मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| मानसोत्तरमेरोस्तु अन्तरं त्रिगुणं स्मृतम्।<br>सर्वतो दक्षिणस्यां तु काष्ठायां तन्निबोधत ॥ ४५<br>नव कोट्यः प्रसंख्याता योजनैः परिमण्डलम्।<br>तथा शतसहस्राणि चत्वारिंशच्च पञ्च च ॥ ४६<br>अहोरात्रात् पतङ्गस्य गतिरेषा विधीयते।<br>दक्षिणादिङ्निवृत्तोऽसौ विषुवस्थो यदा रविः ॥ ४७<br>क्षीरोदस्य समुद्रस्योत्तरतोऽपि दिशं चरन्।<br>मण्डलं विषुवच्चापि योजनैस्तन्निबोधत ॥ ४८<br>तिस्रः कोट्यस्तु सम्पूर्णा विषुवस्यापि मण्डलम्।<br>तथा शतसहस्राणि विंशत्येकाधिकानि तु ॥ ४९<br>श्रवणे चोत्तरां काष्ठां चित्रभानुर्यदा भवेत्।<br>गोमेदस्य परे द्वीपे उत्तरां च दिशं चरन् ॥ ५०<br>उत्तरायाः प्रमाणं तु काष्ठाया मण्डलस्य तु।<br>दक्षिणोत्तरमध्यानि तानि विद्याद् यथाक्रमम् ॥ ५१<br>स्थानं जरद्गवं मध्ये तथैरावतमुत्तरम्।<br>वैश्वानरं दक्षिणतो निर्दिष्टमिह तत्त्वतः ॥ ५२<br>नागवीथ्युत्तरा वीथी ह्याजवीथिस्तु दक्षिणा। | मानसोत्तर और मेरु पर्वतके बीचमें पुष्करद्वीपसे तिगुना अन्तर है। अब दक्षिण दिशामें सूर्यकी गतिका परिमाण सुनिये। यह (दक्षिणायन-) मण्डल नौ करोड़ पैंतालीस लाख योजन विस्तृत बतलाया गया है। यह सूर्यकी एक दिन-रातकी गति है। दक्षिणायनसे निवृत्त होकर जब सूर्य विषुव (खगोलीय विषुवद्वृत्त और क्रान्तिवृत्तका कटान-बिन्दु) स्थानपर स्थित होते हैं, तब वे क्षीरसागरकी उत्तर दिशामें भ्रमण करते हैं। अब विषुवन्मण्डलका परिमाण योजनोंमें सुनिये। वह विषुवन्मण्डल तीन करोड़ इक्कीस लाख योजनके परिमाणवाला है। श्रवणनक्षत्रमें जब सूर्य उत्तर दिशामें चले जाते हैं, तब वे गोमेदद्वीपके बादवाले द्वीपकी उत्तर दिशामें भ्रमण करते हैं। अब उत्तर दिशाके मण्डलका तथा दक्षिण और उत्तरके मध्यभागका प्रमाण क्रमशः सुनिये। इनके मध्यमें जरद्गव, उत्तरमें ऐरावत और दक्षिणमें वैश्वानर नामक स्थान सिद्धान्ततः निर्दिष्ट किये गये हैं। उत्तर दिशामें सूर्यके मार्गको नागवीथी तथा दक्षिणदिशाके मार्गको अजवीथी कहते हैं॥ ४३—५२ १/२ ॥ | | उभे आषाढमूलं तु अजवीथ्युदयास्त्रयः ॥ ५३<br>अभिजित्पूर्वतः स्वातिं नागवीथ्युदयास्त्रयः।<br>अश्विनी कृत्तिका याम्या नागवीथ्यस्त्रयः स्मृताः ॥ ५४<br>रोहिण्यार्द्रा मृगशिरो नागवीथिरिति स्मृता।<br>पुष्यश्लेषापुनर्वस्वां वीथी चैरावती स्मृता ॥ ५५<br>तिस्रस्तु वीथयो ह्येता उत्तरो मार्ग उच्यते।<br>पूर्वोत्तरफाल्गुन्यौ मघा चैवार्षभी भवेत् ॥ ५६<br>पूर्वोत्तरप्रोष्ठपदौ गोवीथी रेवती स्मृता।<br>श्रवणं च धनिष्ठा च वारुणं च जरद्गवम् ॥ ५७<br>एतास्तु वीथयस्तिस्रो मध्यमो मार्ग उच्यते।<br>हस्तश्चित्रा तथा स्वाती ह्याजवीथिरिति स्मृता ॥ ५८<br>ज्येष्ठा विशाखा मैत्रं च मृगवीथी तथोच्यते।<br>मूलं पूर्वोत्तराषाढे वीथी वैश्वानरी भवेत् ॥ ५९<br>स्मृतास्तिस्रस्तु वीथ्यस्ता मार्गे वै दक्षिणे पुनः।<br>काष्ठयोरन्तरं चैतद् वक्ष्यते योजनैः पुनः ॥ ६०<br>एतच्छतसहस्राणामेकत्रिंशत्तु वै स्मृतम्।<br>शतानि त्रीणि चान्यानि त्रयस्त्रिंशत्तथैव च ॥ ६१<br>काष्ठयोरन्तरं ह्येतद् योजनानां प्रकीर्तितम्।<br>काष्ठयोर्लेखयोश्चैव अयने दक्षिणोत्तरे ॥ ६२ | दोनों आषाढ़ अर्थात् पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़ और मूल—ये तीनों अजवीथी हैं। अभिजित्, श्रवण और स्वाती—ये तीनों नागवीथी हैं। अश्विनी, भरणी और कृत्तिका—ये तीनों नागवीथी नामसे प्रसिद्ध हैं। रोहिणी, आर्द्रा और मृगशिरा भी नागवीथी कहलाते हैं। पुष्य, श्लेषा और पुनर्वसु—ये तीनों ऐरावती वीथी कहे जाते हैं। ये तीनों वीथियाँ उत्तर दिशाका मार्ग कहलाती हैं। पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी और मघा—ये तीनों 'आर्षभी' वीथी हैं। पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद और रेवती—ये तीनों 'गोवीथी' नामसे पुकारे जाते हैं। श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा—ये तीनों 'जरद्गववीथी' हैं। ये तीनों वीथियाँ मध्यम मार्ग कहलाती हैं। हस्त, चित्रा और स्वाती—ये तीनों 'अजवीथी' कहलाते हैं। ज्येष्ठा, विशाखा और अनुराधा—ये 'मृगवीथी' कहलाते हैं। मूल, पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़—ये 'वैश्वानर'-वीथी हैं। ये तीनों वीथियाँ दक्षिण-मार्गमें बतलायी गयी हैं। अब उत्तर और दक्षिण—दोनों दिशाओंका अन्तर योजनोंमें बतला रहा हूँ। इन दोनों दिशाओंका अन्तर इकतीस लाख तीन हजार छः सौ योजन बतलाया जाता है। अब उत्तरायण और दक्षिणायन-कालमें दोनों दिशाओं और दोनों रेखाओंका |