भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४२४* मत्स्यपुराण *

| कुमुदं तूत्तरे तस्य द्वितीयं वर्षमुत्तमम्।<br>एतौ जनपदौ द्वौ तु गोमेदस्य तु विस्तृतौ॥ ११ | तथा इसके उत्तरार्ध भागमें कुमुद नामक दूसरा श्रेष्ठ वर्ष है। गोमेदक द्वीपके ये दोनों प्रदेश अत्यन्त विस्तृत माने जाते हैं॥१-११॥ | | इतः परं प्रवक्ष्यामि सप्तमं द्वीपमुत्तमम्।<br>समुद्रेक्षुरसं चैव गोमेदाद् द्विगुणं हि सः॥ १२<br>आवृत्य तिष्ठति द्वीपः पुष्करः पुष्करैर्वृतः।<br>पुष्करेण वृतः श्रीमांश्चित्रसानुर्महागिरिः॥ १३<br>कूटैश्चित्रैर्मणिमयैः शिलाजालसमुद्भवैः।<br>द्वीपस्यैव तु पूर्वार्धे चित्रसानुः स्थितो महान्॥ १४<br>परिमण्डलसहस्राणि विस्तीर्णः सप्तविंशतिः।<br>ऊर्ध्वं स वै चतुर्विंशद् योजनानां महाचलः॥ १५<br>द्वीपार्धस्य परिक्षिसः पश्चिमे मानसो गिरिः।<br>स्थितो वेलासमीपे तु पूर्वचन्द्र इवोदितः॥ १६<br>योजनानां सहस्राणि सार्धं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>तस्य पुत्रो महावीतः पश्चिमार्धस्य रक्षिता॥ १७<br>पूर्वार्धे पर्वतस्यापि द्विधा देशस्तु स स्मृतः।<br>स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः॥ १८<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव गोमेदाद् द्विगुणेन तु।<br>त्रिंशद्वर्षसहस्राणि तेषु जीवन्ति मानवाः॥ १९<br>विपर्ययो न तेष्वस्ति एतत् स्वाभाविकं स्मृतम्।<br>आरोग्यं सुखबाहुल्यं मानसीं सिद्धिमास्थिताः॥ २० | इसके बाद अब मैं सातवें सर्वोत्तम द्वीपका वर्णन कर रहा हूँ, जो पुष्करों (कमलों)-से व्याप्त होनेके कारण पुष्कर नामसे प्रसिद्ध है। यह परिमाणमें गोमेदकद्वीपसे दुगुना है और इक्षुरसोदक-सागरको घेरकर स्थित है। पुष्करद्वीपमें चित्रसानु (विचित्र शिखरोंवाला) नामक शोभाशाली महान् पर्वत है। यह अनेकों चित्र-विचित्र मणिमय शिखरों तथा शिलासमूहोंसे सुशोभित है। यह महान् पर्वत चित्रसानु द्वीपके पूर्वार्ध भागमें स्थित है। यह महान् गिरि सत्ताईस योजन विस्तृत और चौबीस योजन ऊँचा है। इस द्वीपके पश्चिमार्ध भागमें समुद्रतटपर मानस नामक पर्वत स्थित है, जो पूर्व दिशामें निकले हुए चन्द्रमाके समान शोभायमान है। यह साढ़े पचास हजार योजन ऊँचा है। मानस पर्वतके पूर्वार्धमें स्थित रहते हुए भी इसका पुत्र महावीत नामक पर्वत द्वीपके पश्चिमार्ध भागकी रक्षा करता है। इस प्रकार वह प्रदेश दो भागोंमें विभक्त कहा जाता है। पुष्करद्वीप स्वादिष्ट जलवाले महासागरसे घिरा हुआ है। यह विस्तार एवं मण्डल (घेराव)-में गोमेदक द्वीपसे दुगुना है। इस द्वीपके अन्तःस्थित प्रदेशोंके मानव तीस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। उनमें वृद्धावस्थाका प्रवेश नहीं होता। वे स्वाभाविक रूपसे युवावस्था, नीरोगता, अत्यधिक सुख और मानसी सिद्धिसे युक्त होते हैं॥१२-२०॥ | | सुखमायुश्च रूपं च त्रिषु द्वीपेषु सर्वशः।<br>अधमोत्तमौ न तेष्वास्तां तुल्यास्ते वीर्यरूपतः॥ २१<br>न तत्र वध्यवधकौ नेर्ष्यासूया भयं तथा।<br>न लोभो न च दम्भो वा न च द्वेषः परिग्रहः॥ २२<br>सत्यानृते न तेष्वास्तां धर्माधर्मौ तथैव च।<br>वर्णाश्रमाणां वार्ता च पाशुपाल्यं वणिक् कृषिः॥ २३<br>त्रयीविद्या दण्डनीतिः शुश्रूषा दण्ड एव च।<br>न तत्र वर्षं नद्यो वा शीतोष्णं न च विद्यते॥ २४<br>उद्भिदान्युदकानि स्युर्गिरिप्रस्रवणानि च।<br>तुल्योत्तरकुरुणां तु कालस्तत्र तु सर्वदा॥ २५ | तीनों द्वीपोंमें सर्वत्र सुख, दीर्घायु और सुन्दर रूपकी सुलभता रहती है। उनमें ऊँच-नीचका भाव नहीं होता। पराक्रम और रूपकी दृष्टिसे वे एकतुल्य होते हैं। उनमें न कोई वध करनेयोग्य होता है और न मारनेवाला ही पाया जाता है। उनमें ईर्ष्या, असूया, भय, लोभ, दम्भ, द्वेष और संग्रहका नामतक नहीं है। उनमें सत्य-असत्य एवं धर्म-अधर्मका विवाद, वर्णाश्रमकी चर्चा, पशुपालन, व्यवसाय, खेती, त्रयीविद्या, दण्डनीति (शत्रुओं या अपराधियोंको दण्ड देकर वशमें करनेकी नीति), नौकरी और परस्पर दण्ड-विधान भी नहीं पाया जाता। वहाँ न तो वर्षा होती है, न नदियाँ ही हैं तथा सर्दी-गरमी भी नहीं पड़ती। पर्वतोंसे टपकते हुए जल ही अन्न और जलका काम पूरा करते हैं। वहाँ सर्वदा उत्तरकुरु देशके सदृश समय |