भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 437
  • अध्याय १२३ * | ४२७ ---|---:
परस्पराधिकाश्चैव प्रविष्टाश्च परस्परम्।<br>एवं परस्परोत्पन्ना धार्यन्ते च परस्परम्॥ ५४परस्पर एक-दूसरेसे अधिक तथा एक-दूसरेमें घुसे हुए भी हैं। इसी प्रकार ये परस्पर उत्पन्न होते हैं और परस्पर एक-दूसरेको धारण भी करते हैं*॥ ४२—५४॥
यस्मात् प्रविष्टास्तेऽन्योन्यं तस्मात् ते स्थिरतां गताः।<br>आसंस्ते ह्यविशेषाश्च विशेषा अन्यवेशनात्॥ ५५<br><br>पृथ्व्यादयस्तु वाय्वन्ताः परिच्छिन्नास्तु तत्र ते।<br>भूतेभ्यः परतस्तेभ्यो ह्यालोकः सर्वतः स्मृतः॥ ५६<br><br>तथा ह्यालोक आकाशे परिच्छिन्नानि सर्वशः।<br>पात्रे महति पात्राणि यथा ह्यन्तर्गतानि च॥ ५७<br><br>भवन्त्यन्योन्यहीनानि परस्परसमाश्रयात्।<br>तथा ह्यालोक आकाशे भेदास्त्वन्तर्गतागताः॥ ५८<br><br>कृतान्येतानि तत्त्वानि अन्योन्यस्याधिकानि च।<br>यावदेतानि तत्त्वानि तावदुत्पत्तिरुच्यते॥ ५९<br><br>जन्तूनामिह संस्कारो भूतेष्वन्तर्गतेषु वै।<br>प्रत्याख्यायेह भूतानि कार्योत्पत्तिर्न विद्यते॥ ६०<br><br>तस्मात् परिमिता भेदाः स्मृताः कार्यात्मकास्तु वै।<br>ते कारणात्मकाश्चैव स्युर्भेदा महदादयः॥ ६१<br><br>इत्येवं संनिवेशोऽयं पृथ्व्याक्रान्तस्तु भागशः।<br>सप्तद्वीपसमुद्राणां याथातथ्येन वै मया॥ ६२<br><br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव प्रसंख्यानेन चैव हि।<br>विश्वरूपं प्रधानस्य परिमाणैकदेशिनः॥ ६३<br><br>एतावत् संनिवेशस्तु मया सम्यक् प्रकाशितः।<br>एतावदेव श्रोतव्यं संनिवेशस्य पार्थिव॥ ६४चूँकि ये सभी परस्पर एक-दूसरेमें प्रविष्ट-से हैं, इसीलिये स्थिरताको प्राप्त हुए हैं। पहले इनमें कोई विशेषता नहीं थी, परंतु एक-दूसरेमें प्रविष्ट हो जानेसे ये विशिष्ट हो गये हैं। पृथ्वीसे लेकर वायुतकके सभी तत्त्व परस्पर विभक्त हैं। इन तत्त्वोंसे परे सारा जगत् निर्जन है। (अन्य सभी तत्त्व) प्रकाशमान आकाशमें सर्वत्र व्याप्त हैं। जिस प्रकार छोटे-छोटे पात्र बड़े पात्रके अन्तर्गत समा जाते हैं और परस्पर समाश्रयण होनेके कारण एक-दूसरेसे छोटे होते जाते हैं, उसी प्रकार ये सारे भेद प्रकाशमान आकाशके अन्तर्गत विलीन हो जाते हैं। ये तत्त्व परस्पर एक-दूसरेसे अधिक परिमाणवाले बनाये गये हैं। जबतक ये तत्त्व वर्तमान रहते हैं, तभीतक प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है। इस जगत्‌में इन्हीं तत्त्वोंके अन्तर्गत प्राणियोंकी व्यवस्थि‍ति होती है। इन तत्त्वोंका प्रत्याख्यान कर देनेपर किसी प्रकार कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसीलिये वे परिमित (पृथ्वीसे वायुतक) तत्त्व कार्यात्मक कहे जाते हैं तथा महत्तत्त्व आदि भेद कारणात्मक हैं। इस प्रकार विभागपूर्वक पृथ्वीसे आच्छादित मण्डल, सातों द्वीपों और सातों समुद्रोंका यथार्थरूपसे गणनासहित विस्तार एवं मण्डल तथा परिमाणमें एकदेशी प्रधान तत्त्वका इसे विश्वरूप जानना चाहिये। राजन्! मैंने इस मण्डलका यहाँतक सम्यक् प्रकारसे वर्णन कर दिया; क्योंकि मण्डलके वृत्तान्तको यहाँतक ही सुनना चाहिये॥ ५५—६४॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे सप्त द्वीपनिवेशनं नाम त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें सप्तद्वीपनिवेशन नामक एक सौ तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२३॥


* यह वर्णन अन्य पुराणमें भी है। पर इन सबोंका आचार्य यामुनने 'स्तोत्ररत्नम्'में परमात्मसम्बन्धसहित—
'यदण्डमण्डान्तरगोचरं च यद्दशोत्तराण्यावरणानि यानि च। गुणाः प्रधानं पुरुषाः परं पदं परात्परं ब्रह्म च ते विभूतयः॥'
इस एक ही श्लोकमें बड़े संक्षेपमें, पर सुन्दर शब्दों तथा भावोंमें चित्रण कर दिया है।