मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४३० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्याश्चार्धप्रमाणं च मेरोर्वै चतुरन्तरम्।<br>मेरोर्मध्यात् प्रतिदिशं कोटिरेका तु सा स्मृता॥ १३<br>तथा शतसहस्राणामेकोननवतिं पुनः।<br>पञ्चाशच्च सहस्राणि पृथिव्याः स तु विस्तरः॥ १४<br>पृथिव्या विस्तरं कृत्स्नं योजनैस्तन्निबोधत।<br>तिस्रः कोट्यस्तु विस्तारात्संख्यातास्तु चतुर्दिशम्॥ १५<br>विस्तारं त्रिगुणं चैव पृथिव्यन्तरमण्डलम्।<br>गणितं योजनानां तु कोट्यस्त्वेकादश स्मृताः॥ १६<br>तथा शतसहस्राणां सप्तत्रिंशाधिकास्तु ताः।<br>इत्येतद्वै प्रसंख्यातं पृथिव्यन्तरमण्डलम्॥ १७<br>तारकासंनिवेशस्य दिवि यावत्तु मण्डलम्।<br>पर्यांसः संनिवेशस्य भूमेस्तावत्तु मण्डलम्॥ १८<br>पर्यांसपरिमाणं च भूमेस्तुल्यं दिवः स्मृतम्।<br>समानापि लोकानामेतन्मानं प्रकीर्तितम्॥ १९<br>ज्योतिर्गणप्रचारस्य प्रमाणं परिवक्ष्यते।<br>मेरोः प्राच्यां दिशायां तु मानसोत्तरमूर्धनि॥ २०<br>वस्वौकसारा माहेन्द्री पुण्या हेमपरिष्कृता।<br>दक्षिणेन पुनर्मेरोर्मानसस्य तु पृष्ठतः॥ २१<br>वैवस्वतो निवसति यमः संयमने पुरे।<br>प्रतीच्यां तु पुनर्मेरोर्मानसस्य तु मूर्धनि॥ २२<br>सुखा नाम पुरी रम्या वरुणस्यापि धीमतः।<br>दिश्युत्तरस्यां मेरोस्तु मानसस्यैव मूर्धनि॥ २३<br>तुल्या महेन्द्रपुर्यापि सोमस्यापि विभावरी।<br>मानसोत्तरपृष्ठे तु लोकपालाश्चतुर्दिशम्॥ २४<br>स्थिता धर्मव्यवस्थार्थं लोकसंरक्षणाय च।<br>लोकपालोपरिष्टात् तु सर्वतो दक्षिणायने॥ २५<br>काष्ठागतस्य सूर्यस्य गतिस्तत्र निबोधत।<br>दक्षिणोपक्रमे सूर्यः क्षिप्तेषुरिव सर्पति॥ २६ | उसका आधा भाग मेरु पर्वतके उत्तरोत्तर फैला हुआ है और मेरु पर्वतके मध्यभागमें वह चारों ओर एक करोड़ योजन विस्तारवाली कही जाती है। इसी तरह पृथ्वीके अर्धभागका विस्तार नवासी लाख, पचास हजार योजन बतलाया जाता है। अब योजनके परिमाणसे पृथ्वीके समूचे विस्तारको सुनिये। इसका विस्तार चारों दिशाओंमें तीन करोड़ योजन माना गया है। यही सातों द्वीपों और समुद्रोंसे घिरी हुई पृथ्वीका विस्तार है। पृथ्वीका आन्तरिक मण्डल बाह्य मण्डलसे तिगुना अधिक है। इस प्रकार उसका परिमाण ग्यारह करोड़ सैंतीस लाख योजन माना गया है। यही पृथ्वीके आन्तरिक मण्डलकी गणना की गयी है। आकाश-मण्डलमें जितने तारागणोंकी स्थिति है, उतना ही समग्र पृथ्वीमण्डलका विस्तार माना गया है। इस प्रकार पृथ्वीमण्डलके परिमाणके बराबर आकाशमण्डल भी है। अब ज्योतिर्गणके प्रचारकी बात सुनिये। मेरु पर्वतकी पूर्व दिशामें मानसोत्तर पर्वतके शिखरपर वस्वौकसारा नामकी महेन्द्रकी पुण्यमयी नगरी है, जो सुवर्णसे सुसज्जित है। पुनः मेरुकी दक्षिण दिशामें मानसपर्वतके पृष्ठभागपर संयमनी पुरी है, जिसमें सूर्यके पुत्र यमराज निवास करते हैं। पुनः मेरुकी पश्चिम दिशामें मानसपर्वतके शिखरपर बुद्धिमान् वरुणकी सुखा नामकी रमणीय पुरी है। मेरुकी उत्तर दिशामें मानसपर्वतके शिखरपर महेन्द्रपुरीके समान चन्द्रदेवकी विभावरी पुरी है। उसी मानसोत्तर पर्वतके पृष्ठभागकी चारों दिशाओंमें लोकपालगण धर्मकी व्यवस्था और लोकोंकी रक्षा करनेके लिये स्थित हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य उन लोकपालोंसे ऊपर होकर भ्रमण करते हैं॥ १०—२५॥<br><br>दक्षिण दिशाका आश्रय लेनेपर सूर्यकी जैसी गति होती है, उसे सुनिये। दक्षिणायनकालमें सूर्य छोड़े गये बाणकी तरह शीघ्रगतिसे चलते हैं। वे ज्योतिष्चक्रको सदा साथ लिये रहते हैं। (इस प्रकार भ्रमण करते हुए) |
| ज्योतिषां चक्रमादाय सततं परिगच्छति।<br>मध्यगश्चामरावत्यां यदा भवति भास्करः॥ २७ | जिस समय सूर्य अमरावती पुरीमें पहुँचते हैं, उस समय वे गगनमण्डलके मध्यभागमें रहते हैं अर्थात् मध्याह्न होता है। उसी समय वे यमराजकी संयमनीपुरीमें |
| वैवस्वते संयमने उद्यन् सूर्यः प्रदृश्यते।<br>सुखायामर्धरात्रस्तु विभावर्यास्तमेति च॥ २८ | उदित होते हुए और विभावरी नगरीमें अस्त होते हुए दीखते हैं तथा सुखा नगरीमें आधी रात होती है। |