मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय १२४ * | ४२९
एक सौ चौबीसवाँ अध्याय
सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इसके बाद अब मैं सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन कर रहा हूँ। ये सूर्य और चन्द्रमा सातों द्वीपों एवं सातों समुद्रोंके विस्तारको तथा समग्र भूतलके अर्धभागको और उसके बाहरके अन्य प्रदेशोंको ये अपने प्रकाशसे उद्भासित करते हैं। ये विश्वकी अन्तिम सीमातक प्रकाश फैलाते हैं। तुलना परिभ्रमणके प्रमाणको लेकर ही विद्वान् लोग आकाशकी करते हैं। सूर्य सामान्यतः तीनों लोकोंमें शीघ्रतापूर्वक भ्रमण करते हैं। 'अव' धातु रक्षण और प्रकाशार्थक है। प्रकाश फैलाने तथा प्राणियोंकी रक्षा करनेके कारण सूर्यको 'रवि' कहा जाता है। पुनः सूर्य और चन्द्रमाका प्रमाण बतला रहा हूँ। महनीय होनेके कारण पृथ्वीके लिये 'मही' शब्दका प्रयोग किया जाता है। अब भारतवर्षका तथा सूर्य-मण्डलके व्यासका परिमाण योजनोंमें बतला रहा हूँ, उसे सुनिये। सूर्य-मण्डलका परिमाण नौ हजार योजन है। इस मण्डलमें परिणाह (घेरा) विस्तारसे तिगुना अर्थात् सत्ताईस हजार योजन है। व्यास और मण्डलकी दृष्टिसे भी सूर्यसे चन्द्रमा बहुत छोटे हैं। पुनः सातों द्वीपों और समुद्रोंसहित पृथ्वीमण्डलके विस्तारका प्रमाण, जिन्हें विद्वानोंने पुराणोंमें बतलाया है, (योजनोंकी संख्यामें) बतला रहा हूँ॥१—९॥ <br><br> पूर्वकालमें जो पुराणोंके ज्ञाता हो चुके हैं, वे भी आजकलके पुराणोंके तुल्य ही थे। पूर्वकालके विद्वान् एवं आधुनिक विद्वान्—दोनोंके मत इस विषयमें समान हैं। अतः वर्तमानकालिक विद्वानोंके अनुसार भूतलका परिमाण बतला रहा हूँ। आधुनिक विद्वानोंने दिव्यलोककी स्थितिको भी पृथ्वीमण्डलके बराबर ही माना है। समूची पृथिवी पचास करोड़ योजनोंमें विस्तृत मानी गयी है। | | अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम्।<br>सूर्याचन्द्रमसावेतौ भ्रमन्तौ यावदेव तु॥१¹<br>सप्तद्वीपसमुद्राणां द्वीपानां भाति विस्तरः।<br>विस्तरार्थं पृथिव्यास्तु भवेदन्ध्रत्र बाह्यतः॥२<br>पर्याप्तपरिमाणं च चन्द्रादित्यौ प्रकाशतः।<br>पर्याप्तपारिमाण्यात्तु भूमेस्तुल्यं दिवः स्मृतम्॥३<br>भवति त्रीणि माँल्लोकान् सूर्यो यस्मात् परिभ्रमन्।<br>अव धातुः प्रकाशाख्यो अवनात्तु रविः स्मृतः॥४<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रमाणं चन्द्रसूर्ययोः।<br>महित्वान्महीशब्दो ह्यस्मिन्नर्थे निगद्यते॥५<br>अस्य भारतवर्षस्य विष्कम्भं तु सुविस्तरम्।<br>मण्डलं भास्करस्याथ योजनैस्तन्निबोधत॥६<br>नवयोजनसाहस्रो विस्तारो भास्करस्य तु।<br>विस्तारात् त्रिगुणश्चापि परिणाहोऽत्र मण्डले॥७<br>विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव भास्कराद् द्विगुणः शशी।<br>अतः पृथिव्या वक्ष्यामि प्रमाणं योजनैः पुनः॥८<br>सप्तद्वीपसमुद्राया विस्तारो मण्डलस्य तु।<br>इत्येतदिह संख्यातं पुराणे परिमाणतः॥९<br>तद्वक्ष्यामि प्रसंख्याय साम्प्रतं चाभिमानिभिः।<br>अभिमानिनो ह्यतीता ये तुल्यास्ते साम्प्रतैस्त्विह॥१०<br>देवा ये वै ह्यतीतास्तु रूपैर्नामभिरेव च।<br>तस्माद्वै साम्प्रतैर्देवैर्वक्ष्यामि² वसुधातलम्॥११<br>दिव्यस्य संनिवेशो वै साम्प्रतैरेव कृत्स्नशः।<br>शतार्धकोटिविस्तारा पृथिवी कृत्स्नशः स्मृता॥१२ | |
१. इस अध्यायके सभी श्लोक वायुपु० ५०।५६—१६९ (किसी प्रतिमें ५१।१—११३) तथा ब्रह्माण्डपुराणसे सर्वांशमें मिल जाते हैं। उनके श्लोक विशेष शुद्ध हैं।
२. यहाँ 'विद्वांसो ह वै देवाः' के अनुसार विद्वान् ही देवता हैं।