मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १२३ * | ४२५ |
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| सर्वतः सुखकालोऽसौ जराक्लेशविवर्जितः ।<br>सर्गस्तु धातकीखण्डे महावीते तथैव च ॥ २६<br><br>एवं द्वीपाः समुद्रैस्तु समं समभिरावृताः ।<br>द्वीपस्यानन्तरो यस्तु समुद्रस्तत्समस्तु वै ॥ २७<br><br>एवं द्वीपसमुद्राणां वृद्धिर्ज्ञेया परस्परम् ।<br>अपां चैव समुद्रेकात् समुद्र इति संज्ञितः ॥ २८<br><br>ऋषद्वसन्त्यो वर्षेषु प्रजा यत्र चतुर्विधाः ।<br>ऋषिरित्येष गमने वर्ष त्वेतेन तेषु वै ॥ २९<br><br>उदयतीन्दौ पूर्वे तु समुद्रः पूर्यते सदा ।<br>प्रक्षीयमाणे बहुले क्षीयतेऽस्तमिते च वै ॥ ३०<br><br>आपूर्यमाणो ह्युदधिरात्मनैवाभिपूर्थ्यते ।<br>ततो वै क्षीयमाणे तु स्वात्मन्येव ह्यपां क्षयः ॥ ३१<br><br>उदयात् पयसां योगात् पुष्णन्त्यापो यथा स्वयम् ।<br>तथा स तु समुद्रोऽपि वर्धते शशिनोदये ॥ ३२<br><br>अन्यूनानतिरिक्तात्मा वर्धन्त्यापो ह्रसन्ति च ।<br>उदयेऽस्तमये चेन्दोः पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः ॥ ३३<br><br>क्षयवृद्धी समुद्रस्य शशिवृद्धिक्षये तथा ।<br>दशोत्तराणि पञ्चाहुरङ्गुलानां शतानि च ॥ ३४<br><br>अपां वृद्धिः क्षयो दृष्टः समुद्राणां तु पर्वसु ।<br>द्विरापत्त्वात् स्मृतो द्वीपो दधनाच्चोदधिः स्मृतः ॥ ३५<br><br>निगीर्णत्वाच्च गिरयो पर्वबन्धाच्च पर्वताः ।<br>शाकद्वीपे तु वै शाकः पर्वतस्तेन चोच्यते ॥ ३६<br><br>कुशद्वीपे कुशस्तम्बो मध्ये जनपदस्य तु ।<br>क्रौञ्चद्वीपे गिरिः क्रौञ्चस्तस्य नाम्ना निगद्यते ॥ ३७<br><br>शाल्मलिः शाल्मलद्वीपे पूज्यते स महाद्रुमः ।<br>गोमेदके तु गोमेदः पर्वतस्तेन चोच्यते ॥ ३८<br><br>न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः ।<br>पूज्यते स महादेवैर्ब्रह्मांशोऽव्यक्तसम्भवः ॥ ३९ | बना रहता है। वहाँ सब लोग सर्वत्र वृद्धावस्थाके कष्टसे रहित सुखमय समय व्यतीत करते हैं। यही स्थिति धातकीखण्ड तथा महावीत—दोनों प्रदेशोंमें पायी जाती है। इस प्रकार सातों द्वीप पृथक्-पृथक् सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। जो समुद्र जिस द्वीपके बाद पड़ता है, वह परिमाणमें उसी द्वीपके बराबर माना गया है। इस प्रकार द्वीपों और समुद्रोंकी परस्पर वृद्धि समझनी चाहिये। जलकी सम्यक् प्रकारसे वृद्धि होनेके कारण इस जलराशिको समुद्र कहते हैं। ‘ऋषि’ धातुका अर्थ गमन है, इसीसे ‘वर्ष’ शब्द बनता है। उन वर्षोंमें चार प्रकारकी प्रजाएँ सुखपूर्वक निवास करती हैं। पूर्व दिशामें चन्द्रमाके उदय होनेपर समुद्र सर्वदा जलसे पूर्ण हो जाता है अर्थात् उसमें ज्वार आ जाता है और वही चन्द्रमा जब अस्त हो जाते हैं तब समुद्रका बढ़ा हुआ जल अत्यन्त क्षीण हो जाता है अर्थात् भाटा हो जाता है। जलकी वृद्धिके समय समुद्र अपनी मर्यादाके भीतर ही बढ़ता है और क्षीण होते समय मर्यादाके अंदर ही उसके जलका क्षय होता है ॥ २१—३१ ॥<br><br>जिस प्रकार चन्द्रमाके उदय होनेपर चन्द्र-किरणोंका जलके साथ संयोग होनेसे जल अपने-आप उछलने लगता है, उसी प्रकार समुद्र भी बढ़ने लगता है। यद्यपि शुक्लपक्ष और कृष्णपक्षमें चन्द्रमाके उदय और अस्त-कालमें जल बढ़ता और घटता है, तथापि समुद्रकी मर्यादामें न्यूनता या अधिकता नहीं दीख पड़ती। चन्द्रमाकी वृद्धि और क्षयके अवसरपर समुद्रका भी उत्कर्ष और अपकर्ष होता है। पानीका यह चढ़ाव-उतार एक सौ पंद्रह अङ्गुलतक बतलाया जाता है। पर्वके अवसरोंपर समुद्रोंके जलोंका यह ज्वारभाटा स्पष्ट दीखनेमें आता है। दो ओर जलसे घिरा होनेके कारण समुद्रस्थ प्रदेशको द्वीप कहते हैं और जलको धारण करनेके कारण समुद्रको उदधि कहा जाता है। (सभी वस्तुओंको) आत्मसात् कर लेनेके कारण ‘गिरि’ और (पृथ्वीके) संधिस्थानको बाँधनेके कारण ‘पर्वत’ नाम पड़ा है। शाकद्वीपमें शाक नामक पर्वत है, इसी कारण उसे शाकद्वीप कहते हैं। कुशद्वीपमें जनपदके मध्यभागमें विशाल कुशस्तम्ब (कुशका गुल्म) है (इसीलिये वह कुशद्वीप कहा जाता है)। क्रौञ्चद्वीपमें क्रौञ्च नामक पर्वत है, अतः उसीके नामपर वह क्रौञ्चद्वीप कहलाता है। शाल्मलद्वीपमें सेमलका महान् वृक्ष है, उसकी वहाँके लोग पूजा करते हैं। (इसीसे उसे शाल्मलद्वीप कहा जाता है।) गोमेदकद्वीपमें गोमेद नामका पर्वत है, अतः उसीके नामपर द्वीपको गोमेदक नामसे पुकारते हैं। पुष्करद्वीपमें कमलके समान बरगदका वृक्ष है, इसी कारण उसे पुष्करद्वीप कहते हैं। वह वटवृक्ष अव्यक्त ब्रह्माके अंशसे समुद्भूत हुआ है, इसीलिये प्रधान-प्रधान |