा नियुक्त वायु उस वृष्टिका संहार करती है। नक्षत्रमण्डल सूर्यमण्डलसे निवृत्त होकर विचरण करता है और जब विचरण समाप्त हो जाता है, तब ध्रुवद्वारा अधिष्ठित सूर्यमें प्रविष्ट हो जाता है॥ २७—३६ १/२॥ |
| हिरण्मयेनाणुना वै अष्टचक्रैकनेमिना।<br>चक्रेण भास्वता सूर्यः स्यन्दनेन प्रसर्पिणा॥ ३८<br><br>शतयोजनसाहस्रो विस्तारायाम उच्यते।<br>द्विगुणश्च रथो पस्थादीषादण्डः प्रमाणतः॥ ३९<br><br>स तस्य ब्रह्मणा सृष्टो रथो ह्यर्थवशेन तु।<br>असङ्गः काञ्चनो दिव्यो युक्तः पवनगैर्हयैः॥ ४०<br><br>छन्दोभिर्वाजिरूपैस्तैर्यथाचक्रं समास्थितैः।<br>वारुणस्य रथस्येह लक्षणैः सदृशश्च सः॥ ४१<br><br>तेनासौ चरति व्योम्नि भास्वाननुदिनं दिवि।<br>अथाङ्गानि तु सूर्यस्य प्रत्यङ्गानि रथस्य च।<br>संवत्सरस्यावयवैः कल्पितानि यथाक्रमम्॥ ४२<br><br>अहर्नाभिस्तु सूर्यस्य एकचक्रस्य वै स्मृतः।<br>अराः संवत्सरास्तस्य नेम्यः षडृतवः स्मृताः॥ ४३<br><br>रात्रिर्रवरूथो घर्मश्च ध्वज ऊर्ध्वं व्यवस्थितः।<br>अक्षकोट्योर्युगान्यस्य आर्तवाहाः कलाः स्मृताः॥ ४४<br><br>तस्य काष्ठा स्मृता घोणा दन्तपङ्क्तिः क्षणास्तु वै।<br>निमेषश्चानुकर्षोऽस्य ईषा चास्य कला स्मृता॥ ४५<br><br>युगाक्षकोटी ते तस्य अर्थकामावुभौ स्मृतौ।<br>सप्ताश्वरूपपाश्छन्दांसि वहन्ते वायुरांहसा॥ ४६ | इसके बाद अब सूर्यके रथकी रचना बतलायी जाती है। उसमें एक पहिया, पाँच अरे (अरगजे) और तीन नाभियाँ हैं। उस चक्रकी नेमि (घेरे)-में स्वर्णमयी आठ छोटी-छोटी पुट्ठियाँ लगी हैं। ऐसे उद्दीप्त एवं शीघ्रगामी रथपर बैठकर सूर्य विचरण करते हैं। उस रथकी लम्बाई एक लाख योजन बतलायी जाती है। उसका ईषादण्ड (हरसा) रथके उपस्थ (मध्यभाग)-से प्रमाणमें दुगुना है। ब्रह्माने किसी मुख्य प्रयोजनवश उस रथका निर्माण किया था। उसका असङ्ग (वह रस्सी, जिससे घोड़े रथमें बँधे रहते हैं) दिव्य एवं स्वर्णमय है। उसमें पवनके समान शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए हैं। चक्रके अनुकूल चलनेवाले छन्द ही उन घोड़ोंके रूपमें उपस्थित होते हैं। वह रथ वरुणके रथके लक्षणोंसे मिलता-जुलता-सा है। उसी रथसे सूर्य प्रतिदिन गगन-मण्डलमें विचरते हैं। सूर्यके अङ्गों तथा रथके अवयवोंकी समतामें क्रमशः कल्पना की गयी है। दिनको सूर्यके एक पहियेवाले रथकी नाभि कहा जाता है। वर्ष उसके अरे और छहों ऋतुएँ उसकी नेमि कहलाती हैं। रात्रि उसका वरूथ (कवच, बख्तर) और धूप ऊपर फहरानेवाला ध्वज है। चारों युग इसके धुरेके दोनों छोर हैं और कलाएँ आर्तवाह कही गयी हैं। काष्ठा उसकी नासिका तथा क्षण उसके दाँतोंकी पङ्क्तियाँ हैं। निमेषको इसका अनुकर्ष (रथका तला) और कलाको ईषा (हरसा) कहते हैं। उनके जुएके दोनों छोर अर्थ और काम कहलाते हैं॥ ३७—४५ १/२॥ |
| गायत्री चैव त्रिष्टुप् च जगत्यनुष्टुप्तथैव च।<br>पङ्क्तिश्च बृहती चैव उष्णिगेव तु सप्तमः॥ ४७ | गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पङ्क्ति, बृहती और उष्णिक्—ये सातों छन्द सातों घोड़ोंके रूपमें हैं, जो वायु-वेगसे रथको वहन करते हैं। |
१२८- देव-गृहों तथा सूर्य-चन्द्रमाकी गतिका वर्णन
४४० * मत्स्यपुराण *
