मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १२४ * | ४३१ |
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| वैवस्वते संयमने मध्याह्ने तु रविर्यदा।<br>सुखायामथ वारुण्यामुत्तिष्ठन् स तु दृश्यते॥ २९<br>विभावर्यामर्धरात्रं माहेन्द्रयामस्तमेव च।<br>सुखायामथ वारुण्यां मध्याह्ने तु रविर्यदा॥ ३०<br>विभावर्यां सोमपुर्यामुत्तिष्ठति विभावसुः।<br>महेन्द्रस्यामरावत्यामुद्गच्छति दिवाकरः॥ ३१<br>सुखायामथ वारुण्यां मध्याह्ने तु रविर्यदा।<br>स शीघ्रमेव पर्येति भानुरालातचक्रवत्॥ ३२ | इसी प्रकार जब सूर्य मध्याह्नकालमें यमराजकी संयमनी-पुरीमें पहुँचते हैं, तब वरुणकी सुखानगरीमें उगते हुए और महेन्द्रकी वस्वौकसारा (अमरावती) पुरीमें अस्त होते हुए दीखते हैं तथा विभावरी पुरीमें आधी रात होती है। जब दोपहरके समय सूर्य वरुणकी सुखानगरीमें पहुँचते हैं, तब चन्द्रदेवकी पुरी विभावरीमें उदय होते हैं। जब सूर्य महेन्द्रकी अमरावतीपुरीमें उदय होते हैं, तब वरुणकी सुखानगरीमें अस्त होते (दीखते) हैं और संयमनीपुरीमें आधी रात होती है। इस प्रकार सूर्य अलातचक्र (जलती बनेठी)-की भाँति बड़ी शीघ्रतासे चक्कर लगाते हैं॥ २६-३२॥ |
| भ्रमन् वै भ्रममाणानि ऋक्षाणि चरते रविः।<br>एवं चतुर्षु पार्श्वेषु दक्षिणान्तेषु सर्पति॥ ३३<br>उदयास्तमये वासावुत्तिष्ठति पुनः पुनः।<br>पूर्वाह्ने चापराह्ने च द्वौ द्वौ देवालयौ तु सः॥ ३४<br>पतत्येकं तु मध्याह्ने भाभिरेव च रश्मिभिः।<br>उदितो वर्धमानाभिर्मध्याह्ने तपसे रविः॥ ३५<br>अतः परं ह्सन्तीभिर्गोभिरस्तं स गच्छति।<br>उदयास्तमयाभ्यां च स्मृते पूर्वापरे तु वै॥ ३६<br>यादृक्पुरस्तात्तपति तादृक्पृष्ठे तु पार्श्वयोः।<br>यत्रोदयस्तु दृश्येत तेषां स उदयः स्मृतः॥ ३७<br>प्रणाशं गच्छते यत्र तेषामस्तः स उच्यते।<br>सर्वेषामुत्तरे मेरुर्लोकालोकस्तु दक्षिणे॥ ३८<br>विदूरभावादर्कस्य भूमेर्लेखावृतस्य च।<br>ह्रियन्ते रश्मयो यस्मात्तेन रात्रौ न दृश्यते॥ ३९<br>ऊर्ध्वं शतसहस्त्रांशुः स्थितस्तत्र प्रदृश्यते।<br>एवं पुष्करमध्ये तु यदा भवति भास्करः॥ ४०<br>त्रिंशद्भागं च मेदिन्या मुहूर्तेन स गच्छति।<br>योजनानां सहस्त्रस्य इमां संख्यां निबोधत॥ ४१<br>पूर्णं शतसहस्त्राणामेकत्रिंशच्च सा स्मृता।<br>पञ्चाशच्च सहस्त्राणि तथान्यान्यधिकानि च॥ ४२<br>मौहूर्तिकी गतिर्ह्यैषा सूर्यस्य तु विधीयते। | इस प्रकार स्वयं भ्रमण करते हुए सूर्य नक्षत्रोंको भी भ्रमण कराते हैं। वे चारों दक्षिणान्त पार्श्व भागोंमें चलते रहते हैं। उदय और अस्तके समय वे पुनः-पुनः उदय और अस्त होते रहते हैं और पूर्वाह्न एवं अपराह्नमें दो-दो देवपुरियोंमें तथा मध्याह्नके समय एक पुरीमें पहुँचते हैं। इस प्रकार सूर्य उदय होकर अपनी बढ़ती हुई तेजस्विनी किरणोंसे दोपहरके समय तपते हैं और उसके बाद धीरे-धीरे ह्रासको प्राप्त होती हुई उन्हीं किरणोंके साथ अस्त हो जाते हैं। सूर्यके इसी उदय और अस्तसे पूर्व और पश्चिम दिशाका ज्ञान होता है। यों तो सूर्य जैसे पूर्व दिशामें तपते हैं, उसी तरह पश्चिम तथा पार्श्वभाग (उत्तर और दक्षिण)-में भी प्रकाश फैलाते हैं, परंतु उन दिशाओंमें जहाँ सूर्यका उदय दीखता है, वही उदय-स्थान कहलाता है तथा जिस दिशामें सूर्य अदृश्य हो जाते हैं, उसे अस्त-स्थान कहते हैं। मेरुपर्वत सभी पर्वतोंसे उत्तर तथा लोकालोक पर्वत दक्षिण दिशामें स्थित है, इसलिये सूर्यके बहुत दूर हो जाने तथा पृथिवीकी छायासे आवृत होनेके कारण उनकी किरणें अवरुद्ध हो जाती हैं, इसी कारण सूर्य रातमें नहीं दीख पड़ते। इस प्रकार एक लाख किरणोंसे सुशोभित सूर्य जब पुष्करद्वीपके मध्यभागमें पहुँचते हैं, तब वहाँ ऊँचाईपर स्थित होनेके कारण दीख पड़ते हैं। सूर्य एक मुहूर्त (दो घड़ी)-में पृथिवीके तीसवें भागतक पहुँच जाते हैं। उनकी गतिका प्रमाण योजनोंके हजारोंकी गणनामें सुनिये। सूर्यकी एक मुहूर्तकी गतिका परिमाण इकतीस लाख पचास हजार योजनसे भी अधिक बतलाया जाता है॥ ३३-४२ १/२॥ |
| एतेन क्रमयोगेन यदा काष्ठां तु दक्षिणाम्॥ ४३<br>परिगच्छति सूर्योऽसौ मासं काष्ठामुदग्दिनात्।<br>मध्येन पुष्करस्याथ भ्रमते दक्षिणायने॥ ४४ | इसी क्रमसे जब सूर्य दक्षिण दिशामें जाते हैं, तब (वहाँ छह महीनेतक भ्रमण करनेके पश्चात् पुनः) सातवें मासमें उत्तर दिशाकी ओर लौटते हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य पुष्करद्वीपके मध्यमें भ्रमण करते हैं। |