भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४२६* मत्स्यपुराण *

| तस्मिन् स वसति ब्रह्मा साध्यैः सार्धं प्रजापतिः।<br>तत्र देवा उपासन्ते त्रयस्त्रिंशन्महर्षिभिः॥ ४०<br><br>स तत्र पूज्यते देवो देवैर्महर्षिसत्तमैः।<br>जम्बूद्वीपात् प्रवर्तन्ते रत्नानि विविधानि च॥ ४१ | देवगण उसकी पूजा करते हैं। उस द्वीपमें साध्यगणोंके साथ प्रजापति ब्रह्मा निवास करते हैं। वहाँ महर्षियोंके साथ तैंतीस देवता उपासना करते हैं। वहाँ श्रेष्ठ महर्षियों एवं देवताओंद्वारा देवाधिदेव ब्रह्माकी पूजा की जाती है। जम्बूद्वीपसे अनेकों प्रकारके रत्न (अन्यान्य द्वीपोंमें) प्रवर्तित होते हैं॥ ३२—४१॥ | | द्वीपेषु तेषु सर्वेषु प्रजानां क्रमशैस्तु वै।<br>आर्जवाद् ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च॥ ४२<br><br>आरोग्यायुष्प्रमाणाभ्यां द्विगुणं द्विगुणं ततः।<br>द्वीपेषु तेषु सर्वेषु यथोक्तं वर्षकेषु च॥ ४३<br><br>गोपायन्ते प्रजास्तत्र सर्वैः सहजपण्डितैः।<br>भोजनं चाप्रयत्नेन सदा स्वयमुपस्थितम्॥ ४४ | उपर्युक्त उन सभी द्वीपों और वर्षोंमें क्रमशः प्रजाओंकी सरलता, ब्रह्मचर्य, सत्यवादिता, इन्द्रियनिग्रह, नीरोगता और आयुका प्रमाण एक-दूसरेसे दुगुना बढ़ता जाता है। वे सभी स्वाभाविक ही पण्डित होते हैं, अतः उनके द्वारा स्वयं प्रजाओंकी रक्षा होती रहती है। वहाँ भोजन अनायास ही स्वयं उपस्थित हो जाता है, जो छहों रसोंसे युक्त और महान् बलदायक होता है। उसे ही वहाँके निवासी खाते हैं। | | षड्रसं तन्महावीर्यं तत्र ते भुञ्जते जनाः।<br>परेण पुष्करस्याथ आवृत्त्यावस्थितो महान्॥ ४५<br><br>स्वादूदकसमुद्रस्तु स समन्ताद्वेष्टयन्।<br>स्वादूदकस्य परितः शैलस्तु परिमण्डलः॥ ४६<br><br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते।<br>आलोकस्तत्र चार्वाक् च निरालोकस्ततः परम्॥ ४७ | पुष्करद्वीपके बाद स्वादिष्ट जलसे परिपूर्ण महासागर उस द्वीपको चारों ओरसे घेरकर अवस्थित है। उस स्वादिष्ट जलवाले सागरके चारों ओर एक मण्डलाकार पर्वत है, जो प्रकाश और अन्धकारसे युक्त है। उसीको 'लोकालोक' नामसे पुकारा जाता है। उसका अगला भाग प्रकाशयुक्त तथा पिछला भाग अन्धकारसे आच्छादित रहता है। | | लोकविस्तारमात्रं तु पृथिव्यर्थं तु बाह्यतः।<br>प्रतिच्छन्नं समन्तात् तु उदकेनावृतं महत्॥ ४८<br><br>भूमेर्दशगुणाश्चापः समन्तात् पालयन्ति गाम्। | उसका विस्तार लोकोंके विस्तारके बराबर है, किंतु वह बाहरसे पृथ्वीके अर्धभाग-जितना दीख पड़ता है। वह महान् पर्वत चारों ओर जल-राशिसे आच्छन्न एवं घिरा हुआ है। पृथ्वीसे दसगुना जल चारों ओरसे पृथ्वीकी रक्षा करता है। | | अद्भ्यो दशगुणश्चाग्निः सर्वतो धारयत्यपः॥ ४९<br><br>अग्नेर्दशगुणो वायुर्धारयञ्ज्योतिरास्थितः।<br>तिर्यक् च मण्डलो वायुर्भूतान्यावेष्ट्य धारयन्॥ ५० | जलसे दसगुनी अग्नि सब ओरसे जलको धारण करती है। अग्निसे दसगुनी वायु तेजको धारण करके स्थित है। वह वायुमण्डल तिरछा होकर समस्त प्राणियोंमें प्रविष्ट हो सबको धारण किये हुए है। | | दशाधिकं तथाऽऽकाशं वायोर्भूतान्यधारयत्।<br>भूतानि धारयन् व्योम तस्माद् दशगुणस्तु वै॥ ५१ | वायुसे दसगुना आकाश भूतोंको धारण किये हुए है। | | भूतादितो दशगुणं महद्भूतान्यधारयत्।<br>महत्तत्त्वं ह्यनन्तेन अव्यक्तेन तु धार्यते॥ ५२ | उस आकाशसे दसगुना भूतादि अर्थात् तामस अहंकार है। उस भूतादिसे दसगुना महद्भूत (महत्तत्त्व) है और वह महत्तत्त्व अनन्त अव्यक्तद्वारा धारण किया जाता है। | | आधाराधेयभावेन विकारास्ते विकारिणाम्।<br>पृथ्व्यादयो विकारास्ते परिच्छिन्नाः परस्परम्॥ ५३ | इन विकृतिशील तत्त्वोंके विकार आधाराधेयभावसे कल्पित हैं। ये पृथ्‍वी आदि विकार परस्पर विभक्त हैं, |