| चक्रमक्षे निबद्धं तु ध्रुवे चाक्षः समर्पितः।<br>सहचक्रो भ्रमत्यक्षः सहाक्षो भ्रमति ध्रुवः॥ ४८<br>अक्षः सहैव चक्रेण भ्रमतेऽसौ ध्रुवेरितः।<br>एवमर्थवशात् तस्य सन्निवेशो रथस्य तु॥ ४९<br>तथा संयोगभागेन सिद्धो वै भास्करो रथः।<br>तेनाऽसौ तरणिर्देवो नभसः सर्पते दिवम्॥ ५०<br>युगाक्षकोटी ते तस्य दक्षिणे स्यन्दनस्य तु।<br>भ्रमतो भ्रमतो रश्मी तौ चक्रयुगयोस्तु वै॥ ५१<br>मण्डलानि भ्रमेतेऽस्य खेचरस्य रथस्य तु।<br>कुलालचक्रभ्रमवन्मण्डलं सर्वतोदिशम्॥ ५२<br>युगाक्षकोटी ते तस्य वातोर्मी स्यन्दनस्य तु।<br>संक्रमते ध्रुवमहो मण्डले सर्वतोदिशम्॥ ५३<br>भ्रमतस्तस्य रश्मी ते मण्डले तूत्तरायणे।<br>वर्धते दक्षिणेष्ष्वत्र भ्रमतो मण्डलानि तु॥ ५४<br>युगाक्षकोटी सम्बद्धौ द्वे रश्मी स्यन्दनस्य ते।<br>ध्रुवेण प्रगृहीतौ तौ रश्मी धारयता रविम्॥ ५५<br>आकृष्येते यदा ते तु ध्रुवेण समधिष्ठिते।<br>तदा सोऽभ्यन्तरे सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु॥ ५६<br>अशीतिमण्डलशतं काष्ठयोरुभयोश्चरन्।<br>ध्रुवेण मुच्यमानेन पुना रश्मियुगेन च॥ ५७<br>तथैव बाह्यतः सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु।<br>उद्वेष्टयन् वै वेगेन मण्डलानि तु गच्छति॥ ५८ | इस रथका चक्र अक्षमें बँधा हुआ है और वह अक्ष ध्रुवसे संलग्न है। इसलिये चक्रके साथ अक्ष और अक्षके साथ ध्रुव घूमता रहता है। इस प्रकार ध्रुवद्वारा प्रेरित अक्ष चक्रके साथ ही घूमता है। किसी मुख्य प्रयोजनवश ब्रह्माने इस रथका निर्माण किया है तथा इस प्रकारके अवयवोंके संयोगसे यह सूर्यका रथ सिद्ध हुआ है। इसी रथसे सूर्यदेव आकाशमण्डलमें भ्रमण करते हैं। उस रथके जुए और धुरेके छोर दाहिनी ओरसे घूमते हैं। जब वह रथ आकाशमें मण्डलाकार घूमता है, उस समय उसकी किरणें भी मण्डलाकार घूमती-सी दीख पड़ती हैं। यह मण्डल कुम्हारके चाककी भाँति चारों दिशाओंमें घूमता है। उस रथकी दोनों युगाक्षकोटि और वातोर्मिके चारों दिशाओंमें मण्डलाकार घूमते समय उस रथकी किरणें बढ़ जाती हैं और दक्षिणायनमें घट जाती हैं। वे दोनों किरणें रथकी युगाक्षकोटिमें बँधी हुई हैं और वे ध्रुवमें निबद्ध हैं। ये सूर्यसे भी सम्बद्ध हैं। ध्रुव जब उन दोनों किरणोंको खींचते हैं, तब सूर्य मण्डलके अन्तर्गत ही भ्रमण करते हैं। उस समय सूर्य दोनों दिशाओंके एक सौ अस्सी मण्डलोंमें चक्कर लगाते हैं। पुनः जब ध्रुव दोनों किरणोंको छोड़ देते हैं, तब सूर्य मण्डलोंके बाह्य भागमें घूमने लगते हैं। उस समय वे मण्डलोंको उद्वेष्टित करते हुए बड़े वेगसे चलते हैं॥ ४६—५८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भुवनकोश सूर्याचन्द्रमसोश्चारो नाम पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें सूर्य-चन्द्रमाकी गति नामक एक सौ पचीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२५॥
एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय
सूर्य-रथ* पर प्रत्येक मासमें भिन्न-भिन्न देवताओंका अधिरोहण तथा चन्द्रमाकी विचित्र गति
| सूत उवाच<br>स रथोऽधिष्ठितो देवैर्मासि मासि यथाक्रमम्।<br>ततो वहत्यथादित्यं बहुभिर्ऋषिभिः सह॥ १<br>गन्धर्वरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः।<br>एते वसन्ति वै सूर्ये मासौ द्वौ द्वौ क्रमेण च॥ २ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! सूर्यका वह रथ प्रत्येक मासमें क्रमशः देवताओंद्वारा अधिष्ठित रहता है। इस प्रकार वह बहुत-से ऋषियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणियों, सर्पों और राक्षसोंके साथ सूर्यको वहन करता है। ये सभी देवगण दो-दो मासके क्रमसे सूर्यके निकट |
* यह विषय भी भागवत स्कन्ध १२, अ० ११, वायुपुराण अ० ५२ तथा अन्य विष्णु आदि सभी पुराणोंमें स्वल्पान्तरसे प्राप्त होता है।